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Hindi Section (26 Mar 2012 NewAgeIslam.Com)



कुरानी शरीयत (कानून) तलाक, तीन तलाक, अस्थायी शादी, हलाला को हराम क़रार देती है

मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम

(अंग्रेज़ी से अनुवाद‑ समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

सह लेखक (संयुक्त रूप से अशफाक अल्लाह सैयद के साथ), इस्लाम का असल पैग़ाम, आमना पब्लिकेशन, यू एस ए, 2009

तलाक के बारे में लोकप्रिय प्रथा के बारे में कुरानी चिंता

इस्लाम से पहले के अरब में मर्द अपनी बीवियों को सिर्फ ये कह कर छोड़ सकते थे, "मेरे लिए तुम मेरी माँ जैसी हो" (58:2)।

क्योंकि तलाक देना मर्द के अधिकार में था, उसे किसी कारण की जरूरत नहीं होती थी और न ही वो अपनी तलाक़ दी हुई बीवी को छोड़ता था, जो किसी दूसरी जगह जाने के बजाय अपने शौहर के घर में रहने को प्राथमिकता देती थीं। सही बुखारी में हज़रत आयशा से रवायत है (Acc. 134/Vol.7) ये रिवाज एक नियम बन गया था। इस हदीस के मुताबिक़ः

 "... महिलाएं जिनके पति उन्हें अपने साथ अब रखना नहीं चाहते हैं और तलाक देना चाहते हैं और किसी अन्य महिला से शादी करना चाहता है, इसलिए पत्नी अपने पति से कहती है कि मुझे रखे रहो और तलाक मत दो और दूसरी महिला से शादी कर लो और तुम न मुझ पर खर्च करो और न ही मेरे साथ सो"।

जस्टीनियन कोड जिसका उस ज़माने के विचारों पर बहुत असर था,  वो औरत को एक आदमी की मिलकियत के तौर पर पेश करता था। शादी के बाद पति उसका मालिक बन जाता था और जैसा चाहता था,  उसके साथ व्यवहार करता था। इस तरह,  वो आसानी से सिर्फ ये कह कर अपनी पत्नी को तलाक दे सकता था,  "मैंने तुझ को तीन बार तलाक दिया"। अस्थायी तौर पर साथ रहने की एक प्रणाली (मोतअ शादी) भी लोकप्रिय थी, जो महिलाओं को इजाज़त देती थी कि वो विभिन्न पुरुषों के साथ रह सकती हैं जब उनके पति व्यापार या अन्य किसी मिशन के कारण घर से दूर हों। शिया अस्ना अश्हरी मकतब फिक्र (सम्प्रदाय) इस पर अमल बरकरार रखे हुए है। इस तरह आलिमे दीन अल-हुर्र अल-आमिली के मुताबिक, "मोमिन कामिल तभी होता है जब उसे मोतअ का तजुर्बा [1] हो हालांकि, इसमें कोई शक नहीं हो सकता है कि ये रिवाज व्यवहारिक रूप से कानूनी अस्मत फरोशी से मिलता जुलता है। हालांकि ये तलाक का सवाल नहीं उठाता है,  विवाहित महिला जो इस पर अमल करती हैं वो अस्थायी रूप से अपने पति से तलकशुदा होती हैं और खुद उनके या उनके बच्चों के लिए कोई रोज़गार नहीं होता है और इसलिए सामाजिक स्तर के हिस्से के रूप में दूसरे पुरुष के साथ रहने लगती हैं।

कुरान अपने अहम एजेंडे के साथ " और (सख्त एहकाम का) बोझ जो उनकी गर्दन पर था और वह फन्दे जो उन पर (पड़े हुए) थे उनसे हटा देता है " (7:157) मनमाने तलाक , वैवाहिक जब्र और जीवन भर की गुलामी की लानत से महिलाओं को बचाता है। इससे आगे बढ़कर, यह तलाक के बाद एक या मियां बीवी दोनों और साथ ही साथ बच्चों पर इसके गंभीर भावनात्मक और वित्तीय निहितार्थों को स्वीकार करता है। इसलिए ये समझौते की शर्तें के ज़रिए तलाक देने से रोकता है,  लेकिन इसकी इजीज़त देता है, अगर परिवार के लिए इस का विकल्प जीवन भर का दुख हो।

