
आसिफ मर्चेन्ट, न्यु एज इस्लाम
17 अगस्त, 2012
बाइबल में ब्रह्माण्ड की रचना के बारे में एक कहानी है। क़ुरान में भी इसी तरह की एक कहानी है। समस्या सिर्फ ये है कि इनमें से कोई भी वर्तमान समय के ज्ञान के प्रकाश में विश्वसनीय नहीं है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की संग्रहलाय लाइब्रेरी में बोलते हुए बिशप सैमुएल विल्बरफोर्स ने ये ऐलान किया कि दुनिया लगभग 6000 साल पुरानी है, जिसे ईसा पूर्व 23 अक्टूबर 4004 में खुदा ने पैदा किया। उन्होंने इस तारीख को बाइबल में वर्णित वंशावली की गणना के द्वारा हासिल किया।
अगर किसी ने इसी तरह की कोशिश की होती और क़ुरान का इस्तेमाल करते हुए इस समस्या को हल करने की कोशिश कोई करता तो, इस बात की अधिक संभावना है कि वो भी इसी तरह के परिणाम को प्राप्त करता। यही सब कुछ नहीं है। प्रमुख वैज्ञानिक खोजों के बाद हो सकता कि इस तरह के अस्पष्ट संकेत मिले हों, लेकिन किसी भी मामले में कोई सिर्फ कुरान या बाइबल का उपयोग करते हुए इस तरह की खोज की पेशबंदी नहीं कर पाया है।
समस्या क्या है? क्या पवित्र किताबें ग़लत हैं?
अगर किताबें गलत नहीं हैं, तो इसकी संभावित व्याख्या सिर्फ यही है कि किताबों को पढ़ने का हमारा तरीका गलत है।
पृथ्वी सौर मंडल में केवल एक छोटे से बिंदु के समान है, और हमारी आकाशगंगा में ये एक बिंदु से भी कम है, और जो ब्रह्मांड में एक बिंदु से भी बहुत कम है...... जिसकी अर्थ है कि ब्रह्मांड को शब्दों में बयान करने का कोई तरीका नहीं है। इसमें गणित के आश्चर्यजनक सिद्धांत शामिल हैं जिन्हें इस विषय के ज्यादातर विशेषज्ञ भी समझने में असमर्थ हैं।
क़ुरान लगभग 1400 साल पहले नाज़िल हुआ। बाइबल इससे भी पुरानी है। अगर ज़माने को एक तरफ छोड़ दें। अगर कोई पवित्र किताब आज नाज़िल होगी तो उसमें भी ब्रह्मांड और उसकी संरचना का कोई भी हवाला काफी हद तक ऐसा ही होता। इससे अलग कुछ भी पाठकों के लिए समझना कठिन होगा। यहाँ तक कि शाब्दिक व्याख्या कई गलतियों का कारण बनती जैसा कि बाइबल और क़ुरान की मौजूदा शाब्दिक व्यख्या में है। इन किताबों का असली मकसद आपको खोज के लिए प्रेरित करना है, न कि आपको हर एक क़दम दिखाना है।
किताब की शाब्दिक व्याख्या सृष्टिकर्ता को अलौकिक पुरुष के रूप में पेश करती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितने लोग इससे इंकार कर सकते हैं, लेकिन वो इनका दृष्टिकोण बना रहता है। हम 'अल्लाह के दरबार' जैसे बयान सुनते हैं, जो खुदा को शहंशाह के रूप में पेश करता है, या हम रमज़ान के दौरान ये सुनते हैं, 'जन्नत के दरवाज़े आपके लिए खुले हैं, जहन्नम (नरक) के द्वार स्थायी रूप से बंद कर दिए गये हैं।' इस तरह के बयान एक तरह के 'शिर्क' हैं, और इनसे बचना चाहिए। पैग़म्बर मूसा अलैहिस्सलाम के द्वारा यहूदियों को दिये गये आदेशों में से ये है, "तुम बिना फायदे के खुदा का नाम नहीं लोगे।" मुझे लगता है ऐसा 'शिर्क' से बचने के लिए है, जिसे मैंने ऊपर बयान किया है। इसके विपरीत मुसलमान छोटी छोटी बातों पर, अल्लाह ये....... और अल्लाह वो कहने में गर्व महसूस करते हैं।
