certifired_img

Books and Documents

Hindi Section (21 Mar 2012 NewAgeIslam.Com)



इस्लाम पूरी तरह धार्मिक अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों की रक्षा करता हैः सुल्तान शाहीन का संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भाषण

सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम

इस्लामी कानून के बावजूद शायद 'इस्लामी'  देश अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों के सबसे बड़े उल्लंघन करने वाले हैं।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद 19वां सत्र,  जिनेवा - 27 फरवरी - 23 मार्च, 2012

एजेंडा आइटम 9:  नस्लवाद,  नस्ली भेदभाव,  विदेशियों से नफरत और असहिष्णुता के अन्य रूप,  डरबन घोषणा का पालन,  आगे की कार्रवाई और रणनीति

सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम का भाषण

(यूनाइटेड स्कूल्स इंटरनेशनल की ओर से)

भाषण का पूरा भाग

मैडम चेयर,

डरबन घोषणापत्र स्वीकार किए हुए दस साल और 1992 में सभी देशों द्वारा अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र को स्वीकार किए जाने के बीस साल बीत चुके हैं। जैसा कि संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त मैडम नवी पिल्लई ने हमें याद दिलाया है,  हम इस घोषणापत्र को अपनाने की 20वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि कई देश जो बनावटी तौर पर अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर पूरी तरह अमल की बात करते हैं,  इसका कोई असर नहीं पड़ा है और अब तक व्यवहारिक रूप से मामूली सी भी प्रतिबद्धता नहीं दिखाई है। शायद दुनिया में आज अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों के सबसे बड़े उल्लंघन करने वाले कुछ मुस्लिम बहुल देश ही हैं।

सऊदी अरब समेत कई अरब देशों में,  उदाहरण के लिए कोई भी धार्मिक अल्पसंख्यक अपने पूजा-स्थल का निर्माण नहीं कर सकते हैं। और ऐसा तब है जब न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन्ज़ जिस पर उन्होंने दस्तखत किए हैं,  बल्कि इस्लाम धर्म,  जिसे वो अपना होने का दावा करते हैं,  वो भी अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात करता है। सूरह नम्बर 2:  आयत 256, में क़ुरआन फ़रमाता है कि "ला इकराहा फिद्दीन" (धर्म में कोई जबरदस्ती नहीं है।) ये कैसा मसखरापन है कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने के बजाय,  ऐसे लोग जो कुरान से लगातार मार्गदर्शन हासिल करने का दावा करते हैं,  उनके अधिकारों के सबसे अधिक उल्लंघन करने वाले हैं।

इसी तरह से जब से परिषद का वर्तमान 19वां सत्र शुरू हुआ है, जैसे कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों के घोषणा की 20वीं वर्षगांठ समारोह को मजाक बनाने के लिए, शायद ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरा है जब पाकिस्तान से हिंदू लड़कियों के अपहरण होने,  जबरदस्ती इस्लाम स्वीकार कराने और उससे भी पहले शादी के नाम पर बलात्कार की रिपोर्टें न आई हों। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एच.आर.सी.पी.) ने 11 मार्च, 2012 को बताया कि दक्षिणी प्रांत सिंध में औसतन लगभग 20 से 25 हिंदू लड़कियों को हर महीने जबरदस्ती इस्लाम स्वीकार कराया जा रहा है।

किसी भी अन्य देश के मुकाबले पाकिस्तान अल्पसंख्यकों को मारने की महामारी का शिकार लगता है। अगर वो खुद अपने धर्म का पालन नहीं कर सकते हैं,  तो ये वक्त है कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद इन देशों को संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन पर किए गए उनके हस्ताक्षर का सम्मान करने की याद दिलाये।

