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Hindi Section ( 1 Dec 2012, NewAgeIslam.Com)

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Taliban Fatwa on Terrorism आतंकवाद के समर्थन में तालिबानियों के द्वारा जारी किया गया फ़तवा खारिज किया जाना चाहिएः ऐसे हालात जिनमें काफिरों के आम लोगों का क़त्ल भी जायज़ है- भाग 5

 

कुछ मुसलमान इंकार करने की स्थिति में ही जीना पसंद करते हैं। वो अखबार पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं, तालिबान और दूसरे जेहादियों को इस्लाम के नाम पर बयान न किये जा सकने वाले आतंक को फैलाते हुए देखते हैं,  और उनके औचित्य के लिए हमेशा क़ुरान की आयतों का हवाला देते हैं। लेकिन ध्यान दिलाने पर भी ये मुसलमान इस्लाम की असहिष्णु व्याख्या और नृशंस आचरण के बीच पाए जाने वाले किसी भी सम्बंध से इंकार करते हैं। इस्लाम की ये असहिष्णु व्याख्या हमारे साथ किसी न किसी रूप में या किसी न किसी नाम के तहत इतिहास की 14 सदियों से है। ऐसे लोगों को पहले ख्वारिज या खारिजी (इस्लाम से निकल जाने वाले) कहा जाता था,  और आज उन्हें वहाबी कहा जाता है,  हालांकि वो अपने आपको सल्फ़ी (इस्लाम के बुनियादी सिद्धांत में विश्वास रखने वाले जिस पर मुसलमानों की पहली पीढ़ी ने अमल किया था) और मोहिद (खुदा के एक होने में दृढ़ विश्वास रखने वाले) कहलाने को प्राथमिकता देते हैं। मीडिया में उनकी हामी भरने वाले चाहते हैं कि उन्हें सिर्फ एक आम मुसलमान समझा जाए,  ताकि उनकी इन निंदनीय और नाजायज़ सरगर्मियों के वर्ग में सभी मुसलमानों को शामिल किया जा सके।

बहरहाल मुसलमान जो इस पूरे खेल को जानते हैं और उनके विचारों और गतिविधियों से खुद को अलग करना चाहते हैं। खुदा का शुक्र है कि वहाबी समुदाय अभी भी मुस्लिम समाज का एक छोटा सा समूह है, हालांकि पिछले चार दशकों में उन्होंने पेट्रोडालर की भारी मदद से अपने विचारों के प्रसार द्वारा अपने प्रभाव और पहुंच को बढ़ाया है। ये अहम है कि हम मुख्य धारा के मुसलमान होने के नाते उनके विचारों की कलई खोलते रहें और उनको रद्द करते रहें ताकि वहाबियत, सल्फ़ियत  और इससे संबंधित विचारधाराओं जैसे अहले हदीसियत, क़ुत्बियत, मौदूदियत, देवबंदियत आदि के समर्थकों और प्रचारकों को इस्लाम के मुख्य धारा में शामिल होने का दावा करने से रोका जा सके।

