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Every Good Deed is Valued near Allah  हर अच्छा काम अल्लाह के नजदीक मूल्यवान है
Maulana Asrarul Haq Qasmi

इस्लाम ने अपने मानने वालों का प्रशिक्षण ऐसा किया है कि वह अच्छे कर्मों के खुद भी आदी हो जाएं और समाज में इसे फैलाने का भी कारण बनें। यही कारण है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने साथियों को ऐसे कामों पर उभारने के लिए खुद भी इन कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे और उन्हें हिदायत करते थे। कभी कभी उन्हें रग़बत के लिए पिछले कौमों के नेक लोगों के किस्से भी सुनाते थे। सहाबा रज़िअल्लाहु अन्हुम भी समय समय पर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा करते थे कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! कौन सा कर्म अल्लाह के नज़दीक इनाम वाला और अच्छा है और अवसर के हिसाब से प्यारे पैगम्बर उन्हें अलग जवाब दिया करते थे।

 

जहां एक तरफ आज का आधुनिक समाज यह तय कर पाया है कि मानवाधिकार हैं क्या? मानवाधिकार की परिभाषा क्या है? और इन्हें किन सिद्धांतों के तहत तय किया जाना चाहिए? वहीं दूसरी ओर सूफीवाद इस समस्या को सदियों पहले हल कर चुका है? सूफीयों की नज़र में यह एक मुख्य समस्या है और इसके नियम अल्लाह की तरफ से ही तय कर दिए गए हैं।

Deoband- Bareilly Unity: Cosmetic and Dangerous  देवबंदी- बरैलवी गठबंधन एक खतरनाक दिखावा
Sultan Shahin, Founding Editor, New Age Islam

सूफियों और बरैलवियों के साथ अपनी एक सदी पुरानी फूट को खत्म करने की देवबंदियों  की यह कोशिश यादगार हो सकती थी। लेकिन उन्होंने मात्र मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी भी परिवर्तन से लड़ने के लिए यह गठबंधन किया था। इससे केवल यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि देवबंद केवल भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ जहाँ तक हो सके मुसलमानों का एक बड़ा मोर्चा स्थापित करने और नेतृत्व करने की कोशिश कर रहा है। इससे यह ज्ञात है कि हाल के दशकों में सऊदी पेट्रो डॉलर के आधार पर वहाबियत को बढ़ावा देने के बावजूद अभी भी देवबंदी पैरोकार बहुत कम हैं। कुल मिलाकर अभी भी भारतीय मुसलमान सूफीवाद पर ही विश्वास करते हैं। हालांकि, केवल देवबंद ही नहीं है जो केवल राजनीतिक कारणों से सूफी बरैलवियों के साथ गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहा है। बल्कि मौलाना तौक़ीर रज़ा बरैलवी ने भी अपने देवबंद यात्रा में कहा था कि: "हमें अपने धार्मिक (सांप्रदायिक) मान्यताओं पर कायम रहते हुए अपने साझा दुश्मन से लड़ने के लिए एकजुट होना चाहिए, यही एकमात्र रास्ता है।"

 

आप सल्लललाहु अलैहि वसल्लम कदम कदम पर अपने साथियों के दिलदारी का ख्याल रखते थे, गजवा ए हुनैन के बाद जब माले ग़नीमत वितरण के संबंध में अंसार में से कुछ युवकों को शिकवा पैदा हुआ तो आपने उन्हें अलग जमा किया और ऐसा प्रभावशाली उपदेश दिया कि उनकी दाढ़ी आंसुओं से तर हो गईं, आप इस अवसर पर जहां अंसार मदीना में इस्लाम के परोपकार का उल्लेख किया, वहीं अंसार के परोपकार को भी खुले दिल से स्वीकार किया और अंत में फरमाया: क्या तुम्हें यह बात पसंद नहीं है कि लोग बकरियां और ऊंट लेकर जाएं और तुम अपने नबी को कजावह में लेकर जाओ? अगर हिजरत न होती तो मैं अंसारी में पैदा हुआ होता, तो अगर लोग एक वादी में चले तो मैं उस वादी में चलूँगा जिस में अंसार चलें, मेरे लिए अंसार की स्थिति उस कपड़े का है, जो ऊपर पहना जाता है। (बुखारी,अनअब्दुल्लाह इब्ने ज़ैद, अध्याय,गज़वतुत्ताईफ हदीस संख्या: 4330)

