निर्दोष नागरिकों पर आतंकवादी गतिविधियों को जायज़ ठहराने की निंदनीय कोशिश
सोहेल अरशद, न्यु एज इस्लाम
12 जनवरी, 2013
अपने लेख की सातवीं किस्त में यूसुफ अलअबीरी ने सीधे सीधे तोड़ फोड़ वाली और आतंकवादी गतिविधियों को इस्लामी शरीयत के मुताबिक़ जायज़ ठहराने की कोशिश की है जो बहुत ही निंदनीय अमल है और इस्लाम की छवि को बिगाड़ने की एक और नापसंदीदा कोशिश है।

पिछली क़िस्तों में तो अलअबीरी ने औरतों और बच्चों को वाजिबुल क़त्ल करार देने की कोशिश की थी जो किसी भी तरह दुश्मन की मदद करते हैं जैसे जासूसी करके या वित्तीय सहायता कर या सलाह देकर और इस सलिसिले में हदीस और उलमा के कथनों की गलत ताबीर और व्याख्या करके अपने पक्ष को सही साबित करने की कोशिश की थी और हमने क़ुरान, हदीस और फिक़ह की रौशनी में उनके दृष्टिकोण को रद्द किया था इसलिए इस विषय पर और ज्यादा बहस गैरज़रूरी है।
अलअबीरी के लेख में गोइबल्स के इस नज़रिये को लागू किया गया है कि यदि एक झूठ को सौ बार दुहराया जाए तो वो सच बन जाता है या लोग उसको सच समझ कर कुबूल कर लेते हैं। इस लेख में भी बार बार क़ुरान, हदीस और उलमा के कथनों को नक़ल करके और उन्हें गलत संदर्भ में पेश करके ये संदेश देने की कोशिश की गई है कि नऊज़ोबिल्लाह इस्लाम दुश्मन के बच्चों, बूढ़ों और औरतों को क़त्ल करना जायज़ समझता है जबकि हक़ीक़त ये है कि ऐसा करना इस्लामी सिद्धांत और हुक़ूकुल इबाद (बंदों के अधिकार) की विचारधारा के बिल्कुल खिलाफ है।
इस्लामी सेनाओं ने जब भी किसी दुश्मन की सेना से जंग की है तो सिर्फ लड़ाकों (combatants) को निशाना बनाया है जबकि दुश्मन की क़ौम के अधिकांश लोग दुश्मन का दिल से समर्थन करते होंगे मगर क़त्ल सिर्फ उन्हें किया जाता था जो आम तौर पर हथियार उठाते थे। लेकिन यूसुफ अलअबीरी कहते हैं कि दुश्मन की सहायता करने वालों में वो मासूम (बच्चे, बूढ़े, औरतों आदि) भी शामिल हैं जिन्हें आज की शब्दावली में आम शहरी कहा जाता है।
आगे चल कर वो कहते हैं क्योंकि अमेरिकी जनता अमेरिका के राष्ट्रपति को वोट देकर राष्ट्रपति की कुर्सी देती है और उनकी इस्लाम विरोधी योजनाओं और कार्यक्रमों के बारे में पहले से ही जानकारी रखते हैं इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति और सेना के दमन के वो भी ज़िम्मेदार होंगे। इस लिहाज़ से उनका (बच्चों, औरतों और बूढ़ों का) विध्वंसक हमलों के द्वारा क़त्ल करना (नऊज़ोबिल्लाह) इस्लामी शरीयत के लिहाज़ से जायज़ है।
पहली आलोचना तो ये है कि किसी भी देश में बच्चों को वोट देने का अधिकार नहीं है और न ही वो अपने देश के राष्ट्रपति के कार्यक्रमों और योजनाओं की जानकारी और समझ रखते हैं। इसलिए उन्हें इस औचित्य के आधार पर निशाना बनाना भी सही नहीं है। दूसरी बात ये कि अमेरिका या किसी भी देश का चयनित राष्ट्रपति जनता के 50 से 60 प्रतिशत मतों से ही राष्ट्रपति चुना जाता है और शेष आबादी विरोधी पार्टी के उम्मीदवार को वोट देती है। इसके अलावा जनता किसी भी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के सिर्फ एक कार्यक्रम पर वोट नहीं देते बल्कि देश के विकास, शिक्षा, आर्थिक, स्वास्थ्य, अल्पंसख्यक, रक्षा आदि सभी क्षेत्रों से संबंधित कार्यक्रमों, योजनाओं के आधार पर वोट देते हैं इसलिए अमेरिका या किसी भी अन्य देश के कुछ लोग राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के विदेशी या सैन्य नीति या कार्यक्रमों से सहमत न होते हुए भी रोज़गार, चिकित्सा विभाग, शिक्षा विभाग या अल्पंसख्यक योजनाओं से प्रभावित होकर उसे वोट दे सकते हैं क्योंकि वो योजनाएं मतदाताओं के अपने जीवन में महत्व रखती हैं।
इसी तरह नरेंद्र मोदी के समर्थक और विरोधी गुजरात के सभी हिंदू नरेंद्र मोदी की मुस्लिम नरसंहार की नीति में न केवल विश्वास नहीं रखते बल्कि इससे नफरत भी करते हैं लेकिन इनमें से अधिकांश उन्हें क्षेत्रीय, सामाजिक और आर्थिक कारणों, मजबूरियों और विशेष रिआयतों के वादों के आधार पर वोट देते हैं। इसलिए उनका ये तर्क भी स्वीकार्य नहीं है।