इसी अहम ज़रूरत के मद्देनज़र न्यु एज इस्लाम तालिबान के मुखपत्र नवाये अफगान जिहाद (जुलाई 2012) में प्रकाशित लेख को पेश कर रहा है। ये मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो रहे लेख का पहला हिस्सा है जिसमें इस बात को स्पष्ट किया गया है कि क्यों वहाबियों का ये ईमान है कि काफिरों यानि सभी गैर- वहाबी मुस्लिम,  पूर्व मुस्लिम और अहले किताब समेत गैर-मुस्लिमों के बेगुनाह मर्दों, औरतों और बच्चों को मारना उनके इस्लाम में जायज़ है। मुख्य धारा में शामिल मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वो तालिबानियों के वास्तविक खूनी प्रकृति को समझें और वैश्विक शांति और इस्लाम की नेक नामी की हिफाज़त के लिए कुरान और सुन्नत के आधार पर एक आवाज़ होकर इस दृष्टिकोण की निंदा करें। और वहाबियों के उस वर्ग को जो हिंसक विचारधारा का समर्थन नहीं करता जिनके संस्थापक इब्ने अब्दुल वहाब और वैचारिक संरक्षक इब्ने तैमिया हैं।  उन्हें इस समूह से पूरी तरह से अलग हो जाना चाहिए। अगर आप वहाबी सिर्फ इसलिए कहलाते हैं क्योंकि आप सूफियों के मज़ारात पर हाज़िरी देने और सूफी बुजुर्गों का एहतेराम करने से नफ़रत करते हैं,  न कि इसलिए क्योंकि आप असहिष्णुता और इस दृष्टिकोण के उग्रवाद के कायल और क़द्रदान हैं,  तो आपको समझना चाहिए कि मज़ारात पर हाज़िरी से परहेज़ करने के लिए आपको वहाबी होने की ज़रूरत नहीं। ऐसे बहुत से दूसरे समुदाय के मुसलमान हैं जो मज़ारात की ज़ियारत नहीं करते,  फिर भी वो वहाबी नहीं हैं। आपको मोहिद होने के लिए वहाबी या सल्फ़ी होने की ज़रूरत नहीं........... सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम

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 जैसा कि हम पहले बयान कर चुके हैं कि कुफ़्फ़ार के बुज़ुर्गों, औरतों और बच्चों को निशाना बनाना जायज़ नहीं सिवाए बिलमिस्ल (बराबर) सज़ा देने के लिए। रहा लड़ाई न करने वालों को बिना कारण के क़त्ल करने का मसला तो ये इस शर्त के साथ जायज़ है कि वो उन लड़ाई न न करने वालों के साथ ऐसी जगहों और मज़बूत किलों में निशाना बनें कि जिनकी वजह से लड़ाई करने वाले और लड़ाई न करने वालों में तमीज़ न की जा सके तो इस स्थिति में लड़ाई न करने वालों का क़त्ल करना जायज़ है। उसकी दलील और हदीस है जो सहीहीन में अलसअब बिन जसामा रज़ियल्लाहू अन्हू से मरवी है। उन्होंने कहा कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से मुशरिकीन की औलादों के बारे में पूछा गया कि जब मुजाहिदीन रात के वक़्त मुशरिकीन पर हमला करते हैं और उनकी औरतें और बच्चे भी निशाना बन जाते हैं, तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया, वो उन्हीं में से है।''  लड़ाई करने वाले कुफ़्फ़ार के साथ औरतों और बच्चों के क़त्ल के कारण ये दलील तभी लागू होगी जब कि लड़ाई करने वाले और लड़ाई न करने वालों में तमीज़ करना सम्भव न हो। मुस्लिम की एक रवायत में है कि, वो अपने बापों में से हैं।'' ज़्यादातर उलेमा की राय है कि कुफ़्फ़ार की औरतों और बच्चों को जानबूझ कर क़त्ल नहीं किया जाएगा। लेकिन अगर उनके बापों के क़त्ल के दौरान तमीज़ मुमकिन न हो तो फिर औरतों और बच्चों का क़त्ल जायज़ है।

इमाम इब्ने हजर असक़लानी रहिमतुल्लाह अलैहि ने फेतब अलबारी, जिल्द 6 पेज 146 में कहा है कि

'' आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का फरमान कि, वो उन्हीं में से हैं ''  यानी इस स्थिति में शरई हुक्म के अनुसार जान बूझ कर उन्हें क़त्ल की इजाज़त मतलब नहीं,  मतलब ये है कि अगर बड़ों तक बच्चों को रौंदे बिना पहुंचना सम्भव नहीं हो और वो (बच्चे) इन (बड़ों) के साथ घालमेल के कारण निशाना बन जाएं तो, इस स्थिति में उनका क़त्ल जायज़ है।''

इमाम नोवो रहिमतुल्लाह अलैहि सही मुस्लिम की अपनी शरह की जिल्द 7 पेज 325 में कहते हैं कि,

