शमशाद इलाही शम्स –कनैडा, न्यू एज इसलाम
28 अगस्त 2013
अमेरिकी रक्षा मंत्री चक हैगल ने साफ़ कर दिया कि उनकी सेना सीरिया पर हमले के लिए तैयार है उन्हें बस ओबामा के हुकुम का इंतज़ार है. यह ब्यान तब आया जब सीरिया में संयुक्त राष्ट्र संघ के इंस्पेक्टर प्रतिबंधित गैस के उपयोग की जांच करके अभी वापस लौटे भी नहीं है. समाजवादी होलांदे का फ़्रांस सख्त कदम उठाये जाने के लिए पहले ही कह चुका है, ब्रिटेन के कैमरून युद्ध किस प्रकार का होना चाहिए इस प्रश्न पर जनतंत्र का उपयोग करते हुए संसद का अधिवेशन बुला रहे है. अरब लीग ने सत्यापित कर दिया कि सीरिया की असद हकुमत द्वारा गैस हथियार इस्तेमाल हुए है लेकिन इसके खिलाफ कार्यवाही संयुक्त राष्ट्र करे. असद सरकार के विरुद्ध इस्लामी फासीवादी लड़ाकुओ को पिछले एक साल से मदद कर रहे सऊदी, क़तर, अमीरात जैसी अमेरिकी पिछलग्गु राजशाहियां खुल्ल्मखुल्लाह सामने आने के बजाये संयुक्त राष्ट्र की कार्यवाही का भुगतान करने के लिए तैयार है. इस्राईल और जार्डन सीरिया पर हमले की स्थिती में किसी पलटवार के लिए अपने युद्धास्त्रो पर तेल लगा रहे है. तुर्की ने अमेरिका द्वारा किसी भी सीधी कार्यवाही का खुला समर्थन कर दिया है. रूस और चीन इस इंतज़ार में है कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव लायेगा और वह वीटो करेंगे लेकिन अमेरिका को संयुक्त राष्ट्र की फिलहाल कोई जरुरत बिलकुल नहीं है. ईरान ने बड़ी सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए पश्चिमी देशो को विवेक से काम लेने की सलाह दी है और युद्ध थोपने की शंका जाहिर की है.

पिछले दो सालो में असद सरकार और विद्रोही ताकतों के संघर्ष में लगभग आधा मुल्क खंडहर बन चुका है, एक लाख इंसानी जाने जा चुकी है और करीब २० लाख सीरियाई लोग पडौस के जार्डन, लेबनान और कुर्दिस्तान में पनाह गुजीर है. दो साल से सीरियाई असद हकुमत को रूसी और ईरानी हथियारों की सप्लाई निर्बाध रूप से जारी है जिसके परिणामस्वरूप असद सरकार ने विरोधियो के खिलाफ सख्त जंग लड़ी है. लेबनान के शिया हिज्बोल्लाह लड़ाकुओं ने असद हकुमत का प्रत्यक्ष साथ देकर सीरिया की आग लेबनान में ले जाने का विधवंसकारी काम किया है. सीरियाई संकट में मुस्लिम जगत का शिया –सुन्नी टकराव मौजूदा समय की सबसे बड़ी दारुण कथा है. ईरान असद हकुमत का खुला समर्थक है क्योकि असद शिया मसलक के अलावी समुदाय से है जबकि देश की अधिसंख्यक आबादी सुन्नी है जो उनके खिलाफ अरब स्प्रिंग के चलते विद्रोह कर बैठी.(बहरीन में अल्पसंख्यक सुन्नी समुदाय का राजा शिया बहुसंख्यको पर हकुमत करता है, वहां चल रहे राजशाही के विरुद्ध आन्दोलन को ईरान का समर्थन प्राप्त है जिसे सऊदी सेना ने निर्दयतापूर्वक कुचला) इसके अतिरिक्त सीरिया में कई शिया इस्लामी बुजुर्गो की कब्रे है, बड़ी संख्या में दुनिया भर के शिया मुसलमान सीरिया स्थित इन कब्रों पर जियारत करते है.इस धार्मिक भावनात्मक एकरूपता से अलग ईरान के लिए सीरिया लेबनान तक पहुँचने का एक बहुत महत्वपूर्ण रास्ता है जिसका वह इस्राईल पर अपना दबाव बना कर पूरी दुनिया के मुसलमानों का एकमात्र इस्लाम भक्त नेता बनना चाहता है (नसरुल्लाह के जरिये). इस्राईल की इस स्थिती पर अमेरिका की नज़र है और वह किसी भी स्थिती में अपने सबसे भरोसे के साथी को डावांडोल होते नहीं देखना चाहेगा. जाहिर है खाड़ी देशो में राजशाही की चौधराहट ईरान के इन उपक्रमों को न पसंद करती है और न समर्थन करती.
