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Hindi Section ( 30 Nov 2012, NewAgeIslam.Com)

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Taliban Fatwa on Terrorism आतंकवाद के समर्थन में तालिबानियों के द्वारा जारी किया गया फ़तवा खारिज किया जाना चाहिएः ऐसे हालात जिनमें काफिरों के आम लोगों का क़त्ल भी जायज़ है- भाग 4

 

कुछ मुसलमान इंकार करने की स्थिति में ही जीना पसंद करते हैं। वो अखबार पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं, तालिबान और दूसरे जेहादियों को इस्लाम के नाम पर बयान न किये जा सकने वाले आतंक को फैलाते हुए देखते हैं,  और उनके औचित्य के लिए हमेशा क़ुरान की आयतों का हवाला देते हैं। लेकिन ध्यान दिलाने पर भी ये मुसलमान इस्लाम की असहिष्णु व्याख्या और नृशंस आचरण के बीच पाए जाने वाले किसी भी सम्बंध से इंकार करते हैं। इस्लाम की ये असहिष्णु व्याख्या हमारे साथ किसी न किसी रूप में या किसी न किसी नाम के तहत इतिहास की 14 सदियों से है। ऐसे लोगों को पहले ख्वारिज या खारिजी (इस्लाम से निकल जाने वाले) कहा जाता था,  और आज उन्हें वहाबी कहा जाता है,  हालांकि वो अपने आपको सल्फ़ी (इस्लाम के बुनियादी सिद्धांत में विश्वास रखने वाले जिस पर मुसलमानों की पहली पीढ़ी ने अमल किया था) और मोहिद (खुदा के एक होने में दृढ़ विश्वास रखने वाले) कहलाने को प्राथमिकता देते हैं। मीडिया में उनकी हामी भरने वाले चाहते हैं कि उन्हें सिर्फ एक आम मुसलमान समझा जाए,  ताकि उनकी इन निंदनीय और नाजायज़ सरगर्मियों के वर्ग में सभी मुसलमानों को शामिल किया जा सके।

बहरहाल मुसलमान जो इस पूरे खेल को जानते हैं और उनके विचारों और गतिविधियों से खुद को अलग करना चाहते हैं। खुदा का शुक्र है कि वहाबी समुदाय अभी भी मुस्लिम समाज का एक छोटा सा समूह है, हालांकि पिछले चार दशकों में उन्होंने पेट्रोडालर की भारी मदद से अपने विचारों के प्रसार द्वारा अपने प्रभाव और पहुंच को बढ़ाया है। ये अहम है कि हम मुख्य धारा के मुसलमान होने के नाते उनके विचारों की कलई खोलते रहें और उनको रद्द करते रहें ताकि वहाबियत, सल्फ़ियत  और इससे संबंधित विचारधाराओं जैसे अहले हदीसियत, क़ुत्बियत, मौदूदियत, देवबंदियत आदि के समर्थकों और प्रचारकों को इस्लाम के मुख्य धारा में शामिल होने का दावा करने से रोका जा सके।

इसी अहम ज़रूरत के मद्देनज़र न्यु एज इस्लाम तालिबान के मुखपत्र नवाये अफगान जिहाद (जुलाई 2012) में प्रकाशित लेख को पेश कर रहा है। ये मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो रहे लेख का पहला हिस्सा है जिसमें इस बात को स्पष्ट किया गया है कि क्यों वहाबियों का ये ईमान है कि काफिरों यानि सभी गैर- वहाबी मुस्लिम,  पूर्व मुस्लिम और अहले किताब समेत गैर-मुस्लिमों के बेगुनाह मर्दों, औरतों और बच्चों को मारना उनके इस्लाम में जायज़ है। मुख्य धारा में शामिल मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वो तालिबानियों के वास्तविक खूनी प्रकृति को समझें और वैश्विक शांति और इस्लाम की नेक नामी की हिफाज़त के लिए कुरान और सुन्नत के आधार पर एक आवाज़ होकर इस दृष्टिकोण की निंदा करें। और वहाबियों के उस वर्ग को जो हिंसक विचारधारा का समर्थन नहीं करता जिनके संस्थापक इब्ने अब्दुल वहाब और वैचारिक संरक्षक इब्ने तैमिया हैं।  उन्हें इस समूह से पूरी तरह से अलग हो जाना चाहिए। अगर आप वहाबी सिर्फ इसलिए कहलाते हैं क्योंकि आप सूफियों के मज़ारात पर हाज़िरी देने और सूफी बुजुर्गों का एहतेराम करने से नफ़रत करते हैं,  न कि इसलिए क्योंकि आप असहिष्णुता और इस दृष्टिकोण के उग्रवाद के कायल और क़द्रदान हैं,  तो आपको समझना चाहिए कि मज़ारात पर हाज़िरी से परहेज़ करने के लिए आपको वहाबी होने की ज़रूरत नहीं। ऐसे बहुत से दूसरे समुदाय के मुसलमान हैं जो मज़ारात की ज़ियारत नहीं करते,  फिर भी वो वहाबी नहीं हैं। आपको मोहिद होने के लिए वहाबी या सल्फ़ी होने की ज़रूरत नहीं........... सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम

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वो स्थितियाँ कि जिनमें कुफ़्फ़ार के आम लोगों का कत्ल जायज़ है (चौथी क़िस्त)

शेख़ यूसुफ़ अलउबैरी रहिमतुल्लाह ताला

(उर्दू से अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

आज जो देखने में आ रहा है कि अमेरिका मुस्लिम नौजवानों, औरतों और बुज़ुर्गों को बिना किसी गुनाह के क़त्ल कर रहा है, उन्होंने एक लंबे समय से इराक का घेराव किया है कि जिसके नतीजे में  सिर्फ  आम मुसलमान ही क़त्ल हो रहे हैं। जब इराक पर अमेरिका और उसके सहयोगियों ने बमबारी तो इराकी सरकार को तो कोई खास नुकसान नहीं पहुँचाया अलबत्ता मुसलमानों को गंभीर नुकसान पहुंचाया गया। लाखों लोगों को क़त्ल किया गया और अगर मुसलमान अमेरिका के साथ बराबर (बिलमिस्ल) का मामला करें, तो उनके लिए कई लाख अमेरिकी लोगों का क़त्ल करना जायज़ है। खाड़ी युद्ध के दौरान बग़दाद के इलाके 'आमरया' की पनाहगाह (शरणार्थी स्थल) में अमेरिका ने एक मिसाइल से पांच हजार से अधिक मुसलमानों का क़त्ल किया था।

इसलिए अमेरिका में होने वाली कार्रवाईयाँ तो अमेरिका पर लगे उस कर्ज़े का बदला है जिसमें 'आमिरया' की पनाहगाह पर हमला करके मुसलमानों को ज़ख़्म लगाए गए थे। जबकि इन पाबंदियों का क़र्ज़ तो अभी बाकी है जिनकी वजह से इराक में बारह लाख मुसलमान ज़िंदगी से हाथ धो बैठे थे। अमेरिकियों का ये अत्याचार तो अब भी इराक के निर्दोष लोगों पर जारी है। ये भी एक तथ्य है कि अमेरिका की ओर से घातक हथियारों के उपयोग ने मुसलमानों की इस धरती पर ऐसी बर्बादी फैलाई कि वहां यूरेनियम प्रभावित धूल और ग़ुबार के कारण लाखों निर्दोष मुसलमान अजीबो गरीब रोग से ग्रस्त हुए हैं। ये रोग जो बड़े पैमाने पर फैल चुके हैं, मैं सबसे ज़्यादा खतरनाक और जानलेवा ब्लड कैंसर है। इन सालों के दौरान अमेरिकी हमलों और प्रतिबंधों के कारण दस लाख मासूम बच्चे मौत का शिकार हुए। निस्संदेह ग्यारह सितंबर के मुबारक हमले की तबाही 'इराक में पैदा किए जाने वाले अमेरिकी फसाद से सैकड़ों गुना कम है।

इसके अलावा अगर अमेरिका के अफगानिस्तान के खिलाफ लगाये गये प्रतिबंधों को देखा जाए तो स्थिति ज्यादा भयानक हो जाती है। इन प्रतिबंधों का शिकार होने वालों की संख्या सत्तर हजार से अधिक है। रही रोग और गरीबी .... तो 95 प्रतिशत अफगान मुसलमान इन मुसीबतों से दो चार हैं और उन सबका कारण अमेरिका है। अमेरिका की ओर से अफगानिस्तान पर मिसाइलों की बारिश की गई लेकिन हमें इस आतंकवाद और मासूमों के क़त्ल की ज़बानी निंदा तक करने वाला कोई नज़र नहीं आया।