आज भी हममें से ज़्यादातर ज़मीन को समतल समझते हैं। ये उस समय देखा जा सकता है जब लोग खुदा की बात करते हुए सिर्फ विशेष दिशा में देखते हैं। हाथ को एक विशेष दिशा में नमाज़ की इमामत करने के लिए उठाया जाता है। हम कहते हैं कि अल्लाह ऊपर है, जब हम जन्नत की बात करते हैं तो उसी दिशा में इशारा करते हैं। 'स्वर्ग ऊपर है। या नरक की तरफ इशारा करने के लिए नीचे इंगित करते हैं। स्वर्ग ऊपर है, नरक नीचे है। बीच में धरती समतल है। दरअसल, आप जिस भी दिशा की ओर इशारा करेंगे वो खुदा की ही तरफ हो जाएगा, इसलिए कि पृथ्वी गोल है।
चूंकि ब्रह्माण्ड की रचना को समझना बहुत मुश्किल है, ये उस चेतना को बताता है कि खुदा को सामान्य अवधारणाओं के द्वारा बयान नहीं किया जा सकता। दरअसल अधिक से अधिक कोई यही कह सकता है कि खुदा के बारे में आप जो कुछ भी कहेंगे, वो गलत ही होगा। सीधा संदर्भ देने से बेहतर है कि इससे बचा जाए। ज़्याद से ज़्यादा यही होगा कि कोई एक विषय के आस पास बात कर सकता है। शायद इसीलिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने कहा है कि साइंस को पढ़ने में एक घंटा लगाना, एक साल की इबादत से बेहतर है। साईंस की पढ़ाई में कोई भी बह्माण्ड की संरचना के बारे में कुछ मालूमात हासिल कर सकता है। यहाँ फिर मैं इस बात पर ज़ोर दूँगा कि अगर आप साइंस की पढ़ाई को बहुत शाब्दिक रूप में नहीं लेते, तो भी इससे आगे जाने की कोशिश करें, इससे ये सम्भव है कि आपको ब्रह्माण्ड की रचना की एक झलक मिल जाए।
दरअसल मुझे लगता है कि पवित्र किताबों की शाब्दिक व्याख्या ने ही हमको इतनी बुरी तरह से गुमराह किया है। अगर हम मान लें कि कुरान की असल मंशा न्याय पर आधारित एक शांतिपूर्ण संस्कृति की स्थापना है, और इसे शब्दिक रूप में लिये बिना पढ़ें, तो ये बहुत बड़ा अंतर पैदा कर देगा। कुरान के सभी कानूनों में इस तरह के बिंदु पाए जाते हैं, ''अगर तुम ये भूल जाओ तब भी कि तुम्हारा रब, रहम करने वाला, सब कुछ जानने वाला है।'' इससे इस बात का इशारा मिलता है कि जो कानून क़ुरान में बयान किए गए हैं, वो सिर्फ निर्देश हैं। हमें कानून के शासन पर आधारित और न्याय के लिए समर्पित समाज की स्थापना के लिए अपने क़ानून खुद बनाने होंगे।
किसी भी तरह से हमें ये कभी नही भूलना चाहिए कि ये जीने और सोच विचार के लिए हमारा एक ही मौका है। हमें अपनी आजीविका के अलावा कुछ समय 'खुदा को पाने के लिए की जाने वाली कोशिश में भी बिताना चाहिए। इसके अनगिनत तरीके और रास्ते हैं, और हर एक रास्ता समान रूप से सही हैं, यहाँ तक कि आप पेशे और व्यवसाय से कुछ भी हों। हो सकता है कि किसी वक्त ईमानदारी के साथ कोई ये कह सके;
"तलाशो तलब में वो लज़्ज़त मिली है
दुआ कर रहा हूँ के मंज़िल न आए।"
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