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Is This the Islam of Prophet Mohammad, a Blessing to Mankind?  क्या यह वही इस्लाम है जिसकी तबलीग शांति और दया के पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने की थी?
Sultan Shahin, Founding Editor, New Age Islam

क्या यह आवश्यक नहीं है कि उनके सामने यह सवाल रखा जाए कि सल्फ़ी इस वैचारिक लड़ाई में क्यों विजयी हो रहे हैं?क्या सूफी उलेमा एक भी इस्लामी आतंकवादी को वापस सूफी इस्लाम पर राजी करने में सक्षम रहे हैं?आखिरकार कम से कम दक्षिण एशिया और अफ्रीकी तटीय क्षेत्रों में आज के सभी आतंकवादी अब तक सूफी इस्लाम के ही अनुयायी थे। वहाबियत मूल रूप से केवल अरब के ही क्षेत्रों में सीमित थी। और अरब दुनिया के अलावा अन्य क्षेत्रों में सल्फ़ी बहुत कम ही पाए जाते थे। सल्फ़ियत के प्रचार के लिए पेट्रो डॉलर की आसान उपलब्धता ने निश्चित रूप से इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन क्या केवल धन ही इतना बड़ा वैचारिक क्रांति पैदा कर सकती है?क्यों सूफी उलेमा के जवाबी कदम इस संबंध में कोई परिणाम प्रदान करने में पर्याप्त प्रभावी साबित नहीं हुए?

 

This Masjid is That of Ahl e Sunnat  यह मस्जिद अहले सुन्नत की है....?
Paighambar Nauganvi

मस्जिदों के निर्माण और उनमें नमाज़ पढ़ने का फ़लसफ़ा यह भी है कि मुसलमान आपस में एक दूसरे से अधिक करीब जाएं अन्यथा नमाज़ तो घर में भी पढ़ी जा सकती है,अब जो लोग मस्जिदों से मुसलमानों को भगाते हैं वे मस्जिदों के निर्माण के फलसफे ही से अनभिज्ञ हैं। मस्जिद न शिया होती है न सुन्नी, न बरेलवी होती है और न देवबंदी, मस्जिदों की ऐसी वितरण बड़ी बिदअत है, अगर उक्त मस्जिद के इमाम साहब ने फ़िक्ह की शिक्षा भी प्राप्त की होती तो उन्हें मालूम हो जाता कि जो इंसान अकेला मस्जिद निर्माण कराता है उसे भी यह अधिकार नहीं होता कि किसी को नमाज़ पढ़ने से रोक सके तो चंदे से निर्माण किया गया मस्जिद से कोई व्यक्ति किसी मुसलमान को कैसे भगा सकता है?

 

Triple Talaq, Indian Constitution and Counter-Affidavit Filed by Muslim Personal Law Board  तीन तलाक, भारतीय संविधान और मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड का जवाबी हलफनामा
A Rahman, New Age Islam

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस मामले में आवश्यक पक्ष बनने यानी (impleadment) की आवेदन, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार करते हुए बोर्ड को जवाबी हलफनामा पेश करने की अनुमति दे दी। सायरा बानो की तैंतीस (33)पन्नों पर आधारित याचिका के जवाब में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सत्तर (70)पृष्ठों का जो जवाबी हलफनामा फाइल किया है, इसे पढ़ने के बाद भारतीय संविधान और इस्लामी कानून या इनमें से किसी एक का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति सिवाय सिर पीटने और कफे अफ़सोस मलने के और कुछ नहीं कर सकता। बतौर कानूनी दस्तावेज़ यह हलफनामा कतई फुसफुसा और नाक़ाबिले एतेना ए अदालत तो है ही,ऐसे विरोधाभासी बयानों का हामिल भी है जिनके संबंध में अदालत के माध्यम से पूछे जाने वाले संभावित प्रश्नों का कोई वकील जवाब नहीं दे सकेगा और ना ही उन विरोधाभासों का वर्णन और व्याख्या कर पाएगा।

 

Triple Talaq: Accountability of Action is a Must  तीन तलाक : कथनी व करनी का हिसाब आवश्यक
Uzma Naheed

