certifired_img

Books and Documents

Hindi Section (14 Jun 2014 NewAgeIslam.Com)



The Paramount Significance of Sh'aban and Shab-e-Bara'at (Night of Forgiveness) And Our Behaviour शाबान का महीना, शबे बारात और हम

 

 

 

मोहम्मद हामिद रज़ा बरकाती, न्यु एज इस्लाम

12 जून, 2014

शाबान महीने की फ़ज़ीलत

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने शाबान को अपना महीना बताया है। इरशाद फरमाया: शाबान शहरा वरमज़ान शहरल्लाह यानि शाबान मेरा महीना है और रमज़ान अल्लाह का (मासबत बिलसुन्नतः) दूसरी जगह इरशाद फरमाया: रजब शहरल्लाह, वशाबान शहरा वरमज़ान शहरा उम्मती यानि रजब अल्लाह का महीना है, शाबान मेरा महीना है और रमज़ान मेरी उम्मत का महीना है। (अल-जामे अलसग़ीर)

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम इस महीने में रोज़ा रखा करते थे आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से जब इसका कारण पूछा गया तो आप ने फ़रमाया कि अल्लाह इस महीने में इस साल मरने वालों के नाम लिख देता है, तो मैं पसंद करता हूँ कि मेरी मृत्यु इस हाल में आए कि मैं रोज़ेदार होऊँ। (अल-तर्गीब वल-तरहीब)

शाबान में रोज़े रखने की फज़ीलतः अल्लाह के नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से पूछा गया कि रमज़ान के बाद कौन सा रोज़ा अफज़ल (बेहतर) है? आप ने इरशाद फरमाया: शाबान का, रमज़ान के सम्मान की वजह से। (अल-तर्गीब वल-तरहीब)

हज़रत ओसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहू अन्हू से रवायत है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से निवेदन किया कि या रसूलुल्लाह! मैंने आपको किसी और महीने में रोज़ों का इतना ध्यान देते नहीं देखा जितना शाबान में देते हैं? तो आप ने फ़रमाया किः ये रजब और रमज़ान के बीच का महीना है जिससे लोग अनजान रहते हैं, हालांकि इस महीने में खुदा की बारगाह में आमाल पेश किए जाते हैं, मैं ये चाहता हूं कि जब मेरा अमल पेश किया जाए तो मैं रोज़े की हालत में होऊँ। (नेसाई)

हज़रत आईशा रज़ियल्लाहू अन्हा से रवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम रोज़ा रखने लगते तो हम ये कहते कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम रोज़ा रखना नहीं छोड़ेंगे। और जब रोज़ा रखना छोड़ देते तो हम कहते कि अब आप रोज़ा नहीं रखेंगे। मैंने रमज़ान के अलावा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को कभी पूरे महीने के (नफिल) रोज़े रखते नहीं देखा और जितने रोज़े आप शाबान में रखते मैंने किसी और महीने में इससे ज़्यादा रोज़े रखते आपको नहीं देखा। (बुखारी)

शबे बरात की फज़ीलत

शाबान की पन्द्रहवीं रात को शबे बरात कहा जाता है। शब का अर्थ रात और बरात का अर्थ छुटकारा है चूंकि इस रात में अल्लाह अपने गुनाहगार बंदों को माफ करता है और उन्हें जहन्नम से आज़ाद करता है। हदीस शरीफ में हैः जब शाबान की पन्द्रहवीं रात हो तो इसमें रात को जागो और दिन में रोज़ा रखो। अल्लाह इस दिन सूर्यास्त से आसमाने दुनिया की तरफ नुज़ूल फरमाता है, और फरमाता है किः है कोई माफी चाहने वाला, मैं उसके माफ कर दूँ। है कोई रोज़ी मांगने वाला? मैं उसे रोज़ी अता कर दूँ। है कोई परेशान, मैं उसकी परेशानी दूर कर दूँ। और ये सिलसिला सुबह तक जारी रहता है। (अल-तर्गीब वल-तरहीब)

सभी मोमिनों की माँ सैयदा आयशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहू अन्हा रवायत करती हैं कि मैं एक रात रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को न पाकर आपकी तलाश में निकली आप जन्नतुल बक़ी में थे, आपका सिर आसमान की तरफ उठा हुआ था, आपने मुझसे फरमाया: ऐ आयशा क्या तुम्हें डर है कि अल्लाह और उसका रसूल तुम पर ज़ुल्म करेगा? मैंने कहा, या रसूलुल्लाह मुझे गुमान हुआ शायद आप दूसरी बीवियों के पास तशरीफ़ ले गए हैं। आपने फरमायाः "अल्लाह पंद्रहवीं शाबान की रात आसमाने दुनिया पर नुज़ूल फरमाते हैं और क़बीला बनू कलब की बकरियों के बालों से ज़्यादा लोगों को माफ करते हैं। (तिर्मज़ी और इब्ने माजा)