उपरोक्त अंतरविरोधो को देखते हुए यह आसानी से समझ में आ सकता है कि सीरिया का प्रश्न सीरिया के हाथ में है ही नहीं. इस छोटे से देश के मूर्ख राजनीतिक नेतृत्व ने अपनी मूढ़ता के चलते पूरे इलाके के सनसनी फैला दी है. असद जब तक सीरिया की गद्दी पर बैठे है तब तक वहां न केवल कत्लोगारत का कारोबार चलेगा बल्कि ईरानी प्रभाव का क्रीसेंट खाड़ी की पतित राजशाही, अमेरिका और इस्राईल के लिए काँटा बना रहेगा. बाशर अल असद की बेवकूफियां और तानाशाही मुस्लिम जगत सहित पूरा विश्व एक ऐसी पृष्ठभूमि में देख रहा है जब अमेरिका और उसके सहयोगियों ने असद से अधिक शक्तिशाली नेता सद्दाम और लीबिया के गद्दाफी की न केवल हत्या की बल्कि इन दोनों मुल्को को नेस्तानाबूद कर दिया. व्यक्तिगत हठधर्मिता ने देखते ही देखते पिछले तेरह सालो में लाखो लोगो की लाशो का बाज़ार लगाया है. इससे यह तथ्य स्पष्टरूप से रेखांकित होता है कि मौजूदा विश्व में किसी भी मुस्लिम हकुमत का नेतृत्व न केवल अपंग है बल्कि उसके पास न कोई दूरगामी सोच है और न राजनयिक कार्यकुशलता. ईरानी नेतृत्व भी मौजूदा विश्व में उसकी सत्ता के विरुद्ध उत्पन्न हुए अंतर्विरोधों को हल करने में सफल नहीं हुआ. पिछले एक साल में उसके विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग ५० अरब डालर की कमी आयी है. अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधो का असर अब स्पष्ट रूप से सामने आ रहा है जिसकी बौखलाहट उसके राजनितिक नेतृत्व में देखने को मिलती है.
अगले कुछ दिनों में दुनिया भर के टी वी चैनलों पर क्रूस मिसाईले तो कभी युद्धक विमानों की कार्यवाहियां दिखाई जायेंगी लेकिन कैमरा पैन होकर नीचे होने वाले जानी नुकसान को न कभी दिखाएगा और न उसे दर्शक कभी देख पायेगा. सीरीन गैस के प्रयोग का आरोप झूठा हो सकता है. गैस हमले में जिन तकरीबन १३०० नागरिको की हत्या का केस बना कर संयुक्त राष्ट्र का जांच दल वहां भेजा गया है, अमेरिकी हमले के बाद जब हजारो-लाखो की तादाद में वहां आम नागरिक मरेंगे तब उसका न कोई केस बनेगा और न उसका मुकदमा दुनिया की किसी अदालत में चलाया जायेगा. झूठ बोलकर पहले वो ईराक भी गए थे, और इसी झूठे प्रचार तंत्र का प्रयोग करके वह लीबिया में भी गए थे. उन्हें जहाँ जाना होता है अपने पिट्ठू-गधों की कमर पर बोझ रख कर चले जाते है. प्रयुक्त हथियारों की तस्वीरे दिखा कर अरबों डालरों के हथियार बेच दिए जाते है. उन्हें हर तीन चार साल के बाद एक प्रदर्शनी लगानी होती है और असद जैसे जन विरोधी नेता उनके बनाये जाल में फंस जाते है. निश्चय ही इस खौफनाक अवस्था से निकलने के लिए मुस्लिम देशो की आवाम को इस्लाम से इतर विकल्पों पर सोचना होगा क्योकि राजनितिक इस्लाम मौजूदा विश्व को न तो समझने की सलाहियत रखता है और न अपने सामाजिक गतिरोध को तोड़ सकता है. कुछ मक्कार इस्लामी सिद्धांतकारो का यह प्रचार काफी मुद्दत से चल रहा है कि सीरिया संकट तीसरे विश्व युद्ध को जन्म देगा. इसी जगह से इमाम मेहदी अवतरित होंगे और अंतत: पूरी दुनिया में इस्लाम की फतह का परचम फहराया जायेगा.
हारी हुई कौमें अपने बाजुओं पर भरोसा करना छोड़ देती है जिन्हें मज़हब अपने किस्से कहानी सुना कर जगाने की कोशिश करता है लेकिन मौजूदा दौर में मजहब अपने प्रचार की प्रगाढ़ता और मारक क्षमता दोनों खो चुका है. जिसके पास आज तकनीक और विज्ञान नहीं वह मुर्दा और निर्वीर्य समाज है.
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