अब जरा फ़िलिस्तीन को देखिए! अमेरिका के समर्थन में यहूदियों की मुसलमानों के खिलाफ पचास साल से अधिक समय से जारी जंग पर भी नज़र डालें। इस युद्ध के नतीजे में पचास लाख लोग बेघर, दो लाख बासठ शहीद, एक लाख छियासी हजार घायल और एक लाख इकसठ हजार अपंग हुए। अमेरिका की ही मदद से दस महीने से अधिक समय से हमारे फिलिस्तीनी भाइयों का घेराव जारी है। सोमालिया में अमेरिका 'इंसानी हमदर्दी' की आड़ लेकर दाखिल हुआ लेकिन मूल रूप से तो ज़मीन में फसाद बरपा करना ही उद्देश्य था। इसलिए उसने वहां तेरह हज़ार मुसलमानों को क़त्ल किया और जलाया। अमेरीकी सैनिकों ने वहां मुसलमान औरतों की इज़्ज़तों को लूटा। सोमाली धरती में अमेरिका ने अपनी परमाणु कचरे को दफ़नाया जिसकी वजह से अब तक वहां मुसलमान विभिन्न जानलेवा घातक रोगों का शिकार हैं।

सूडान पर कई सालों से अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखा है जो कि अभी तक जारी है और उसने ख़ार्तूम  के रहने वालों को क़त्ल करने के लिए उन पर मिसाइलों से हमला किया। इन हमलों के कारण और औचित्य देने के लिए उसने ये दावा किया कि यहां रासायनिक हथियारों के गोदाम हैं और अगर सचमुच ऐसा होता तो इन हमलों के कारण ये (रासायनिक) गैसें निकलकर फैल जातीं और कार्तूम में रहने वाले सभी लोगों को मार देतीं। अमेरिका अब भी घोषित रूप से दक्षिणी सूडान के सलीबियों के साथ खड़ा है और इस जंग को भड़का रहा है जिसका शिकार मुसलमान और उनकी अर्थव्यवस्था है।

ये तो मुसलमानों की उन समस्याओं ज़िक्र है जिसमें अमेरिका ने मुसलमानों की सरज़मीनों में दंगा फैलाने और मासूम लोगों के क़त्ल के लिए घोषित और सीधे तौर पर हस्तक्षेप किया। इनके अलावा फिलिपींस, इंडोनेशिया, कश्मीर, मकदूनिया और बोस्निया आदि में मुसलमानों पर जो बीत रही है उसके पीछे भी अमेरिका का हाथ है। इसलिए किसी भी मुसलमान के लिए ये कहना संभव है कि आज जितनी भी मुसीबतें मुसलमानों पर आईं हैं उनमें अमेरिका की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका है। अमेरिका को तो केवल अपने हितों का लालच है चाहे इन हितों के लिए उसे सारी मानवता का खून करना पड़े। अमेरिका के पूरे दुनिया पर हावी होने से लेकर अब तक (इसमें आधी सदी का समय शामिल है) करोड़ों लोग इसका शिकार हुए हैं। ऐसी स्थिति में अमेरिका से उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वो अपनी सीमा का पाबन्द रहेगा और मुसलमानों के खिलाफ अपने ज़ुल्म व सितम के सिलिसले को रोकेगा?

निस्संदेह इस्लामी शरीयत हर त्रुटि और हर ऐब से पाक है। शरीयत में हद से पार जाने वाले और फसाद पैदा करने वालों के लिए किसास का आदेश दिया है। एक ओर तो अमेरिका मुसलमानों को लगातार क़त्ल कर रहा है जबकि दूसरी ओर कमजोर मुसलमानों के लिए संभव ही नहीं कि वो उसे उसके किए की सज़ा दे सकें क्योंकि वो किसी के सामने आकर वार नहीं करता बल्कि दूर से हमला करता है या घेराव करता है। इन जैसी ताकतों का यही इलाज है कि उन्हें भी वैसे ही घाव लगाए जाएं जैसे ये मुसलमानों को लगाते हैं और उनके साथ अत्याचार और ज़्यादती करते हैं।

ऐसी स्थिति में अमेरिका को क्यों खुली छुट दी जा सकती है कि वो जब और जहां चाहे हमारे बच्चों और औरतों को क़त्ल करे और अपनी इच्छा के अनुसार जब और जहां चाहे उन पर हमला करे। और जवाब में मुसलमानों को बाध्य किया जाये कि अमेरिका के खिलाफ कदम उठाना और बदले की कार्रवाई करना सिरे से हराम है। निस्संदेह जो व्यक्ति भी ये कहता है वो या तो जाहिल है या फिर वो मुसलमानों से खुली दुश्मनी करते हुए अमेरिका के समर्थन की कोशिश करता है ताकि वो मुसलमानों में और क़त्ल कर सके और उन्हें दर बदर करे। बिलमस्ल (बराबरी) के शरई सिद्धांत के तहत हम अमेरिका पर इसी तरह तबाही थोपेंगें जिस तरह उसने हम पर की।

