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Hindi Section (08 Feb 2014 NewAgeIslam.Com)



Interfaith Dialogue— Only Way to Fight Extremism अंतरधार्मिक संवाद- चरमपंथ से मुक़ाबला करने का एकमात्र तरीका

 

 

 

 

नूर फख़री एज़ी

16 जनवरी 2014

एक दूसरे की निंदा करना और उन्हें तुच्छ (छोटा) समझते हुए सभी धर्म के चरमपंथियों के बीच जो बात एक समान है वो ये है कि वो सभी लोग एक सच्चे 'रास्ते' पर ईमान (विश्वास) रखते हैं। उनके इस दावे के बावजूद कि ''वो पाप से नफरत करते है पापियों से नहीं'' उनका ये रवैय्या उनसे अलग विश्वास और मूल्यों के मानने वाले लोगों के साथ सम्बंधों को प्रभावित करने की संभावना रखता है और ये किसी भी समाज में चरमपंथ का बीज बोने में मददगार हो सकता है जो कि आगे चलकर आतंकवाद को जन्म दे सकता है।

सऊदी समाज में चरमपंथ को एक गंभीर मुद्दे के रूप में तब देखा जाने लगा जब 9/11 की त्रासदी के बाद सऊदी अरब की धरती पर और दूसरे देशों में आतंवादी हमले होने लगे। जिसके नतीजे में सऊदी सरकार ने चरमपंथ को खत्म करने और इस्लाम को समझने में उदारता को बढ़ावा देने के लिए कई कदमों पर विचार किया, जिनमें 2004 में नेशनल सोसायटी फॉर ह्यूमन राइट्स की स्थापना भी शामिल है, जो उदार इस्लामी मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता बढ़ाने और धार्मिक शिक्षा में सुधार और साथ ही साथ शिक्षको और इमामों को प्रशिक्षण देने का एक अभियान है। इसके अलावा खादिमे हरमैन शरीफैन किंग अब्दुल्लाह ने अंतरधार्मिक और अंतरसांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देने के लिए 2008 में एक और कदम उठाया, जिसके बाद 2011 में वियाना में दि किंग अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अज़ीज़ इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटर-रिलिजियस एण्ड इंटर-कलचरल डायलॉग (KAICIID)'' की स्थापना हुई।

हालांकि इन कदमों से सऊदी लोगों के नज़रिये में बदलाव आ सकता है, लेकिन फिर भी हमारे समाज में पाये जाने वाले चरमपंथी विचारों को जड़ से ऊखाड़ फेंकने के लिए और भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। मिसाल के तौर पर कुछ लोगों का अब भी यही मानना है कि गैर-मुस्लिमों को उनके त्योहारों और विशेष आयोजनों पर शुभकामनाएं नहीं पेश की जानी चाहिए और यहाँ तक कि अगर उन्हें ज़रूरत हो तब भी उन्हें दान भी नहीं देना चाहिए, इसलिए कि वो अलग धर्म को मानते हैं और उनकी नज़रों में उनके जीवन की कोई क़ीमत नहीं है। इसके अलावा कई लोगों को तो ये भी नहीं मालूम है कि दूसरे धर्म के मानने वालों के साथ किस अन्दाज़ में बातचीत और संवाद किया जाना चाहिए, और दूसरों के धर्म के बारे में समझ के लिए जानकारी देने वाले तरीके और विचार को भी वो खारिज करते हैं क्योंकि उनका ये मानना है कि ऐसा करने से उनका अपना ईमान खराब हो जाएगा और ऐसा करना अपने धर्म की 'सच्चाई' पर ईमान के खिलाफ है।

दूसरों के प्रति सहिष्णुता को बढ़ावा देने में सबसे बड़ी रुकावट, कानूनी आधार की कमी है, जो इन उपायों पर विचार करके उन्हें लागू करे, जैसे धर्म की आज़ादी का कानून और भेदभाव विरोधी कानून। इसके अलावा बहुलवाद, मानवाधिकार और मज़हबी आज़ादी पर ज़ोर देने वाली 'साझा मूल्यों' की अवधारणा अपेक्षाकृत एक नई अवधारणा है जिसे शायद अभी तक लोगों ने नहीं समझा है। सऊदी अरब में जो ''साझा मूल्यों'' की कल्पना पाई जाती है वो बहुलता की जगह समानता पर ज़ोर देती है, क्योंकि इन्हें विशिष्ट इस्लामी मूल्य समझा जाता है, जिस पर सभी के द्वारा पालन की उम्मीद की जाती है। सहिष्णुता, मानव गरिमा को स्वीकार करने और उसका सम्मान करने जैसे सार्वभौमिक''साझा मूल्यों' के प्रति जागरुकता के द्वारा चरमपंथ के खात्मे के लिए मज़बूत आधार बनाया जा सकता है, और तभी वास्तविक अंतरधार्मिक और अंतरसांस्कृतिक संवाद को स्थापित किया जा सकता है। साझा मूल्यों के सार्वभौमिक विचार को नई पीढ़ी के सऊदियों के मन में बिठाने के लिए इसकी शुरुआत स्कूल के बच्चों के साथ करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो हो सकता कि सऊदी समाज में धीरे धीरे ही सही लेकिन प्रभावशाली परिवर्तन पैदा कर सकते हैं।

