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Hindi Section ( 5 March 2014, NewAgeIslam.Com)

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The Indian Supreme Court Ruling allowing Child Adoption is Permissible in Islam बच्चा गोद लेने के बारे में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का शरई औचित्य

 

 

  

 

ग़ुलाम ग़ौस, न्यु एज इस्लाम

22 फरवरी, 2014

21 फरवरी, 2014 को टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादकीय पेज पर ये लिखा गया कि, ''सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला कि मुस्लिम पर्सनल लॉ जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (Juvenile Justice Act) के तहत मुसलमानों और दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों को बच्चा गोद लेने से मना नहीं कर सकता है, और ये एक सकारात्मक पहल है।'' बच्चों को गोद लेना और देना इस्लाम में जायज़ है। इसका मकसद उनकी अच्छी परवरिश करना और उनका ध्यान रखना है और इसमें कोई संदेह नहीं कि ये अचछा काम है। और अनाथ बच्चों के मामले में इसको और भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

बच्चों को गोद लेने को एक एहसान बताते हुए कुरान इसका औचित्य प्रदान करता है:

याद करो (ऐ नबी), जबकि तुम उस व्यक्ति से कह रहे थे जिस पर अल्लाह ने अनुकम्पा की, और तुमने भी जिस पर अनुकम्पा की कि "अपनी पत्नी को अपने पास रोक रखो और अल्लाह का डर रखो (33: 37)

नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ज़ैद बिन हारसा को गोद लिया था। और ऊपर दी गयी कुरान की आयत ने पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के इस व्यवहार को 'एहसान' करार दिया है। महत्वपूर्ण बात ये है कि बच्चों के गोद लेने को कुरान और इस्लाम दोनों ने ही सराहा है।

निम्नलिखित हदीस अनाथ बच्चों को गोद लेने पर ज़ोर देती है:

''नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी तर्जनी और बीच वाली उंगली एक साथ मिलाकर कहा कि वो और ऐसा व्यक्ति जो किसी अनाथ की ज़िम्मेदारी को क़ुबूल करता है, जन्नत में एक दूसरे के इतने ही क़रीब होंगे।'' (सही अलबुखारी [5304])

लेकिन कुरान के अनुसार गोद लिया गया बच्चा गोद लेने वाले की अपनी असली औलाद नहीं बनता, इसलिए उसे जैविक पिता के नाम से ही पुकारा जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस्लाम न्याय करना और जैविक सम्बंध को भी बचाना चाहता है।

क़ुरान कहता हैः

''उन्हें उनके बापों का बेटा कह कर पुकारो। अल्लाह के यहाँ यही अधिक न्यायसंगत बात है। और यदि तुम उनके बापों को न जानते हो, तो धर्म में वो तुम्हारे भाई तो हैं ही और तुम्हारे सहचर भी। इस सिलसिले में तुमसे जो ग़लती हुई हो उसमें तुम पर कोई गुनाह नहीं, किन्तु जिसका संकल्प तुम्हारे दिलों ने कर लिया, उसकी बात और है। वास्तव में अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।'' (33: 5)

ये आयत गोद लिये बच्चे को दत्तक माता पिता के नाम से बुलाने की जाहिलियत (पूर्व इस्लामी) के दौर की प्रक्रिया को खत्म करने के लिए नाज़िल हुई थी। इसलिए ज़ैद को फिर से ज़ैद बिन हारसा पुकारा जाने लगा न कि ज़ैद बिन मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)। ये भी याद रखा जाना चाहिए कि सिर्फ नाम परिवर्तन के कारण नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और उनके दत्तक बेटे ज़ैद बिन हारसा के बीच अथाह प्यार में कोई कमी नहीं हो सकी।

इस्लाम में किसी बच्चे को गोद लेने का मतलब ये होता है कि उस पर वो सभी नियम लागू होंगे जो खून के रिश्तों के बीच होते हैं। इस्लामी कानून के अनुसार कोई भी गोद लिया गया बच्चा अपने वास्तविक भाई बहनों से शादी नहीं कर सकता  है। गोद लिए जाने के बाद भी वो अपने दत्तक माता पिता के लिए गैर महरम ही रहेगा।

ऐसे भी स्थिति है जब गोद लिया गया बच्चा गोद लेने वाले परिवार के लिए महरम बन जाता है। और ये तब हो सकता है जबकि गोद लिया बच्चा दो साल से कम हो और उसे गोद लेने वाली मां ने उसे अपना दूध भी पिलाया हो। और इस रिश्ते को ले पालक का नाम दिया जाता है।

इसके बावजूद गोद लिया गया बच्चा अपने असली पिता से विरासत हासिल करेगा न कि गोद लेने वाले पिता से। ले पालक बच्चे के मामले में ये कोई अपवाद नहीं है। लेकिन गोद लेने वाले माता पिता को अधिकार है कि वो अपनी पूरी सम्पत्ति का एक तिहाई ऐसे लोगों को वसीयत कर सकते हैं जो उसके उत्तराधिकारी न हों। कुरान इसकी व्याख्या करता है:

