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Hindi Section ( 3 Jun 2014, NewAgeIslam.Com)

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Let’s Now Look Within! आइए आत्मावलोकन करें! और नरेन्द्र मोदी, गुजरात दंगे और बाबरी मस्जिद के विध्वंस से अपना ध्यान हटाएं

 

 

 

 

 

डॉ. गुलाम ज़रक़ानी

31 मई, 2014

लोकतंत्र के शिष्टाचार में से है कि चुनाव से पहले प्रतिनिधियों पर जितनी चाहें आलोचना कर लें, लेकिन चुनाव में कामयाब होने वाले व्यक्तित्व को सबका साझा प्रतिनिधि स्वीकार करना चाहिए। यही वजह है कि भारतीय लोकतंत्र के तहत आने वाले क्षेत्रों में चुनाव लड़ने वाले सभी प्रतिनिधि आपस में एक दूसरे के खिलाफ क्या कुछ नहीं कहते, लेकिन चुनाव हारने वाले सारे प्रतिनिधि कामयाब होने वाले को मुबारकबाद देने में आगे रहते हैं। ये प्रतीकात्मक रूप में इस बात को प्रकट करता है कि न केवल वो सारे क्षेत्र का प्रतिनिधि है, बल्कि देश के विधायी संस्थाओं में स्वयं का प्रतिनिधि भी है।  थोड़ी देर के लिए विचार करें तो महसूस होगा कि ये लोकतांत्रिक शिष्टाचार देश की अखंडता के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। अगर ये न हो तो चुनाव के बाद हारने वाले प्रतिनिधि विरोधों का दरवाज़ा खोल दें और देश अराजकता, खींचतान और आपसी दुश्मनी के भंवर में फंसकर रह जाए।

ठीक उसी लोकतंत्र के शिष्टाचार का तकाज़ा ये है कि देश के सारे लोग, चाहे वो ​​किसी भी धर्म से सम्बंध रखते हों या किसी भी पार्टी से हमेशा के लिए वफादारी का दम भरते हों, न चाहते हुए भी, प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का स्वागत करें। दूसरे शब्दों में आप कह सकते हैं कि जब तक वो प्रधानमंत्री नहीं बने थे, हमारा लोकतांत्रिक अधिकार था कि हम उनका विरोध करें, लेकिन जब वो बन गए हैं तो अब उनके प्रधानमंत्री बनने पर आलोचना किसी तरह उचित नहीं है, लेकिन अगर वो ऐसे उपाय करते हैं, जो हमारे क़ौम के हितों के खिलाफ हो, तो फिर निस्संदेह उनकी आलोचना की जाए।  ऐसी स्थिति में उनके प्रधानमंत्री बनने पर आलोचना नहीं होगी, बल्कि उनके उठाए गये कदमों पर होगी और ये कोई अनुचित बात नहीं है।

बराये मेहरबानी बहुत ही गंभीरता के साथ सुनिये, अखबारों, इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया की वेबसाइटों पर देख रहा हूं कि कुछ लोग बाबरी मस्जिद की शहादत और गुजरात दंगों को लेकर बहुत ही जोशीले बयानों को लिख रहे हैं और दुखद तस्वीरें अपलोड की जा रही हैं। मैं ये नहीं कहता कि हमें पुराने ज़ख्मों को भूल जाना चाहिए, लेकिन ये मौका उन ज़ख़्मों को कुरेदने का नहीं है। यक़ीन करें कि धार्मिक भावनाओं को भड़काना हमारे हित में नहीं है, बल्कि होना ये चाहिए कि अगर बहुसंख्यक वर्ग धार्मिक भावनाओं को भड़काने की कोशिश करे, तो हम रणनीति के साथ उसे दबा दें।  अब सांप्रदायिक ताक़तों के हौसले बुलंद हैं, ऐसे में हमारी छोटी सी गलती हमें अपूर्णनीय क्षति पहुँचा सकती है। अब यही देखिए कि पिछले चुनाव में उन्होंने ''हिन्दुत्व' की मज़बूती के लिए वोट मांगे और धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के अधिकांश लीडरों ने भी मुसलमानों से सहानुभूति व्यक्त करते हुए उन्हें सरकार से दूर रखने के लिए वोट मांगे। नतीजा ये हुआ कि उनके नारे तो निस्संदेह उनके हित में गए, लेकिन हमारे नकारात्मक नारे भी उनके हित में चले गए। ये प्रयोगात्मक घटना हमें सावधान करती है कि देश में प्रतिष्ठित जीवन जीने के लिए हमें किस तरह के उपाय करने की ज़रूरत है।

हाल ही में समाचार पत्रों के द्वारा ये खबर मिली कि इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर, दिल्ली में प्रधानमंत्री के स्वागत को लेकर इसके सदस्यों में गंभीर मतभेद पैदा हो गए हैं। कुछ चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी का स्वागत न किया जाए और कुछ उनका स्वागत करने का समर्थन कर रहे हैं। मेरे विचार में ये बात भारतीय मुसलमानों के हित में है कि गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को न बुलाएं, कोई हर्ज नहीं, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें बुलाना चाहिए। ये पूरी तरह स्वीकार कर लीजिए कि कम से कम उन्हें पांच वर्षों तक तो प्रधानमंत्री रहना ही है, लेकिन हो सकता है कि बेहतर प्रदर्शन के आधार पर पांच साल का और मौका भी उन्हें मिल जाए। हर दौर की मान्यताओं के दर्पण में विचार करें कि क्या इतने लंबे अर्से तक मुसलमान उनका विरोध करते रहें? और क्या ये बॉयकाट मिल्लते इस्लामिया के हित में है? याद रहे कि जवाब देने से पहले देश के दूर दराज़ इलाक़े में फैली हुई छोटी छोटी मुस्लिम आबादियों के असल हालात को मद्देनज़र रखें। बहुत संभव है कि आप बड़े शहरों के सुरक्षित इलाक़ों में रहते हों, जहां आस पास सधर्मी लोग रहते हों, लेकिन इसमें शक नहीं कि देश में ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां मुस्लिम समुदाय के घर गिने चुने हैं और वो पूरी तरह देशवासियों की घनी आबादी के बीच घिरे रहते हैं। इसलिए हमारी कोई भी भावनात्मक गल्ती उनके लिए हानिकारक साबित हो सकती है। एक मुसलमान होने के नाते हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम सिर्फ अपने बारे में न सोचें, बल्कि पूरी मिल्लत इस्लामिया के कल्याण को ध्यान में रखें।