एक बैठक में तीन तलाक एक दंड है। और नफसानी सुकून के लिये दी जाए तो पाप है। अब यह काम उलेमा का ही है कि अगर इस्लाम का खुल्लम खुल्ला मज़ाक उड़ाया जा रहा हो और खुद मिल्लते इस्लामिया में फसाद का कारण बन रही हो तो उस समय चाहे सरकार से मांग बतौर पूर्वाग्रह हो या वास्तव में चिंतित हो, यह सोचना हमारा ही कर्तव्य होगा कि इस प्रक्रिया से आम जनता को कैसे बाहर निकाला जाए और इस्लाम के लिए उपयोगी कानून साबित किया जाए। लगभग 30 साल से यह अनुभव कर रहा हूं कि लोग तीन तलाक के बंद करने की मांग कर रहे हैं और हम लगातार और पूरा जोर देकर उसकी validity पर बात कर रहे हैं।

 

हनफ़ी, अहले हदीस और शिया तीनों मसलकों के विपरीत मेरा दृष्टिकोण यह है कि कुरआनी निर्देश के बावजूद दी गई तलाक चाहे एक हो या अधिक दो स्थित नहीं होगी। एक मजलिस के तीन तलाक के बारे में पाठकों ने देखा कि इमामों की राए एक दूसरे से अलग और असंगत हैं। इसलिए दोनों राएँ सटीक शरीअत करार नहीं दी जा सकती। अन्यथा अनिवार्य आएगा कि खुदा की किताब और उसकी शरीअत में विरोधाभास पाई जाती है। जो बहुत बड़ी त्रुटि और दोष है। अलबत्ता दोनों विरोधाभासी राय रखने और मानने वाले यानी मुकल्लिद और गैर मुकल्लिद सभी प्रकार के उलेमा की इस बात पर सहमती है कि ...

 

Triple Talaq is Revocable Divorce from the Quran's Point of View  तीन तलाक क़ुरआन के अनुसार एक तलाक रजई ही है
Aldaktur Furqan Meharban al-Madani

इसमें कोई शक नहीं एक मजलिस के तीन तलाकों के तीन ही लागू करने से पति-पत्नी के बीच सुलह और समझौता के सभी संभावनाएं समाप्त हो जाते हैं जिससे परिवार के परिवार उजड़ जाते हैं और मासूम बच्चे बेघर और बेसहारा हो जाते हैं। तलाकशुदा महिला के सामने दुख के पहाड़ खड़े हो जाते हैं। वह रोते रोते अपनी आँखों के आँसू सूखा लेती है और उसकी आंखों के सामने हर समय अंधेरा छा जाता। उसे अपनी अगली मंजिल नज़र नहीं आती। वह असहाय हो जाती है,यहां तक कि इद्दत के दौरान वह पति के द्वारा दिए जाने वाले खर्च से भी वंचित हो जाती है और तीन तलाक लागू होने का फतवा देने वाले हमारे मुक़ल्लिद उलेमा उसे अपने पहले पति की ओर लौटने के लिए हलाला के प्रति प्रोत्साहित करते।

 

Triple Talaq will be Counted as Talaq Uttered Three Times  तीन तलाक! हर हाल में तीन ही मानी जाएँगी
Hafeez Nomani

कई साल से तीन तलाक बराबर एक तलाक की मांग की जा रही है अच्छे अच्छे दीनदार शिक्षित यह मांग पर्सनल लॉ बोर्ड से कर रहे हैं कि वह तीन तलाक को एक तलाक के बराबर करार दें। उनके विचार में यह पर्सनल लॉ के विद्वानों को अधिकार है कि वह तीन को एक दें। साल पर साल बीत गए। बोर्ड द्वारा कहा जा रहा है कि यह मानव के इख़तियार की चीज़ नहीं है। पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में भी एक मुसलमान ने एक ही समय में तीन तलाक दे दी थी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के संज्ञान में यह बात आई तो चेहरा मुबारक क्रोध से लाल हो गया और कहा कि अभी तो दुनिया में मैं मौजूद हूँ इसके बावजूद इतनी गलत हरकत करने की हिम्मत कर ली?