लेकिन कुरान,  महिलाओं को एक सामाजिक बोझ नहीं मानता है। ये उनके आर्थिक हितों और जो शादी टूट गई उससे पैदा होने वाले बच्चों की सुरक्षा करता है,  और उसे फिर से शादी की इजाज़त देता है और उनके साथ व्यवहारिक रूप से किसी भी अन्य गैर शादीशुदा महिलाओं की तरह व्यवहार करता है।

वही के संदर्भ

वही के नाज़िल होने के ज़मानए हाल के संदर्भ में कुरान इस्लाम से पहले की उन रस्मों को रद्द करता है जो मर्द को एक हलफ (शपथ) के ज़रिए अपनी बीवी के साथ हमेशा के लिए सम्बंध खत्म करने लेकिन अपने निकाह में रखने की इजाज़त देता है,  इस तरह ये इस औरत की फिर से शादी या आज़ादी में रुकावट डालता है। (2:226)

"और उन लोगों के लिए जो अपनी पत्नियों के पास न जाने की कसम खा लें, चार माह की मोहलत है, पस अगर वो (इस मुद्दत में) रुजु कर लें तो बेशक अल्लाह बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है" (2:226) ।

आयत के अंत में बख्शिश और मेहरबानी करने वाली खुदा की विशेषता कुरान की मियाँ बीवी के बीच मिलाप और प्रभावी शादी के बंधन को प्रोत्साहित करने की तरफ़ इशारा करता है। लेकिन, अगर एक आदमी तलाक के अपने फैसले पर जमा हुआ है और लगातार चार महीने के लिए अपनी पत्नी को छोड़ देता है,  तो उसे इस अवधि के अंत में उसे शादी को खत्म कर देनी चाहिए और पत्नी को छोड़ देना चाहिए (2:227)।

"और अगर उन्होंने तलाक का पुख्ता इरादा कर लिया हो तो बेशक अल्लाह खूब सुनने वाला जानने वाला है" (2:227)

इंसानियत के लिए बतौर पैमाना तलाक के प्रभावी होने के लिए कानून बनाने का एक टाइम फ्रेम

एक कानूनी जुमले के तौर पर (2:228 /229) कुरान की दूसरी चीजों के बीच, तलाक का नोटिस (2:228) पाने वाली एक महिला के लिए तीन महीने के इंतजार की अवधि निर्धारित करता है, और उस व्यक्ति को आदेश देता जो नियमित रूप से तलाक की प्रक्रिया शुरू करे, वो स्पष्ट रूप से इस अवधि के दौरान कम से कम दो बार गवाहों की मौजूदगी में अपनी नियत ज़ाहिर करे .... (2:229)। इस अवधि में दो अन्य आयात (2:231, 65:2) में इसे दुहराया गया है।

"और तलाक़याफ्ता औरतें अपने आपको तीन हैज़ तक रोके रखें, और उनके लिए जायज़ नहीं कि वो उसे छिपाएँ जो अल्लाह ने उनके रहमों में पैदा फरमा दिया हो .... (2:228)। तलाक (सिर्फ) दो बार (तक) है, फिर या तो (बीवी को) अच्छे तरीक़े से (ज़ौजियत में) रोक लेना है या भलाई के साथ छोड़ देना है .... (2:229)।

"और जब तुम औरतों को तलाक दो और वो अपनी इद्दत (पूरी होने) को आ पहुँचें तो उन्हें अच्छे तरीक़े से (अपनी ज़ौजियत में) रोक लो या उन्हें अच्छे तरीके से छोड़ दो, और उन्हें महज़ तकलीफ़ देने के लिए न रोके रखो कि (उन पर) ज़्यादती करते रहो, और जो कोई ऐसा करे सो उसने अपनी ही जान पर ज़ुल्म किया ... "(2:231) ।

"फिर जब वह अपनी मोक़र्रेरा मीआद (के खत्म होने) के क़रीब पहुंच जाएं तो उन्हें भलाई के साथ (अपनी ज़ौजियत में) रोक लो या उन्हें भलाई के साथ जुदा कर दो। और अपनों में से दो आदिल मर्दों को गवाह बना लो और गवाही अल्लाह के लिए क़ायम किया करो,  इन (बातों) से उसी शख्स को नसीहत की जाती है जो अल्लाह और यौमे आखिरत पर ईमान रखता है,  और जो अल्लाह से डरता है वो उसके लिए (दुनिया और आखिरत के रंज व ग़म से) निकलने की राह पैदा फरमा देता है" (65:2)।

