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Hindi Section ( 26 Jan 2013, NewAgeIslam.Com)

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Misleading And Misplaced Ideas Of Punjabi Taliban's Emir On Democracy PART 1 लोकतंत्र से सम्बंधित अमीर पंजाबी तालिबान के जाहिलाना दृष्टिकोण ... क़िस्त- 1

 

न्यु एज इस्लाम एडिट डेस्क

25 जनवरी, 2013

इस लेख के लेखक मौलाना अस्मतुल्लाह मुआविया हैं जो प्रतिबंधित संगठन सिपाहे सहाबा के पूर्व प्रमुख थे और वर्तमान में पंजाबी तालिबान के अमीर यानी पाकिस्तानी मुसलमानों के तथाकथित अमीरुल मोमिनीन हैं। इस संगठन का मोडस आपरेन्डी ये है कि ये लोग अमेरिका विरोध के नाम पर और अमेरिका से जंग है। और ये अमेरिका के खिलाफ जेहाद के नाम पर चंदा बटोरने और नौजवान मुसलमानों की खेप तैयार करते हैं और इस दौलत और अतिरिक्त कार्यबल का इस्तेमाल पाकिस्तान में अपनी सियासी दुकान चमकाने के मकसद से सम्प्रदायिक नफरत फैलाते और मासूम मसलानों समेत औरतों और बच्चों को आत्मघाती हमलों में मारते हैं। शियों, अहमदियों, हिंदुओं, ईसाइयों और सूफियों के खिलाफ उन्होंने जिहाद 'छेड़ रखा है। पाकिस्तानी हुकूमत को उन्होंने काफिरों की सरकार घोषित कर दिया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और अन्य सभी मुस्लिम मंत्री उनकी नज़र में काफ़िर हैं। रिहायशी इलाकों और बाजारों में आम मुसलमानों को आत्मघाती हमलों में मारना उनके मुताबिक़ इस्लाम है और आला दर्जे का जिहाद है जैसा उनके साथी अलअबीरी ने अपने लेख में साबित करने की कोशिश की है।

उक्त लेख का एक बड़ा हिस्सा शेर और भावनात्मक नारों और बातों पर आधारित है। इसका दूसरा हिस्सा पाकिस्तान के राजनीतिक और आर्थिक स्थिति पर पर मगरमच्छ के आँसुओं पर आधारित है और बाक़ी हिस्सा पाकिस्तान में इस्लामियत और शरीयत के खयाली कशमकश पर आधारित है।

अगर हम बुराई के तूफाने बदतमीज़ी पर खामोश रहें, और रब की बग़ावत पर मसलहेत और अनदेखी, जबान बंदी से काम लेते रहें, तो निश्चित रूप से नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने जो फरमाया, कि फिर अज़ाब का हमें इंतेजार करना होगा। क्यों न इस अस्थायी जान को राहे ख़ुदा की नज़र कर दिया जाए। ऐसी बुनियाद में अपना खून दे जाएं जिसकी इमारत 'इमारते इस्लामी' कहलाए और व्यवस्था 'इस्लामी व्यवस्था' कहलाए। रब का कलमा बुलंद हो। शरीयत लागू नज़र आए।

मौलाना के अनुसार पाकिस्तान रब से बगावत कर रही है इसलिए उसका विरोध करना हमारा फर्ज़ है। और इस विरोध का एक ही तरीका है आत्मघाती हमले, हिंसा, मंत्रियों, सैनिकों, अधिकारियों और निहत्थे लोगों का क़त्ल। वो कहते हैं कि पाकिस्तान में इस्लामी व्यवस्था कायम करने के लिए अपने खून की क़ुर्बानी दो क्योंकि सिर्फ इस्लामी व्यवस्था ही पाकिस्तान की सारी समस्याओं का हल है। जबकि सच्चाई ये है कि पाकिस्तान में इस्लामी सरकार कायम है। यहां हुदूद कानून, तौहीने रिसालत कानून और अहमदिया मुखिफ कानून लागू है और देश का नाम इस्लामी गणतंत्र पाकिस्तान है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सभी मंत्री और अधिकारी मुसलमान हैं, लेकिन फिर भी तालिबानी नेता अस्मतुल्लाह मुआविया के अनुसार पाकिस्तान की मौजूदा सरकार काफिरों की सरकार है।

