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The Momineen and the Kafirin  मोमिनीन और काफेरीन
Naseer Ahmed, New Age Islam

“इसमें तो शक ही नहीं कि मुसलमान हो या यहूदी हकीमाना ख्याल के पाबन्द हों ख्वाह नसरानी (गरज़ कुछ भी हो) जो ख़ुदा और रोज़े क़यामत पर ईमान लाएगा और अच्छे (अच्छे) काम करेगा उन पर अलबत्ता न तो कोई ख़ौफ़ होगा न वह लोग आज़ुर्दा ख़ातिर होंगे” (5:69)

 

Facing Extremism- Some Key Proposals  उग्रवाद का सामना कैसे करें- कुछ महत्वपूर्ण सुझाव
Basil Hijazi, New Age Islam

मेरे एक अज़ीज़ का कहना है कि सभी रक्षात्मक तदबीरों और सैन्य ऑपरेशनों के बावजूद इस्लाम के नाम पर हो रहे आतंकवाद का खात्मा करने में दुनिया को नाकामी का सामना करना पड़ रहा है, जिसका कारण उनके खयाल में केवल यह है कि दुनिया मर्ज़ का इलाज करने के बजाए मरीज के लक्षण के पीछे पड़ी हुई है, और अगर स्तिथी यही रही तो इस समस्या का अंत कभी नहीं हो पाएगाl उनके अनुसार अगर “आतंकवाद” केवल “उप प्रभाव” है तो “धार्मिक या वैचारिक उग्रवाद” वास्तव में असल रोग हैl

 

इससे यह बात साफ़ है कि खैर के ज़माने में कोई जानता भी नहीं था कि औरत औरतों की इमामत करे, तो आज हम औरतों को खैरुल कुरून की औरतों से आगे बढ़ने की हिम्मत बिलकुल नहीं करनी चाहिए बल्कि उनहीं पाक बाज़ औरतों की सीरत को अपनाने की कोशिश करनी चाहिएl कहने का मतलब यह कि वक्त व हालात के फ़ितनों को देखते हुए औरतों को मस्जिद में जाने की हरगिज़ हरगिज़ अनुमति ना दी जाए जो लोग इस पर अड़े हैं वह हकीक़त में अजमते इस्लाम को दागदार करना चाहते हैंl

 

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया मुझे पता है कि तुम मेरे साथ (बा जमाअत) नमाज़ को पसंद करती होl “लेकिन तेरी नमाज़ तेरे रिहाइशी कमरे में बेहतर हैl बैठक की जगह और तेरी नमाज़ बैठक में तेरे लिए बेहतर है हवेली की जगह और तेरी नमाज़ अपनी हवेली में बेहतर है कबीले की मस्जिद के मुकाबलेl और अपने कबीले की मस्जिद में नमाज़ पढ़ना तेरे लिए अधिक बेहतर है मेरी मस्जिद (मस्जिदे नबवी) में नमाज़ पढ़ने से “तो इस पर उन्होंने हुक्म दिया कि उनके लिए उनके रिहाइशी कमरे के आखरी कोने के तारीक हिस्से में मस्जिद बना दी जाए (अर्थात नमाज़ के लिए जगह विशेष कर दी जाए) इसलिए ऐसा ही किया गया तो वह इसी में नमाज़ अदा करतीं रहीं यहाँ तक कि अल्लाह पाक से जा मिलींl (मुसनद अहमद पृष्ठ 371 जिल्द 6)

 

Reflections on Qur'anic Message - Part-12  निज़ामे जकात- जो इस्लामी निज़ाम समाज आधारित था वह इस ज़माने में इस्लामी पूंजीवाद को मजबूती प्रदान कर रहा है- खुदा गवाह है
Muhammad Yunus, New Age Islam

ख़ैरात तो बस ख़ास फकीरों का हक़ है और मोहताजों का और उस (ज़कात वग़ैरह) के कारिन्दों का और जिनकी तालीफ़ क़लब की गई है (उनका) और (जिन की) गर्दनों में (गुलामी का फन्दा पड़ा है उनका) और ग़द्दारों का (जो ख़ुदा से अदा नहीं कर सकते) और खुदा की राह (जिहाद) में और परदेसियों की किफ़ालत में ख़र्च करना चाहिए ये हुकूक़ ख़ुदा की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और ख़ुदा बड़ा वाक़िफ कार हिकमत वाला हैl” (9:60)....उक्त आयत में सदके को एक फ़रीज़ा करार दिया गया है इसमें इसके हकदारों की एक विस्तृत सूची भी पेश की गई है जिसका उद्देश्य इसके अयोग्य और धनी लोगों को इस पर दावा करने के हक़ से ख़ारिज करना हैl

