कुलदीप तलवार
7 जनवरी, 2013
(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)
पाकिस्तान सांप्रदायिकता, जातीय और राजनीतिक हिंसा की चपेट में आ चुका है। वहाँ कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता जब तालिबान मस्जिदों, इमाम बाड़ों, दरगाहों, गिरजाघरों, मंदिरों, गुरुद्वारों, लड़कियों के स्कूलों, मीडिया वालों, अल्पसंख्यक वर्गों, पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को निशाना बनाकर आत्मघाती हमले न किए जा रहे हों। अधिकतर ऐसे हमलों के लिए पाकिस्तान तालिबान जिम्मेदारी कुबूल करते हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है। इसी तरह पेशावर के एयरपोर्ट पर रॉकेट से हमले में आतंकियों समेत कई लोग मारे गए हैं और कई घायल हुए हैं। दरअसल पाकिस्तान में तालिबान इतने ताक़तवर हो चुके हैं कि उनके सामने सरकार बेबस है और उसने तालिबान के आगे लगभग हथियार डाल दिए हैं। पिछले महीने यानी दिसंबर 2012 में मोहर्रम के मौक़े पर कराची, क्वेटा, इस्लामाबाद, पेशावर, रावलपिंडी, डेरा इस्माइल खान और अन्य शहरों में मोहर्रम के जुलूसों पर सभी सुरक्षा बन्दोबस्त के बावजूद रिमोट कंट्रोल से बम विस्फोट किए गए और कई मासूमों को जान से हाथ धोना पड़ा और लगभग 90 लोग ज़ख्मी हुए।
बहुसंख्यक सुन्नी समुदाय अल्पसंख्यक शिया समुदाय पर हमला कर रहे हैं। पिछले साल जनवरी से दिसंबर तक 750 से अधिक लोगों की आतंकवाद के नाम पर मौत के घाट उतार दिया गया है। इसमें सभी समुदायों के लोग शामिल हैं। पूरे देश में विशेष रूप से कराची और क्वेटा में अवैध हथियार का भंडार मौजूद है। ये हथियार नागरिकों को जातीय और धार्मिक आधार पर मारने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं। एहतियात के तौर पर अक्सर सरकार मोबाइल सेवा बंद कर देती है और मोटर साइकिल पर डबल सवारी पर पाबंदी भी लगा देती है। लेकिन सभी प्रयासों के बावजूद आत्मघाती हमलों पर काबू नहीं पाया जा रहा है। आतंकवादियों के द्वारा नए नए तरीकों से हमलों को अंजाम दिया जा रहा है। पाकिस्तान का आदिवासी क्षेत्र खैर बखतों ख्वाह और बलोचिस्तान पूरी तरह तहरीके तालिबान पाकिस्तान के कण्ट्रोल में है। इन इलाकों में सरकार के शासन का कोई असर ही नज़र नहीं आता। सुरक्षा बलों के हौसले पस्त हो चुके हैं। इधर तहरीके तालिबान पाकिस्तान (टी.टी.पी.) ने सरकार के साथ शांति वार्ता करने से इंकार कर दिया है।
पाकिस्तान सरकार को उखाड़ फेंकने का दम भरते हुए तालिबान के प्रवक्ता ने कहा है कि उनकी लड़ाई शासकों के साथ जारी रहेगी। आतंकवादियों को हिंसा छोड़कर शांतिपूर्ण वार्ता में शामिल होने की अपील की गयी थी। लेकिन तालिबान लोकतंत्र की धारा का स्वागत नहीं करते हैं वो पाकिस्तान में भी अपनी वैसी ही सरकार स्थापित करना चाहते हैं जैसे उन्होंने अफगानिस्तान में स्थापित की थी। सत्ताधारी दल मोटे तौर पर धार्मिक चरमपंथ का विरोधी और दक्षिण एशिया में शांति का पक्षधर है लेकिन प्रशासनिक स्तर पर गैर प्रभावी साबित हुआ है। पाकिस्तान की न्यायिक प्रणाली भी आतंकवादियों को सजा देने की क्षमता खो चुकी है। पिछले 15 वर्षों में सिर्फ दो लोगों को आतंकवाद से जुड़े मामलों में सज़ा हुई है। गृहमंत्री रहमान मलिक ने कहा है कि पाकिस्तान में जज लोग आतंकवादियों से खौफ खाते हैं और यही वजह है कि वो उन्हें सज़ा के बगैर छोड़ देते हैं।