'कुफ़्फ़ार पर रात के वक़्त हमले करने और रात के वक़्त औरतों और बच्चों के क़त्ल के औचित्य जो हदीस हमने ज़िक्र की है यही हमारा और मालिक रहिमतुल्लाह अलैहि व  अबु हनीफा रहिमतुल्लाह अलैहि और ज़्यादातर का मज़हब है। अलबयात' और 'यबतियून' का मतलब है कि उन पर रात के वक़्त हमला किया जाये और इस तरह आदमी को औरत और बच्चों से अलग न किया जा सके। इस हदीस में रात में मारने की दलील और ऐसे लोगों को सूचना दिए बिना उन पर हमला करने का औचित्य है, जिन्हें दावत (इस्लाम) पहुंच चुकी हो।''

इब्ने असीर 'जामेउल उसूल' जिल्द 2, पेज 733 में कहते हैं कि,

'युबीतून' का मतलब है कि रात के समय दुश्मन की लापरवाही से फायदा उठाते हुए उस पर हमला करना और माले गनीमत लूटना। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का फरमान है कि, वो उन्हीं में से हैं''  यानी इन (बच्चों और औरतों का शरई हुक्म और उनके घर वालों का शरई हुक्म एक है। इसी तरह का अर्थ एक रवायत में है जिसमें आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का फरमान है कि, वो तो अपने बापों में से हैं।

अल्लामा इब्ने क़दामा रज़ियल्लाहू अन्हू ने अलमुगनी वलशरह जिल्द 10 पेज 153 में कहा कि

'औरतों और बच्चों का रात के हमले में और उनकी रिहाइश में उस सूरत में क़त्ल करना जायज़ है कि जब सिर्फ उन्हें ही क़त्ल करना उद्देश्य न हो। कुफ़्फ़ार के क़त्ल और उनकी हार के लिए उनके जानवरों को क़त्ल करना जायज़ है और इसमें कोई मतभेद नहीं।

अलमुगनी में उन्होंने ने फरमाया:

'खड़ी फसल पर रात के वक़्त हमला करना और उन्हें इस हमले में क़त्ल करना जायज़ है। इमाम अहमद बिन हम्बल रहिमतुल्लाह ने फरमाया कि रात के वक़्त हमले करने में कोई हर्ज नहीं है और रोमियों पर हमले तो सिर्फ रात के वक़्त ही होते थे। इमाम अहमद ने ये भी फरमाया कि हमें नहीं मालूम कि किसी ने दुश्मन पर रात के वक्त हमला करने को मकरूह समझा हो। उन्हें सुफियान ने ज़ोहरा से बयान किया, उन्होंने अब्दुल्ला बिन अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हुमा से,  उन्होंने अलसएब बिन जबासा रज़ियल्लाहू अन्हू से उन्होंने कहा कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से (ऐसे वक़्त) सुना कि (जब) ​​आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से मुशरिकों के घरों के बारे में सवाल किया गया कि हम रात के वक़्त उन पर जब हमला करते हैं तो हम उनकी औरतों और उनके बच्चों को निशाना बनाते हैं, तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि, वो तो उन्हीं में से हैं।''  (इमाम अहमद ने) कहा कि इसकी सनद जैद है।

सो अगर कहा जाए कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने तो औरतों और बच्चों के क़त्ल से मना फरमाया। इससे ये साबित होता है कि कोई व्यक्ति अगर (औरतों बच्चों) को जानबूझ कर क़त्ल करने का इरादा करे तो ये जायज़ नहीं। ये भी फरमाया किः अलसएब की हदीस: आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की औरतों को क़त्ल करने से मना करने के बाद की है।