 

Revisiting the Meaning of Kafir  काफिर के अर्थ पर नए सिरे से विचार
Naseer Ahmed, New Age Islam

इस आयत में काफिर का शब्द नाशुकरी और बगावत के अर्थ में हैl उसका इमानौर अकीदे के साथ कोई संबंध नहीं हैl मुसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के हुक्म की पैरवी कर रहे थे, लेकिन फिरऔन के दृष्टिकोण से, जिसने एक बेटे के तौर पर उनकी परवरिश की थी; वह वास्तव में एक बाग़ी थे जो फिरऔन के खिलाफ खड़े हुए और आपने अपने बेटे पर इताअत के एक बाप के हुकुक से इनकार कियाl

 

The Principles of War from the Quran  कुरान में युद्ध के सिद्धांत
Naseer Ahmed, New Age Islam

इस्लाम में, दुसरे काफिर हैं, लेकिन वह गैर मुस्लिम नहीं हैं बल्कि वह अन्याई और अत्यचारी हैं जो इस्लाम समेत किसी भी मज़हब पर अमल पैरा हो सकते हैंl कुरआन की रौशनी में अल्लाह का मकसद सभी किस्म की अन्यायों और अत्याचार का खात्मा करना है, और जो लोग न्याय के लिए खड़े होते हैं और अत्याचार के खिलाफ जंग करते हैं वह “अल्लाह की जमाअत” हैं और मुसलामानों को इस तरह के लोगों के साथ मिल कर एक “उम्मत वाहिदा” या एक संयुक्त मोर्चा कायम करना चाहिए ताकि अन्याय और अत्याचार का खात्मा हो सकेl

 

औरतों को मस्जिदों में जाने की अनुमति उस समय थी जब कि मुअल्लिम इंसानियत के सिवा कोई मुअल्लिम ना था इस्लाम के शुरुआत का ज़माना था और हर नौ मुस्लिम की शिक्षा दीक्षा बहुत ज़रुरी थी इस लिए नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मस्जिदे नबवी में बैठ कर ही सभी पेश आने वाले मसाइल का हल फरमाया करते थेl लेकिन उस समय जब यह दुश्वारियां ख़तम हो गई और जा बजा औरतों की शिक्षा के लिए अंबिया के वारिस ने विशेष इंतज़ाम किया और जगह जगह दर्सगाहें और तरबियतगाहें फराहम हो गई तो इन हालात में अब उनहें मस्जिदों में जाने की कोई हाजत नहीं रही क्योंकि उनके लिए असल हुक्म तो यह हैl अनुवाद: “और (साफ-साफ) उनवाने शाइस्ता से बात किया करो और अपने घरों में निचली बैठी रहो और अगले ज़माने जाहिलियत की तरह अपना बनाव सिंगार न दिखाती फिरो...” (सुरह अहज़ाब ३३)

 

ISIS in India?  क्या यह भारत में आई एस आई एस के आने का संकेतहै?
Arshad Alam, New Age Islam

अब तक वर्तमान तथ्य इतने स्पष्ट नहीं हैं कि इसका सर रिश्ता आइएसआइएस के साथ जोड़ा जाएl ट्रेन धमाके की प्रारंभिक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि संभावित रूप से हो सकता है कि यह हादसा बिजली सार्ट सर्किट की वजह से पेश आया होl लेकिन इसके बावजूद कथित तौर पर लखनऊ में एक आइएसआइएस के दहशतगर्द को गिरफ्तार किया गया हैl और कुछ दुसरे व्यक्तियों की गिरफ्तारी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के विभिन्न स्थानों से भी अमल में आई है लेकिन पुलिस अब तक उन धमाकों का संबंध उनसे साबित नहीं कर सकी हैl

 

God Created This Limited World To Put Us On Trial  खुदा ने इस सीमित दुनिया का निर्माण हमारी आज़माइश के लिए किया है
Maulana Wahiduddin Khan