Who Speaks for Islam in India?  भारत में इस्लाम का प्रवक्ता कौन?
Arshad Alam, New Age Islam

उलेमा के इस रवैये का केवल एक ही मतलब हो सकता है, और वह यह है कि उलेमा के इस वर्ग का तर्क स्पष्ट रूप से इस्लाम विरोधी है। वह इस्लाम की एक प्रचलित परंपरा के खिलाफ जा रहे हैं जो इस बात की प्रतिज्ञा है कि कुरआन के कई और व्याख्या संभव है और सही है। शुरुआती दौर में इस्लाम की कोई धार्मिक इदारजाती प्रणाली स्थापित न करने की एक उचित कारण है। इसलिए धार्मिक संस्थागत प्रणाली पर काबिज होने की कोशिश करने वाले उलेमा इस्लाम की प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस्लाम के ज्ञान और अपनी सुंदरता विविधता पसंद प्रकृति और विचारों के तनोआत में निहित है। अफसोस की बात है कि इस्लाम के तथाकथित संरक्षक इस ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को नष्ट करने पर कमर कस रहे हैं।

 

Emphasis On Arab Or Persian Culture Prevents  एक विश्व धर्म के रूप में इस्लाम की असफलता के कारण अरब या फारसी संस्कृति पर जोर
Asif Merchant, New Age Islam

यह सब कुछ उलेमाओं द्वारा पैदा किए गए ठहराव और गतिरोध का नतीजा है कि जिन देशों में इस्लाम का वर्चस्व हुआ उनका विकास रुक गया। उलेमा से होने वाले नुकसान की एक क्लासिक उदाहरण प्रिंटिंग के क्षेत्र में मुसलमानों का पछड़ापन है। पंद्रहवीं सदी में एक जर्मन जोहानिस गोटीनबरग ने एक एनिमेटेड प्रिंटिंग मशीन का आविष्कार किया। उसने यूरोप में छपाई की दुनिया में एक क्रांति पैदा कर दिया और इस वजह से किसी भी संख्या में बहुत आसानी के साथ किताबें और अखबार प्रिंट किए जाने लगे इसके परिणामस्वरूप आम लोगों के बीच ज्ञान को बढ़ावा मिला और यूरोप में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास की गति तेज हो गई। उस समय मुसलमानों की सबसे बड़ी ताकत तुर्की थी।

 

The Greatest Blessing  दुनिया की सबसे बड़ी नेअमत
Maulana Wahiduddin Khan for New Age Islam

इसके लिए एक व्यक्ति की पहली और सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वह अपनी पत्नी का सम्मान और उसकी वास्तविक महत्व का क़द्र करे। उसे उसके अंदर छिपा रत्न खोजना होगा। उसे उसके अंदर की खूबसूरती को खोजना आवश्यक है। हर औरत के अंदर अपार प्राकृतिक संभावनाएं हैं अब यह उसके पति की योग्यता पर निर्भर करता है कि वे या तो इस संभावना को हकीकत का रूप देने में उसकी मदद करे या इसे यूं ही बर्बाद होने दे।

 

What is the Ruling of Talaq Pronounced Without Witnesses?  गवाहों के बिना दी गई तलाक का क्या हुक्म है?
Ghulam Ghaus Siddiqi, New Age Islam

सबसे बेहतर तलाक की विधि जो क़ुरआन ने बताया है उसे इस्लाम के अकाबेरीन,फ़ुक़्हा ए किराम और उलमा ए इज़ाम तलाके अहसन का नाम देते हैं यहाँ केवल उलेमा और अकाबेरीन की बारगाह में यह सवाल रखना लक्ष है कि क्या किसी ऐसे कानून को बनाया जा सकता है जिसमें यह कहा जाए कि '' कोई व्यक्ति बिना गवाहों के तलाक न दे l

 

Who Are Those Who Will Believe And Those Who Will Not?  कौन ईमान लाने वाले हैं और कौन नहीं?
Naseer Ahmed, New Age Islam

