FOLLOW US:

Hindi Section

शरीयत को लागू करना तालिबान का मिशन है, मगर इस मिशन का अफसोसनाक पहलू ये है कि उनके विचार में शरीयत को लागू करने का मतलब शरीयत की उनकी व्याख्या यानि वहाबी इस्लाम को जबरन और हिंसक रूप से लागू करना है जिसमें धर्म के मामले में इंसान की निजी स्वतंत्रता जो कि कुरान में स्पष्ट रूप से मौजूद है, की कोई गुंजाइश नहीं है।

उनकी सरकार में हर मोड़, हर गली, बाजारों, मदरसों, स्कूलों यहां तक ​​कि घरों में लोग कोड़ों और बंदूकों के साथ घूमते मिलेंगे और लोगों को नेकी और बुराई के अपने विचार के अनुसार अमल करने पर मजबूर करेंगे। मिसाल के तौर पर गलियों में अच्छाई का हुक्म और बुराई से रोकने' वाले लोग लड़कियों को स्कूल जाने से रोकेंगे, क्योंकि उनके मज़हब में लड़कियों का तालीम हासिल करना गैर शरई काम है। इसलिए, इसी, अच्छाई का हुक्म और बुराई से रोकने के तहत इन्होंने पाकिस्तान में एक स्कूल जाने वाली लड़की पर जानलेवा हमला किया।

शरीयत को हिंसक और जानलेवा तौर पर लागू करने की मिसालें जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी दिखाई देंगी। इस लेख का आधार हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की एक हदीस है जिसमें मुस्लिम समाज में एक ऐसे समूह की वकालत की गई है कि जो लोगों को भले कामों के लिए कहे और बुरे कामों से मना करे। मगर इस हदीस को तालिबानी आलिम ने एक ऐसे समूह के गठन का आधार बनाया जो कानून हाथ में लेकर लोगों को सज़ा देने के लिए अधिकृत होगा और इस तरह से हर व्यक्ति समाज में पुलिस बन जाएगा। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और सीरिया के गृहयुद्ध के शिकार क्षेत्रों में इस तरह की घटनाओं की खबरें आई हैं कि जिहादी संगठनों ने ‘अच्छे काम का हुक्म देने' के नाम पर कानून अपने हाथ में लेकर मानवाधिकारों का उल्लंघन किया और शरीयत का 'उल्लंघन' करने वालों को सज़ा दी।

इसी तरह के समूह का एक सदस्य एक व्यक्ति के मकान में बिना इजाज़त घुस गया और उससे कहा कि तुमने इस्लामी शरीयत का उल्लंघन किया है इसलिए तुम्हें सज़ा दी जाएगी। जब मकान मालिक ने उससे पूछा कि आप बिना इजाज़त मेरे घर में कैसे दाखिल हुए तो इस खुदाई फौजदार ने फिल्मी अंदाज़ में जवाब दिया कि, हमें किसी की इजाज़त की ज़रूरत नहीं। इसलिए, तालिबान के ये खुदाई फौजदार लोगों के मकान में भी शरीयत के उल्लंघन की जांच करने के लिए बिना इजाज़त दाखिल हो जायेंगें और मुजरिमो को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ सज़ा देंगे।

हम नीचे तालिबान के मुखपत्र नवाए अफगान जिहाद के मई 2013 अंक में छपे हुए लेख अच्छाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने की ज़िम्मेदारी को पेश कर रहे हैं ताकि पाठकों को अंदाज़ा हो सके कि तालिबान और उनके जैसे आतंकवादी संगठन शरीयत लागू करने के नाम पर किस तरह की व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं ... न्यु एज इस्लाम एडिट डेस्क

 

शरीयत को लागू करना तालिबान का मिशन है, मगर इस मिशन का अफसोसनाक पहलू ये है कि उनके विचार में शरीयत को लागू करने का मतलब शरीयत की उनकी व्याख्या यानि वहाबी इस्लाम को जबरन और हिंसक रूप से लागू करना है जिसमें धर्म के मामले में इंसान की निजी स्वतंत्रता जो कि कुरान में स्पष्ट रूप से मौजूद है, की कोई गुंजाइश नहीं है।

