
नजीब जंग
8 दिसम्बर, 2012
(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)
अल्लाह की चयनित क़ौम के आध्यात्मिक पिता पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का ख़ून आज भी अरबों, यहूदियों और ईसाइयों के रगों में दौड़ रहा है और इस खून की काफी मात्रा मध्य पूर्व में पवित्र विरासत पर कब्जा करने के लिए बहाई जा चुकी है। जिमी कार्टर ने अपने प्रसिद्ध लेख Palestine: Peace Nor Apartheid में लिखा है कि पवित्र स्थान में बहाया गया खून इस ब्रह्मांड को बनाने वाले से आज भी फरियाद कर रहा है। और ये दर्दनाक फरियाद अमन है। 29 नवंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने फ़िलिस्तीन को आब्ज़र्वर या पर्यवेक्षक के रूप में हैसियत देने के लिए भारी वोटों से क्षेत्र में शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। 9 नकारात्मक वोटों के सामने 138 सकारात्मक वोटों की संख्या ये ज़ाहिर करती है कि विश्व शांति को बिखेर सकने वाले अत्यंत संवेदनशील समस्या के प्रति दुनिया उदासीन और बेपरवाह नहीं रह सकती।
घटना ये है कि इस क्षेत्र ने पिछली आधी सदी में न केवल आम ज़िंदगियों का नुक्सान हुआ है बल्कि संपत्तियों का भी नुकसान बल्कि इस समय में इस्राइलियों और फिलिस्तीनियों ने खौफ और सदमें के नज़रिए से भी भारी कीमत चुकाई है। वर्ष 2000 से अब तक 200 इस्राइली और लगभग 7000 फिलिस्तीनी लड़ते हुए मारे गए हैं जबकि उनमें घायलों की संख्या क्रमशः 59575 और 10792 है। अरब की ज़मीन पर क़ब्जे के प्रयास में इसराइल ने फिलिस्तीनी के 24813 घरों को तबाह करके न केवल अरबों को बेघर कर दिया बल्कि पूरे क्षेत्र को आतंकवाद की ऐसी भट्टी में झोंक दिया जिससे पूरी दुनिया का सुकून छिन गया है।
अविश्वसनीय मुसीबतों के बावजूद ये मुठभेड़ खत्म होता नहीं लगता। इसमें शक नहीं कि जमीनी स्थिति गंभीर समस्याओं से दो चार रही है। हालांकि अरब क़ौम इसराइल को अपने पड़ोसी के रूप में स्वीकार करने पर आमादा नहीं हैं। अधिक से अधिक अरब भूमि पर काबिज़ होने के इस्राइली प्रयास जारी हैं। फिलिस्तीनी नेतृत्व के अंदर विवादों और मतभेदों की वजह से इस्राइली फिलिस्तीनियों को स्वीकार करने और परिणामस्वरूप उनसे बातचीत से इनकार करते हैं और किसी समाधान पर पहुंचने के गरज़ से दोनों पक्षों पर दबाव डालने के लिए अमेरिका वास्तव में कोई विश्वसनीय प्रस्ताव लेकर सामने नहीं आया।
वास्तव में सच्चाई ये है कि इसराइल को अमेरिकियों से असीमित राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य मदद मिलती रही है और अब भी मिल रही है। जिससे इसराइल इस्लामी जगत में विशेष और पूरी दुनिया में आमतौर से विश्वास खो बैठा है। इस तरह की सूचना प्राप्त हुई हैं कि पिछले दो साल में अमेरिका ने इसराइल को सैन्य मदद के रूप में प्रतिदिन 8.2 मिलियन डॉलर की रक़म दी है जबकि फ़िलिस्तीन को उसने एक पैसा भी नहीं दिया। इसलिए सच्चाई तो यही है कि अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों और इसराइल के रस्म के रूप में स्वीकृत वैश्विक समझौतों के आधार पर शांति को बल प्रदान करने के लिए उचित प्रयास नहीं किये।
पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र की स्थिति जबर्दस्त रूप से खतरनाक रुख अख्तियार कर गई है। एक तरफ तो ये सच्चाई है कि इसराइल के पास परमाणु हथियारों का बहुत बड़ा भंडार है और वो किसी भी पड़ोसी देश को तबाह करने यहां तक कि ईरान पर भी हमला करने की क्षमता रखता है। ज़ाहिर है कि ये बात अरब कौमों को अपने परमाणु बम बनाने पर उकसाएगी।
