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Hindi Section ( 17 Dec 2012, NewAgeIslam.Com)

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The Truth behind Taliban's Fatwa Justifying Killings of Innocent Civilians Part-5 नवाये अफगान जिहाद का फतवा और उसकी वास्तविकता- (किस्त 5)

 

सोहेल अरशद, न्यु एज इस्लाम

15 दिसम्बर, 2012

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

नवाये अफगान जिहाद में अपने लेख, वो हालतें कि जिनमें कुफ़्फ़ार के आम लोगों का क़त्ल भी जायज़ है में यूसुफ अलउबैरी मसला (लाश के नाक, कान औऱ दूसरे अंग इत्यादि काटने का अमल) की समस्या उठाते हुए ये फतवा देते हैं कि अगर कुफ़्फ़ार मुसलमानों की औरतों और बच्चों का क़त्ल करते हैं तो मुसलमानों के लिए भी ये जायज़  हो जाता है कि वो भी कुफ़्फ़ार के आम लोगों और औरतों और बच्चों का क़त्ल करें। इस फ़तवे के समर्थन में कुरान की वही आयत पेश करते हैं जिसमें बदला लेने की इजाज़त दी गई है। इस सिलसिले में इब्ने तैमिया रहिमतुल्लाह अलैहि के इस अंश का हवाला दिया गया है।

'हालांकि मसला करने से मना किया गया है लेकिन अल्लाह ने मुसलमानों के लिए इस चीज़ को मोबाह (जायज़) करार दिया है कि वो कुफ़्फ़ार का मसला करें। जबकि उन्होंने मुसलमानों का मसला किया हो।

यूसुफ अलउबैरी अपने एक गलत दृष्टिकोण को ढके छिपे अंदाज़ में क़ुरान की आयतों और उलमा और फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) के इबारतों की ग़लत पेशकश से सही करार देने की कोशिश कर रहे हैं। जंग की हालत में इस्लाम उन लोगों से मुनासिब (उचित) तरीके से बदला लेने की इजाज़त देता है, जो मुक़ाबला करते हैं या जिन्होंने क़त्ल किया हो या अंगों को काटा हो इसलिए, इब्ने तैमिया की इबारत या कुरान की आयत (बदला से सम्बंधित) सिर्फ उन्हीं लोगों के बारे में है जिन्होंने जंग किया हो। चूंकि तालिबान बे-खबरी में नागरिकों और अपने दुश्मनों (अमेरिकी सैनिक, नाटो सैनिक, अफगानिस्तान सरकार के मंत्रियों, सांसद, सरकारी अधिकारियों और उनके समर्थक नागरिकों) पर बे-खबरी में हमले कर के उन्हें मारते हैं जिनमें बच्चे और औरतें भी होती हैं इसलिए वो इन सबके क़त्ल को जायज़ ठहराने के लिए इस तरह की लंगड़ी लूली दलीलें पेश कर रहे हैं। जबकि खुद मजबूरी के कारण उन हदीसों को नक़ल कर रहे हैं जिनमें हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने मसला से मना फरमाया है।

'मसला से कुरान और हदीस में मतलब वैसा ही बदला है, जो उसी शख्स से उतनी ही मिक़दार (मात्रा) में लिया गया हो, जितना किसी पर ज़ुल्म हुआ है। मगर तालिबान के आलिम का दृष्टिकोण है कि मसला का अर्थ दुश्मन की क़ौम के बेकसूर लोगों से बदला लेना है जबकि ये सीधे तौर पर इल्मी बददयानती और इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ है। इससे पहले भी कुरान की ये आयत पेश की गयी है।

'और कोई बोझ उठाने वाला दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा। (अलइसरा- 15)