वो पाकिस्तान में नेताओं के भ्रष्टाचार, बढ़ती गरीबी आदि पर मातम करते हैं, लेकिन इसका सिर्फ एक ही इलाज बताते हैं और वो है हिंसा। उनके अनुसार सिर्फ खून खराबा से ही इक़लाब आ सकता है। चाहे इस खून खराबे में बेशुमार मासूम औरतें, बच्चें, बूढ़े और निहत्थे लोगों की मौत हो जाये। उनकी इस तकरीर से ये भी स्पष्ट होता है कि उनके पास भावनात्मक नारों के अलावा पाकिस्तान की समस्याओं के समाधान के लिए कोई ठोस रणनीति नहीं हैं। उनके पास बस एक भावनात्मक नारा है, इस्लामी शरीयत और इस्लामी व्यवस्था का जो उनके अनुसार केवल तालिबान ही दे सकता है। पाकिस्तान की मौजूदा व्यवस्था इस्लामी व्यवस्था नहीं है।

तालिबान ने कभी भी देश के निर्माण और समाज के सुधार के शांतिपूर्ण प्रयास का समर्थन नहीं किया। अफग़ानिस्तान में भी उसने लोकतांत्रिक गठबंधन में शामिल होने से इनकार कर दिया। कारण वही बताया कि ये गठबंधन सरकार कुफ़्र की सरकार है। पाकिस्तान में भी अस्मतुल्लाह मुआविया किसी भी शांतिपूर्ण आंदोलन में शामिल होने से इनकार करते हैं। अगर वो पाकिस्तान में भ्रष्टाचार, गरीबी और शोषण का अंत करना चाहते हैं तो ताहिरूल क़ादरी का समर्थन क्यों नहीं किया या खुद शांतिपूर्ण आंदोलन क्यों नहीं चलाते?

इस लेख में उन्होंने कहीं भी शियों, ईसाइयों, हिन्दुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ कुछ नहीं कहा है जबकि कुफ्र के खात्मे के नाम पर एक तरफ तो वो पाकिस्तान हुकूमत से संघर्षरत हैं तो दूसरी ओर वो शियों का नरसंहार कर रहे हैं क्योंकि उनकी नज़र में वो भी काफ़िर हैं। सूफियों की दरगाह हमेशा उनके निशाने पर रहती है जिन पर आत्मघाती हमलों के नतीजे में बेश्मार मासूम ज़ायरीन (तीर्थ यात्री) मारे जाते हैं। उनके संगठन तालिबान ने पाकिस्तान में आंतरिक उत्पात मचा रखा है और बड़ी चालाकी से खुद ही कहते हैं कि कौन लोग पाकिस्तान में उत्पात मचा रहे हैं। आज पाकिस्तान को जिन समस्याओं का सामना है उनमें से ज़्यादातर समस्याएं तालिबान की पैदा की हुई हैं।

जिन्ना पाकिस्तान को भारत की ही तरह एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनाना चाहते थे मगर धार्मिक लॉबी के दबाव में पाकिस्तान लगातार धार्मिक सांप्रदायिकता की ओर बढ़ता चला गया और फिर इस धार्मिक सम्प्रदायिकता ने साम्प्रदायिक नफरत को जन्म दिया। जिसकी आग में एक के बाद एक संप्रदाय जलता चला गया। अहमदियों, शियों, ईसाइयों और हिंदुओं का जीना दूभर हो गया। और इस सभी धार्मिक नफरत को बढ़ावा देने में तालिबान और उसके वैचारिक साथी संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए, पाकिस्तान के प्रारंभिक धर्मनिरपेक्ष मंत्रालय में जिन्ना ने जिन हिंदू, अहमदी और अंग्रेज़ लोगों को मंत्रालय और विभाग सौंपे थे उन्हें मौलाना अस्मतुल्लाह अंग्रेजों का थोपा हुआ कहते हैं। जो एक गुमराह करने वाली बात है। पाकिस्तान में जिन्ना को छोड़कर कोई नेता या बुद्धिजीवी नहीं था जो इसे एक मजबूत नेतृत्व प्रदान कर सकता। बस मौलाना अस्मतुल्लाह मुआविया जैसे भावनात्मक भाषण देने वाले मौलाना थे जिनके पास न तो राजनीतिक दूरदर्शिता थी और न वो प्रशासनिक और आर्थिक मामलों में विशेषज्ञता रखते थे। वो सिर्फ पाकिस्तान के प्रमुखों को अपनी मांगें पेश करते थे कि ऐसा होना चाहिए, ऐसा नहीं होना चाहिए और जिन्ना को ब्लैक मेल करते थे। वो कहते हैं कि:

''पाकिस्तान की पहली आर्थिक कमेटी के पंद्रह सदस्यों में से ग्यारह अमेरिका के थोपे गए थे।

ज़ाहिर है इस वक्त पाकिस्तान में इतने विशेषज्ञ नहीं थे कि उन्हें आर्थिक कमेटी का सदस्य बनाया जाता। इसलिए ऐसा करना उस वक्त की पाकिस्तान सरकार की मजबूरी थी। और फिर ब्रिटिश सरकार अपनी पूर्व कॉलोनी में अमेरिकी अधिकारियों को क्यों थोपते। मगर तालिबानियों पाकिस्तानी हुक्मरानों को हर चीज़ में अमेरिका का भूत नज़र आता है।

इसी तरह बँटवारे के लिए सरहदों की पहचान की नौबत आई तो पाकिस्तानी नेताओं के पास न कोई ब्ल्यु प्रिंट था और न आंकड़े थे जिसकी बिना पर वो मुस्लिम बहुल इलाकों पर अपना दावा पेश कर सकते जबकि वो बरसों से पाकिस्तान की मांग करते आ रहे थे। इस बारे में अगर थोड़ी बहुत बुद्धिमत्ता किसी ने दिखाई तो वो थे ज़फ़रुल्लाह खान जो अहमदी थे और विदेश मंत्री थे। उन्होंने बाउण्ड्री कमेटी के सामने हाज़िर होकर अपनी हैसियत भर ज़्यादा से ज़्यादा इलाकों को पाकिस्तान में शामिल करवाने की कोशिश की। मगर उनके अहमदी होने के कारण पाकिस्तान के ये साम्प्रदायिक नेता उनसे एहसानमंदी  का इज़हार नहीं कर सकते।

एक और खयाल जो उन्होंने बना रखा है वो ये है कि लोकतंत्र इस्लाम विरोधी और काफ़िराना व्यवस्था है और सिर्फ इस्लामी खिलाफत ही एकमात्र शासन का तीरका है जो इस्लामी समाज के लिए आवश्यक है और लोकतंत्र काफिरों की हुकूमत है। वो कहते हैं,

'लोकतंत्र और तानाशाही के इस चूहे बिल्ली के खेल में जनता को तमाशा बना दिया गया। आखिर कब तक हम तानाशाही और लोकतंत्र जैसे इस्लाम विरोधी ज़ालिम व्यवस्थाओं में घुन की तरह पिसते रहेंगे।

मौलाना के लिए तानाशाही और लोकतंत्र दोनों इस्लाम विरोधी हैं क्योंकि उनके इल्म और विश्वास के अनुसार लोकतंत्र पश्चिम की पैदावार है जबकि तथ्य ये हैं कि लोकतंत्र का जन्म ग्रीस के एथेंस में हुआ। ये अलग बात है कि दुनिया के अधिकांश यूरोपीय और गैर मुस्लिम देशों ने लोकतांत्रिक सरकार को अपनाया है। चूंकि अमेरिका और ब्रिटेन में भी लोकतंत्र है इसलिए उनकी नज़र में लोकतंत्र पश्चिमी सभ्यता की ईजाद है और काफ़िराना व्यवस्था है।

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