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Hindi Section (15 Apr 2014 NewAgeIslam.Com)



The Collection of Qur'anic Verses into a Book Form: Perceptions and Reality क़ुरान संकलन के बारे में प्रचलित धाराणाएं और वास्तविकताएं

 

 

 

 

गुलाम रसूल देहलवी, न्यु एज इस्लाम

9 अप्रैल, 2014

किसी भी मुसलमान के भीतर हमेशा ये बौद्धिक जिज्ञासा विकसित होनी चाहिए कि उसके धर्म के मुख्य स्रोत यानि क़ुरान का संकलन किस तरह सम्भव हुआ और कैसे मुसलमानों ने इसे अपनी स्मृति में संग्रहीत किया। अब तक मैं भी उन्हीं आम मुसलमानों की ही तरह क़ुरान पर ईमान (विश्वास) रखने वाला एक मुसलमान था जिन्हें क़ुरान की ऐतिहासिक सच्चाई की बिल्कुल भी समझ नहीं है और वो क़ुरान पर सिर्फ इस धार्मिक पवित्रता के आधार पर विश्वास रखते हैं जो इसके साथ जुड़ी हुई है। लेकिन मैं पूरे विश्वास के साथ ये कह सकता हूँ कि क़ुरान पर विश्वास रखने का ये क़ुरानी तरीका नहीं है। एक ऐसी किताब की तो बात ही छोड़ दीजिए जो सार्वभौमिक और वैश्विक धर्म के लिए आधार प्रदान करती है, दरअसल क़ुरानी दृष्टिकोण से ये तरीका एक आम खबर पर विश्वास करने का भी नहीं है। क़ुरान हमें स्पष्ट रूप से ये हुक्म देता है कि जब कोई खबर हमारे पास पहुंचती है तो अच्छी तरह से हमें उसकी जांच और परख करनी चाहिए ताकि कहीं ऐसा न हो कि हमारी नादानी की वजह से किसी को नुकसान पहुंच जाए।(49: 6)

एक जागरूक मुसलमान को इन बातों का संज्ञान लेना चाहिए जिनकी वजह से क़ुरान हर तरह की विकृति, अपूर्णता और एक लापता किताब होने की त्रुटि से संरक्षित है। और आज हमारे सामने पूरी तरह से सुरक्षित धार्मिक किताब के रूप में मौजूद है और ज़िंदा आवाज़ के रूप में ईश्वरीय संदेश आज भी बरकरार है। क़ुरान की सुरक्षा इस्लाम में इतनी महत्वपूर्ण रही है कि वही के नाज़िल होने के प्रारंभिक चरण में ही अल्लाह ने एक ज़बरदस्त क़ुरानी आयत नाज़िल फ़रमा कर क़ुरान के संरक्षण को सुनिश्चित बना दिया: "यह अनुसरण निश्चय ही हमने अवतरित किया है और हम स्वयं इसके रक्षक हैं।" (15: 9) ये क़ुरान का ही चमत्कार है कि अरब के काफिरों की हर सम्भव कोशिशों के बावजूद भी क़ुरान के पाठ में एक शब्द भी का परिवर्तन और इसे विकृत करने में वो सफल न हो सके।

इसलिए मुसलमानों को क़ुरान के संकलन के बारे में आम धारणाओं की समीक्षा ज़रूर करनी चाहिए। आमतौर पर ये माना जाता है कि क़ुरान के संकलन और उसे किताब की शक्ल में जमा करने की प्रक्रिया औपचारिक रूप से पैगम्बर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के जीवन में सम्पन्न नहीं हुई बल्कि बाद में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के तीसरे खलीफा हज़रत उस्मान ग़नी रज़ियल्लाहू अन्हू के दौर में क़ुरान का संकलन किया गया और उसे एक किताब की शक्ल में पहली बार उन्हीं के दौर में पेश किया गया। इस सम्बंध में आम तौर पर जो रवायत मशहूर है वो इस प्रकार हैं कि जानवरों की हड्डियों और खालों जैसे पदार्थ जिन पर क़ुरान की आयतें लिखी हुई थीं, वो विभिन्न स्थानों पर और अलग अलग लोगों के पास बिखरी पड़ी थीं। सामूहिक गवाही के साथ उन्हें सावधानी से इकट्ठा करने का काम सबसे पहले खलीफा हज़रत अबु बकर रज़ियल्ल्हू अन्हू के दौर में शुरू हुआ। लेकिन आज जो क़ुरान हम पढ़ते हैं उसके संकलन का काम तीसरे खलीफा हज़रत उस्मान गनी रज़ियल्ल्हू अन्हू के दौर में पूरा हुआ। जिन्होंने क़ुरान के संकलन को पूरा होने के बाद सभी निजी नुस्खों को जलाने का हुक्म दिया। ये तथ्य पूरी तरह से उन रवायतों पर आधारित हैं जो इब्ने शहाब ज़हरी रज़ियल्ल्हू अन्हू से मिली थी। लेकिन मेरे लिए इस पर विश्वास करना मुश्किल है। क्योंकि क़ुरान खुद अपने बारे में जो स्पष्ट रूप से कहता है ये रवायतें उसकी विरोधाभासी हैं।  