ऐसा नहीं है कि मानवाधिकार संगठन उनके गंभीर उल्लंघन की रिपोर्टिंग में अकेले हैं। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट को सत्ताधारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की विधायिका अज़रा फज़ल पीचौहो ने पुष्टि की है जो पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की बहन हैं। उन्होंने 15 मार्च को कहा कि हिंदू लड़कियां ज़बरदस्ती मदरसों में रखी जाती हैं और मुसलमानों से शादी करने पर मजबूर की जाती हैं। उनकी ये टिप्पणी उस संदर्भ के खिलाफ आई है जिसमें पाकिस्तानी अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट ने सिंध में अपहरण हुई तीन हिंदू लड़कियों को पेश करने का निर्देश दिया था।

और ये सिर्फ हिन्दू ही नहीं है और ईसाइयों की तो बात ही छोड़ दीजिए जो पाकिस्तान में मानवाधिकार के इन उल्लंघनों और भेदभाव का शिकार हैं। पाकिस्तान के सेकुलर फोरम के अध्यक्ष दिलशाद भुट्टो ने पाकिस्तान में शिया लोगों के नरसंहार की कड़ी निंदा की और कहा कि संघीय और राज्य सरकारें और पुलिस अहमदीं,  शिया,  ईसाई और हिंदू सहित धार्मिक अल्पसंख्यकों के सदस्यों की सुरक्षा करने में अक्सर असफल हो रही हैं।

ये न सिर्फ मुस्लिम बहुल देशों की बल्कि हमारे इस्लाम धर्म की शबीह (छवि) को खराब कर रहा है,  और जिसके परिणामस्वरूप दुनिया भर में कई गैर-मुस्लिमों के मन में इस्लाम के प्रति भय पैदा कर रहा है। मैं, विश्व समुदाय के प्रतिनिधियों को ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि हमारा धर्म इस्लाम, सभी धर्मों के मानने वालों के अधिकारों की रक्षा का पूरी तरह समर्थन करता है।

वास्तव में,  इस्लाम के आगमन के 13 साल बाद,  कुरान जब सबसे पहले मुसलमानों को हथियारों के साथ खुद की रक्षा करने की अनुमति दे रहा था तो उसने सभी की धार्मिक स्वतंत्रता, यहूदियों,  ईसाइयों,  हिंदुओं और मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा का निर्देश दिया था,  न कि सिर्फ मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता की।

कुरान ने 22 वीं सूरे और आयत नम्बर 40 में फरमाया है: " अगर खुदा लोगों को एक दूसरे से दूर दफा न करता रहता तो गिरजे और यहूदियों के इबादत ख़ाने और मजूस के इबादतख़ाने और मस्जिद जिनमें कसरत से खुदा का नाम लिया जाता है कब के कब ढहा दिए गए होते"। ये स्पष्ट रूप से मुसलमानों की धार्मिक ज़िम्मेदारी के तौर पर,  उनके पास जो भी ज़रिया हैं वे धार्मिक समूहों के अधिकार, गिरजाघरों, कलीसाओं, खानकाहों, मंदिरों और मस्जिदों का निर्माण और खुदा की इबादत में मदद करने को ज़रूरी बनाता है।

मिसाल के तौर पर, सऊदी अरब में, तालिबान के नियंत्रण वाले पाकिस्तान के इलाकों और नाईजीरिया में बोको हराम के कब्जे वाले इलाकों में धार्मिक या सांप्रदायिक अल्पसंख्यकों के लिए इबादतगाह बनाना नामुमकिन है और अपने धर्म पर स्वतंत्र रूप से पालन ​​की बात नहीं कर सकते हैं। मेरे अनुसार,  उपरोक्त कुरानी आयात इस स्थिति को बदलने के लिए अपनी संभावित क्षमता और संसाधनों में संघर्ष करने को मुसलमानों पर लाज़मी कर देती हैं। हमें कम से कम इन इलाकों के हुक्मरानों को, जो मुसलमान होने का दावा करते हैं उन्हें कुरान पर इसकी असल रूह के मुताबिक अमल करने के लिए क़ायल करने की कोशिश करनी चाहिए और दुनिया में पहले से ही मौजूद इस्लामोफ़ोबिया में इज़ाफा करना बंद करना चाहिए।