तलाक के बाद दोबारा शादी

कुरान तीन महीने की इद्दत के खात्मे के बाद एक तलाकशुदा औरत को अपने साबिका शौहर (पूर्व पति) के साथ शादी की इजाज़त नहीं देता है। उसे एक दूसरे मर्द से शादी कर के उसकी बीवी के तौर पर उसके साथ रहना चाहिए और अगर उसकी दूसरी शादी नाकाम होती है और अगर उसके नए शौहर ने उसे तलाक दे दिया, तो वो तीन महीने के इद्दत के बाद अपने पहले शौहर से दोबारा शादी कर सकती है (2:230)।

"फिर अगर उसने (तीसरी बार) तलाक दे दी तो उसके बाद वो उसके लिए हलाल न होगी जब तक कि वो किसी और शौहर के साथ निकाह कर ले,  फिर अगर वो (दूसरा शौहर) भी तलाक दे दे तो अब इन दोनों (यानी पहले शौहर और इस औरत) पर कोई गुनाह न होगा, अगर वो (दोबारा रिश्तए अज़्दवाज में) पलट जाएं बशर्ते कि दोनों ये खयाल करें कि (अब) वो हुदूदे इलाही क़ायम कर सकेंगे,  ये अल्लाह की (मोक़र्र करदा) हुदूद हैं जिन्हें वो इल्म वालों के लिए बयान फरमाता है" (2:230)।

जाहिर है, यह एक तलाकशदा औरत को पूरी आजादी और नए पति या पत्नी को तलाश करने और शादी करने की इजाज़त देता है। इस शिक (उपबंध) की गैर मौजूदगी में कई पूर्व पति अपनी तलाकशुदा बीवियों को तलाक़ के बाद पैदा हुए बुग़्ज़ (ईर्ष्या) के सबब एक नए पति या पत्नी से शादी में रुकावट पैदा कर सकते थे। इसलिए कुरान मर्दों को को चेतावनी देता हैः

"और जब तुम औरतों को तलाक दो और अपनी इद्दत (पूरी होने) को आ पहुँचें तो जब वे शरई दस्तूर के मुताबिक आपस में रज़ामंद हो जाएं तो उन्हें अपने (पुराने या नए) शौहरों से निकाह करने से मत रोको, उस शख्स को इस अमर की नसीहत की जाती है जो तुम में से अल्लाह पर यौमे क़यामत पर ईमान रखता हो,  ये तुम्हारे लिए बहुत सुथरी और नेहायत पाकीज़ा बात है,  और अल्लाह जानता है और तुम (बहुत सी बातों को) नहीं जानते" (2:232)।

अटल तलाक के बाद पूर्व पति से दोबारा शादी की इजाज़त के मामले में अगर इस्लाम से पहले की ही  रस्म जारी रहतीं जिसमें मर्द अपनी मर्ज़ी से बीवी को तलाक देता था, और अपनी मर्ज़ी से दोबारा शादी करता था और अपने से अलग होने की कभी इजाज़त नहीं देता था, इस तरह एक औरत को नाकाम शादी की कैद से आज़ाद करने का तलाक का मकसद पूरी तरह नाकाम कर देता।

तलाकशुदा गर्भवती बीवी और बच्चों का नान-नुफ्क़ा

एक वाज़ेह तौर पर बयान की गयी आयत में कुरआन फरमाता है: 1. एक गर्भवती पत्नी को तलाक देने वाले पति की सामाजिक और आर्थिक जिम्मेदारियों, 2. अपने गर्भ को बताने की तलाकशुदा पत्नी की नैतिक जिम्मेदारी, 3. बच्चे की दाई के द्वारा देखभाल हो तो इसके लिए इन दोनों के बीच आपसी सहमति और मश्विरा और 4. अगर तलाक के बाद कोई बच्चा पैदा होता है तो वारिस की जिम्मेदारी वालिद पर होगी (2:233)।