खुदा ने अपनी मर्जी के अनुसार एक बेहतरीन दुनिया का निर्माण किया है जिसका नाम जन्नत हैl एक ऐसी दुनिया जिसमें हमारी इक्षा के अनुसार हर चीज उपलब्ध है, जो हर प्रकार की सीमा और कमी, खौफ और दर्द से पाक हैl एक ऐसी दुनिया जहां ना कोई मौत है ना बुढ़ापा है, जहां हम पूर्ण रूप से तृप्त हो सकते हैंl एक कामिल जन्नत में कोई नाकिस प्राणी नहीं रह सकताl इसलिए, खुदा ने कमाल प्राप्त करने वाली मखलूक की शकल में हमें पैदा किया हैl मशीयत यह है कि हम इस मौजूदा और नाकिस दुनिया में एक परीक्षा व आज़माइश का दौर बसर करें और इसके बाद अपने कर्मों के अनुसार हम एक कामिल और अनन्त दुनिया में रहने का हक़ हासिल कर सकेंगेl

 

Repentance of Sins– the first Station of Islamic Mysticism  गुनाहों से तौबा- इस्लामी सूफीवाद का प्रथम स्थान
Ghulam Ghaus Siddiqi, New Age Islam

तौबा अल्लाह पाक के करीब आने और उसकी मुहब्बत हासिल करने का माद्ध्यम हैl यह परिवर्तन ज़िन्दगी का एक अमल और पाकीजगी की असल हालत पर वापस आने का एक तरीका हैl तौबा अल्लाह को राजी करने का जरिया है, हमारे दिल को पाक करती है और हमें मुश्किलात और आजमाइशों से दूर रखती हैl अल्लाह नें हमें कुरआन करीम में तौबा के बारे में बार बार याद दिलाया हैl जैसे कि अल्लाह पाक फरमाता है, “क्यों नहीं रुजूअ करते अल्लाह की तरफ और उससे बख्शिश मांगते, और अल्लाह बख्शने वाला मेहरबान हैl” (5:74)l “बेशक वही है बहुत तौबा कुबूल करने वाला मेहरबानl “(2:37)l मगर वह जो तौबा करें और संवारें और ज़ाहिर करें तो मैं उनकी तौबा कुबूल फरमाऊंगा और मैं ही हूँ बड़ा तौबा कुबूल फरमाने वाला मेहरबानl (2:160)

 

उल्फत व मुहब्बत से ज़िंदगी गुज़ारने में हमारे आखिरत की कामयाबी है, वरना अगर हम एक दुसरे के दुश्मन बन गए तो दुश्मनी की वजह से हम उसके पीछे अधिक और अपने पीछे कम ध्यान देंगे, जिससे ना तो हम अपने दुनियावी काम में ध्यान दे पाएंगे और ना ही हमें दीनी कामयाबी की तलाश का मौक़ा मिलेगाl इसलिए उल्फत व मुहब्बत और भाईचारगी ही हमारे कामयाबी की ज़मानत हो सकती है, और ऊपर पेश किये गए अहादीस भी क़यामत तक के लोगों को भाईचारगी और रवादारी का दर्स देती है और एक दुसरे की मदद का जज्बा भी उजागर करती हैl

 

आयते करीमा और हदीसों में जा बजा यह शिक्षा दी गई है कि सभी उम्मत दावत हो या इस्तेजाबत आपस में एक दुसरे के साथ उल्फत व भाईचारगी कायम करें, एक दुसरे के हुकुक को पहचान कर उनको अदा करने की कोशिश करें, और हर मुसीबत और ज़रूरत के समय उनका साथ देंl मुहब्बत करने का बुनियादी मतलब यह है कि एक दुसरे के बारे में सामान्य पसंदीदगी, कुबूलियत और मदद का रवय्या रखा जाएl इस काम की इब्तेदा वालिदैन से होती है, फिर उसमें बीवी बच्चे, भाई बहन, रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त अहबाब और दुसरे सम्बन्धी एक के बाद दुसरे सभी को शामिल होते चले जाते हैंl

 

The Nuances of Quranic Diction  कुरआन के भाषा शैली की बारीकियाँ
Naseer Ahmed, New Age Islam

