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Hindi Section ( 25 May 2013, NewAgeIslam.Com)

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Joining Islam Is Like Joining an Army पाकिस्तान में रहना है तो इस्लाम पर अमल करना होगा

 

अनवर ग़ाज़ी

12 मई, 2013

 ''ये इस्लाम के मानने वालों की धरती है। पाकिस्तान की स्थापना करने वालों ने पाकिस्तान को लिबरलिज़्म के लिए नहीं बनाया था। लिबरल होने का मतलब अमेरिका और यूरोप की ग़ुलामी है। जो अपने को उदार कहते हैं, वो अपना नाम अल्पसंख्यकों में दर्ज करा लें। "ये शब्द सैय्यद मुनव्वर हसन के हैं, जो उन्होंने मज़ारे क़ाएद पर कहे।

पाठकों! इन दिनों ये बहस जोरों पर है और इसमें इज़ाफ़ा ही होता जा रहा है, पाकिस्तान बनाने का मकसद क्या था? और इसमें व्यवस्था क्या होनी चाहिए? सेकुलर लोग ये प्रचार कर रहे हैं पाकिस्तान में धर्म का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, सिर्फ इसी तरह देश तरक्की कर सकता है और वो इसके लिए बतौर दलील पश्चिम को पेश करते हैं। इन वर्गों को ये मुश्किल इसलिए पेश आ रही है कि पश्चिम एक लंबे समय तक 'धार्मिक' था, लेकिन वहाँ पुरोहितवाद ने उदारवादियों को विद्रोही बना दिया।

पंद्रहवीं सदी के खगोल विज्ञान विशेषज्ञ और प्रसिद्ध दार्शनिक ''गैलीलियो'' (Galileo) के सिद्धांत कि ''पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है न कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है।" उस समय पेश किया था जब कहा जाता था धरती स्थिर है और पृथ्वी ही ब्रह्मांड का केन्द्र है। इस समय वहाँ पुरोहितवाद का बहुत अधिक असर था। इस दृष्टिकोण को कोई स्वीकार करने के लिए तैयार न था। इसके इल्ज़ाम में गैलिलियो को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। जेल में डाला गया। जब अदालत में पेश किया गया तो गैलीलियो ने जज के सामने अस्पष्ट शब्द का इस्तेमाल करते हुए अपनी गलती स्वीकार तो कर ली लेकिन जब परिसर से बाहर निकले तो ज़बान से ये निकला "सच तो ये है कि पृथ्वी घूमती है। इससे इन्कार कोई मजनू ही कर सकता है।"

पश्चिमी देशों में सारी ताक़त और शक्ति का स्रोत धार्मिक समुदाय माना जाता था और ये धार्मिक वर्ग विकास का विरोधी था। ये धार्मिक वर्ग इतना मज़बूत था कि ये चाहता तो हलाल को हराम करार देता और हराम को हलाल बताता। ये लोगों में बख्शिश (माफी) के परवाने जारी करता। उसने लोगों का शोषण किया था। ये ईसाई धार्मिक वर्ग अपनी मनमानी से धर्म की भयानक व्याख्या करता था। जो उनकी मर्जी में आता था, उसे धर्म का नाम देकर लोगों का शोषण करते थे। उन्होंने विकास और समृद्धि के सभी रास्ते बंद कर रखे थे।

"धर्म" के नाम पर ईसाई धार्मिक वर्ग ने अपने लोगों का शोषण कर रखा था, लेकिन इसके मुक़ाबले में इस्लाम और मुसलमानों के इतिहास को देख लें। इस्लाम स्थिर धर्म नहीं है। ये हर युग और हर दौर के लिए स्वीकार्य है। जब भी मुसलमानों की हुकूमत आई, मुसलमान दुनिया की विकसित क़ौम बन गयी। खिलाफते राशिदा इस्लामी व्यवस्था की व्यवहारिक मिसाल थी। इसमें जितनी तरक्की हुई, उससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। वो आधुनिक कानून जो आज यूरोप में "उमर लाज़" के नाम से मौजूद हैं, मुसलमान खलीफा ही का कारनामा था।

दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि इस्लाम की सभी शिक्षाएं आज भी वैसे ही हैं, जैसे आज से 14 सौ साल पहले थीं। कोई इस्लामी धार्मिक वर्ग ऐसा नहीं कर सकता कि धर्म की अपनी मनमानी व्याख्या करे। अगर कोई ऐसा करता है, तो उसके मुक़ाबले में उलमाए हक़ मैदान में निकल आते हैं। ये इस धर्म पर अल्लाह की विशेष मेहरबानी है कि कोई उसे अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ अपने हित के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता।

असल यही वो फर्क है जो सेकुलर ताक़तों को समझ नहीं आ रहा। जिस दिन उन्हें मालूम हो जाएगा कि पश्चिमी धार्मिक वर्ग और पूर्वी धार्मिक वर्ग में ज़मीन आसमान का अंतर है, तब उनकी मानसिक गंदगी खुद बखुद खत्म हो जाएगी। फिर ये बात भी याद रखनी चाहिए कि आखिर सेकुलर तब्का क्यों इस बात पर तुला हुआ है कि यहाँ की व्यवस्था सेकुलर होनी चाहिए, जबकि हमारे पास सर्वसम्मति वाला संविधान मौजूद है। ऐसा संविधान जिसे दुनिया का सबसे अच्छा संविधान कहा जा सकता है। पाकिस्तान के सेकुलर वर्ग को आखिर पाकिस्तान की इस्लामी पहचान से क्या मुश्किल हो रही है?

