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Hindi Section ( 3 Aug 2011, NewAgeIslam.Com)

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Are women inferior to men according to the Quran and Hadith? क्या क़ुरान और हदीस के मुताबिक़ महिलाएं पुरुषों से कमतर हैं

 

डाक्टर कौसर फ़ातिमा

3 अगस्त, 2011

मैं जब आलिम फाज़िल(मदरसा शिक्षा बोर्ड की डिग्रियां) की छात्रा थी तो मुझे अपने खुदा से बड़ी शिकायत थी। मेरी समझ में ये बात नहीं आती थी कि उसने हम औरतों को नाक़िसुल अक़्ल वद्दीन (दीन की निगाह में कमअक्ल) क्यों पैदा किया। हम पर व क़र्ना फी बयूतुकुन्ना के हवाले से हमेशा घरों में रहने की पाबंदी क्यों लगा दी? मुझे इस बात की भी शिकायत थी कि मर्दों को हमारे ऊपर क़व्वाम अर्थात हुक्मरान या इंचार्ज क्यों बनाया गया? अल-रेजालू अलैहिन्ना दरजः कह कर दुनिया के हर मर्द को चाहे वो नैतिक रूप से कितना ही भ्रष्ट क्यों न हो, हम औरतों पर उसे प्राथमिकता क्यों दी गयी? विरासत में हमारा हिस्सा मर्दों से कम और मर्दों की अपेक्षा हमारी गवाही को आधा क्यों रखा गया है? जब मैं मौलवी बन कर निकली तो मेरे पास एक किताब कुरआन रिजाली तफ़व्वुक थी। (नऊज़ो बिल्लाह- शैतान से पनाह) इस किताब को पुरुषों के वर्चस्व का संविधान कहा जाता है। ये किताब बताती है कि धरती को पुरुषों के लिए बनाया गया है और हम महिलाओं का रोल यहाँ पर अत्यल्प है। लेतसकुनु एलैहा की कल्पना भी हम महिलाओं को पुरुषों की सर्विस इण्डस्ट्री का हिस्सा बताती। मैं शायद क़ुरान को ज़िंदगी भर पुरुष प्रधान समाज का संविधान मानती अगर मेरी शिक्षा यहीं रुक गयी होती।

अलीगढ़ में अपनी पीएचडी के दौरान जब मैंने मुस्लिम महिलाओं को अपने शोध का विषय बनाया तो मुझे महिलाओं के सम्बंध में कुरान की हर आयत और परम्परा के शोध का अवसर प्राप्त हुआ। मुझे ये जान कर आश्चर्य हुआ कि जिस परम्परागत चिंतन ने औरत को नाक़िसुल अक़्ल वद्दीन (दीन की निगाह में कम अक्ल) बताया है उसी को कुरान ने आसिया अलैहिस्सलाम और मरियम अलैहिस्सलाम के रूप में प्रत्येक आस्तिक पुरुष और महिलाओं के लिए रोल माडल करार दिया है। यदि महिलाओं को वास्तविक रूप में प्रकृति ने नाक़िसुल अक़्ल वद्दीन बनाया है, तो फिर महिलाओं के साथ ही साथ पुरुषों को इनके अनुकरण करने की बात करने का क्या अर्थ है? इस प्रश्न को और आगे बढ़ाइये, अगर अल-रेजालू अलैहिन्ना दरजः एक सामान्य बयान है, जैसा कि आम तौर पर समझा जाता है, तो मैं धर्म की व्याख्या करने वालों से ये पूछना चाहती हूँ कि आज दुनिया का सबसे परहेज़गार व्यक्ति भी हज़रत आयशा