लेकिन यूसुफ अलउबैरी बड़ी दीदा दिलेरी से कहते हैं,

ये संदेह निरर्थक और गलत है। यहां तक ​​कि अगर हम इसे जंगजू लोगों पर ही लागू करें तो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम क़ुरैश के जंगजू लोगों से लड़ते थे जबकि वास्तव में तो समझौता बनी बकर बिन वाएल ने तोड़ा था या क़ुरैश के सरदारों ने। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम बनी करीज़ा के मर्दों, बूढ़ों और उनके मज़दूरों से लड़ते थे जबकि उन्होंने तो समझौता नहीं तोड़ा था बल्कि उनके बड़ों और राय देने वाले लोगों ने समझौते का उल्लंघन किया था। नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने उनके इस जुर्म की वजह से सात सौ जानों का क़त्ल किया और जो बच गए उन्हें गुलाम बना लिया। इसलिए उलमा दुश्मन के लोगों का मसला करने को बिल्कुल जायज़ ठहराते हैं। उसके साथ ये शर्त नहीं लगाते कि मसला सिर्फ ऐसा करने वाले का किया जाएगा।

इसका जवाब ये है कि कोई समझौता, पक्षकारों के नेताओं और सरदारों के बीच होता है जो दो समूहों का प्रतिनिधि होता है। इसलिए सरदारों द्वारा समझौता तोड़ने का मतलब है कि उनकी क़ौम ने इस उल्लंघन का समर्थन किया। इसलिए, इसके बाद जिन लोगों ने मुसलमानों के खिलाफ उनका साथ दिया और लड़े और उनसे दुश्मनों का सा व्यवहार किया गया और जिन्होंने हथियार डाल दिए और किनारे हो गये उन्हें छोड़ दिया गया। जाहिर है जो लोग लड़े वो मारे गए और युद्ध के सिद्धांत के अनुसार जो हार गये वे जंगी क़ैदी कहलाए।

मगर जिस ज़बान और लहजे में यूसुफ अलउबैरी ने इस बात को पेश किया है उससे ये प्रतीत होता है कि हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने बेकसूरों, शांतिपूर्ण जनता और निहत्ते लोगों को क़त्ल किया और ग़ुलाम बनाया। इस तरह उन्होंने हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के अनादर का अपराध किया। इस्लामी इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि क़ुरैश के क़बीले और मदीने और आस पास के यहूदी क़बीले अक्सर समझौते तोड़ देते थे और बे-खबरी में मुसलमानों पर हमले करते थे। इसलिए, ऐसे जंगजू क़बीले से मुसलमानों को जंग करनी पड़ती थी।  मगर यूसुफ अलउबैरी जंग की हालत को शांति की स्थित में अपने आतंकवादी समूह की आतंकी गतिविधियों पर लागू करते हैं जिसके नतीजे में बेकसूर लोग बे-खबरी की हालत में मारे जाते हैं।

'इसलिए उलमा दुश्मन के लोगों का मसला करने को बिल्कुल जायज़ ठहराते हैं। इसके साथ ये शर्त नहीं लगाते कि मसला सिर्फ ऐसा करने वालों का किया जायेगा।

ये बात बहुत गुमराह करने वाली और गैर शरई है और इसे सिर्फ तालिबान की गैर इस्लामी सरगर्मियों को जायज़  ठहराने के लिए किया गया है। उनकी राय में मसला सिर्फ़ ऐसा करने वाले का ही नहीं बल्कि ऐसा करने वाले की जुर्म की सज़ा उसकी बीवी, बच्चों, भाइयों और क़ौम के दूसरे लोगों को बे-खबरी में क़त्ल कर दी जाएगी। जबकि खुद हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने गैर मोतहारिब (न लड़ने वालों) लोगों, बच्चों, औरतों और बुढ़ों को क़त्ल करने से मना फरमाया है। और कुरान सिर्फ़ उसी को सज़ा देने के हक़ में है जो जुर्म और ज़ुल्म करने का दोषी है। उन्होंने जितने उलमा का क़ौल नक़ल किया है वो सब यही कहते हैं कि लड़ने वालों के साथ बराबरी का बदला लिया जा सकता है लेकिन इन कथनों से यूसुफ अलउबैरी ने ज़बरदस्ती ये मतलब निकालने की कोशिश की है कि बदला का मतलब दुश्मन की बीवी, बच्चों और उनकी क़ौम के दूसरे लोगों से बदला भी शामिल है जबकि मतन (पाठ) में ये बात कहीं मौजूद ही नहीं है।