अगर लोग कोई काम नेक नियति के साथ बिना किसी गफलत, किसी इनकार के या हक़ पर सूचित होने के बाद उसका इनकार किये बिना करते हैं तो अल्लाह की बख्शिश का दरवाज़ा उनके लिए खुला है, चाहे वह “मोमिन” हों या “काफिर”l और जहां तक बात इस सवाल का है कि क्या सभी मुशरेकीन काफिर हैं या नहीं, तो इसका सादा पैमाना कुरआन की किसी भी आयत में मुशरेकीन को काफिरीन का बदला तलाश करना और उन विरोधाभास को दरयाफ्त करना है जो उस नतीजे तक ले जाते हैंl यहाँ इससे बेहतर कोई सबूत नहीं हो सकता कि कुरआन की किसी भी आयत में सभी मुशरेकीन काफिर नहीं हैंl इसलिए, लोगों को इसे कुबूल करने में झिझक क्यों है?

 

The Correct Understanding of the So Called ‘Sword’ Verses of Surah Taubah  सुरह तौबा की नाम निहाद “तलवार” वाली आयतों की सही तफसीर
Naseer Ahmed, New Age Islam

यहाँ तक कि उन लोगों को भी जंग बंदी की मुद्दत के दौरान हिजरत करने और खुद को बचाने का मौक़ा दिया गया थाl यह फैसला केवल इस समाज के सेकुलर कानून के अनुसार ही नहीं बल्कि मजीद इंसानी और रहमदिली पर आधारित थाl इसलिए उनहें “तलवार वाली आयतें” करार देना मुराद और परिणाम दोनों के आधार पर कुरआन की एक गलत तर्जुमानी हैl और किन लोगों पर मुशरेकीन, काफेरीन, ला यालमुन और ला युमिनुन जैसे कलीदी शब्द और उनके अर्थ का इतलाक होता है इस की सफाई खुद आयतों की मदद से पेश कर दी गई हैl

 

Had The Hadith Already Asked Muslims 1400 Years Ago Not To Join ISIS?  क्या हदीस ने 1400 साल पहले ही मुसलमानों को आईएसआईएस में शामिल नहीं होने का हुक्म दे दिया था?
Ghulam Ghaus Siddiqi, New Age Islam

प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आईएसआईएस जैसी आतंकवादी संगठनों के बारे में भी भविष्यवाणी की और हमें यह बताया कि फ़ितनों के दौर में “ऐसे नौजवान लोगों का एक गिरोह सामने आएगा जो बेवकूफ और नादान होंगे”l वह “पुरकशिश बयानात का सहारा लेंगे” लेकिन बदतरीन अपराध का इर्तेकाब करेंगेl वह कुरआन पढ़ेंगे और लोगों को कुरआन की तरफ बुलाएँगे लेकिन इसकी “शिक्षाएं उनके गले से नीचे नहीं उतरेंगी” अर्थात वास्तव में कुरआन के पैगाम के साथ उनका कोई संबंध नहीं होगाl प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलाही वसल्लम ने इन आतंकवादियों को “बदतरीन मखलूक” करार दिया हैl

 

Is It Possible To Logically Derive A Single Meaning Of Every Verse Of The Quran?  क्या कुरान के एक आयत से केवल एक ही अर्थ लेना संभव है?
Naseer Ahmed, New Age Islam

कोई और क्यों नहीं यह कहता कि कुरआन की कुरआन की हर आयत का केवल एक अर्थ तार्किक तौर पर लिया जा सकता है? इसका विशेष कारण यह है कि वह हदीसों की रौशनी में कुरआन की “व्याख्या”, करते हैं और यह महसूस करते हैं कि उन्हें इसके स्पष्ट अर्थ से मुंह मोड़ने और उसके “अर्थ” को अपने अकीदे के साथ हम आहंग करने के लिए कुरआन मजीद की विभिन्न आयतों को मनसूख करने की जरुरत हैl वह अहले किताब की तरह जान बुझ कर कुरआन के अर्थ में उलटफेर करते हैं (2:75) और असल अर्थ के बजे उसके अनुपूरक अर्थ का प्रयोग करके उसकी व्याख्या करते हैंl क्या अर्थ के लिए उन्हें हदीसों पर निर्भर होने की आवश्यकता है?