उनकी सरकार में हर मोड़, हर गली, बाजारों, मदरसों, स्कूलों यहां तक ​​कि घरों में लोग कोड़ों और बंदूकों के साथ घूमते मिलेंगे और लोगों को नेकी और बुराई के अपने विचार के अनुसार अमल करने पर मजबूर करेंगे। मिसाल के तौर पर गलियों में अच्छाई का हुक्म और बुराई से रोकने' वाले लोग लड़कियों को स्कूल जाने से रोकेंगे, क्योंकि उनके मज़हब में लड़कियों का तालीम हासिल करना गैर शरई काम है। इसलिए, इसी, अच्छाई का हुक्म और बुराई से रोकने के तहत इन्होंने पाकिस्तान में एक स्कूल जाने वाली लड़की पर जानलेवा हमला किया।

शरीयत को हिंसक और जानलेवा तौर पर लागू करने की मिसालें जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी दिखाई देंगी। इस लेख का आधार हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की एक हदीस है जिसमें मुस्लिम समाज में एक ऐसे समूह की वकालत की गई है कि जो लोगों को भले कामों के लिए कहे और बुरे कामों से मना करे। मगर इस हदीस को तालिबानी आलिम ने एक ऐसे समूह के गठन का आधार बनाया जो कानून हाथ में लेकर लोगों को सज़ा देने के लिए अधिकृत होगा और इस तरह से हर व्यक्ति समाज में पुलिस बन जाएगा। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और सीरिया के गृहयुद्ध के शिकार क्षेत्रों में इस तरह की घटनाओं की खबरें आई हैं कि जिहादी संगठनों ने ‘अच्छे काम का हुक्म देने' के नाम पर कानून अपने हाथ में लेकर मानवाधिकारों का उल्लंघन किया और शरीयत का 'उल्लंघन' करने वालों को सज़ा दी।

इसी तरह के समूह का एक सदस्य एक व्यक्ति के मकान में बिना इजाज़त घुस गया और उससे कहा कि तुमने इस्लामी शरीयत का उल्लंघन किया है इसलिए तुम्हें सज़ा दी जाएगी। जब मकान मालिक ने उससे पूछा कि आप बिना इजाज़त मेरे घर में कैसे दाखिल हुए तो इस खुदाई फौजदार ने फिल्मी अंदाज़ में जवाब दिया कि, हमें किसी की इजाज़त की ज़रूरत नहीं। इसलिए, तालिबान के ये खुदाई फौजदार लोगों के मकान में भी शरीयत के उल्लंघन की जांच करने के लिए बिना इजाज़त दाखिल हो जायेंगें और मुजरिमो को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ सज़ा देंगे।

हम नीचे तालिबान के मुखपत्र नवाए अफगान जिहाद के मई 2013 अंक में छपे हुए लेख अच्छाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने की ज़िम्मेदारी को पेश कर रहे हैं ताकि पाठकों को अंदाज़ा हो सके कि तालिबान और उनके जैसे आतंकवादी संगठन शरीयत लागू करने के नाम पर किस तरह की व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं ... न्यु एज इस्लाम एडिट डेस्क

 
Is Religion Itself A Problem? क्या मज़हब ही समस्या है?
Nastik Durrani, New Age Islam नास्तिक दुर्रानी

फेसबुक पर एक बहस में ज्यादातर लोगों की राय ये थी कि अपने लंबे इतिहास में मानवता ने जो सबसे बुरी वस्तु खोजी  है, वो धर्म है, और ये कि इंसानियत धर्म के नाम पर होने वाले अपराधों की रोकथाम मज़हब को खत्म किए बिना नहीं कर सकती क्योंकि ये अंधकार युग के अवशेष हैं। जबकि कुछ अन्य लोगों का मानना ​​था कि समस्या धर्म में नहीं बल्कि उन लोगों में है जो धर्म के नाम पर सत्ता और संसाधनों पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं।

इस्लाम में पति लोगों को हुक्म है कि वो अपनी बीवी के साथ अच्छा व्यवहार करें। अच्छे व्यवहार का मुख्य पहलू ये है कि पति अपनी जीवन संगिनी पर मानसिक और शारीरिक हिंसा से पूरी तरह परहेज़ करे लेकिन समाज में ऐसे कई जाहिल और ज़ालिम मर्द हैं जो अपनी कमज़ोर बीवी को जानवरों की तरह मारते पीटते हैं और उसे अपना अधिकार समझते हैं। ये बात कैसे उचित हो सकती है कि मर्द एक तरफ तो अपनी बीवी से मानसिक सुकून और शारीरिक सुख प्राप्त करे बेहतरीन वक्त गुज़ारे और दूसरी तरफ उसके साथ इतना वहशियाना व्यवहार करे? ये एक अत्यंत अमानवीय और असभ्य हरकत है….