कुरआन मानव व्यवहार के नियमों का वर्णन करता है लेकिन अल्लाह ख़ुदा साथ ही साथ वह अपनी सुन्नत भी बयान करता है। ऐसा इसलिए है कि ख़ुदा के ये नियम अटल और अपरिवर्तनीय हैं जो सख्ती से लगातार और ना बदलने वाली शैली में रवां दवां हैं। लोग उसे शाब्दिक शैली में समझते हैं और यह कहते हैं कि अगर ख़ुदा लोगों को गुमराह करने की अनुमति देता है या उनके दिलों पर मुहर लगाता है जिससे वह "बहरे,गूंगे और अंधे"हो जाते हैं तो फिर उसे कैसे इसका जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?यह भी आत्म का धोखा है और नैतिक जीवन प्रणाली की जिम्मेदारी लेने की नाकाबिलियत का प्रतीक है जिसको उन्होंनें स्वयं चुना है जबकि ख़ुदा लगातार उन्हें इस बात की याद दिलाती है कि:

 

You Terrorists Are Shameless!  बेशर्म तुम हो आतंकवादियों!
Shakeel Shamsi

हम सभी जानते हैं कि आतंकवादी बदला किससे लेते हैं?बाजारों में बम रखकर, इबादतगाहों में आत्मघाती विस्फोट कर और बलात्कार को इस्लाम पर हमला करार देने वाले आतंकवादी 300 स्कूली लड़कियों को एक साथ अपहरण करने को बिल्कुल इस्लामी काम समझते हैं। जिहाद अलनिकाह के नाम पर एक लड़की के साथ कई कई आतंकवादी संभोग करते हैं तब उन्हें इस्लाम पर होने वाले हमले सुंदर लगते हैं। जाकिर मूसा भारतीय मुसलमानों को भड़का कर अपना उल्लू सीधा करना चाहता है,वह चाहता है कि भारत भर में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठें और उसके आकाओं का काम आसान हो।

 

जिस तरह से हम रोज़े में खाने-पीने और जिंसी शहवत के कार्यों से अल्लाह के आदेश के कारण रुके रहते हैं उसी तरह हमारे पूरे जीवन अल्लाह के आदेशों के अनुसार होनी चाहिए,हमारी आजीविका और हमारा वस्त्र हलाल हो,हमारे जीवन का तरीका हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा ए किराम वाला हो ताकि हमारी आत्मा हमारे शरीर से इस हाल में अलग हो कि हमें,हमारे माता पिता और सारे इन्सान व जिन्नात को पैदा करने वाला हमसे राज़ी व प्रसन्न है तो इंशा अल्लाह हमेशा हमेशा की सफलता हमारे लिए भाग्य होगी कि उसके बाद कभी भी असफलता नहीं है।

 

यूरोप में होने वाले हमलों पर कुछ हद तक '' संतुष्टि '' व्यक्त करने वाले तत्व यह दलील भी सामने लाते हैं कि पश्चिम स्वयं बीजी हुई फसल काट रहा है। उसने खुद ही विभिन्न मुस्लिम देशों में युद्ध शुरू करके इस घृणा को काश्त किया था जो अब पश्चिम को भी अपनी चपेट में ले रही है। यह आपत्ति करने वाले इस प्रक्रिया में अपने देश के शासक, प्रभावशाली वर्गों, कुलीन और धार्मिक और राजनीतिक नेताओं के चरित्र को पूरी तरह भुला देते हैं। इसके अलावा इस बात को बहरहाल नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि मुसलमानों के विभिन्न समूहों ने किसी न किसी बहाने से दुनिया भर में विनाश और मनुष्यों को मारना शुरू किया है।

 

New Trial for Muslims  मुसलमानों के लिए नई आज़माइश
Nazia Erum

आजकल किसी मुसलमान के घर में पकने वाला कोई मांस आखिर गोमांस ही तो समझा जाने लगा है। मेरी मुस्लिम दासी मुझे बताती है कि कई बार इससे अन्य दासियों ने पूछा कि क्या हम घर में गोमांस बनाती है? हम नहीं बनाती है। लेकिन हम फिर भी बे ऐतेबारी में जीते हैं। अपने अगल बगल घटी घटनाओं के समाचार देखें, स्पष्टीकरण के लिए समय ही कहां है, केवल शक पर्याप्त है कि किसी मुसलमान को अपमानित किया, या बदतर उपाय करते हुए उसे मार डाला जाए।