"और माँएं अपने बच्चों को पूरे दो बरस तक दूध पिलाएँ, ये (हुक़्म) उसके लिए है जो दूध पिलाने की मुद्दत पूरी करना चाहे,  और दूध पिलाने वाली माओं का खाना और पहनना दस्तूर के मुताबिक़ बच्चे के बाप पर लाज़िम है, किसी जान को उसकी ताक़त से बढ़कर तकलीफ़ न दी जाए, (और) न माँ को उसके बच्चे के बाइस (कारण) नुकसान पहुंचाया जाए और न बाप को उसकी औलाद के सबब से,  और वारिसों पर भी यही हुक्म आयद होगा, फिर अगर माँ बाप दोनों आपसी रज़ामन्दी और मशविरें से (दो बरस से पहले ही) दूध छुड़ाना चाहें तो उन पर कोई गुनाह नहीं, और फिर अगर तुम अपनी औलाद को (दाया से)  दूध पिलवाने का इरादा रखते हो तब भी तुम पर कोई गुनाह नहीं जबकि जो तुम दस्तूर के मुताबिक देते हो उन्हें अदा कर दो,  और अल्लाह से डरते रहो और ये जान लो कि बेशक जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उसे खूब देखने वाला है" (2:233)।

कुरान मर्दों को तलाकशुदा गर्भवती बीवी (65:6) की मदद करने का और भी हुक्म देता है कि उन्हें अपनी हैसियत के मुताबिक खर्च करते रहना चाहिए (65:7)।

"तुम इन (मोतल्लेक़ा- तलाकशुदा) औरतों को वहीं रखो जहाँ तुम अपनी हैसियत के मुताबिक रहते हो और उन्हें तकलीफ़ मत पहुंचाओ कि उन पर (रहने का ठिकाना) तंग कर दो, और अगर वो हामला (गर्भवती) हों तो उन पर खर्च करते रहो जब तक कि वो अपनी फज़ीलत लें ले, अगर वो तुम्हारी खातिर (बच्चे को) दूध पिलाएँ तो उन्हें उनका मुआवज़ा अदा करते रहो, और आपस में (एक दूसरे से) नेक बात का मशविरा (हस्बे दस्तूर) कर लिया करो, और अगर तुम बाहम दुश्वारी महसूस करो तो उसे (अब कोई) दूसरी औरत दूध पिलाई जाएगी (65:6)। साहब वुस्अत को अपनी वुस्अत (के लिहाज़) से खर्च करना चाहिए, और जिस शख्स पर उसका रिज़्क तंग कर दिया गया हो तो वो उसी (रोज़ी) में से (बतौर नुफ़्क़ा) खर्च करे जो उसे अल्लाह ने अता फ़रमाई है। अल्लाह किसी को मोकल्फ़ नहीं ठहराता मगर इस कदर जितना कि उसे उशने अता फरमा रखा है, अल्लाह अंक़रीब तंगी के बाद कशाइश पैदा फरमा देगा" (65 : 7)।

महेर का निपटारा अगर वैवाहिक जीवन की शुरुआत न की हो और न ही महेर तय किया गया हो

कुरान मर्दों को अपनी तलाकशुदा बीवी को उचित खर्च देने की निर्देश देता है, यहां तक ​​कि उनके बीच वैवाहिक जीवन की शुरुआत न हुई हो तब भी (2:236, 33:49)।

"तुम पर इस बात में (भी) कोई गुनाह नहीं कि तुम (अपनी मनकूहा) औरतों को उनके छूने या उनके मुरे मोक़र्रर करने से भी पहले तलाक दे दी है तो उन्हें (ऐसी सूरत में) मुनासिब खर्चा दे दो, हैसियत वाले पर उसकी हैसियत के मुताबिक (लाज़िमी) है और तंग दस्त पर उशकी हैसियत के मुताबिक़, (हालांकि) ये खर्चा मुनासिब तरीके पर दिया जाये, ये भलाई करने वालों पर वाजिब है" (2:236) ।

"ऐ ईमान वालो! जब तुम मोमिन औरतों से निकाह करो फिर तुम उन्हें तलाक दे दो क़ब्ल इसके कि तुम उन्हें मस करो (यानी खिलवत सहीहा करो) तो तुम्हारे लिए इन पर कोई उद्दत (वाजिब) नहीं है कि तुम उसे शुमार करने लगो,  सो उन्हें कुछ माल व मता दो और उन्हें अच्छी तरह हुस्ने सुलूक के साथ रुख्यत करो" (33:49)।

आयत 2:236 शादी के महेर के लिए दायित्व और जबकि आयत 4:4 सदुकात शब्द का प्रयोग करती है।