जंग के दौरान दुश्मन के खजूर के पेड़ों, फसलों और इमारतों को तबाह करने और जलाने की मनाही के समर्थन में हदीसें और खुल्फ़ाए राशेदीन (चारों खलीफा) के कथनों और आदेश पहले भी नकल किए गए हैं लेकिन इस किस्त में अलअबीरी इसी विषय को फिर से उठाते हैं और इस जायज़ ठहराने की कोशिश करते हैं। तालिबान चूंकि एक आतंकवादी संगठन है और जंग की रणनीति आतंकवादी हमलों और विध्वंसक गतिविधियों पर आधारित है, इसलिए अलअबीरी जंग से संबंधित इन्हीं पहलुओं को उजागर करते हैं जहां उन्हें अपनी विध्वंसक गतिविधियों और आतंकवादी हमलों के समर्थन में हल्का सा औचित्य भी निकलने की उम्मीद हो। जंग के दौरान विभिन्न समयों पर विभिन्न स्थितियों होती हैं जब सेना को अपने बचाव में सख्त फैसले करने पड़ते हैं मगर उन विशिष्ट परिस्थितियों में उठाए गए कदम युद्ध के सुनहरे सिद्धांत नहीं बनते और खासकर इस्लामी शरीयत में तो ये और भी मना है। क़ुरान पाक, हदीस और खुल्फाए राशेदीन के हुक्म इस मामले में बिलकुल स्पष्ट हैं और उन्हें पिछली किस्तों में नक़ल कर दिया गया है।
यूसुफ अलअबीरी इमाम हजर का कथन नक़ल करते हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि 'ज़्यादातर' ने दुश्मन के खजूर के पेड़ों और घरों को जलाने के औचित्य को अपनाया है, जबकि इमाम अवज़ाई रहिमतुल्लाह अलैहि, अललैस रहिमतुल्लाह अलैहि, अबु सूर रहिमतुल्लाह अलैहि ने इसे मकरूह जाना और उन्होंने हज़रत अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हू के अपने लश्करों को की जाने वाली इस वसीयत को दलील बनाया कि वो उनमें से कोई काम न करें।
खुद ऊपर दिये गये अंश से स्पष्ट है कि ज़्यादातर उल्मा ने पेड़ों और घरों को जलाने को नापसंददीदा काम बताया है और इस संबंध में हज़रत अबु बकर रज़ियल्लाहू अन्हू की वसीयत को प्रेरणास्रोत मानते हैं और उनकी ये राय क़ुरान और हदीस की तालीम के ही अनुसार है। यूसुफ अलअबीरी एक और जगह अंतर्विरोध का शिकार हैं। वो कहते हैं,'' दुश्मन को जलाना नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के जंग के तरीकों में से एक तरीका है।'' इस बारे में एक हदीस का हवाला देते हैं जिसमें हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ओसामा रज़ियल्लाहू अन्हू को हुक्म दिया कि ''उन पर (दुश्मन पर) सुबह के वक्त हमला कर औऱ आग लगा। लेकिन फिर खुद ही एक अन्य हदीस नक़ल करते हैं जिसमें हुजूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम पहले हज़रत हम्ज़ा रज़ियल्लाहू अन्हू से कहते हैं कि ''अगर तुम फलाँ आदमी को पकड़ लो, तो उसे आग से जला डालो। मगर फिर जब वो जाने के लिए मुड़ते हैं हुजूर सल्ल उन्हें आवाज देकर बुलाते हैं और कहते हैं ' अगर तुम फलाँ व्यक्ति को पकड़ लो तो उसे मार डालो मगर जलाना नहीं क्योंकि आग से सिवाय रब के कोई नहीं जलाता।
इसलिए अलअबीरी अपने ही दृष्टिकोण का खंडन अपनी ही नक़ल की हुई हदीसों से कर जाते हैं कि दुश्मन को जलाना नऊज़ोबिल्लाह हुजूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के जंग के तरीकों में से एक है।
बहरहाल उन्होंने इस हदीस को नक़ल करके जिसमें हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ''उन पर सुबह के वक्त अचानक हमला कर और आग लगा। अपने ही झूठ की पोल खोल दी कि हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम रात के वक्त दुश्मन पर बेखबरी में हमला करने को जायज़ समझते थे। पिछली किश्तों में उन्होंने ये साबित करने की कोशिश की थी कि रात को आबादियों पर बेखबरी में हमला करना जायज़ है। मगर उन्होंने अपने लेख में जो हदीस नक़ल की है उसमें ये कहा गया है कि सुबह के वक्त अचानक हमला कर यानी सुबह होने तक इंतेज़ार कर।
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