पाकिस्तान के बलूची अपने ऐतिहासिक और जातीय पृष्ठभूमि को छोड़ने और पाकिस्तानी राष्ट्रीयता में खुद को एकीकृत कर देने को तैयार नहीं हैं। पाकिस्तान के बंगाली, गैर बंगाली पाकिस्तानियों के साथ समन्वय स्थापित नहीं कर सके। फिर वो कैसे पूरी दुनिया के मुसलमानों के सभी क़ौमों और जातीय समूहों से बात की उम्मीद कर सकते हैं कि वो एक साथ जमा हो सकते हैं और एक अमीरुल मोमिनीन के नेतृत्व में धरती पर एकमात्र खिलाफत की स्थापना कर सकते हैं। यही कारण है कि इकबाल ने कमाल अतातुर्क के द्वारा खिलाफत उस्मानिया को भंग करने का स्वागत किया था बल्कि इसे इस्लामी दुनिया में एक नई शुरुआत के रूप में बयान किया था।

 

मुस्लिम लीग नवाज़ का पाकिस्तान में जारी चरमपंथ और सांप्रदायिकता के प्रति दृष्टिकोण पाकिस्तान के धार्मिक दलों से भिन्न नहीं है। सिर्फ नवाज़ शरीफ अपनी पिछली सरकार के गिरने के कारण पाकिस्तानी फौज की खुफिया एजेंसियों आई.एस.आई. और एम.आई. को लगाम देना चाहते हैं ताकि भविष्य में ऐसा कांड न हो जबकि नवाज़ लीग के अधिकांश सदस्य पूरी तरह सेना के धार्मिक स्वभाव और अन्य अवधारणाओं के प्रबल समर्थक हैं।

 

धर्म संस्कृतियां नहीं बनाते, इंसान मज़हब के जन्म से हजारों साल पहले से सभ्यता से परिचित था। सभ्यता अपनी सबसे सरल परिभाषा में कला एवं ज्ञान व साहित्य में विकास के माध्यम से मानव जीवन को आसान बनाना है। न ही ये कोई ईश्वरीय कारनामा है कि जो कुन फयाकुन की ताक़त से अंजाम पाती हो, बल्कि ये विशुद्ध रूप से एक भौतिक व मानवीय उपलब्धि है, जो जब जहां माहौल पैदा होता है, पनप उठती है और इस वातावरण के खत्म होने पर समाप्त हो जाती है।

 

मुसलमान एक क़ौम के रूप में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़े हैं। हज के माध्यम से कभी मुसलमानों की किसी सामूहिक समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सका। हज मुसलमानों में एकता और सहमति स्थापित करने में बिल्कुल बेअसर साबित हुआ है। मौजूदा दौर में स्थिति ये है कि हर साल लगभग तीस से चालीस लाख लोग हज करते हैं जिस पर समग्र रूप से अरबों रुपये खर्च होते हैं। सऊदी सरकार ने अपने कानून कुछ इस तरह बना रखे हैं कि मुसलमानों की उम्र भर की कमाई जो हज पर खर्च होती है उसका अधिकांश लाभ सऊदी शासक वर्ग को पहुंचता है। और ये प्राप्त लाभ कहाँ और किस काम में खर्च होता है कोई ढकी छिपी बात नहीं है।

 

जब से अल्लाह के फज़ल व करम से मुसलमानों ने पढ़ना सीखा है तब से वो अपने इतिहास को पूर्व के लोगों की क़लम और आँखों से पढ़ रहे हैं जैसा कि वो देखते हैं, जब ज़रा सा विकास किया तो खबरें और आंकड़े भी पश्चिमी समाचार एजेंसियों और सांख्यिकीय संस्थानों से हासिल करने लगे। कोई इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि पश्चिम हर एक संभावित तरीके से अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए हर तरह से तैयार रहता है ताकि अपनी चौधराहट बरकरार रख सके और शायद किसी हद तक कुछ जानकारियों की निष्पक्षता के पीछे यही राज़ छिपा है।