 

The Sixteen Quranic Verses That Counter Violent-Extremism and Terrorism  सोलह कुरआनी आयतें जो उग्रवाद और आतंकवाद का खात्मा चाहती है
Ghulam Ghaus Siddiqi, New Age Islam

मुस्लिम उलेमा इस्लामी शरई कानून को समझने के लिए चार महत्वपूर्ण स्रोत का इस्तेमाल करते हैं; कुरआन, सुन्नत, इज्माअ और कयासl आखरी तीनों स्रोत के लिए ज़रूरी है कि वे निश्चित तौर पर कुरआन करीम के मुताबिक हो जोकि इस्लामी बुनयादी उलूम का एक बुनियादी मसदर व सरचश्मा हैl जब कुरआन किसी समस्या पर खुद से बराहे रास्त रौशनी नहीं डालता या उसका विवरण प्रदान नहीं करता तभी मुस्लिम उलेमा इस्लामी अह्कामत के वैकल्पिक स्रोत से रुजुअ करते हैंl

 

The Culture of Terrorism and Counter-Terrorism  आतंकवाद की संस्कृति और आतंकवाद की रोकथाम की संस्कृति
Basil Hijazi, New Age Islam

अब चाहे बात वांछित सामाजिक न्याय की ही क्यों न हो, इस मकसद में कामयाबी या नाकामयाबी की साड़ी ज़िम्मेदारी केवल सरकारी नीतियों पर ही नहीं डाली जा सकती है। क्योंकि एक समस्या "भाग्य" और "अल्लाह की मर्ज़ी" का भी है। यानी मामले की स्थिति को "खुदा की मर्ज़ी" समझ कर उसे जूं का तूं ही कुबूल कर लेना। इसीलिए अगर यह दावा बना कर पेश किया जाए कि आतंकवादी ज़ुल्म के खिलाफ कोई क्रांतिकारी आंदोलन है तो फिर यह “क्रांतिकारी आंदोलन” महिलाओं, बच्चों और निर्दोष लोगों का खून क्यों बहाती है।  न्याय की खोज और निर्दोष लोगों के क़त्ले आम के बीच आखिर क्या संबंध है?

 

The Culture of Terrorism and Counter-Terrorism  आतंकवाद की संस्कृति और आतंकवाद की रोकथाम की संस्कृति
Basil Hijazi, New Age Islam

अब चाहे बात वांछित सामाजिक न्याय की ही क्यों न हो, इस मकसद में कामयाबी या नाकामयाबी की साड़ी ज़िम्मेदारी केवल सरकारी नीतियों पर ही नहीं डाली जा सकती है। क्योंकि एक समस्या "भाग्य" और "अल्लाह की मर्ज़ी" का भी है। यानी मामले की स्थिति को "खुदा की मर्ज़ी" समझ कर उसे जूं का तूं ही कुबूल कर लेना। इसीलिए अगर यह दावा बना कर पेश किया जाए कि आतंकवादी ज़ुल्म के खिलाफ कोई क्रांतिकारी आंदोलन है तो फिर यह “क्रांतिकारी आंदोलन” महिलाओं, बच्चों और निर्दोष लोगों का खून क्यों बहाती है।  न्याय की खोज और निर्दोष लोगों के क़त्ले आम के बीच आखिर क्या संबंध है?

 

Division of Knowledge between Religious and Secular in the Madrasas  इस्लाम के निरंतर गिरावट को खत्म करने के लिए, मदरसों में धार्मिक और धर्मनिरपेक्षता के बीच ज्ञान का बटवारा समाप्त करना आवश्यक
Muhammad Yunus, New Age Islam

“इस्लाम जिसकी आयु ईसाइयत के मुकाबले में आधी दर्जन शताब्दी ही कम है, इसने एक लंबा और शानदार तहजीब पेश किया और आज हम जिस तहजीब के प्रतिनिधि हैं इसका अधिकतर भाग उसी का कृतज्ञ है कि जब मध्यकालीन के कुछ राहिब यूनानी व रूमी तहजीब के बारे में अपने सीमित ज्ञान को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे थे, मुस्लिम देशों के शानदार शहरों में शैक्षिक संस्थान और विश्वविद्यालय फलफूल रहे थे”l जोनाथन ब्लूम और शीला ब्लेयर, Islam, Empire of Faith, बी सी सी सीरीज, ब्रिटिश 2001, पृष्ठ 11l