इसलिए फौजी सतह पर किसी भी तरह की जांबाज़ी इस क्षेत्र को परमाणु युद्ध की राह पर डाल कर विश्व शांति को तबाह कर सकती है। बहरहाल इसे अंधेरे में उम्मीद की किरण कहिए कि क्षेत्र की जनता शांति प्रयासों को सफल होते देखना चाहती है। दोनों पक्षों की बयानबाज़ी और उनकी मांगें अनुचित लगती होंगी, लेकिन कहा ये जाता है कि अरब नेता व्यक्तिगत रूप से शांति में गहरी दिलचस्पी रखते हैं। यही हाल इस्राइली नागरिकों का है जिनकी उदारवादी मांगों को गंभीरता से सुना और समझा ही नहीं जा रहा है। अफसोस इसका है कि ऐसे क्षण में भी जब इसराइल शांति के उपायों का लाभ उठा सकता है, उसने एक विवादास्पद क्षेत्र (ई- 1) में आवासीय घरों का निर्माण करने का कदम उठाया है, जहाँ यहूदी बस्तियाँ दो राज्यों के समाधान के लिए मौत की घंटी मानी जाती रही हैं। ये बस्ती, बड़ी बस्तियों को येरुशलम से जोड़ देगी और फ़िलिस्तीन दो टुकड़ों में बँट जाएगा। इसके साथ ही इजरायल ने पश्चिमी येरुशलम और पश्चिमी तट पर 3000 और घरों के निर्माण का ऐलान किया है।
लेकिन दुनिया को ये ऐतिहासिक मौक़ा गंवाना नहीं चाहिए। राष्ट्रपति ओबामा को जो अब दूसरी बार राष्ट्रपति के पद पर चुनाव जीतकर सुरक्षित हैं। मई 2011 का उनका बयान याद दिलाया जाना चाहिए जिसमें उन्होंने 1967 ई. के मध्य एशिया के जंग से पहले स्थापित सीमाओं पर आधारित फिलिस्तीनी राज्य की मांग की थी। ऐसी तीन प्रमुख समस्याएं हैं जिन्हें निश्चित रूप से हल किया जाना चाहिए।
1. फिलिस्तीनियों को इजरायल के अस्तित्व का अधिकार स्वीकार करना चाहिए।
2. अंतर्राष्ट्रीय कानून निर्देषों के अनुसार इस्राइलियों को फिलिस्तीनी जनता का शांति और गरिमा के साथ जीवित रहने का अधिकार स्वीकार करना चाहिए।
3. इस्राइल और फ़िलिस्तीन दोनों को इससे सहमत होना चाहिए और एक दूसरे को ये विश्वास दिलाना चाहिए कि लड़ाई में शामिल न रहने वाले मर्दों, औरतों और बच्चों का खून और नहीं बहाया जाएगा और न ही ऐसी हिंसा को शब्द संपार्श्विक क्षति के तहत उचित बताया जाएगा।
शांति की निर्भरता इसराइल पर है और इस पर कि अमेरिका किस हद तक इसराइल पर दबाव डाल सकता है। ज़ाहिर है कि अमेरिका अन्य क्षेत्रों और देशों के मामलों में भी उलझा रहता है, जैसे इराक, ईरान, अफगानिस्तान और उत्तर कोरिया आदि। इसलिए वो अपनी सभी कोशिशों इसराइल फ़िलिस्तीन मसले पर केंद्रित नहीं कर सकता। अरब देशों की भी अपनी समस्याएं हैं। इनमें से कुछ में आंतरिक मतभेद और विवाद हैं। कुछ लोकतंत्र की ओर कदम बढ़ा रहे हैं, जिससे उनके नेतृत्व को खतरा होने के साथ साथ इस्लामी बहस और कट्टरपंथ में भी तेज़ी आई है। लेकिन अरबों को ये महसूस करना चाहिए और खुल कर इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए जिसे इसराइल कहते हैं। उसी तरह जैसे इस्राइलियों को बहुत कम भूमि के बचे हुए हिस्से में फिलिस्तीनी राज्य को स्वीकार करना चाहिए, जो संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीनियों के लिए निर्धारित की है। फिलिस्तीनियों को अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत सभी मानवाधिकार दिए जाएं, जैसे आत्मनिर्णय का अधिकार, लोकतंत्र का अधिकार, जीवन और शरीर की सुरक्षा का अधिकार और संपत्ति की पवित्रता आदि। ये वही सीधा और सच्चा रास्ता है जिसकी तलाश अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को करनी चाहिए।
नजीब जंग जामिया मिल्लिया इस्लामिया के वाइस चांसलर (कुलपति) हैं।
8 दिसम्बर, 2012, स्रोतः इंक़लाब, नई दिल्ली
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