 

मनुष्य आम तौर पर अपने बुजुर्गों से झुक कर मिलता और तवाज़ो अपनाता है, अक्सर यह झुकाव और बिछाव में धर्म, भाषा और क्षेत्र का अंतर भी बाधा नहीं बनता, उसी तरह इंसान छोटों और बच्चों के साथ स्नेह और प्यार से पेश आता है, इसमें भी धर्म, क्षेत्र, भाषा का कोई अंतर नहीं होता, यह मानव स्वभाव का हिस्सा है, जैसे फूल को देखकर इंसान को उसे देखने और सूंघने की रूचि होती है, साथ ही बच्चों को देखकर दिल में करुणा का भाव उभरता और उससे प्यार करने को दिल चाहता है, मगर इंसान के व्यवहार और मिज़ाज का परीक्षा तब होता है, जब वह अपने दोस्तों और साथियों के साथ हो, विशेषकर ऐसी स्थिति में जब कि अल्लाह ने उसे अपने हम उम्रों और समकालीन लोगों  के मुकाबले उच्च स्थान व मर्तबे से नवाज दिया हो, जो लोग घटिया होते हैं, वे ऐसे अवसरों को अपनी बड़ाई की अभिव्यक्ति और दूसरों को नीचा दिखाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

 

Suicide Attacks Are Categorically Forbidden in Islam  आत्मघाती हमला सभी परिस्थितियों में हराम है: कुरआन और हदीस की रौशनी में
Ghulam Ghaus Siddiqi, New Age Islam

ऊपर कुरआनी आयतों और कई हदीसों का अध्ययन करने के बाद एक सही मुसलमान जिसे कुरआन के बारे में कोई संदेह नहीं है और जो हदीस की हुज्जियत पर विश्वास रखता है वह कभी भी आत्मघाती हमलों का औचित्य नहीं रख सकता। वह कभी भी आईएस द्वारा किए गए आत्मघाती हमलों का औचित्य किसी भी मामले में पेश नहीं कर सकता। एक मुसलमान जिसे अल्लाह और उसके प्यारे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के प्यार की मिठास नसीब हुई हो वह हमेशा आत्मघाती हमले को अवैध व हराम ही समझेगा। एक सही मुसलमान खुद को विस्फोट से उड़ा कर अपनी इसी जीवन को नष्ट नहीं कर सकता। वह आत्मघाती हमलों के लिए किसी दूसरे मुसलमान को नहीं उभारा सकता। अगर कोई यह हराम कार्य करता है तो वह नरक में सजा का हकदार होगा और हर उस रास्ते से भटक जाएगा जो अल्लाह और उसके प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के करीब का कारण है।

Why Islam Needs a Reformation Now  इस्लाम में अब बदलाव की ज़रुरत क्यों
Sultan Shahin, Founding Editor, New Age Islam

सऊदी अरब अपनी जमीन पर मंदिर या चर्च बनाने की अनुमति नहीं देता। कुरान की शिक्षा अगर किसी ज़ेहाद की अनुमति देती है तो वो सऊदी अरब के खिलाफ होनी चाहिए ताकि सऊदी अरब को बाध्य किया जा सके कि वह दूसरे धर्मों के धार्मिक स्थल को अपने यहाँ स्वीकृति दे। इस्लाम के आगमन के 13 सालों बाद जब मुसलमानों को खुद की रक्षा के लिए हथियार रखने की इजाजत दी गयी थी तो वह वास्तव में धर्म की रक्षा के लिए थी, केवल मुसलमानों या मुस्लिम धर्म की के लिए नहीं। कुरान के शब्दों में (२२:40) “अगर अल्लाह ने अलग-अलग तरह के लोगों को नियंत्रित न किया होता तो मठ, चर्च, उपासना स्थल और मस्जिद जहां-जहां ईश्वर की भरपूर पूजा की जाती है, उन्हें बिलकुल ही तबाह कर दिया जाता।“

Eid-e-Milad-un-Nabi an Important Festival for Various Sects of Islam  मीलाद उन-नबी इस्लाम धर्म के मानने वालों के कई वर्गों में एक प्रमुख त्यौहार है।
Syed Imteyaz Hasan