Some Muslim Intellectuals of This Era Cry Lies or Half-Truths against Islam  कुछ मुस्लिम विद्वान इस्लाम के बारे में संदेह पैदा करने के लिए या तो झूठ बोल रहे हैं या आधी सच्चाई पेश कर रहे हैं
Muhammad Yunus, New Age Islam

और जो कोई भी मुस्लिम विद्वान कुरआन में तरमीम करने या उसे पुर्णतः अस्वीकार करने का ख्वाब देखता है उसे इतहास से सबक प्राप्त करना चाहिएl मुग़ल बादशाह अकबर आज़म नें जो खुद को इस्लाम का एक सुधारक समझता थाl जिसकी पैदाइश हज़रत मुहम्मद की बेसत के लगभग एक हज़ार साल के बाद हुई थी, एक संपादित इस्लाम दीने इलाही से परिचित करायाl वह अपने पुरे जीवन में किसी भी संख्या में लोगों को इस दीन में शामिल नहीं कर सकाl एक सम्पादित कुरआन पेश करने का स्टैंड रखने वाले मौजूदा दौर के विचारक क्या मक़ाम रखते हैं इस पर लेखक कुछ नहीं कहना चाहताl

 

Can We Trust Our Common Sense?  क्या हम अपने कॉमन सेंस पर भरोसा कर सकते हैं?
Naseer Ahmed, New Age Islam

धर्मों नें हमें सहीह और गलत का अत्यधिक महत्वपूर्ण पैमाना दिया है लेकिन इंसानों की बने हुई फिकह के कारण इसका अधिकतर भाग खराब हो गया है जिसके कारण इसके पैरुकारों के कॉमन सेंस को बढ़ते हुए पूर्वाग्रह, संकीर्णता और अलगाववाद की दिशा में फेर दिया गयाl हमें अपनी फिकह को अपने आसमानी सहिफा कुरआन की रौशनी में नये सिरे से तशकील देने और उन सभी गलत दृष्टिकोण व विचारों को अस्वीकार करने की आवश्यकता है जो हमारी कह ने हमें दिया हैl

 

Reflections on Qur'anic message - Part-13  जकात का व्यापक पहलू- दिमाग की गंदगियों को दूर करके अपनी सोच और फ़िक्र को पाक करना
Muhammad Yunus, New Age Islam

हो सकता है कि इन सभी बातों में आधुनिक मूल्यों के हामिल पाठकों की दिलचश्पी ना हो क्योंकि उपरोक्त अहकामात या ममनुआत (वर्ज्य) में से किसी से भी माल, मूल्य और समाजी हैसियत की दौड़ में आगे बढ़ने में या अपनी चमक दमक और नाम व नुमूद में बढ़ोतरी करने में मदद नहीं मिलती है, जो कि वर्तमान युग में हर इंसान का मुतमहे नज़र हैl और जहाँ तक आम मुसलमानों का प्रश्न है तो उनके लिए उलेमा के लम्बे बयानात और अंबिया, औलिया और सुफिया की कहानियाँ और उनके मोअजज़ात का ज़िक्र कुरआन के खुश्क अहकामात व हिदायात से कहीं अधिक रुचि का कारण हो सकता हैl

 

Reflections on Qur'anic Message - Part-11  कुरआन के अनुसार ज़कात सहित सदका पुरी मानवता की देख भाल से इबारत है, यह ही इस्लामी मानवतावाद का आधार है
Muhammad Yunus, New Age Islam

खुलासा यह है कि जब कुरआन एक मुसलमान से चाहे वह अमीर हो या गरीब, परुष हो या स्त्री "اقیمو الصلوٰۃ و اٰتو الزکوٰۃ" कहता है, तो वह न केवल यह कि नमाज़ कायम करने का आदेश देता है बल्की अपने ख्यालात को पाक करने के लिए दोसरों के लिए रहमत औ शफकत का रवय्या अपनाने का भी आदेश देता हैl और यह अपने दिमाग को सभी नकारात्मक और बुरे ख्यालात से पाक करना हैl एक मालदार व्यक्ति के लिए ज़कात के फ़रीज़े से बारी होने के लिए सदके में सखावत का प्रदर्शन करना आवशयक है (9:60) जोकि फ़र्ज़ ज़कात की बुनियाद है जिस पर हम अलग से प्रकाश डालेंगेl

 
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