बहुत से गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों की कमी की एक वजह यह है कि कुछ मुस्लिम देश अपने राज्यों के लिए नागरिकता का विचार ही नहीं रखते हैं। यहाँ तक कि अगर एक शरणार्थी कई दहाईयों तक देश की सेवा करता है तो उसे स्थायी आवास का भी अधिकार नहीं देते हैं, नागरिकता की तो बात ही मत कीजिए। हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) के अमल के विपरीत,  उन लोगों ने 100 प्रतिशत मुस्लिम राज्यों का तसव्वुर तैयार किया है। जैसा कि इन देशों के प्रतिनिधि संयुक्त राष्ट्र के इस प्रतिष्ठित मंच में मौजूद हैं,  मैं उनसे अनुरोध करूंगा कि वो पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व.) जो पहला इस्लामी संविधान हमारे लिए छोड़ गए हैं, उसके प्रावधानों का अध्ययन अवश्य करें। हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) ने जिस इस्लामी राज्य की स्थापना की थी वो वास्तव में एक धर्मनिरपेक्ष राज्य था। उसे मीसाक़े मदीना नाम के अधिवेशन के आधार पर स्थापित किया गया था। ये एक सेकुलर राज्य स्थापित करने के लिए यहूदियों और अन्य धार्मिक वर्गों के साथ नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के समझौते पर आधारित था।

उसके कुछ शानदार प्रावधान, जिससे उन लोगों की आंखें खुल जानी चाहिए जो इस्लामी देशों को चलाने का दावा करते हैं, वो निम्नलिखित थेः

•        मदीना (जो कि एक बहु संस्कृति वाला शहर था और जिसमें विभिन्न दर्शन, विशेष रूप से यहूदी,  मुसलमान,  मुशरिक और मुलहिद भी रहते थे) एक देश था न कि उसे धार्मिक देश क़रार दिया गया था। उसकी पूरी आबादी को उम्मत कहा जाता था- एक शब्द जो अब सिर्फ मुसलमानों के लिए खास तौर से इस्तेमाल किया जाता है।

•        कोई धार्मिक समूह दूसरों पर अपने धार्मिक नियमों (यानी शरीयत) को थोप नहीं सकता था, ऐसे समूह जिनका विश्वास उनके जैसा नहीं होता था। ऐसे में सिविल कानून का पालन होता था।

•        मुसलमानों ने वादा किया था कि जो कोई भी मदीना, या मदीना में रहने वाले किसी भी वर्ग पर हमला करता है तो वो उसके खिलाफ युद्ध करेंगे, यहाँ तक कि अगर हमलावर मुसलमान हों तब भी। (ऐसा ही अन्य धार्मिक गुटों पर भी लागू होता था)।

जबकि पाकिस्तान में गोजरा (अगस्त 2009) में ईसाइयों के कत्ले आम पर अपने सदमे का इज़हार करते हुए, एक प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान मौलाना मोहम्मद ताहिरूल कादरी ने कहा कि "यह उचित समय है कि हम अपना मोहासेबा (आत्मावलोकन) करें और अल्पसंख्यकों के बारे में इस्लामी तालीमात पर अमल करें"। उनके बयान के बाद इस मसले पर पाकिस्तानी विद्वानों ने कुरान और हदीस के ऐसे अंश को एक जगह इकट्ठा करने का काम किया। मैं यहाँ कुछ संदर्भ दे रहा हूँ जो इस्लाम के अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के संकल्प के बारे में कुछ मुस्लिम देशों के अमल के कारण विश्व समुदाय के बहुत से लोगों के मन में पैदा संदेह का निवारण कर देगा।