 

'' मुस्लिम लॉ कुछ आधार में कुरआन, हदीस, इज्माअ और इज्तेहाद नमाज़ के संबंधि में कुरआन और हदीस दोनों का सहारा लेना पड़ता है तब यह विषय साफ होता है। जहां तक कानूनी दृष्टिकोण का सवाल है इस विषय पर 1937 में मोहम्मद अहमद काजमी सदस्य सेंट्रल विधानसभा की कोशिश Application Act Muslim Law पास हुआ जिसमें विरासत और तलाक दोनों का उल्लेख है लेकिन इस विवरण से परहेज किया गया है शायद उन्हें साम्प्रदायिक मतभेद के करण। यह कानूनी दर्जा हो गया और भारतीय संविधान में प्रावधानों 25/26 आदि में सुरक्षा प्रदान किया गया है।

 

भारत में आज जिस तरह भारतीय मुस्लिम का सामाजिक व राजनीतिक दृश्य है वह कुछ और नहीं बल्कि मुसलमान पीढ़ी दर पीढ़ी जो गुलाम बनाकर रख दिए गए हैं उसी के ऐतिहासिक धरोहर हैं। स्वयंभू धार्मिक पहचान की समस्या को ही समुदाय की नेतृत्व अधिक महत्व देती है और इसका जवाब धार्मिक उग्रवाद की पकड़ से उनके स्वतंत्र होने में है। आज के दौर के भी 'उदारवादी'मुसलमानों ने भी इस ऐतिहासिक गलती को सुधारने के लिए कोई व्यापक और साझा कोशिश नहीं की।

 
Why Are We Silent? हम चुप क्यों हैं!
Dr Ali Khan Mahmoodabad, Tr. New Age Islam

Why Are We Silent?  हम चुप क्यों हैं!
Dr Ali Khan Mahmoodabad

आज हमको शर्म से सिर झुकाना चाहिए कि पाक सरज़मीन पर एक ऐसे व्यक्ति का जिसका केवल आगमन हुआ बल्कि उसका इतने वैभव से स्वागत हुआ जिसने मुसलमानों और इस्लाम को बुरा कहने में कोई कसर नहीं छोड़ी,हम किस मुंह से पश्चिमी देशों की मुनाफेकत का उल्लेख कर सकते हैं जब इस्लाम के सभी प्रमुख और सत्ताधारी लोग एक ऐसे व्यक्ति का भाषण सुनने के लिए एकत्र होते हैं जिसने कहा कि मैं सोचता हूँ कि इस्लाम हमसे नफरत करता हैl

 

Triple Talaq Controversy  तीन तलाक का विवादास्पद मुद्दा: मुतअस्सिब उलेमा सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने के लिए इस्लाम की गलत तस्वीर पेश कर रहे हैं
Sultan Shahin, Founding Editor, New Age Islam

अपने एक हलफनामा में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक अजीबोगरीब सैद्धांतिक रुख किया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट को कहा है कि अगर तीन तलाक की प्रक्रिया को अवैध करार दे दिया जाता है तो यह मुसलमानों को पापों के लिए प्रतिबद्ध होने पर मजबूर करने की खातिर अल्लाह के निर्देश की अनदेखी करने के लिए फिर से कुरआन लिखने के बराबर होगा। क्योंकि सऊदी अरब,पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित लगभग सभी मुस्लिम देशों ने एक मजलिस की तीन तलाक के मामले को अवैध करार दिया है तो स्पष्ट है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की नज़र में वे सब इस्लाम से बाहर हो चुके हैं । मालूम होता है कि इस्लाम एक ऐसा धर्म बन चुका है कि जिस पर केवल कुछ भारतीय मौलवी ही पालन कर रहे हैं। यहां तक कि इस सिद्धांत के आधार पर यह दलील शियों और साथ ही अहले हदीस सुन्नी वहाबी फिरकों को भी मुर्तद करार देने के बराबर है क्योंकि यह सब मकातिबे फ़िक्र एक मजलिस की तीन तलाक को केवल एक तलाक रजई ही मानते हैं।