 
Is it Islam? क्या यही इस्लाम है?
Rooman Rizvi, Tr. New Age Islam रूमान रिज़वी

दहशत का माहौल ....! वहशत का काला बादल ...! हर एक पल जान जाने का खतरा ...! हद हो गयी मस्जिद और इबादत में खूनखराबा ....! एक मुसलमान दूसरे मुसलमान के लहू का प्यासा ...! सुकून की बस्ती उजड़ चुकी ...! चिन्ता और बेचैनी का बसेरा है ....! इस्लाम का नाम लेकर अपनी- अपनी मनमानी ...! हत्या, मार काट का बाजार गर्म ......! आत्मघाती हमले ......! क्या यही इस्लाम है?

 

पाकिस्तान की फौज में बढ़ते सल्फ़ी उग्रवादियों के प्रभुत्व के बारे में हालांकि कुछ विदेशी पत्रकारों और विश्लेषण करने वालों के द्वारा लिखी गई पुस्तकों में कुछ मिसालें मिल जाती हैं, लेकिन खुद पाकिस्तानी लेखकों ने अपने ऊपर लागू किये गये सेंसरशिप के कारण इस विषय पर लिखने से बचते रहे हैं। इसकी वजह सरल और स्पष्ट है कि कोई भी 'ओखली में सिर नहीं देना चाहता'' क्योंकि इस मामले में उसका अनंतिम नुकसान अपरिहार्य है।

 

अगर मुसलमान शिक्षा के मैदान में तरक्की हासिल करना चाहते हैं तो उन्हें ठोस योजनाएं बनानी होगी और ये योजनाएं व्यक्तिगत स्तर पर भी होनी चाहिए और सामूहिक स्तर पर भी। व्यक्तिगत स्तर पर ये कि माँ बाप अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिये स्कूलों और संस्थानों को चुनें, जहां गुणात्मक शिक्षा दी जाती हो। अगर ये संस्थान महंगे हैं तो फीस अदा करने का कोई बंदोबस्त करने की कोशिश करें। अगर माँ बाप गरीब हैं, लेकिन पढ़े लिखे हैं तो वो अपने बच्चों को स्कूलों और संस्थानों में भेजें ही, मगर खुद ज़रूर पढ़ाएँ।

 

क्या पाकिस्तान की सभी समस्याओं का कारण इस्लाम है? पाकिस्तान के इन वर्गों को पता है कि पाकिस्तान में 65 वर्षों में अक्सर शासन सेकुलर दिमाग वाले शासकों ने ही किया है। अगर सिर्फ सेकुलरिज़्म से देश चलते तो पाकिस्तान दुनिया के बेहतरीन देशों में से होता। हम पहले भी ये कई बार कह चुके हैं पाकिस्तान और पश्चिम की तुलना करना इसलिए भी उचित नहीं कि हमारी और उनकी बुनियाद में ज़मीन आसमान का अंतर है। उनके पास कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि हम एक शानदार अतीत रखने वाली व्यवस्था के अलमबरदार हैं।

मिसाल के तौर पर कोई भी राजनीतिक पार्टी दीनी मदरसों के अतिवादी और सांप्रदायिक पाठ्यक्रम को बदलने जैसी मांग नहीं कर सकती और न ही ऐसे लोगों को लगाम दे सकती है जो जबान और बयान से सांप्रदायिक काम जारी रखते हैं। सांप्रदायिक ताकतों और अतिवादियों को कार्रवाईयों के लिए धन इकट्ठा करने से नहीं रोका जा सकता और न ही स्थानीय स्तर के अपराधों में शामिल तत्वों पर काबू पाया जा सकता है। ये एक मुश्किल घड़ी है जिसमें पाकिस्तान में निर्वाचित होने वाली नई सरकार पाकिस्तान की कठिन और जटिल समस्याओं का सामना करेगी।

 
The Rule Of Mahram And Helpless Women महरम और महरूमियत
Nastik Durrani, New Age Islam नास्तिक दुर्रानी