"और औरतों को उनके महेर खुशदिली से अदा किया करो, फिर अगर वो इस (महेर) में से कुछ तुम्हारे लिए अपनी खुशी से छोड़ दें तो तब उसे (अपने लिए) साज़गार और खुशगवार समझकर खाओ" (4:4)

ऊपर जिसका ज़िक्र  पहले किया गया (दायित्व) आवश्यक जिम्मेदारी है जबकि जिसका अंत में ज़िक्र किया गया वो एक तोहफा या सदक़ा की तरफ इशारा करता है। इस तरह,  कुरान शादी के महेर की कानूनी स्थिति के बारे में कोई इबहाम नहीं छोड़ता है ये अपनी बीवी के लिए एक आदमी की आवश्यक जिम्मेदारी है,  और सद्भावना या सदक़ा के तौर पर इस पर अमल किया जाता है जिसे वापस नहीं लिया जाता है। उसे अदा करने को टालने और उसे किसी दूसरे माली या तलाक के बाद के लेनदेन से जोड़ने का कोई सवाल ही नहीं उठ सकता है।

महेर का निपटारा अगर वैवाहिक जीवन की शुरुआत नहीं हुई लेकिन महेर तय था

कुरआन में इरशाद है:

"और अगर तुमने उन्हें छूने से पहले तलाक दे दी दरआनेहालीकि तुम उनका महेर मोक़र्रर कर चुके थे तो उस महेर का जो तुमने मोक़र्रर किया था निस्फ देना ज़रूरी है सिवाय इसके कि वो (अपना हक़) खुद माफ कर दें या वो (शौहर) जिसके हाथ में निकाह की गिरह है माफ कर दे (यानी बजाय निस्फ के ज़्यादा या पूरा अदा कर दे) और (ऐ मर्दों!) अगर तुम माफ कर दो तो ये तक़वा के क़रीबतर है,  और (कशीदगी के उन लम्हात में भी) आपस में एहसान करना न भूला करो, बेशक अल्लाह तुम्हारे आमाल को खूब देखने वाला है"(2:237)।

ऊपर की आयत में दोनों विशेषताओं को बताने वाले शब्द ‘अल्लज़ी’ का इस्तेमाल किया गया है, जिसे रवायती तौर पर एक शौहर के रूप में पहचान की जाती है,  इसका मतलब है कि सिर्फ शौहर ही निकाह को खत्म कर सकते हैं जो अभी वैवाहिक जीवन शुरू करने वाले हैं। लेकिन ये शादी को एकतरफा तौर पर भंग करने के एक औरत को कुरान से मिले विशेषाधिकार को रद्द करता है (2:229)।  इसलिए, अल्लज़ी 'शब्द की व्याख्या दोनों सिंफ के तौर पर होनी ज़रूरी है जिसका मतलब है कि जोड़े या शौहर या बीवी में से कोई भी कानूनी तौर पर शुरू न कि गई वैवाहिक जीवन को भंग कर सकता है। इस के आधार पर इस आयत के ऐलानात को निम्नलिखित सिद्धांतों में विभाजित किया जा सकता है:

•        अगर शौहर तलाक के अमल को शुरू करता है तो उसे अपनी बीवी को आधा महेर देना होगा, अगर वो उससे दस्तबरदार हो जाये तो।

•        अगर एक औरत की तरफ से शादी तोड़ी जाती है तो उसे आधे महेर से दस्तबरदार होना होगा जो उसे अगर उसके शौहर के तलाक देने पर प्राप्त होता।

•        एक शख्स तलाक देता है तो उसे अख्तियार है कि वो बीवी के ज़रिए छोड़े गए आधे को भी सखावत (फज़ल) का इज़हार करते हुए पूरा महेर अदा कर दे।

•        तलाक पाने वाले दोनों पक्षों को एक दूसरे के प्रति उदार रवैय्या अपनाना चाहिए और एक दूसरे का शोषण करने से बचना चाहिए।

तलाकशदा औरत का नान नुफ्का

 कुरान ऐलान करता है कि:

"और तलाक़शुदा औरतों को भी मुनासिब तरीके से खर्चा दिया जाए, यह परहेज़गारों पर वाजिब है (2:241)। इसी तरह अल्लाह तुम्हारे लिए अपने एहकाम वाज़ेह फरमाता है ताकि तुम समझ सको" (2:242)।