पिछले चरणों पर पालन के बाद अंतरधार्मिक संवाद को ज़मीन स्तर पर भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। ऐसे समाजी फोरम को बनाया जान चाहिए जहाँ सऊदी अरब के नागरिक और गैर-मुस्लिम निवासी एक दूसरे के धर्म के बारे में चर्चा कर सकें। एक दूसरे की धार्मिक रस्मों, रिवाजों और उनके पीछे के कारणों को जान सकें, ये न सिर्फ सऊदी नागरिकों बल्कि उन प्रवासियों में भी जो सऊदी अरब में रह रहे हैं, एक दूसरे की आपसी समझ और सहिष्णुता को बढ़ावा दे सकता है, जिनमें से कुछ प्रवासी इस्लाम और सऊदी संस्कृति के बारे में गलतफ़हमियों का शिकार हैं। ये कदम सऊदी समाज में बेहतर मेल मिलाप और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को बढ़ावा देगा। इसके अलावा प्रवासियों के साथ ही बाकी पूरी दुनिया के साथ अच्छे सम्बंध बनाने में मददगार हो सकता है। ये किसी भी धर्म की अपनी आस्था की 'सच्चाई' पर विश्वास रखने का विरोधाभासी नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य दूसरों की आस्था और विश्वास और विभिन्न जीवन प्रणाली को स्वीकार करना और उनकी सराहना करना है।

धर्म का उद्देश्य लोगों की आध्यात्मिक भलाई में सकारात्मक सहयोग करना और इस दुनिया में शांति, न्याय और नैतिक मूल्यों की स्थापना करना है। हालांकि किसी को भी धर्म की शक्ति को कम नहीं आंकना चाहिए, जिसको अगर कोई भ्रमित कर दे तो इसका उपयोग तबाही मचाने के लिए किया जा सकता है। सलीबी जंगे सात सदियों तक जारी रहीं जिनमें हज़ारों लोगों की जानें गईं और इसकी वजह सिर्फ ये थी कि पॉप अर्बन द्वितीय ने कहा था कि ये ''ईश्वर की मर्ज़ी है।''

इस लड़ाई में मुसलमानों के खिलाफ ईसाईयों ने जंग को 'पवित्र युद्ध' साबित करने के लिए धर्म का इस्तेमाल किया था। और वर्तमान समय में भी तथाकथित लोग 'पवित्र युद्ध' में हजारों लोगों की जाने ले रहे हैं।

यदि हम अपने बच्चों को दूसरे नबियों के मानने वालों से प्यार करने पर इसलिए चेतावनी देते हैं कि कहीं उनके ईमान में खराबी न पैदा हो जाए तो हम उन्हें ये शिक्षा नहीं दे सकते कि अल्लाह पर ईमान रखने के लिए पिछले सभी नबियों पर ईमान रखना ज़रुरी है।

सभी धर्मों के बीच कुछ साझा विशेषताएं होती हैं जिन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए और कुछ मतभेद भी हैं जिन्हें सराहा जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इंसानियत हमें एक ही दायरे में लाकर खड़ा करती है और धर्म हमारे जीवन के एक क्षेत्र को निर्धारित करता है जो कि रुकावट बनने के बजाय शांतिपूर्ण ज़िंदगी जीने में मददगार होना चाहिए।

स्रोत: http://www.arabnews.com/news/509606

URL for English article:

http://www.newageislam.com/interfaith-dialogue/nawar-fakhri-ezzy/interfaith-dialogue-—-only-way-to-fight-extremism/d/35296

URL for Urdu article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/nawar-fakhri-ezzy,-tr-new-age-islam/interfaith-dialogue—-only-way-to-fight-extremism-بین-المذہب-مکالمہ-–-انتہاءپسندی-سے-مقابلہ-کرنے-کا-ایک-واحد-راستہ/d/35560

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