पवित्र महीना और हमः इसमें कोई शक नहीं कि शाबान बहुत अहम महीना है। इस महीने की पन्द्रहवीं रात जिसे शबे  बरात कहा जाता है बड़ी फज़ीलत वाली है। हमें चाहिए तो ये था कि इस महीने में रोज़ा रखें और शबे बारात में इबादत की विशेष व्यवस्था करें। लेकिन हमारा तरीका इसक विपरीत नज़र आता है।। अक्सर देखा गया है कि शाबान का महीना आते ही आतिशबाजी छोड़ी जाती है, शबे बरात में बच्चे- जवान गोले पटाखे छोड़ते फिरते हैं, चारों ओर बेवजह का शोर और हंगामा बरपा करते घूमते हैं। कुछ लोग तो सिर्फ होटलों और चायखानों में ही बैठकर पूरी रात बिताते हैं। याद रहे शरीयत में इस तरह की वाहियात खुराफात की कोई जगह नहीं। हां अल्लाह के ज़िक्र की महफिलें सजाई जाएं, दरूद व  सलाम पढ़ा जाए, सज्दों से मस्जिदों को आबाद किया जाए, जिनकी फर्ज़ नमाज़ें पूरी हो चुकी हैं वो रात में नफिल की नमाज़ अदा करें। आपस में एक दूसरे से माफी मांगी जाए और प्यार के दरवाज़े हमेशा के लिए खोले जाएं, क़ज़ा नमाज़ों को अदा किया जाए और तौबा कर के आइंदा की नमाज़ों की पाबंदी की जाए, कब्रिस्तान जाकर माँ बाप, रिश्तेदारों  दोस्तों और मोमिनों के लिए माफी की दुआ की जाए कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम खुद इस रात जन्नतुल बक़ी तशरीफ ले गये। जुआबाज़ी, शराब पीना, चोरी, सूदखोरी, दूसरों की बुराई और दूसरे सभी काम से पूरी ईमानदारी से पश्चाताप किया जाए कि खुदा की बारगाह में जब हमारे कार्यों को पेश किए जाएं तो हम हमेशा के लिए सच्चे प्रायश्चित करने वाले और नेक कामों को करने वाले हों। कुरान में हैः ऐ ईमान वालो! अल्लाह से सच्ची तौबा करो। अल्लाह हमें सच्ची तौबा करने और अच्छे काम करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन!

URL for Urdu article:

http://newageislam.com/urdu-section/mohammad-hamid-raza-barkati,-new-age-islam/the-paramount-significance-of-sh-aban-and-shab-e--bara-at-(night-of-forgiveness)-and-our-behaviour--ماہ-شعبان،-شب-برأت-اور-ہم/d/87487

URL for this article:

http://www.newageislam.com/hindi-section/mohammad-hamid-raza-barkati,-new-age-islam/the-paramount-significance-of-sh-aban-and-shab-e-bara-at-(night-of-forgiveness)-and-our-behaviour-शाबान-का-महीना,-शबे-बारात-और-हम/d/87537

 




TOTAL COMMENTS:-   8


  • The precedence of this 'festival' is only that one night on the 15 of Shaban, Hadhrat Aysha did not find the prophet pbuh in the bed. She came out of the  house and looked for him around. She finally came to the graveyard and fouund him, asked him the reason to visit the graveyard this night. He reportedly told him about the fazilat of the night.  Now, the question is, if this night was so important and significant, why he personally visited the graves and not informed all the Muslims in the previous day as had been the case with other festivals? And did he ask the Muslims to light up the mosques and the graves that night?
    By logic - 6/19/2014 2:37:43 AM



  • Muslims should feel free to believe in or to not believe in shab-e-baraat. Let us not try to impose our beliefs on others.



    By Ghulam Mohiyuddin - 6/18/2014 12:56:21 PM



  • Khalid saheb- 6/18/2014 4:22:46 AM
    i need not to be one. there are already many. Only i meant Islam will become really peaceful. 

    By rational mohammed yunus - 6/18/2014 5:31:54 AM



  • iske liye aapko rational saheb terrorist banna parega
    By Khalid - 6/18/2014 4:22:46 AM



  • jab tak brailvi/sufi islam ka mukammal kabaada nahi kar denge chain se nahi baithenge.


    By rational mohammed yunus - 6/18/2014 2:35:38 AM



  • Dear Badar Kazmi Saheb,

    Please listen to this short speech of Dr Tahirul Qadri Saheb, and be aware of so many Hadiths that talk about Importance of Shabe Barat.

    https://www.youtube.com/watch?v=T8pwnATWeOc


    By Ghulam Ghaus غلام غوث - 6/18/2014 2:27:23 AM



  • Badar Kazmi sahib Aap mafi mang rahen hain lekin is Galati ki Maafi Aaapko nahi milegi. Han agar aap apni baat wapas lelen to zaroor maafi milegi. 
    By Naseem - 6/18/2014 2:07:25 AM



  • Sultan shahin sb intihai mafi ke sath yeh ki islam men shab e bara'at ke koi rat nahi aur barr e dagher hind pak bsngla desh ke siwa muslim duniya ise janti tak nahi yeh aik bidat h jiske khilaf ab in teeno mulk ke mazhabi halqun se bhi awaz buland hone lagi h yeh yahan deepavli ka badal tha jise iske tarekhi pase manzar men dekhna chahiye aap jaise zi ilm log bhi agar iske bare men mubarak otaqdees ke bat karenge to ?
    By Badar Kazmi - 6/18/2014 12:53:18 AM



Compose Your Comments here:
Name
Email (Not to be published)
Comments
Fill the text
 
Disclaimer: The opinions expressed in the articles and comments are the opinions of the authors and do not necessarily reflect that of NewAgeIslam.com.

Content