क़ुरान की आयत 2: 2, 10: 1, 11: 1, 16: 89 आदि के जैसे ही अल्लाह ने क़ुरान का उल्लेख 'अलकिताब' के रूप में कई बार किया है।

क़ुरान ने स्पष्ट कर दिया कि ''निश्चय ही ये प्रतिष्ठित क़ुरान है। एक सुरक्षित किताब में अंकित है। ये बड़े रुतबे की क़ुरान है।'' ( 56: 77- 78)

खुद क़ुरान का बयान है कि क़ुरान चर्मपत्र पर लिखा था (5: 2- 3)

क़ुरान में वर्णित है कि ''पवित्र पन्नों में अंकित है, प्रतिष्ठि्त, उच्च, ऐसे कातिबों के हाथों में रहा करते है। जो प्रतिष्ठित और नेक है'' (80:13 -16)

उपरोक्त क़ुरान की आयतों से ये स्पष्ट है कि क़ुरान को पैग़म्बर सल्लल्लाहू अलैहि  सल्लम के जीवन में ही पूरी तरह से संरक्षित किया गया और इसे किताबी शक्ल दी गयी थी। इसलिए इब्ने शिहाब ज़ुहरी रज़ियल्लाहू अन्हू से जोड़ कर पेश की गयी उपरोक्त रवायतें इस्लाम के मूल स्रोत की विरोधाभासी हैं। लेकिन इन्हें पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि ये सम्भव है कि खलीफा अबु बकर सिद्दीक रज़ियल्लाहू अन्हू को क़ुरान के ऐसे नुस्खे मिले हों जो पहले से मौजूद मूल मसाहेफ से तैयार किए गए हों। वास्तव में मुल मसहफ मस्जिदे नब्वी के एक खम्बे के पास रख दिया गया था। ये  तथ्य है कि इस खम्बे को ''अस्तवाना मसहफ'' कहा जाता है, जो इस बात की गवाही के लिए पर्याप्त सुबूत है कि पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के दौर में ही क़ुरान एक किताब की शक्ल में मौजूद थी।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने जीवन में ही क़ुरान के संरक्षण पर काफी ध्यान दिया था। उन्होंने लगभग अपने सभी सहाबा को हिदायत फ़रमाई थी कि वो क़ुरान की हर एक आयत को अपनी स्मृति में रचा बसा लें। (1) उन्होंने बतौर इबादत प्रतिदिन क़ुरान की तिलावत का हुक्म भी जारी किया था। क़ुरान को मौखिक रूप से याद करने, बार बार सुनने- सुनाने और विशेष रूप से फ़र्ज़ नमाज़ों में इन आयतों की तिलावत करने की हिदायत फरमाकर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने कई सहाबियों को पूरा क़ुरान याद करवा दिया था। इसलिए कई भरोसेमंद रावियों के अनुसार ये बात सच है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के जीवन में ही बहुत सारे सहाबियों ने क़ुरान के प्रत्येक शब्द को याद कर लिया था जिनमें से कुछ प्रसिद्ध सहाबियों के नाम इस प्रकार हैं: ज़ैद इब्ने साबित, अबी बिन कअब, मआज़ बिन जबल, अबु ज़ैद रज़ियल्लाहू अन्हू अजमईन (2) इन सहाबियों ने न सिर्फ क़ुरान की हर आयत को याद कर लिया था बल्कि आयत के सही उच्चारण को भी सीख लिया था और जिसे बाद में इल्मे तज्वीद के नाम से जाना गया जिसे इसके बाद पूरा क़ुरान विज्ञान कहा जाने लगा।