इस्लामी विचारधारा पर इस आलिम का कहना है कि "इस्लाम वैश्विक भाईचारे, सहिष्णुता और शांति के साथ सह-अस्तित्व का समर्थन करता है और अपने मानने वालों को आदेश देता है कि अपने आसपास के लोगों के लिए शांति का ज़रिया बने। इस तरह इसका मकसद एक आदर्श राज्य और समाज की स्थापना करना है,  चाहे उनकी  धार्मिक पहचान, जाति, रंग कुछ भी हो, जहां सभी नागरिकों के समान अधिकार हों और कानून की नज़र में सब बराबर हों। कुरानी हुक्म "धर्म में कोई जबरदस्ती नहीं है" (2:256) धार्मिक मामलों में ज़बरदस्ती और दबाव बनाने से इन्कार करता है और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए आधार बनाता है। एक स्थान पर क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि" (सो) तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिए और मेरा धर्म मेरे लिए है"। (109:6)

इस्लाम, अल्पसंख्यकों के अधिकारों का जो महत्व और तकद्दुस देता है इसका अंदाज़ा नबी करीम (स.अ.व.) के इरशाद से लगाया जा सकता है: "खबरदार! अगर किसी ने अल्पसंख्यक वर्ग के किसी सदस्य पर अत्याचार या उसके अधिकार सलब (हड़प) किए या उसकी बर्दाश्त करने की सीमा से ज़्यादा  हिंसा की या उसकी इच्छा के बिना कुछ इससे ज़बरदस्ती ले लिया तो क़यामत के दिन (ऐसे मुसलमानों के खिलाफ) मैं उनकी ओर से लड़ूँगा"। (अबू दाऊद 3:170)

"ये न सिर्फ एक चेतावनी है, बल्कि उसे कानून की हुर्मत भी हासिल है, जिसे पैगम्बर नबी करीम (स,अ,व,) के पवित्र ज़माने में इस्लामी राज्यों में लागू किया गया था और बाद की अवधि में भी लागू रहा और अब भी इस्लामी राज्य (पाकिस्तान) के संविधान का एक हिस्सा है। नबी करीम (स.अ.व.) के ज़रिए अल्पसंख्यकों के अधिकारों के बारे में मुसलमानों को हमेशा पहले से बाखबर किया गया। अल्पसंख्यकों के बारे में बात करते हुए एक दिन आप (स.अ.व.) ने इरशाद फ़रमाया कि "जो कोई भी अल्पसंख्यक तबके के किसी सदस्य को मारेगा,  वो जन्नत की खुशबू सूंघ नहीं पाएगा, हालांकि जन्नत की खुशबू चालीस साल की दूरी तय करेगी"। (इब्ने रशद, बदीअतुल मुज्तहिद, 2:299)

"जब भी गैर-मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल पैगम्बर (स.अ.व.) से मिलने आया, उनकी मेहमान नवाज़ी खुद आप (स.अ.व.) ने की। एक बार जब हब्शा (Abyssinia) का एक ईसाई प्रतिनिधिमंडल बा-बरकत शहर मदीना में पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से मिलने आया, तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने खुद मेहमानों की मेजबानी के फराएज़ (दायित्व) अदा किए और उन्हें मस्जिद में ठहराया। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि "यह असहाब हमारे सहाबा के लिए अलग और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की हैसियत रखते हैं, इसलिए मैंने इनका सम्मान और खुद आतिथ्य करने का फैसला किया है"। (इब्ने कसीर, सीरतुन नबविया, 2:31)

"इसी तरह, नजरान से एक 14 सदस्यीय ईसाई प्रतिनिधिमंडल मदीना के पवित्र शहर में आया था। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने प्रतिनिधिमंडल को मस्जिद में ठहराया और प्रतिनिधिमंडल के ईसाइयों को नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की मस्जिद में उनके धर्म के अनुसार पूजा करने की इजाजत दी। (इब्ने सअद, तब्क़ातुल कुबरा, 1:357)

"नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार इस तरह का था और नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की उनके साथ बातचीत भी सम्मान और आदर के आधार पर थी। जब एक दुश्मन यहूदी जो युद्ध के दौरान मरने वाला था तो लोगों ने उसकी बहुत बड़ी संपत्ति के लिए संभावित वारिस के बारे में पूछा, तो उसने कहा कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम उसकी संपत्ति के वली (संरक्षक) होंगे। ये बताता है कि पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का गैर-मुस्लिमों की नज़र में कितना सम्मान था।

इमाम अबू यूसुफ अपनी महान रचना, किताबुल अखराज में लिखते हैं कि मुसलमान और गैर-मुसलमान अल्पसंख्यक दोनों के साथ नबी करीम  (स.अ.व.) और खुल्फ़ाये राशिदीन के ज़माने में सिविल कानून और सजा से संबंधित कानून के मामले में समान रूप से बर्ताव किया जाता था। एक बार एक मुसलमान ने एक गैर-मुसलमान को पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के ज़माने में हत्या कर दी। कसास के तहत इस मुसलमान की हत्या करने का आदेश आप (स.अ.व.) ने दिया औऱ आप (स.अ.व.) ने फ़रमाया कि "गैर मुसलमानों के अधिकारों की सुरक्षा मेरा सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है।" (शाफ़ई अलमसनद, 1:343)

"इस तरह से, एक इस्लामी देश में सिविल कानून में एक मुसलमान और एक गैर-मुस्लिम की हैसियत बराबर है। गैर मुस्लिम भी उसी सजा का हकदार है, जिस जुर्म को करने की सूरत में एक मुसलमान जिस सज़ा का हक़दार होगा। चाहे एक गैर-मुस्लिम एक मुसलमान की कोई चीज़ चुराता है या मुसलमान किसी गैर-मुस्लिम के साथ ही ऐसा व्यवहार करता है, दोनों बराबर सजा पाने के हकदार होंगे। कानून की नज़र में उनके साथ व्यवहार में किसी तरह का कोई भेदभाव करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती है।

"इस्लामी तालीमात और पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के क़ौल के विपरीत, हमारा असल तर्ज़े अमल शर्मनाक है,  जो इस्लाम धर्म की बदनामी के लिए ज़िम्मेदार है। गोजरा में जो देखा गया, कोई भी समझदार मुसलमान इस तरह की निंदा की जाने वाली कार्रवाई की न तो मंजूरी दे सकता है और न उनकी इस तरह अनदेखी कर सकता है। ये बहुत चिंता का मामला है कि किस तरह कट्टरपंथी मौलवियों की एक छोटी सी अक्लियत, जाहिल लोगों को अपने प्रभाव में ले सकती और उन्हें देश और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की जवाबी कार्रवाई के डर के बिना अपने इशारों पर नचा सकती है।

"हालांकि अल्प-अवधि में बुराई को जड़ से समाप्त करने की प्रशासनिक नाकामी को दंगों के फैलने का  इल्ज़ाम दिया जा सकता है,  इन घटनाओं के कारण होने वाली भारी तबाही यह दर्शाती है कि कैसे उग्रवाद हमारे रव्य्यों और सामाजिक व्यवहार में दाखिल हो गया है। देश (पाकिस्तान) निष्क्रिय और प्रतिक्रिया वाले जवाब को अपना कर इस स्थिति और खराब होने की इजाज़त नहीं दे सकता है। सामाजिक संतुलन, धार्मिक सहिष्णुता और सांप्रदायिक सद्भाव की कीमत पर जब एक विशेष धार्मिक मानसिकता को स्वीकार किया और उसे बढ़ावा दिया, और जो नुक्सान इसने कर दिया है उसे सही करने के लिए कार्रवाई की जरूरत है। ऐसे वक्त में जब हमें समकालीन समस्याओं का समाधान करने के लिए अन्य विश्वासों के लोगों के साथ संपर्क और रचनात्मक बातचीत में हमें व्यस्त होने की जरूरत है,  इस तरह के कदम उठाना सिर्फ नुक्सानदेह साबित होगा"।