मिलाद-उन-नबीमिलाद-उन-नबी, इस्लाम के मानने वालो के लिए सबसे पाक़ त्योहार माना जाता है| मिलाद-उन-नबी का अर्थ दरअसल इस्लाम के प्रमुख हज़रत मोहम्मद के जन्म का दिन होता है | मिलाद शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के 'मौलिद' शब्द से हुई है| मौलिद शब्द का अर्थ 'जन्म' होता है और नबी हज़रत मोहम्मद को कहा जाता है | इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार मिलाद-उन-नबी का त्योहार 12 रबी अल-अव्वल के तीसरे महीने में आता है |

 

Islam of a Fundamentalist Like Zakir Naik is Not Our Islam  जाकिर जैसे कट्टरपंथियों का इस्लाम हमारा इस्लाम नहीं!
Ghulam Rasool Dehlvi

देश में इस्लाम के भीतर इधर एक कट्टर सलाफी विचारधारा उभरी है, जिसके उपदेशक ऐसी बातें कह रहे हैं जो इस धर्म के उदारवादी मूल्यों से मेल नहीं खाती। ऐसे ही एक धर्मोपदेशक हैं केरल के सलाफी धर्मगुरु शम्सुद्दीन फरीद, जो कहते हैं कि मुसलमानों को गैरमुस्लिमों के त्योहारों और धार्मिक पर्वों में भाग नहीं लेना चाहिए। माना जाता है कि मालाबार के लापता मुस्लिम युवा उन्हीं की शिक्षा से प्रभावित हैं। कई तथाकथित इस्लामी कार्यक्रमों में नाइक ने सालोंसाल जो काम किया, वही शम्सुद्दीन फरीद भी कर रहे थे। द्वेषपूर्ण भाषण देने पर कसारगोड पुलिस ने हाल में उनके खिलाफ मामला दर्ज किया है।

 

Poetry, Music is Forbidden in the Real Islam or in It's Fundamentalist Versions  काव्य, गीत-संगीत हकीकी इस्लाम में हराम है या इसके कट्टरपंथी संस्करणों में?
Abhijeet, New Age Islam

पैगंबरे-इस्लाम की सीरत में दसियों ऐसे प्रमाण मौजूद हैं जो साबित करतें हैं कि उन्हें न तो गीत-संगीत, काव्य और शेरो-शायरी से तकलीफ थी और न ही उनको खुशी मनाने के लिये इन तरीकों को चुनने पर ऐतराज़ था। रसूल जब मक्का से हिजरत कर मदीना पहुंचे तो मदीना की औरतें अपने-अपने मकानों की छतों पर चढ़ गई और आने की खुशी में झूम-झूम कर अश्आर पढ़ने लगी, छोटी बच्चियाँ दफ बजा-बजा कर गीत गाने लगीं। मज़े की बात है कि झूम रहीं और जश्न मना रही लड़कियों को नबी ने मना नहीं किया ये तुम लोग क्या जाहिलाना काम कर रही हो बल्कि खुश होकर उनसे पूछा कि ऐ बच्चियों, क्या तुम मुझसे मुहब्बत करती हो? लड़कियों ने हाँ में जबाब दिया तो खुश होकर नबी ने उनसे फरमाया, मैं भी तुम सबसे बेइंतेहा मुहब्बत करता हूँ।

Maulana, Why do you not Tell These Things to Your Ummah  मौलाना ये सब अपनी उम्मत को क्यों नहीं बताते?
Abhijeet, New Age Islam

रसूल साहब के सीरत की ये धटना तलाक को लेकर उनकी सोच को प्रतिबिंबित करती है। उनकी बेटी एक काफिर के निकाह में थी और शरीयत के अनुसार मुसलमान की बेटी किसी काफिर के निकाह में नहीं रह सकती तब भी नबी ने अबुल आस से अपनी बेटी को तलाक़ देने को नहीं कहा उल्टा जब उनके दामाद ने भड़काये जाने के बाबजूद बीबी जैनब को तलाक देने से मना कर दिया था तब नबी ने उनके बेहतरीन दामाद होने की बात कही थी।

Sultan Shahin Raises Triple Talaq Issue  सुल्तान शाहीन  ने UNHRC में  ट्रिपल तलाक के मुद्दे को उठाया , उन्होने मुसलमानों से कहा कि वे इस्लामी थियोलाजी पर गंभीरता से पुनर्विचार करें
Sultan Shahin, Founding Editor, New Age Islam