ये तो रही एक बात, दूसरी बात ये है कि केंद्र में सरकार धर्मनिरपेक्ष ताकतों की हो या साम्प्रदायिक ताकतों की, हमें आगे बढ़ने के लिए अपनी कोशिशें फिर भी करनी पड़ेंगी। ये खयाल न रखें कि केंद्र में अगर धर्मनिरपेक्ष दल की सरकार होगी, तो हमें घर बैठे बैठे सब कुछ मिल जायेगा और बेहतर रोज़गार के अवसर मिल जाएंगे। यकीन नहीं होता तो पीछे मुड़ कर देखिए कि पिछले दस वर्षों तक कांग्रेस की सरकार रही है। देश के कितने फीसदी मुसलमानों का भला हुआ है? वर्षों से उत्तर प्रदेश में धर्मनिरपेक्ष दल सत्ता में रहे हैं, बता सकते हैं कि इस दौरान कितने मुसलमान बुलंदी पर पहुंचे हैं? बिहार में धर्मनिरपेक्ष पार्टी की सरकार है, यहां मुसलमानों ने कौन सा तीर मार दिया है? पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की उद्धारकर्ता पार्टी की सरकार मानी जाती है, यहां कितने मुसलमान ऐश व इशरत से हमकिनार हो गए हैं? ये ज़मीनी वास्तविकताएं ख़मोशी से ज़बान पर हैं कि ये दुनिया है, यहाँ वही समूह सफल होता है, जो गंभीरता से प्रयास करता है।  उद्योग व व्यापार, इल्म व हुनर और शोध व जाँच के क्षेत्र में आगे बढ़ने का जज़्बा ले कर कोशिश करने वाले ही कामयाबियों से हमकिनार होते हैं। ये और बात है कि सत्तारूढ़ पार्टी की नीति सकारात्मक हो, तो मामूली कोशिश के नतीजे भी अच्छे और पूरे आते हैं, लेकिन राजनीतिक पालिसी अगर नकारात्मक हो, तो चाहिए कि कोशिशों की रफ्तार बढ़ा कर ''मामूली से असाधारण'' की मंजिल तक पहुंचा दी जाए। मुझे विश्वास है कि अच्छे नतीजे हमारी निगाहों के सामने होंगे।

साहेबों! ह्यूस्टन में मेरे एक बहुत ही क़रीबी दोस्त हैं, जिन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी से साइंस में पीएचडी की डिग्री हासिल की है। वो एक बहुत ही बड़ी अमेरिकी कंपनी में काम करते हैं, जहां उनके अलावा कोई और मुस्लिम चेहरा नहीं है। शुरुआत में उनके अधिकारी ने उन्हें जुमा के दिन बैठक में भाग लेने की नोटिस दे दी। उन्होंने हिम्मत करके कहा कि जुमा के दिन हमें नमाज़ के लिए मस्जिद जाना होता है। ऐसे में मेरे लिए बैठक में भाग लेना मुश्किल होगा। वो कहते हैं कि इसके बाद से हर जुमा को वो अधिकारी खुद उन्हें संबोधित कर कहता कि आप को तो नमाज़ के लिए जाना है, जल्दी जाइए। जानते हैं कि एक गैर मुस्लिम के दिल में अपने मुलाज़िम से इतनी सहानुभूति की भावना क्यों पैदा हुई? वो बताते हैं कि मैं कंपनी में अकेला मुस्लिम हूं, इसलिए अपने अस्तित्व की आवश्यकता को साबित करने के लिए दूसरों की तुलना में बहुत ज़्यादा मेहनत करता हूं। चूंकि मेरी वजह से कंपनी को काफी फायदा होता है, इसलिए वो मेरा खयाल रखते हैं।  यहां पहुंचकर मेरी बात पूरा तरह स्पष्ट हो जाती है कि गलत बात पर 'विरोध' करना अनुचित नहीं है, लेकिन सिर्फ 'विरोध'' ही करते रहना निस्संदेह हमारे हित में बिल्कुल नहीं है। उठिए और अपने अपने कामों में पूरी दिलचस्पी के साथ लग जाइए। सम्भव है कि कल का सूरज हमारे लिए खुशी की खबर लेकर आए!

जमशेदपुर (टाटा नगर), भारत के रहने वाले डा. ग़ुलाम ज़रक़ानी आलिम और फ़ाज़िल (शास्त्रीय इस्लामी विद्वान) हैं। वर्तमान में वो वर्ल्ड लैंग्वेज डिपार्टमेंट, लोन स्टार कॉलेज, ह्यूस्टन, अमेरिका में प्रोफेसर हैं।

31 मई 2014 स्रोत: इंक़लाब, नई दिल्ली

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