इसके अलावा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने क़ुरान के क्रम को खुद ही व्यवस्थित किया और अपने सहाबियों को इससे अच्छी तरह परिचित करा दिया (3) ऐसी कई प्रमाणिक हदीसें है जो ये बताती हैं कि हर साल रमज़ान के महीने में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अपने कई सहाबियों की उपस्थिति में जिब्रईल अलैहिस्सलाम के बाद कुरान को बिल्कुल उसी क्रम में तिलावत फरमाते थे जिस क्रम में ये उन पर नाज़िल हुई थी। (4) और जब पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के निधन का साल आया तो उन्होंने कुरान की दो बार तिलावत फ़रमाई (5) इसलिए वहां पर मौजूद सभी सहाबियों के दिमाग़ में सभी कुरानी आयतें और इन सूरतों का क्रम अच्छी तरह बैठ गया।

नतीजतन सभी आयतों को लिखा गया और पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के जीवन में ही पूरे कुरान को लिखित रूप में सहेजा गया था। इस बड़े काम को आपके साक्षर सहाबियों ने अंजाम दिया था जिसमें हज़रत ज़ैद इब्ने साबित रज़ियल्लाहू अन्हू का नाम सबसे प्रमुख है (6) अबी इब्न काब, अब्दुल्लाह इब्ने मसूद, मुआविया इब्ने अबी सुफियान, खालिद इब्न वलीद और ज़ुबैर बिन अव्वाम भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के प्रमुख लेखकों में शामिल थे (7) ये लोगों क़ुरान को चमड़े, चर्मपत्र, जानवरों की कांधे की हड्डियों और खजूर के डंठलों पर क़ुरान की आयते दर्ज किया करते थे। (8)

इस तथ्य से इंकार की कोई गुंजाइश नहीं है कि 7वीं शताब्दी से लेकर अब तक क़ुरान अपने मूल रूप में बाक़ी है और यही दुनिया की एकमात्र किताब है जिसे अब तक सबसे अधिक बार पढ़ा गया है और सबसे ज़्यादा इसको याद भी किया गया है। इसलिए खुदा के संदेशों की दूसरी किताबों के बीच क़ुरान सबसे अधिक सुरक्षित, सही और संरक्षित है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के दौर से लेकर अब तक क़ुरान के संरक्षण में सबसे बड़ा और मुख्य कारक लाखों लोगों के द्वारा इसकी लगातार तिलावत और हमेशा याद रखना रहा है। क़ुरान की इस प्रमुख विशेषता ने केनेथ क्रेग (Kenneth Cragg) जैसे सेकुलर विद्वानों को सोचने और ये कहने पर मजबूर कर दिया है कि:

"मुसलमानों में क़ुरान ख्वानी की प्रवृत्ति के कारण क़ुरानी आयतों ने भक्ति के जीवित और अटूट रहने के क्रम में सदियों का सफर तय किया है। इसलिए क़ुरान को न तो कोई प्राचीन विरासत घोषित किया जाना चाहिए और न ही इसे एक सामान्य ऐतिहासिक दस्तावेज़ माना जाना चाहिए जिसका सम्बंध सुदूर अतीत से है। क़ुरान को याद करने की सच्चाई ने मुस्लिम अवधि में खामियों के बावजूद क़ुरान को कभी खत्म न होने वाले खज़ाने के रूप में पेश किया और उसे हर पीढ़ी में स्वीकृति मिली और सिर्फ संदर्भ के लिए एक अथारिटी के रूप में इसके बहिष्कार की इजाज़त कभी नहीं दी।" ( केनेथ क्रेग, दि माइंड ऑफ़ दि क़ुरान, लंदनः जॉर्ज एलेन और अनविन, 1973, पेज 26)