व्यापक रूप से कुरान निर्देश: ये एक आदमी को एक बारगी फराहम करने को नहीं कहता है,  या उसकी तलाक़शुदा बीवी को जब तक वह दोबारा शादी न कर ले तब तक नान नुफ्का देने के लिए नहीं कहता है। लेकिन कुरान मर्दों को अक्ल का इस्तेमाल करने को कहता है। इस तरह, अगर एक आदमी अपनी आय के अनुसार एक महिला जिसके के साथ उसने सिर्फ शादी का समझौता किया है लेकिन अभी तक वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं किए हैं (2:236 उपरोक्त) और शौहर और बीवी के तौर पर साथ रहने के बाद तलाक देने के समय निष्पक्ष और बामुरव्वत बर्ताव करना चाहिए। इसलिए,  इसे अपने शरीके ज़िंदगी की माली ज़रूरत, उम्र, सेहत और उसके हालात के मद्देनज़र रख कर औऱ अपनी आय के अनुसार नान नुफ्का का नेज़ाम करना चाहिए। ज़ाहिर है,  मामले की लियाकत, वर्तमान सामाजिक स्थिति, सुरक्षा और तलाक के मामले में ज़ौजैन की निस्बतन माली हालत की बुनियादों को मद्देनज़र रखते हुए ये ऐसा मामला है जिसे अदालत को फैसला करना होता है।

कुरान अपने आदेश की किसी भी जोड़ तोड़ वाली व्याख्या की पेशबंदी करता है

कुरान की तलाक पर हिदायतें जिन पर उपरोक्त में बातचीत की गई वो वही के दो अलग अलग दौर से ताल्लुक रखती हैं। आयात 2:226-242 का हिस्सा मदीना के शुरुआत के समय की है जबकि 65:1-7 मदीने के मध्य युग से संबंध रखती हैं। दोनों हिस्से के ज़माने के लिहाज़ से तीन से चार साल जुदा हैं और तलाक के दौरान दोनों हिस्से शौहर की ज़िम्मेदारियों को स्पष्ट करने में स्थायी रूप से एक दूसरे को पूरक बनाते हैं। कुरान का ये दोहराना (i) बाद की पीढ़ियों के उलमा के द्वारा गलत व्याख्या और (ii)  इस विषय पर किसी भी एबहाम से बचने में मदद करने के लिए है।

नतीजा: कुरान तलाक की प्रक्रिया को संतुलित और कई मंज़िलों में निमटता है जिसमें से एक तीन महीने की अवधि है,  ताकि किसी व्यक्ति के जीवन में पेश आने वाला इस यातनादायक अनुभव का सामना संतुलित औऱ समन्वित अंदाज़ में कर सके और जिससे पूर्व मियां बीवी के बीच तल्खी और नाराजगी न हो। अस्थायी शादी (मोतअ) का इदारा और  तीन तलाक कुरान के पैग़ाम के सीधे खिलाफ है और इसलिए हराम है। हलाला के जैसे कुछ स्थानीय संस्कार व रिवाज एक आदमी को जैसे गुस्से या नशे की हालत में उसकी पत्नी को तलाक देने की इजाज़त देते हैं और फिर उसी के बाद एक दोस्त के साथ शादी करने और शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर करते हैं और फिर उसे तलाक दिलाकर अगले दिन फिर से शादी करते हैं,  इस  तरह तलाक के बाद तीन महीने की इद्दत की अवधि इसे लागू होने के लिए न तो अपनी और न ही अपने दोस्त के द्वारा तलाक दिए जाने के बाद लिहाज़ करते हैं। ये बिल्कुल हराम और जिंसी तौर पर भी शर्मनाक है। ऐसे तरीके जो पुराने इस्लामी कानून का हिस्सा रहे हैं वो इस्लाम को बुरा और गंदा बना रहे हैं,  इससे अलग कि चाहे इस पर कुछ मुसलमान ही अमल करते हैं, और कैसे मुसलमान अपने अकीदे की अज़्मत बताते हैं और इस्लाम को पश्चिमी लोगों के एक वर्ग की नज़रों में मध्यकाल के औरत से बेज़ार पंथ में तब्दील कर दिया है,  जैसा कि 2012 के राष्ट्रपति चुनाव के रिपब्लिकन उम्मीदवार न्यूट ग्रिंगर ने जुलाई 2010 में अमेरिकन इंटरप्राइज़ इंस्टीट्यूट ऑफ वाशिंगटन में एक भाषण में खुलासा किया: "मेरा विश्वास है कि शरीयत अमेरिका और दुनिया में स्वतंत्रता के बचे रहने के लिए एक नश्वर खतरा है, जैसा कि हम जानते हैं "। ये इस्लामी कानून के विशेषज्ञ हज़रात के लिए वक्त है कि प्राचीन इस्लामी कानून को रद्द करें और शरीयते इलाही (क़ुरआन) पर आधारित इस्लाम के आधुनिक कानून को स्थापित करें। प्राचीन इस्लामी कानून जो अल्लाह के शब्द नहीं हैं और ये कई मामलों में कुरान की मिसालों के खिलाफ है जिनकी तफ्सील हाल के कुछ लेखों में दी गई हैः