दक्षिण एशिया के एक मुस्लिम देश में हजारों हिंदू और ईसाई लड़कियों को , जिनमें से बहुत सी18 वर्ष की आयु से कम की हैं उनकाअपहरण कर लिया गया है, उन्हें जबरन मुसलमान बनाया गया हैऔर फिर उनकी "शादी"अपहणकर्ताओं से कर दी गई है। एक मध्य पूर्वी देश में, अदालतें, 9 साल की उम्र  वाली छोटी लड़कियों के विवाह की अनुमति देती हैं और उन्हें अपने विवाह को शारीरिक संबंध स्थापित करके पूर्ण करने और अपने पति के साथ रहने को मजबूर करती हैं।

Reviving a Sunnah? How ISIS Justifies Slavery?  आईएसआईएस के लोग गुलामी को कैसे सही ठहराते है? क्या वे एक सुन्नत को फिर से जीवित कर रहे हैं?
Arshad Alam, New Age Islam

2014  में जब ‘संजर’ फतह हुआ तो आईएसआईएस ने विशेषकर शिया और यज़ीदी समुदाय से कई महिलाओं और बच्चों को गिरफ्तार कर लिया. दाएश (आईएसआईएस) ने उन लोगों पर जो हैबतनाक अत्याचार किए, दुनिया उनकी दिल दहला देने वाली कहानियों से परिचित है. ‘संजर’ के जीत जाने के बाद पैदा हुए मानवीय संकट पर ध्यान केंद्रित करने के बजाए पश्चिमी मीडिया ने इस बात की जांच में अधिक रुचि दिखाई कि आईएसआईएस यौन गुलामी का वह बाजार गर्म करने में किस तरह लगा हुआ है, जिसमें यज़ीदी महिलाओं की खरीद-बिक्री जारी है।

Are Donors On Global Terror Watch Lists Funding Saudi-Style Islam In India?  भारत में सऊदी स्टाFइल इस्ला म की तलाश में विवादित पाठ्यक्रमों और फंड के रहस्यह का सच
Sreenivasan Jain

हालांकि सलाफी लोग कहते हैं कि उनकी अपील इस्‍लाम की शुद्धतावादी वर्जन पर आधारित है और इसी की शिक्षा देना उनका मकसद है और उनके बढ़ाव से चिंतित होने की कोई बात नहीं है. लेकिन यूपी और कर्नाटक में जब NDTV ने कई सलाफी मदरसों का दौरा किया तो हमने पाया कि कई विवादित सऊदी सलाफी विद्धानों को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है. मसलन 13वीं सदी के उपदेशक इब्‍न तैयमियाह को शामिल किया गया है जो प्रभावी मर्दिन फतवा के लेखक हैं. आमतौर पर पूरी दुनिया में जिहादी समूह हिंसा को न्‍यायोचित ठहराने के लिए इसका सहारा लेते हैं. 

 

Why Are Indian Ulema Silent Over Islamic State’s Challenge: Unwillingness Or Inability?  भारतीय उलेमा इस्लामी राज्य की चुनौती पर खामोश क्यूँ: यह उनकी अनिच्छा है या अक्षमता?
Sultan Shahin, Founding Editor, New Age Islam

कुछ लोग कहेंगें कि हमारे मुस्लिम उलेमा पहले ही मुनासिब कदम उठा चुके हैं तो इन्हें ही हर फितने का जवाब क्यूँ देना चाहिए? क्या 1050 भारतीय विद्वानों ने एक ऐसे फतवे पर हस्ताक्षर नहीं किया जिसके में आईएस की गतिविधियों को इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ करार दिया गया है? इसमें कोई शक नहीं है कि उन्होंने ऐसा किया है जैसा कि दुनिया भर के 120 उलेमा और यहां तक कि सऊदी अरब के ग्रैंड मुफ्ती ने भी ऐसा ही एक फतवा जारी किया था। लेकिन यहां सवाल यह है कि उनकी सारी कोशिशें पूरी तरह से अप्रभावी क्यों हैं? क्यों आईएस अब तक अपनी पार्टी में युवाओं को शामिल कर रहा है? 100 देशों से एक साल के भीतर 30,000 मुसलमान इस्लामी राज्य पहुँच चुके हैं।

 