हालांकि हमें उन हदीसों की प्रमाणिकता की जाँच करनी चाहिए जिन्हें इस्लाम विरोधी लोग कुरान की आयतों की सटीकता और पूर्णता के बारे में संदेह पैदा करने के लिए पेश करते हैं। मिसाल के तौर पर हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहू अन्हू से जोड़ कर पेश की गयी वो हदीस जिसमें ये रवायत की गई है कि उन्होंने कहा किः तुम में से कोई ये न न कहे कि ''मुझे पूरा क़ुरान हासिल हो गया है।'' तुम्हें कैसे मालूम कि पूरा क़ुरान क्या है? क़ुरान का बहुत सारा हिस्सा हमसे चूक गया है। इसके बजाय तुम ये कहो, 'हमें उतना ही क़ुरान मिला जितना सुरक्षित रहा।'' (दी कलेक्शन ऑफ दि क़ुरान, बर्टन, पेज: 2)

इस तरह की रवायतों के पीछे दो उद्देश्य हो सकते हैं, जैसा कि जॉन बर्टन ने अपनी किताब "The collection of the Qur'an" के पेज- 2 में इसे बताया है। पहला उद्देश्य क़ुरान के पाठ को जमा करने और उन्हें सम्पादित करने में हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की नाकामी (नऊज़ोबिल्लाह) को प्रकट करना और दूसरा उद्देश्य क़ुरान के पूर्ण न होने और इसके कुछ हिस्सों के गुम हो जाने की सम्भावना को बताना हो सकता है।

पूर्वीज्ञान के ऐसे भी विशेषज्ञ हैं जिन्होंने क़ुरान के संकलन और संरक्षण पर काम किया है और वो इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के जीवन में ही क़ुरान को संरक्षित और प्रमाणीकृत कर दिया गया था। ऐसे ही  एक विशेषज्ञ जान बर्टन ने भी अपनी किताब "The collection of the Qur'an" में कुरान के पाठ के बारे में अपनी निर्णायक टिप्पणी को इस तरह लिखा है:

''..... क़ुरान वो किताब जो हमारे पास उसी रूप में पहुंची जिस रूप में इसको रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अनुमोदित किया था ..... दरअसल आज जो क़ुरान हमारे हाथों में है वो मोहम्मद सल्लल्लाहू अलहि वसल्लम का मसहफ है (9)

संदर्भः

(1) सही अलबुखारी, वाल्यूम 6, हदीस नंबर 546

(2) सही अलबुखारी, वाल्यूम 6, हदीस नंबर 525

(3) ऊलूमुल क़ुरान, अहमद वॉन डेंफर, दि इस्लामिक फाउंडेशन, यूनाइटेड किंगडम, 1983, पेज 41-42

(4) सही अलबुखारी, वाल्यूम 6, हदीस नंबर 519

(5) सही अलबुखारी, वाल्यूम 6, हदीस नंबर 518 और 520

(6) अलइतक़ान फिल ऊलूम अलक़ुरान, जलालुद्दीन सुयूती, बेरूत: मकतब अलथिकाफिया, 1973, वाल्यूम 1, पेज 41 और 99

(7) अलइसाबह फि तमयीज़ अस्सहाबा, इब्ने हजर अलअसक़लानी, बेरूत: दारल फिक्र, 1978

(8) किताब फहम अल सुनन, अल-हारिस अल मुहासाबी, अलइतक़ान फिल ऊलूम अलक़ुरान, जलालुद्दीन सुयूती में हवाला, वाल्यूम 1, पेज 58

(9) जॉन बर्टन, ''The Collection of the Qur'an'' (दि कलेक्शन ऑफ दि कुरान), कैम्ब्रिज: कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1977, पेज 239-40

गुलाम रसूल देहलवी सूफीवाद से जुड़े एक इस्लामी विद्वान हैं। उन्होंने भारत के प्रसिद्ध इस्लामी संस्था जामिया अमजदिया (मऊ, उत्तर प्रदेश) से आलिम और फ़ाज़िल की सनद हासिल की, जामिया इस्लामिया, फैजाबाद, उत्तर प्रदेश से कुरानी अरबी में विशेषज्ञता प्राप्त की और अलअज़हर इंस्टिट्यूट आँफ इस्लामिक स्टडीस, बदायूं , उत्तर प्रदेश से हदीस में प्रमाण पत्र प्राप्त किया है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली से अरबी (ऑनर्स) में ग्रेजुएशन किया है, और अब वहीं से धर्म के तुलनात्मक अध्यन (Comparative Religion) में M.A. कर रहे हैं।

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