उल्लेखनीय बात ये है कि अजमल आमिर कसाब को फांसी दिए जाने का बदला लेने के लिए पाकिस्तान में मौजूद तालिबान ने भारतीयों को निशाना बनाने की धमकी दी है। उधर पाकिस्तान की एक अदालत ने 14 वर्षीय ईसाई लड़की रमशा मसीह के खिलाफ दरिन्दगी का कोई सबूत न मिलने पर उसे बरी कर दिया है। रमशा मसीह पर एक पड़ोसी ने कुरान मजीद के पन्नों को आग लगाने का इल्ज़ाम लगाया था और इसकी वजह से उग्रवादी उसकी जान लेने को अमादा थे और अब भी वो इस कोशिश में लगे हुए हैं कि रमशा मसीह की जान ले ली जाए। 15 वर्षीय मलाला युसुफ़जई जिसने तालिबान के आतंकवाद के खिलाफ आवाज उठाई और लड़कियों को स्कूल जाने के लिए आमादा किया उसकी जान पर खतरे के बादल मंडला रहे हैं। मलाला हमले में गंभीर रूप से घायल हो गई थी जो अभी भी बरमिंघम के अस्पताल में इलाज चल रहा है। बहरहाल आतंकवादी मलाला के पाकिस्तान लौटने का इंतजार कर रहे हैं, वास्तव में तहरीके तालेबान पाकिस्तान संगठन का उत्तरी वज़ीरिस्तान में सक्रिय हक्कानी नेटवर्क और अलकायदा का करीबी सम्बंध बना हुआ है। जिसकी वजह से पाकिस्तान तालिबान के हौसले बुलंद हैं।
अमेरिका पाकिस्तान पर बराबर दबाव बनाए हुए है कि इस क्षेत्र में फौजी ऑपरेशन करके हक्कानी नेटवर्क और अलकायदा का सफाया करे क्योंकि वो तत्व अफगानिस्तान में घुस कर नाटो सेना पर हमले कर रहे हैं। लेकिन सरकार इससे बच रही है जबकि पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़रदारी ने खुद स्वीकार किया है कि आतंकवादी हमलों में 40,000 पाकिस्तानी जानें जा चुकी हैं और 80 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। इसके बावजूद राष्ट्रपति आसिफ ज़रदारी का ये कहना है कि वो उत्तरी वज़ीरिस्तान में सैनिक कार्रवाई नहीं करा सकते क्योंकि तालिबान का सम्बंध मदरसों से है और मदरसों को आम इंसानों का सहयोग हासिल है। हालात के मद्देनजर पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल अशफाक कियानी इस इलाके में सैन्य ऑपरेशन के पक्ष में नहीं हैं। इस परेशानी भरे माहौल के बावजूद पाकिस्तान में अगले साल आम चुनाव होने वाले और इन चुनावों की तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं। सत्तारूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की गठबंधन सरकार 16 मार्च, 2013 को अपने पांच साल की अवधि को पूरा कर लेगी। पाकिस्तान में ये पहली लोकतांत्रिक सरकार होगी जो अपने अवधि पूरी करने जा रही है। अब देखना ये है कि पाकिस्तान में तालिबान क्या गुल खिलाते हैं।
7 जनवरी, 2013 स्रोत: रोज़नामा हिंदुस्तान एक्सप्रेस, नई दिल्ली
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