http://www.newageislam.com/NewAgeIslamIslamicShariaLaws_1.aspx?ArticleID=5714

http://www.newageislam.com/NewAgeIslamIslamicShariaLaws_1.aspx?ArticleID=5723

अंतिम राय: हिंदुस्तान में मुस्लिम उलमा पर्सनल लॉ पर जोर देते हैं जिसे इस्लाम के पहले के उनके पूर्वजों ने हनफ़ी कानून का आज्ञा के तहत बनाया गया था। मध्यकाल के जमाने के लिए, जब महिलाएं गैर मुस्लिम दुनिया में गंभीर रूप से मज़लूम थीं,  तब पूरी तरह कुरान के खिलाफ रहने वाले कानून असर अंदाज़ थे। गैर मुस्लिम दुनिया में महिलाओं की स्वतंत्रता और स्वायत्ता और लैंगिक आंदोलन में इच्छित परिवर्तन के साथ- बहुत हद तक क़ुरआन के पैग़ाम के अनुसार ( मैं ये प्रस्ताव नहीं कर रहा हूँ कि उन लोगों ने उसे कुरान से कॉपी किया,  अगर ऐसा रहा होता,  तो क्यों नहीं उलमा ऐसा नहीं कर पाए)। वक्त आ गया है कि उलेमा कुरानी मिसालों के मुताबिक़ अपने कानूनों में सुधार करें।

किसी को भी हैरानी हो सकती है क्यों हिंदुस्तान में उलेमा ऐसे फतवा या आदेश पर अमल के लिए  आग्रह करते हैं जो आज कुरान के विपरीत, औरत से नफरत करने वाला और गंभीर रूप से अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकारों का उल्लंघन और प्रकृति के इस कदर खिलाफ है कि (सगे सम्बंधियों के साथ यौन सम्पर्क को माफ करती और भारत सरकार को ऐसा कानून पास करने के लिए मजबूर करती हैं कि शादी के 30 साल से अधिक के बाद एक महिला के नान नुफ्का को तय करेगा) है कि किसी के लिए खुलकर चर्चा करना मुश्किल है इस डर से कि कहीं ये बेमज़ा न हो। हलाला पर अमल के बारे में कम से कम कोई ये कह सकता है कि ऐसा दिन भी आएगा जब हिंदुस्तान के एक गुमनाम गांव के एक मौलवी सबूत के तौर पर इस अमल को देखने और फिल्म बनाने पर इसरार (आग्रह) करेंगें? खुदा हम सभी लोगों की उस दिन से हिफाज़त करे।

नोट्स

1. अज़ाफ़ ए. ए. फ़ैज़ी, आवर लाइन्स आफ मोहम्मडन लॉ, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, पांचवां संस्करण 2005, पृष्ठ- 117

मोहम्मद यूनुस ने आईआईटी से केमिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की है और कार्पोरेट इक्ज़ीक्युटिव के पद से रिटायर हो चुके हैं और 90 के दशक से क़ुरान का गहराई से अध्ययन और उसके वास्तविक संदेश को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी किताब इस्लाम का असल पैग़ामको साल 2000 में अलअज़हर अलशरीफ, काहिरा की मंज़ूरी प्राप्त हो गयी थी और यूसीएलए के डॉ. खालिद अबुल फ़ज़ल का समर्थन भी हासिल है। मोहम्मद यूनुस की किताब इस्लाम का असल पैग़ामको आमना पब्लिकेशन मेरीलैण्ड, अमेरिका ने साल 2009 में प्रकाशित किया।

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