मुल्ला अलउबैरी इस संदर्भ में कुरान की इस आयत का हवाला दिया है।

'और जब हमारा इरादा किसी बस्ती को हलाक करने का हुआ तो वहां के आसूदा लोगों को (फ़वाहिश पर) मामूर (लगा) कर दिया तो वो नाफरमानियाँ करते रहे। फिर उस पर (अज़ाब) का हुक्म साबित हो गया और हमने उसे हलाक कर डाला।'

इस आयत की व्याख्या में मुल्ला अलउबैरी कहते हैं,

'शरीयत ने अपराध की उपरोक्त स्थितियों की ये सज़ाएँ इसलिए रखी है कि ये सामूहिक मुसीबितें गिनी जाती हैं ...... इसलिए व्यक्ति की सजा जमात को दी जाती है ताकि जमात को मुजरिम के काम से पहले उसका हाथ पकड़ने पर उभारा जाए।''

जैसे अफगानिस्तान और पाकिस्तान की निर्वाचित सरकार का समर्थन करने वाले आम मुसलमान नागरिक सामूहिक रूप से गुनहगार हैं इसलिए खुदा ने तालिबान को ये अधिकार दिया है कि वो दोनों देशों की जनता और उनके प्रतिनिधियों को आत्मघाती बम धमाकों से मारते रहें, जब तक कि वो इन हुकूमतों का समर्थन करना न छोड़ दें और तालिबानियों की हुकूमत को को कुबूल न कर लें। इस को कहते हैं कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा .... भानुमति ने कुंबा जोड़ा।

कुरान में कुछ क़ौमों का ज़िक्र है जिनकी बहुसंख्यक जनता गुनाहों में डूब गई थी इसलिए उनके विद्रोह के इल्ज़ाम में अल्लाह ने उनको हलाक कर दिया। उन क़ौमों में से कुछ हैं, क़ौमे नूह, क़ौमे लूत, क़ौमे आद व समूद मदीने वाले वगैरह। खुदा उन बस्तियों को हलाक नहीं करता जहां अच्छे लोग बड़ी संख्या में हों। और उनमें भी उनके शिकार मासूम औरतें और बच्चे हैं।

ऊपरोक्त आयत को नक़ल करने के पीछे भी तालिबानी आलिम का मकसद ये है कि दुश्मन क़ौम के '' निर्दोष लोगों ' को वाजिबुल क़त्ल करार दिया जाए। जबकि एक हदीस में है, अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हू फरमाते हैं,

'' जब खुदा के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम फौजों को रवाना करते तो उन्हें हुक्म फ़रमाते 'दगा फरेब से काम न लो, माले ग़नीमत में खयानत न करो, लोशों का निरादर न करो और बच्चों और धार्मिक नेताओं को क़त्ल न करो।''

जनाब अबु यूसुफ अपनी किताब, किताबुल खिराज में लिखते हैं,

'' कोई भी शांतिपूर्ण गैर मुस्लिम नागरिक को उसके सहधर्मियों के अत्याचार की सजा नहीं दी जाएगी।

इसलिए, मुल्ला यूसुफ अलउबैरी का ये कहना कि दुश्मन के अत्याचार या ज़्यादती का बदला उसकी बीवी, बच्चों और उसकी क़ौम के दूसरे लोगों से लेना जाइज़ है। ये प्रत्यक्ष रूप से जिहालत है और गैर इस्लामी व गैर शरई है। इस फ़तवे का औचित्य न क़ुरान में है न हदीस में और न ही फिकह इस्लामी में है।

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