इसलिए कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने औरतों को क़त्ल करने से उस वक़्त मना किया था कि जब आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इब्ने अबी अलहक़ीक़ की तरफ (संदेश) भेजा था और उन दोनों हदीसों में अनुकूल ये बात बनती है कि नहीं (मना करना) को इरादे से क़त्ल पर महमूल किया जाये जबकि (क़त्ल के) औचित्य को इस (इसके इरादे के बिना) अलावा पर महमूल किया। यहां ये मालूम ही है कि निस्संदेह जब नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से अचानक और रात के वक़्त हमले की हालत में बच्चों के क़त्ल के बारे में पूछा गया, तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ज़रूरत के आकार का विवरण नहीं पूछा कि जिसने मुजाहिदीन को रात में क़त्ल करने पर मजबूर किया ताकि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम (उसी जरूरत की बुनियाद पर) मुजाहिदीन के लिए कुफ़्फ़ार के मासूम लोगों यानी औरतों और बच्चों को जायज़ करार दें। जबकि शरई क़ायदा कहता है कि:

'ऐहतेमाल के मक़ाम पर तफ्सील तलब न करना, क़ौल को उमूमियत का दर्जा दे देता है।'

इसलिए नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का उमूमियत (शाधारणीकरण) वाला फरमान कि, वह उन्हीं में से हैं''  इस्लामी लश्कर के लिए जायज़ क़रार देता है कि जब वो देखें कि अचानक हमला करने की आवश्यकता है तो उनके लिए ऐसा करना जायज़ है। चाहे इसके नतीजे में औरतों, बच्चों और बूढ़े वगैरह मारे जाएँ और चाहे अचानक हमला करने की कोई खास ज़रूरत न भी हो। क्योंकि जिस कारण के लिए रात के समय हमले की स्थिति में औरतों और बच्चों का क़त्ल करना जायज़ हुआ, वो है दुश्मन की ताक़त को कमज़ोर करने और उसकी प्रतिरोधक प्रणाली पर चोट पहुँचाने की ज़रूरत, जो दरअसल उसके मर्दों को क़त्ल और उसके किलों को गिराने से हासिल होती है .... चाहे इस दौरान न लड़ने वाले लोग ही मारे जायें।

इसलिए औरतों और बच्चों के क़त्ल के औचित्य, दुश्मन की रक्षा को कमजोर करना ही है। जैसा कि औरतों और बच्चों के क़त्ल के औचित्य के सभी कारण स्पष्ट है। इसलिए दुश्मन की ताक़त के सामरिक केन्द्रों को निशाना बनाने के कारण औरतों और बच्चों का कत्ल होना,  दरअसल अचानक हमले 'अलगारह के बराबर है। क्योंकि वो कारण जिसकी वजह से अचानक हमले (अलगारह) में कुफ़्फ़ार औरतों और बच्चों का क़त्ल जायज हुआ, आज वही कारण दुश्मन के सामरिक केन्द्रों की एक बड़ी शक्ल के रूप में मौजूद है जिसकी मसलहेत सिर्फ जंग करने वालों के क़त्ल से बढ़ जाती है। इसलिए ग्यारह सितंबर के मुबारक दिन जो सामिरक केंद्र पर हमले हुए, ये अमेरिका के लिए उसके बीस हजार जंग लड़ने वालों के क़त्ल से अधिक सख्त और भारी थे। इसलिए जो जंग लड़ने वाले से अलग न होने के कारण मासूम लोगों के क़त्ल की इजाज़त दी, तो वो इन हमलों के नतीजे में क़त्ल होने वाले के क़त्ल को भी जायज़ करार देगा क्योंकि ये भी सामरिक केन्द्रों में नहीं पहचाने गए जो जंग लड़ने वालों की तुलना में ज़्यादा अहम थे। ये शरई सिद्धांत के अनुरूप होने के कारण ज़्यादा मुनासिब है।

(जारी)

स्रोत: नवाये अफगान जिहाद (नवंबर, 2012)

URL for English article: https://newageislam.com/radical-islamism-jihad/taliban-fatwa-terrorism-that-needs/d/9429

UR for Urdu article: https://newageislam.com/urdu-section/taliban-fatwa-terrorism-/d/9454

URL for this article: https://newageislam.com/hindi-section/taliban-fatwa-terrorism-/d/9507

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