अदालतें औरतों का कोई मामला तब तक स्वीकार नहीं करतीं जब तक उनका कोई महरम उनके साथ न हो, चाहे वो शिकायत महरम की ही दर्ज कराने आई हो। उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए भी औरतें महरम के बिना विदेश नहीं जा सकतीं। सरकार समझती है कि घर की औरतों के मामलों में वली (अभिभावक) की सहमति उसके मौलिक अधिकारों में शामिल है। जहां तक ​​बात औरत के अधिकार की है तो उसकी आप बात न करें, क्योंकि शरीयत में इसके लिए कोई जगह नहीं।

 
Hand of God or A Coincidence? ख़ुदा का हाथ या संयोग?
Nastik Durrani, New Age Islam नास्तिक दुर्रानी

तक़दीर (भाग्य) पर विश्वास सभी मानवीय कौशल को ज़ंग लगा देता है, कि जो माथे पर लिखा है उसे आँख ज़रूर देखेगी और इंसान की ज़िंदगी की सारी जानकारी पहले से ही एक किताब में लिख दी गई हैं... ये विश्वास छात्रों, मज़दूरों और अधिकारियों की मानसिकता को तबाह कर देता है। वो क़िस्मत पर विश्वास रखते हुए आगे बढ़ने के लिए मेहनत नहीं करते, ऐसे विश्वास के कारण असाधारण और प्रतिभाशाली लोग पैदा ही नहीं हो सकते!

 

जैशे मोहम्मद के अमीर मौलाना मसूद अज़हर इस साप्ताहिक में निरंतरता के साथ सबसे ज़्यादा लेख लिखते हैं लेकिन यहां उन्होंने ''सादी की कलम से' का क़लमी नाम अपना रखा है। उनके लेख का नाम 'रंग व नूर' है लेकिन लेख में रंग के नाम पर खून और नूर के नाम पर मौत की स्याही स्पष्ट होती है। दिसंबर 2009 के एक अंक में मौलाना मसूद अज़हर सादी की कलम से में लिखते हैं, ''अल्लाह की शान और रहमत खुदकुश (आत्मघाती) हमलावर के साथ साथ चलती है और रहमत के फरिश्ते उसे अपने साये में लिए होते हैं।''

 

पाकिस्तान एक नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है। वर्तमान स्थिति हमारे देश के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के सामने गंभीर असमंजस की स्थिति पैदा कर रहा है। आतंकवादियों की रणनीति सरल और स्पष्ट है, जबकि हमारे पास कोई रणनीति नहीं है। ये आतंकवादी जहां चाहें वहां कभी भी हमला करने की क्षमता रखते हैं, जबकि हम प्रभावी रूप से उन्हें रोकने की क्षमता नहीं रखते। वो पाकिस्तान को तबाह करने के नापाक मकसद के लिए दृढ़ हैं, और हम पाकिस्तान के नज़रिए के सवाल पर आपस में बँटे हुए हैं।

 

इस्लाम एक व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता है। ये हर व्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करता है, और ख़ुदा के सामने सबको व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार और जवाबदेह ठहराता है। हमने क़ुरान में इसकी तरफ इशारा करती हुई आयतें पाईं। इस्लाम का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बढ़ावा देना है, जो समाज में सद्भाव और समुदाय में बेहतरी लाने की दिशा में तेज़ी लाता है।

 

क्या सल्फ़ियों की ज़बान आम माहौल में औरतों की बढ़ती भूमिका के खतरे का प्रतिनिधित्व करती है? सल्फ़ी मानसिकता में महिलाओं के बदलती भूमिका को स्वीकार करने की गुंजाइश क्यों नहीं है? ये कहना ग़लत नहीं होगा कि सल्फ़ी विचारधारा अरब दुनिया में प्रचलित कोई धार्मिक विचार नहीं है। हालांकि मीडिया और अपने मानने वालों के मन पर इसका पूरा एकाधिकार है।

 