 

जो लोग हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं और आग से खेल रहे हैं। उन्हें समझना चाहिए कि भारतीय मुसलमानों के बहुमत ने जिन्ना के प्रस्तावित पाकिस्तान को अस्वीकार कर दिया था और गांधी, नेहरू, आज़ाद के पीछे लोहे की दीवार बन गए। उन्हें विश्वास था कि भारत सबका देश हैlएक बात और ध्यान देने की है। सदियों पहले इस्लामी मुजतहेदीन ने स्टेट के बारे में दो विचार दिए थे:दारुल इस्लाम और दारुल हरब,लेकिन भारतीय उलेमा ने देश की संरचना को ध्यान में रखते हुए तीसरी इस्तेलाह बनाई और भारत को दारुल अमन करार दिया। यह भारतीय मुसलमानों के विश्वास में शामिल हो गया कि भारत दारुल अमन है।

 

Instant Triple Talaq: The AIMPLB Puts Muslims to Shame Again  तीन तलाक का मामला -आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुसलमानों को फिर लज्जित किया
Arshad Alam, New Age Islam

अब आधिकारिक तौर पर इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने वर्तमान सत्र में मुस्लिम समाज में तलाक के मौजूदा मामूल में किसी भी परिवर्तन को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। दूसरे शब्दों में बोर्ड ने एक बैठक में तीन तलाक की प्रक्रिया की वैधता को बरकरार रखा और उसे तलाक देने का सही और वैध तरीका माना है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मुस्लिम महिलाओं को केवल इतनी राहत देने के लिए तैयार है कि जो व्यक्ति शरई नियम के अनुसार वैध कारणों के बिना तलाक देगा उसे सामाजिक बहिष्कार का सामना करना होगा।

 

मुस्लिम मैरिज एक्ट का मतलब है-व्यक्ति के विवाह और तलाक के विकल्प छीन करके अदालत को सौंपना। मतलब अन्य देशवासियों की तरह एक मुसलमान को भी किसी नाचाकी के कारण तलाक लेने के लिए सालों अदालतों के चक्कर काटने और मुकदमे बाज़ी में अपनी जान व माल खर्च करके भी बे मतलब और दर मांदा होते रहना होगा,जो परेशानी के साथ गैर शरई प्रक्रिया है।

 

इस्लाम में तलाक दो तरह से होती है:एक वे जो पत्नी द्वारा शुरू की जाती है जिसे 'खुला'कहते हैं और दूसरी स्थिति में पति द्वारा दी जाती है। तीन तलाक पति द्वारा दी जाने वाली तलाक का एक रूप है। अगर पति तलाक देता है तो उसे अपनी पत्नी का मेहर अदा करना पड़ता है,जो अनिवार्य अदाएगी है जिसे निकाह के समय दूल्हे की ओर से दुल्हन को अदा किया जता है या बाद में अदा करने का वादा किया जाता है। मेहर की निर्दिष्ट निकाह के दौरान हस्ताक्षर करने वाले हर निकाहनामें में की जाती है। अगर पत्नी खुला चाहे तो उसे अपने महेर के अधिकार से दस्तबरदार हो जाना पड़ता है, क्योंकि निकाह का यह रद्द खुद उसके द्वारा शुरू किया जता है।

 

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट में बहस शुरू हो चुकी है और जब फैसला सुनाया जाएगा तो भारत के हर नागरिक को यह मानना होगा। क्या ही अच्छा होता कि हम कह देते कि जो कानून 26मुस्लिम देशों में प्रचलित है हम भी उसी पर चलेंगे। ऐसा करके हम कानूनी चर्चा रुकवा सकते थे और अपने गैर मुस्लिम भाइयों के सामने शर्मिंदगी से बच सकते थे। न्यायिक चर्चा से गैर मुसलमानों को यह कहने का मौका मिल गया कि कुछ मुसलमान कुरआन पढ़ने के बावजूद उसे समझ नहीं पाए।

 
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