मैं, इस परिषद से अनुरोध करूंगा कि वो अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों के मामले में उपेक्षा बरतने वाले सभी देशों को इस तथ्य कि, वो राष्ट्रीय, जातीय, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों से जुड़े लोगों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र पर किए गए हस्ताक्षर याद दिलाए और उसका सम्मान करने का निर्देश दे और ये कि ये देश इन प्रावधानों का पालन करने के बाध्य हैं। आइए इन देशों को याद दिलायें कि सभी देशों द्वारा 1992 में घोषणापत्र को स्वीकार करने की हम 20वीं वर्षगांठ मना रहे हैं और ये देश इसके प्रावधानों का पालन करने को बाध्य हैं। कितनी देर तक विश्व समुदाय को इन देशों के इन निर्देशों के पालन होने का इंतजार करना चाहिए,  जिस पर अमल के लिए इन देशों ने दुनिया के सामने वादा किया था।

मैं, इस मौके पर उपेक्षा बरतने वाले देशों के प्रतिनिधियों से अनुरोध करूंगा कि वो संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त मैडम नवी पिल्लई के पहले चार सत्र 2008 से 2011 तक की सिफारिशों के  संकलन की भूमिका में उन्होंने जो कहा है,  उसे पढ़ें। इसकी शुरुआत में, उन्होंने कहा है कि: "2012 में हम इस ज़रूरी घोषणापत्र के सभी देशों द्वारा स्वीकार किये जाने की 20वीं वर्षगांठ का जश्न मनाएंगे,  जो किसी विशेष वर्ग से संबंध रखने वाले लोगों के अधिकारों के उल्लंघन को देखते हुए, विश्व स्तर पर अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हर जगह सम्मान, सुरक्षा और विकास करने को आवश्यक मानता है। बीस साल बीत गए हैं और अधिसूचना में बताए गए अधिकारों को वास्तविकता बनाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। बहुत से जातीय, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को भेदभाव, उन्हें बेअसर करने और समाज से बाहर करने का सामना अब भी करना पड़ रहा है, और कुछ देशों में तो हिंसा और विवादों के भयानक प्रभाव का भी सामना करना पड़ रहा है। फोरम हर जगह पिछड़े अल्पसंख्यकों के जीवन को बेहतर बनाने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की पहली पंक्ति में है"।

URL for English article:

http://www.newageislam.com/islam-and-human-rights/sultan-shahin,-editor,-new-age-islam/islam-fully-protects-human-rights-of-religious-minorities--sultan-shahin-tells-unhrc-at-geneva/d/6886

URL for Urdu article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/سلطان-شاہین،--ایڈیٹر،--نیوایج-اسلام/اسلام-مکمل-طور-پر-مذہبی-اقلیتوں-کے-انسانی-حقوق-کی-حفاظت-کرتا-ہے---سلطان-شاہین-کا-اقوام-متحدہ-انسانی-حقوق-کونسل-میں-تقریر/d/6887

URL for this article:

 http://www.newageislam.com/hindi-section/सुल्तान-शाहीन,-एडिटर,-न्यु-एज-इस्लाम/इस्लाम-पूरी-तरह-धार्मिक-अल्पसंख्यकों-के-मानवाधिकारों-की-रक्षा-करता-हैः-सुल्तान-शाहीन-का-संयुक्त-राष्ट्र-मानवाधिकार-परिषद-में-भाषण/d/6894

 




TOTAL COMMENTS:-    


Compose Your Comments here:
Name
Email (Not to be published)
Comments
Fill the text
 
Disclaimer: The opinions expressed in the articles and comments are the opinions of the authors and do not necessarily reflect that of NewAgeIslam.com.

Content