Compassionate Islam and Ma Malakat Aymanukum दया और सहानुभूति का धर्म इस्लाम और “मा मलकत अय्मानुकुम” का अर्थ
T.O. Shanavas, New Age Islam

“मा मलकत अय्मानुकुम”, यह वाक्य सूरह अल-मआरिज की आयत 30 और 31 में है और इन जैसी दूसरी आयतों का अनुवाद (तर्जुमा) इस तरह किया जाता है: “जो अपने गुप्तांग (शर्मगाह) के प्रति सतर्कता बरतते रहते हैं और उसकी हिफाज़त करते हैं सिवाए अपनी बीवियों और गुलामों के जो उनकी मिल्क में हैं तो इस बात पर उनकी कोई भर्त्सना नही। किन्तु जिस किसी ने इसके अतिरिक्त कुछ और चाहा तो ऐसे ही लोग सीमा का उल्लंघन करनेवाले है।" ….

 

आइएस ने जिस तरह नृशंसता का प्रदर्शन किया है उसके कारण सारी दुनिया उसे हैवानियत का पर्याय मानने लगी है। उसके कहर को देख दुनिया स्तब्ध है। आइएस की शैतानी हरकतों की मुसलिम जगत में ही तीखी आलोचना हो रही है। मगर आइएस इस्लाम की उसकी अपनी व्याख्या पर डटा हुआ है। आखिर आइएस चाहता क्या है।

 

इन दिनों समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड पर इतनी चर्चा क्यों है?

चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन नाम के एक संगठन ने लगभग 50 हज़ार मुस्लिम महिलाओं के हस्ताक्षर वाला एक ज्ञापन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपा है जिसमे तीन बार तलाक़ को ग़ैर क़ानूनी बनाने की मांग की गई है.

इस ज्ञापन पर मुस्लिम समाज के कई मर्दों ने भी हस्ताक्षर किए हैं.

भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने केंद्र सरकार से कहा है कि वो स्पष्ट करे कि वो इस पर क्या कर रही है.

 

भारत सूफ़ी संतों का देश है जहाँ हिन्दू और मुसलमान मिलकर रहते हैं। देखा जाए तो हिन्दू समुदाय के दिल में सूफ़ी फ़क़ीरों के लिए जो अक़ीदत है, वह मुसलमानों के कमतर नहीं। आप अजमेर में ख़्वाजा के दरबार में चले जाइए,आपको लगेगा जैसे हिन्दू मुस्लिम एकता का मेला लगा है। सिख, ईसाई,दलित और बौद्ध भी उसी श्रद्धा से आते हैं और ग़रीब नवाज़ से अपनी फ़रियाद लगाते हैं। यह बात मुझे पिछले दिनों दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम और जयपुर में एक शानदार सूफ़ी सम्मेलन के बाद आयोजनकर्ता तंज़ीम उलामा ए इस्लाम के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ़्ती अशफ़ाक़ हुसैन क़ादरी ने कहीं।

Curriculum of the Indian Madrasas and Islamic Seminaries, Dars-e-Nizami  भारतीय मदरसों का पाठ्यक्रम, दर्स-ए-निज़ामी: विवाद सामग्री से भरपूर और सुन्दर आध्यात्मिक इस्लामी शिक्षाओं से खाली
Ghulam Rasool Dehlvi, New Age Islam

इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि मदरसे हमेशा इस्लामी शिक्षाओं के केंद्र रहे हैं और आज भी ऐसे कई मदरसे हैं जो इस दिशा में शानदार कारनामे अंजाम दे रहे हैं। लेकिन दुखद स्थिति यह है कि आज अक्सर मदरसे अपने छात्रों को आधुनिक दौर में पेश आने वाले शैक्षिक और वैज्ञानिक चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम बनाने में असफल हैं। दीनी मदारिस के मौजूदा हालात पर केवल एक सरसरी नजर डालने से ही इस बात का बखूबी अंदाजा हो जाता है कि यह अपने उस  वास्तविक  लक्ष्य से बहुत दूर जा चुके हैं, जो हमारे पूर्वज उलेमा और इस्लामी विद्वानों ने शुरुआत में तय किया था।

 

1. हे आस्तिको ! प्रतिज्ञाओं को पूरा करो। -कुरआन [5, 1]

2. …और अपनी प्रतिज्ञाओं का पालन करो, निःसंदेह प्रतिज्ञा के विषय में जवाब तलब किया जाएगा।  -कुरआन [17, 34]