यूरोप या उत्तरी अमेरिका में किसी मस्जिद के विध्वंस की कल्पना कीजिए। हम मुसलमान पूरी दुनिया में अपनी चीख और पुकार से आसमान सिर पर उठा लेंगे। यही फासीवादी ताक़तें जो इस्लाम के ऐतिहासिक हैसियत को मिटाने पर तुली है, शोर मचाने लगेंगी और इसमें शक नहीं कि दुनिया के कुछ हिस्सों में हिंसा भी फूट पड़ेगी। मुसलमान धर्म के मामले में बहुत संवेदनशील माने जाते हैं। मगर हैरानी की बात है कि जब मुस्लिम विरासत के स्थानों, दरगाह और खूबसूरत मकबरे और मस्जिदें कट्टरपंथी मुसलमानों के द्वारा तबाह कर दिए जाते हैं तो ये संवेदनशीलता कहां चली जाती है। अब समय आ गया है कि मुसलमान अपने विवेक को टटोलें और जिस चीज में ईमान रखते हैं उसकी हिफ़ाज़त के लिए उठ खड़े हों.........

 

पाकिस्तान के इतिहास का पहला चुनाव आतंकवाद और उग्रवाद की भेंट चढ़ने जा रहा है क्योंकि तालिबान और इससे जुड़े सभी गुट तय कर चुके हैं कि पाकिस्तान में राजनीतिक ''परिवर्तन'' सिर्फ राजनीतिक दलों पर हमले से उन्हें भयभीत कर हासिल किया जा सकता है। किसी देश में चुनाव को प्रभावित करने और अपनी मर्ज़ी के नतीजे हासिल करने का ये अनूठा तरीका है क्योंकि बाहरी तौर पर इसकी कामयाबी की संभावना दिखनी शुरू हो गई है और पाकिस्तान के कम से कम तीन राज्यों की राजधानियों  क्वेटा, कराची और पेशावर में इस तरह के घातक हमलों का सिलसिला शुरू हो चुका है।

 

अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर ये साबित हो कि इन धमाकों के पीछे कोई चरमपंथी संगठन शामिल है जिन्हें पश्चिम में "इस्लामोफ़ोबिया" के मरीज़ "इस्लामी चरमपंथी" कहते हैं तो अमेरिका क्या करेगा? ये बात अब कोई राज़ नहीं रही है कि ओबामा के नेतृत्व में डेमोक्रेट प्रशासन ने "अरब वसंत" के देशों में "इस्लामी धारा" को सत्ता तक पहुंचने में मदद की  खासकर ट्यूनीशिया और मिस्र में और अब भी उनके अत्याचार पर पर्दा डालते हुए उनकी मदद किये जा रहा है। ठीक उसी तरह जैसे पहले दोनों देशों के तानाशाहों  की मदद कर रहा था।

 

ओसामा बिन लादेन के हीरो होने पर कोई दूसरी राय नहीं और जब पाकिस्तान में पश्चिमी देशों के मददगार, इस्लाम दुश्मन और लालची राजनेताओं का दौर ख़त्म हो जाएगा तो पाकिस्तान की इस्लामी पार्लियमेंट ओसामा बिन लादेन के शहादत दिवस को राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने का संकल्प पारित करेगी और इस बात की काफी उम्मीद है कि ओसामा के नाम से बहादुरी और इस्लाम दोस्ती का राष्ट्रीय पुरस्कार शुरू करवाया जाए ताकि इस्लामी के इस महान सपूत को श्रद्धांजलि दी जा सके।

 

मुसलमानों को चाहिए कि वो साज़िशी थ्योरी को छोड़कर उस बदलते हुए दिनों की तैयारी में लग जाएं जो खुदा की तरफ से किसी क़ौम के लिए सबसे अच्छे अवसर की हैसियत रखते हैं। वो अपने अंदर नेतृत्व क्षमता पैदा करें, और सबसे बढ़कर ये कि वो देने वाले समुदाय बन कर रहें। वो अपने बच्चों को पढ़ाएँ और खुद भी पढ़ें। वो अपने हर घर को लाइब्रेरी और लेबोरेट्री में तब्दील कर दें। वो ख़ुदा की किताब  क़ुरान से जिंदगी की रौशनी, उम्मीद और ताक़त हासिल करें।

 
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20
Get New Age Islam in Your Inbox
E-mail:
Videos

Dr. Muhammad Hanif Khan Shastri Speaks on Unity of God in Islam and HinduismPLAY 

Shaukat Kashmiri speaks to New Age Islam TV on forced conversions to Islam in PakistanPLAY 

Shaukat Kashmiri speaks to New Age Islam TV on impact of Sufi IslamPLAY 

NEW COMMENTS