(रज़ियल्लाहू तआला अन्हू) और हज़रत उम्मे सलमा (रज़ियल्लाहू तआला अन्हू) से एक दर्जा आगे होने का दावा कर सकता है। क्या हमारे उलेमा वास्तव में समझते हैं कि महिला होने की हैसियत से हज़रत आयशा रज़ियल्लाहू तआला अन्हू नाक़िसुल अक़्ल वद्दीन हैं। जब आप(पैग़म्बर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) हुदैबिया में हज़रत उम्मे सलमा (रज़ियल्लाहू तआला अन्हू) से परामर्श स्वीकार कर रहे थे, तो क्या इस बात को जानबूझ कर अनदेखा कर रहे थे कि वो महिला होने के नाते नाक़िसुल अक़्ल थीं? मुझे इस बात पर सुखद आश्चर्य हुआ कि कुरान को रजाली तफ़व्वुक की किताब समझने में मेरे हृदय में जो शंकाएं पैदा हुईं थीं, मैं वो पहली महिला नहीं थी, मुझ से बहुत पहले कुछ इसी प्रकार की आपत्तियां हज़रत उम्मे सलमा रज़ियल्लाहू तआला अन्हू ने किये थे। हज़रत उम्मे सलमा (रज़ियल्लाहू तआला अन्हू) ने एक दिन पैग़म्बर मोहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) ये सवाल किया कि ऐ अल्लाह के रसूल क्या अल्लाह सिर्फ़ पुरुषों को ही सम्बोधित करता है? कुरआन के टीकाकार कहते हैं कि इस प्रश्न के बाद कुरआन मजीद की ये आयत अवतरित हुई, इन्नल मुसलमीना वलमुसलेमाते वलमोमेनीना वलमामेनाते वलक़ानेतीना वलकानेताते (सूरेः अहज़ाबः35)। तब मुझे मालूम हुआ कि क़ुरान पर, बल्कि कह लीजिए कि इस्लाम पर हम औरतों का भी उतना ही हक़(अधिकार) है जितना कि पुरुषों का। जब मैं इस आयत पर पहुँची कि लिर्रेजाले नसीबुम मिम्मा कसबू वलिन्निसाए नसीबुम मिम्मा कसब्ना (सूरेःनेसाः32), तो मेरी शंकाएं जाती रहीं। अल्लाह से मेरी शिकायत खत्म हो गयी, कि अब कुरान मुझे रिजाली तफ़व्वुक की किताब नहीं, बल्कि मानव की बराबरी और सोचने समझने का संविधान मालूम होने लगी। मुझे ये बात समझ में आ गयी कि जिस किताब के कारण महिलाओं को उनका व्यक्तित्व वापस मिला, उसे सम्पत्ति के बजाए इंसान समझा गया। इसी किताब की रिजाली व्याख्या ने आगे चल कर महिलाओं से उनके इस्लामी अधिकार बल्कि आधारभूत मानवाधिकार छीन लेने की कोशिश की। पुरुषों ने ये काम गलत व्याख्या के माध्यम से करने की कोशिश की। कभी घोड़ा,घर और औरत को एक ही पंक्ति में खड़ा कर दिया, कभी उन्हें नाक़िसुल अक़्ल वद्दीन बताया, और ये भी न सोचा कि इस परम्परा की चपेट में आसिया (अलैहिस्सलाम), मरियम (अलैहिस्सलाम), खदीजा (रज़ियल्लाहू तआला अन्हू), आयशा (रज़ियल्लाहू तआला अन्हू) और उम्मे सलमा (रज़ियल्लाहू तआला अन्हू) ही नहीं आती हैं, बल्कि इस्लाम का संदेश भी इसकी चपेट में आ जाता है। हाफ़िज़ ज़हबी ने मीज़ानुल ऐतेदाल में लिखा है कि हदीस के झूठे रावियों में  अनगिनत पुरुषों का नाम दिखाई देता है लेकिन एक भी औरत झूठी रवायत के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराई जा सकती। बेचारी औरतें गशियते इलाही के कारण ऐसा कर भी नहीं सकती, इसलिए वो पीछे रह गयीं। परिणाम ये हुआ कि शरीअत ने जो कुछ महिलाओं को दिया था पुरुषों ने अपनी मनमानी व्याख्या के द्वारा उसे बड़ा होशियारी से छीन लिया। इसका परिणाम ये है कि आज हमारी आधी आबादी कार्यात्मक रूप से या तो व्यर्थ है या फिर पुरुषों के अधीन हैं।