3. …और अल्लाह से जो प्रतिज्ञा करो उसे पूरा करो। -कुरआन [6,153]

4. और तुम अल्लाह के वचन को पूरा करो जब आपस में वचन कर लो और सौगंध को पक्का करने के बाद न तोड़ो और तुम अल्लाह को गवाह भी बना चुके हो, निःसंदेह अल्लाह जानता है जो कुछ तुम करते हो। -कुरआन [16, 91]

5. निःसंदेह अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अमानतें उनके हक़दारों को पहुंचा दो और जब लोगों में फ़ैसला करने लगो तो इंसाफ़ से फ़ैसला करो।  -कुरआन [4, 58]

 

मैं जुमा की नमाज़ पढ़ने के लिए गया, लेकिन जब भी कोई नमाज़ पढ़ने वाला (मस्जिद में) प्रवेश करता तो सलाम करता और नमाज़ी लोग उसका जवाब देते, यहाँ तक कि जो क़ुरआन पढ़ रहा होता वह भी सलाम का जवाब देता। जब प्रवचन - खुत्बा - शुरू हो गया तो कुछ नमाज़ी प्रवेश किए और सलाम किए, तो इमाम ने धीमी आवाज़ में उत्तर दिया। तो क्या यह जायज़ है?

 

शायद आपको जानकर हैरत हो कि वुजू स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद फायदेमंद और कारगर है। नमाज से पहले पांच वक्त वुजू बनाने से इंसान ना केवल कई तरह की बीमारियों से बचा रहता है बल्कि वह तंदुरुस्त और एक्टिव  बना रहता है।

 

Religious and Theological Underpinning of Global Islamist Terror अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी आतंकवादियों की धार्मिक और थियोलाजी संबंधी बुनियाद: इंटर्नेशनल काउंटर टेरररिज्म सम्मेलन, 2016
Sultan Shahin, Founding Editor, New Age Islam

"आईएस आईएस का खंडन " शीर्षक से एक अरबी किताब की लाखों प्रतियां अभी हाल ही में सीरिया और इराक में वितरित की गईं हैं। यह अंग्रेजी में भी ऑनलाइन उपलब्ध है। इसमें कोई शक नहीं है कि इस पुस्तक के लेखक शेख मोहम्मद अल-याकूबी अपनी इस कोशिश के प्रति गंभीर हैं। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की है कि बगदादी और उसके साथी मूर्ख हैं, लेकिन उन्होंने भी इसके लिए कयामत से संबंधित हदीसों से ली गई उन भविष्यवाणियों का सहारा लिया  है जिनका प्रयोग आईएस आईएस करता है। अलकाईदा कयामत से पहले की भविष्यवाणियों की बात नहीं करता है, लेकिन आइएस आइएस के विचार कयामत से पहले की भविष्यवाणियों पर आधारित हैं। वे अपने युद्ध के औचित्य का आधार इसी बात को बनाते हैं कि अंतिम दौर में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह भविष्यवाणी की थी। आईएस आईएस ने दाविक जैसे सैन्य रूप में मामूली एक शहर पर कब्जा करने के लिए अनगिनत लोगों की जान कुर्बान कर दीं क्योंकि कयामत की भविष्यवाणी में इस शहर में युद्ध का हवाला मिलता है। उन्होंने अपनी पत्रिका का नाम भी दाविक रखा है।

 

Religious Extremism or Extremely Religious; A Feminine Perspective  धार्मिक उग्रवाद या बेहद धार्मिक होना ; एक स्त्री का नजरिया
Inas Younis, New Age Islam

उग्रवाद के विभिन्न कार्य भगवान या धर्म से  प्रेरित नहीं होते हैं, बल्कि इसकी वजह आदमी की यह सिद्ध करने  की चाह होती है कि वह उन चीजों को नियंत्रित कर सकता है जो प्रकृति-मानव चेतना के स्थिर कानूनों के अनुसार नहीं हैं। उग्रवादियों को सांसारिक सुख की इच्छा नहीं होती, वे अपनी आखरत को निश्चित करना चाहते हैं। ऐसा चाहें मनोवैज्ञानिक या राजनीतिक रूप से प्रेरित हो, सभी तरह के उग्रवाद की जड़ में चिंता और भय ही होता है।

 
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