अमेरिका ने सद्दाम और उसकी बाथ पार्टी को बहाना बनाकर इराक में घातक हथियारों और अत्याचारी प्रतिबंधों से लाखों इराकी मुसलमानों का नरसंहार किया।

शेख ओसामा बिन लादेन को शरण देने के 'अपराध' में  अमेरिका ने अफ़ग़ान लोगों पर प्रतिबंध लगाए और उन पर मिसाइलों से हमले किये जिसमें दसियों हज़ार मुसलमान मारे गए।

एक कृत्रिम रासायनिक कारखाने को समाप्त करने का दावा करते हुए अमेरिका ने सूडान पर हमला किया और वहां दवाओं की फैक्टरी नष्ट कर दी जिसमें कई मुसलमान क़त्ल हुए।

अब हम कहते हैं कि हम बिलमिस्ल (बराबर) का मामला अख्तियार करेंगे और अमेरिका के ही अपनाए गए तरीके यानी लोगों के कारण लोगों को सज़ा देना के अनुसार अमेरिकी सरकार के अपराध के कारण उसकी जनता को सज़ा देंगे!

इस स्थिति में अमेरिका और उसके चेले क्यों गजबनाक होते हैं जब हम उसे बिलमिस्ल (बराबर) सज़ा देते हैं। क्या ये वही अमेरिका नहीं है जो जिस पर चाहे आतंकवादी होने या आतंकवाद का मददगार होने का हुक्म जारी करता है और फिर उस पर हमला करता है, मासूम और बेगुनाह लोगों को क़त्ल करता है और इस काम पर थोड़ी सी शर्म भी महसूस नहीं करता!

हम भी उसी के नियम के अनुसार काम करते हुए और इसी को आधार बनाते हुए कहते हैं कि यहूदी आतंकवादी हैं जबकि अमेरिका फ़िलिस्तीन में यहूदी आतंकवाद का मददगार है। तो क्या हमें ये अधिकार नहीं है कि हम उस पर उसी के सिद्धांत के अनुसार हुक्म लागू करें? निस्संदेह हमारा अधिकार है, तो फिर अमेरिका पर पूरी दुनिया को किस चीज़ पर गुस्सा है? अगर हम उसके साथ बिलमिस्ल (बराबर) मामला करना चाहें तो अमेरिका पर होने वाले हमले शरई तौर पर जायज़ हैं। और अगर हम उसके साथ उसी के क़ानून के अनुसार व्यवहार करना चाहें तो भी ये कार्रवाईयाँ उसके अपने सिस्टम 'न्यु वर्ल्ड आर्डर'  के अनुसार जायज़ हैं!!!

इस बात में किसी शक और संदेह की गुंजाइश नहीं कि अमेरिकी बुज़ुर्गों, बच्चों और औरतों और अन्य लोगों का क़त्ल करना जायज़ और हलाल है बल्कि ये जिहाद की उन श्रेणियों में से एक है जिनका अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हुक्म दिया है। अल्लाह ताला का फरमान है:

फमाने तदी अलैकुम फातदू वआलैहि बमिस्ले मा औतदा अलैकुम (अलबक़रा- 194)

'लिहाज़ा अगर कोई तुम पर ज़्यादती करे, तो तुम भी उस पर उतनी ही ज़्यादती कर सकते हो जितनी उसने तुम पर की है।''

और उसका फरमान है कि

वइन आक़ब्तुम फआक़ेबू बेमिस्ले माउक़िब्तुम बिहि (अल-नहेल: 126)

'और अगर तुमने बदला लेना हो, तो उतना ही बदला लो जितनी तुम पर ज़्यादती हुई।''

लेकिन मुसलमान हर हाल में शरीयत के अता किये गये कानून के पाबंद हैं इसलिए उनके लिए किसी भी तरह जायज़ नहीं कि वो चालीस लाख युद्ध न कर रहे अमेरिकियों से अधिक को क़त्ल करें और एक करोड़ से अधिक अमेरिकियों को बेघर करें। इसी सूरत में वो हद से बढ़कर ऐसी सज़ा देने वालों में शुमार होंगे जो बिलमिस्ल (बराबर) से अधिक हो। वाल्लाहो आलम

(जारी)

स्रोत: नवाये अफगान जिहाद (अक्तूबर, 2012)

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