हिंदुस्तान में जहां मुसलमानों को बहुलतावादी समाज में रहना है, यहां महिलाओं की अधिकारहीनता और भी घातक साबित हुई है। हिंदुस्तानी मुस्लिम महिलाओं के लिए तथाकथित उलेमा के आदेश भ्रम में लगातार वृध्दी का कारण बनते रहे हैं। अभी कुछ दिनों पहले आपने ये फतवा सुना होगा कि महिलाओं का घरों से बाहर काम करना जायज़ ही नही बल्कि हराम भी है। हमारे टीकाकार न जाने क्यों पूरी आयत पढ़ने और और उसको उसके असल संदर्भ में समझने को तैयार नहीं हैं। व क़र्ना फी बयूतुकुन्ना का आदेश पैग़म्बर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम के परिवार की महिलाओं से सम्बंधित हैं, जिसका कारण ये बताया गया कि वहां ईश्वर का संदेश आता है और तत्कालीन पैगम्बर ज्ञान और हिकमत की शिक्षा देते हैं। आज भी अगर कहीं कोई ऐसा घर हो जहां ईश्वर का संदेश प्राप्त होता हो और पैग़म्बर मोहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) का साथ भी मौजूद हो तो, मैं कहती हूँ कि महिलाओं ही क्या पुरुषों को भी ऐसे घरों में जम कर बैठ जाना चाहिए, कि भला इससे सुनहरा मौका क्या होगा, लेकिन जिन घरों में महिलाओं को ज्ञान और शिक्षा से दूर और केवल रसोईघर तक ही सीमित रखा जाता हो तो और जहां खाली वक्त में सास बहू के सीरियल देखने के अलावा और कोई रूचि न हो तो ऐसे घरों में जमे रहने में मुझे कोई तक़वा नज़र नही आता। सच पूछिए तो हम शैक्षिक और चिंतन के मतभेद का शिकार हैं। एक तरफ तो हम व क़र्ना फी बयूतुकुन्ना के सहारे से महिलाओं को समाजी परिदृश्य से बाहर कर देना चाहते हैं, लेकिन दूसरी ओर धार्मिक पुरुषों की ये भी इच्छा होती है कि उनकी पत्नी और बहू बेटियों का इलाज महिला डाक्टर करे। अब अगर कोई पूछे कि आपके बताये पर सभी मुस्लिम महिलाओं ने यदि पालन किया होता तो मुस्लिम महिला डाक्टर, टीचर और लेखिका कहाँ से आतीं? और आज जो मैं जो इस काबिल हुई कि मुस्लिम बेटियों के मुकदमे को सामने रख सकूँ , ये कैसे सम्भव होता?

ईश्वर ने हिजाब का आदेश दिया हमनें बुरका बना डाला, वो भी ऐसा कि जिसके पीछे मुस्लिम महिलाओं का चेहरा और उनका व्यक्तित्व और पहचान छिप कर रह गई। हम सिध्दान्तः चेहरे और हथेलियों को सतर मानने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन समाजी दबाव का असर इतना ज़्यादा है कि हमारी धार्मिक बहनें या तो समाज के डर से या फिर अपने पति के डर से अपना चेहरा खुला रखने के शरई अधिकार से वंचित हैं। हालांकि उन्हें मालूम है कि हज जैसी इबादत में जहां लाखों का मजमा होता है, चेहरे का खुला रखना ज़रूरी होता है। जब तक औरतों को चेहरा खुला रहा तब तक वो इस पोज़ीशन में थीं कि वो हज़रत उमर (रज़ियाल्लाहू तआला अन्हा) जैसे रोबदार ख़लीफ़ा को मिम्बर पर भी टोक दें, और रावी ने ये लिखा कि जिस औरत ने हज़रत उमर (रज़ियाल्लाहू तआला अन्हा) का मिम्बर पर अपमान किया,  वो एक चपटी नाक वाली औरत थी। सकीना बिन्ते हुसैन के सौन्दर्य के बारे में कौन नहीं जानता है, लेकिन तब किसी की हिम्मत नहीं हुई कि कोई उन पर ग़त ग़त की आवाज़ लगाता, जैसा कि आज सऊदी अरब में एक शरीफ महिला के खुले चेहरे को देख कर अम्र बिल मारूफ वाले करते हैं। अगर समाजी परिदृश्य में महिलाओं की गतिविधियां आम न होतीं तो व्यापार में महिलाओं की भागीदारी और राजनीति में उन से परामर्श, जैसा कि हज़रत उमर (रज़ियाल्लाहू तआला अन्हा) ने किया था, और युध्दों में उनकी सहभागिता सम्भव न होती। महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करके हम अपने शानदार इतिहास से ही इंकार करेंगें।