क्या पाकिस्तान की सभी समस्याओं का कारण इस्लाम है? पाकिस्तान के इन वर्गों को पता है कि पाकिस्तान में 65 वर्षों में अक्सर शासन सेकुलर दिमाग वाले शासकों ने ही किया है। अगर सिर्फ सेकुलरिज़्म से देश चलते तो पाकिस्तान दुनिया के बेहतरीन देशों में से होता। हम पहले भी ये कई बार कह चुके हैं पाकिस्तान और पश्चिम की तुलना करना इसलिए भी उचित नहीं कि हमारी और उनकी बुनियाद में ज़मीन आसमान का अंतर है। उनके पास कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि हम एक शानदार अतीत रखने वाली व्यवस्था के अलमबरदार हैं। इसी तरह अगर पाकिस्तान के संविधान को न मानने के इल्ज़ाम में सूफी मोहम्मद घातक करार पाते हैं तो फिर ये सेकुलर वर्ग पाकिस्तान के संविधान की उपस्थिति में दूसरी व्यवस्थाओं की बात क्यों करते हैं?

उनके मन की एक समस्या ये भी है कि उन्होंने इस्लाम का अध्ययन नहीं किया है। उनका मानना ​​है इस्लामी व्यवस्था के आने से सब कुछ पलट जाएगा। अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होगा। उन्हें दीवार से लगा दिया जाएगा। उन्हें ज़बरदस्ती दाढ़ियाँ रखवाई जाएंगी। उन्हें मस्जिदों की तरफ जबरदस्ती जाने पर मजबूर किया जाएगा। हालांकि उन्हें पता नहीं कि इस्लाम में कोई ज़बरदस्ती नहीं। खासकर गैरमुस्लिमों के लिए इस्लाम के कानून हैं। उन्हें अपने धर्म का पालन करने की पूरी आज़ादी है। हाँ! अगर कोई मुसलमान अपने आपको "मुसलमान" कहकर भी इस्लाम के सिद्धांत के अनुसार न चले उसके लिए ज़रूर कुछ नियम निर्धारित हैं और इसकी मिसाल बिल्कुल ऐसी है जिस तरह किसी देश की सेना होती है। उसका अनुशासन होता है। अब अगर कोई व्यक्ति उठ खड़ा हो और कहना शुरू कर दे कि ये फौज अपने सिपाहियों और अफसरों पर अत्याचार करती है। क्यों सुबह उन्हें उठाकर उनसे कई किलोमीटर दौड़ लगवाई जाती है? क्यों उन्हें कड़ी गर्मी और सर्दी में मार्च कराया जाता है? क्यों उन्हें उनकी गलतियों पर सजा दी जाती है? क्यों उन्हें बड़ी गलती पर कोर्ट मार्शल किया जाता है? क्यों किसी और देश के साथ वफादारी के मामले में उन्हें मौत का सामना करना पड़ता है? क्योंकि सेना में भर्ती होने के लिए किसी पर ज़बरदस्ती नहीं की जाती। जो खुद अपनी मर्ज़ी से जाता है, उसे इन सब बातों, समस्याओं और निर्देशों की जानकारी होती है। यही मिसाल इस्लाम की है। इस पाकिस्तान की है।

अगर किसी ने इस्लाम क़ुबूल नहीं किया है तो यहाँ पर कोई जोर ज़बरदस्ती नहीं और इस्लामी हुकूमतों में उन्हें पूरी सुरक्षा हासिल रही है, लेकिन जिसने इस्लाम स्वीकार किया है, उसके लिए ज़रूर इस्लाम कुछ नियम निर्धारित करता है और ये नियम अत्याचार की श्रेणी में नहीं आते, बल्कि मानवता के अस्तित्व के लिए होते हैं। अगर अमेरिका व ब्रिटेन के इंसानों ने कुछ नियम निर्धारित तय कर रखे हैं और उसे वहां के लोग हर्ज़े जान बनाते हैं तो क्यों न हम दुनिया की सर्वश्रेष्ठ हस्ती मोहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की लाई हुई व्यवस्था को अपने लिए सरमाया बनाएं। अब अगर कोई व्यक्ति अपने आपको हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की लाई हुई व्यवस्था का पाबंद नहीं समझता। उसे इस पाबंदी में कठिनाइयों पेश आती हैं तो उसके लिए इससे अच्छी सलाह क्या हो सकती है कि वो अपना नाम अल्पसंख्यकों में दर्ज करा ले।

12 मई, 2013 स्रोत: जंग, कराची

 

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