और जब बाँटने के समय नातेदार और अनाथ और मुहताज उपस्थित हो तो उन्हें भी उसमें से (उनका हिस्सा) दे दो और उनसे भली बात करो।' (4: 8)

कुरान ने संतुलन का एक अद्वितीय उदाहरण पेश किया है और वो है अनाथों और गरीबों का ध्यान रखना, जिसमें बच्चों को गोद लेना भी शामिल है।

लेकिन गोद लेने वाले माता पिता अपनी असली औलाद को किसी भी कीमत पर विरासत के उनके अधिकार से वंचित नहीं कर सकते, जो इस्लाम ने उन्हें दिया है, और न ही वो अपने गोद लिए गए बच्चे को मझदार में छोड़ सकते हैं, क्योंकि उनकी मौत के बाद वो असहाय हो सकते है।

इस्लामी दृष्टिकोण से मुसलमानों को जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (Juvenile Justice Act) के तहत सुप्रीम कोर्ट के फैसले से परेशान नहीं होना चाहिए। ये अधिनियम किसी भी तरह मुसलमानों को इस बात के लिए मजबूर नहीं करता कि वो किसी बच्चे को गोद लें बल्कि मुसलमानों को इस बात की आज़ादी देता है कि वो या तो सेकुलर रास्ता अपनायें या पर्सनल लॉ पर चलें। कोर्ट का कहना है कि, ''ये अधिनियम किसी भी भावी माँ बाप को किसी बाध्यकारी प्रक्रिया का आदेश नहीं देता है। कोर्ट ने ये भी कहा कि, ''अगर किसी व्यक्ति की ऐसी इच्छा है तो इस अधिनियम के प्रावधानों को अपनाने की आज़ादी उस व्यक्ति को हासिल होगी। इस तरह का कोई भी व्यक्ति किसी को भी गोद लेने या ऐसा न करने के लिए हमेशा आज़ाद है और इसके बजाय वो पर्सनल लॉ के उन आदेशों को अपना सकता है जो उसे लगता है कि उस पर लागू होते हैं।''

संक्षेप में कहें तो इस अधिनियम ने असहाय लोगों के जीवन को समृद्ध करने की दिशा में संतुलित क़दम की बात की है। इसने अपने फैसले को मुसलमानों के ऊपर छोड़ दिया है तो ये भी इस्लामी कानून के ही समान है। पर्सनल लॉ को इसका स्वागत करना चाहिए और बच्चों को गोद लेने के इंसानियत भरे काम को गले लगाना चाहिए जैसा कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने पूरी मानवता के लिए इसका व्यवहारिक नमूना पेश किया था। आधुनिक मुसलमान और उलमा भी गोद लेने के सम्बंध में हमारे विचारों में परिवर्तन पर ज़ोर दे रहे हैं। मिसाल के तौर पर असरा नोमानी ने कुछ दिनों पहले इसी विषय पर लिखे अपने लेख में ये निष्कर्ष लिखा कि, ''जैसा कि समकालीन मुस्लिम देशों में कई सामाजिक समस्याएं पैदा हो रही हैं और इनके मद्देनज़र मुसलमानों को तर्क, करुणा और प्रेम के उच्च स्तर पर पहुँच जाना चाहिए और अपने बेहद कमज़ोर लोगों की मदद कर उन्हें आतंकवादियों की पकड़ से बाहर निकाल कर बेहतर जीवन देने की कोशिश करनी चाहिए।

सम्बंधित लेख:

1. Anti - Adoption Traditions in the Muslim World Benefit Al Qaeda Recruiters by Asra Q. Nomani

http://www.newageislam.com/islamic-ideology/anti-adoption-traditions-in-the-muslim-world-benefit-al-qaeda-recruiters/d/6970

2. Islam: Adoption myths by Masood Ashraf Raja

http://www.newageislam.com/the-war-within-islam/the-mullah-in-nation-building/d/4421

3. Adoption In Islam : Why It Is Illegitimate Maulana Nadeemul Wajidi ( Translated from Urdu by Raihan Nezami , New Age Islam )

http://www.newageislam.com/islamic-ideology/adoption-in-islam--why-it-is-illegitimate/d/2309

न्यु एज इस्लाम के स्थायी स्तंभ लेखक , ग़ुलाम ग़ौस सूफीवाद और आध्यात्मिकता से जुड़े एक आलिम व फाज़िल (क्लासिकल इस्लामी स्कालर) हैं। उन्होंने दिल्ली स्थित सूफी विचारधारा वाली इस्लामी संस्था जामिया हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, ज़ाकिर नगर​​, नई दिल्ली से तफ्सीर, हदीस, अरबी और इस्लाम के शास्त्रीय अध्ययन में विशेषज्ञता हासिल की है। उन्होंने आलिमीयत औऱ फ़ज़ीलत क्रमशः जामिया वारसिया अरबी कॉलेज, लखनऊ और जामिया मंज़रे इस्लाम, बरेली, उत्तर प्रदेश से किया है और जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली से वो अरबी में स्नातक हैं।

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