इमाम ग़ज़ाली ने अहया-उल-उलूम में लिखा है कि जो शख़्स औरत के परामर्श पर चलेगा वो नर्क में डाला जायेगा। हज़रत उमर (रज़ियाल्लाहू तआला अन्हा) के हवाले से एक रवायत लिखी कि औरतों से परामर्श ज़रूर करो लेकिन उसका उल्टा करो कि ऐसा करने में बरकत है। काश कि उन्हें मालूम होता कि उम्मे सलमा (रज़ियल्लाहू तआला अन्हू) के परामर्श पर पैग़म्बर मोहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम) ने उस वक्त अमल किया जब बड़े बड़े परामर्शदाताओं के परामर्श काम नहीं कर रहे थे। मलकए सबा के परामर्श पर चल कर पूरी कौम आमन्तो बेरब्बे सुलेमान पुकार उठी, लेकिल महिलाओं से फिर भी ये अपेक्षा की जाती है कि वो संवेदनशील मामलों से दूर रहें। परम्परागत दीनदारी तो सिर्फ इस औरत को एक रोल माडल के रूप में पेश करती है। जैसा कि मौलाना अशरफ अली थानवी ने लिखा है, लखनऊ की एक महिला, जिनके पति प्रायः कोठे पर मुजरे सुनते और अधिकांश समय वहीं गुज़ारते थे, इस पर विरोध करने के बजाय इतनी आज्ञाकारी थीं कि उन्हें वहीं कोठे पर खाना बना बना कर पहुँचा दिया करती थीं और मौलाना अशरफ अली थानवी के अनुसार सारे लोगों में इस भली महिला की आज्ञाकारी होने की चर्चा थी। जब तक हमारे बीच ऐसी भली महिलाओं की नस्ल बाकी रहेगी, पुरुषों के सुधार की कोई भी तरकीब सफल नहीं होगी। हमें चुपके से उनके कानों में बताना होगा कि कुरान में फस्सालेहातो क़ानेतातो से तात्पर्य ईश्वर के आदेशों के पालन से है, पतियों की बिना शर्त आदेश पालन से नहीं है।

मेरे विचार से मुस्लिम महिलाओं को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए मुस्लिम पुरुषों की ट्रेनिंग का काम खुद अपने हाथों में लेना होगा। पुरुषों के उपदेश और निर्देश बहुत सुन लिया गया। चेहरे को ढाकने के भी निर्देश बहुत हो गये अब ग़ज़्ज़ो बस्र से काम लेने की ज़रूरत है। पूरे मुस्लिम समाज को एक इकाई के रूप में एकजुट करने के लिए आवश्यक है कि केवल मुस्लिम महिलाओं का ही नहीं बल्कि मुस्लिम पुरुषों का भी ईश्वर से तकवा वाला सम्बंध स्थापित किया जाय और तभी उस समाज का निर्माण हो सकेगा जब हम पूर्ण विश्वास के साथ कह सकेंगें कि वलमोमेनूना वलमोमेनाते बादोहुम औलियाओ बाद (ईश्वर में विश्वास करनेवाले सभी पुरष और स्त्रियां एक दूसरे के समर्थक,मित्र और रक्षक है)।

(उर्दू से हिंदी अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

स्रोत- रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा

URL: https://newageislam.com/hindi-section/are-women-inferior-men-according/d/5171


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