मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी
उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम
(भाग एक)
2 सितंबर 2022
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: ताकतवर मोमिन कमज़ोर मोमिन से बेहतर है, (सहीह मुस्लिम, हदीस नंबर:2646) आम तौर पर हमारे समाज में जब ताकत का ज़िक्र किया जाता है तो लोग इससे जिस्मानी ताकत मुराद लेते हैं; लेकिन अगर गौर किया जाए तो इसका मफहूम अपने अंदर बड़ी वुसअत और व्यापकता रखता है। ताकत एक वस्फ़ है और इंसान की विभिन्न सलाहियतें इस वस्फ़ की हामिल हो सकती हैं, जैसे ताकत अख़लाक़ व किरदार की भी होती है और कुछ दफा अख़लाक़ व किरदार की ताकत से वह काम लिया जाता है जो हाथ पाँव की ताकत से नहीं लिया जा सकता।
जिस्मानी ताकत से तो ज़र व ज़मीन को फतह किया जा सकता है; लेकिन अख़लाक़ की ताकत से इंसान के दिल जीते जाते हैं। इसी तरह ताकत दौलत व सरवत की भी होती है। एक शारीरिक एतेबार से कमज़ोर शख्स भी माल व दौलत के जरिये बड़े बड़े मार्कों को जीत सकता है। इसी तरह एक बहुत बड़ी ताकत वह है जो राजनीति के माध्यम से हासिल होती है, राजनीतिक शक्ति के माध्यम से व्यक्ति और कौमें देश व कौम की तकदीर की मालिक हो जाती हैं। ताकत इल्म, तकनीक और भाषा और कलम की भी होती है, एक इल्म वाला व्यक्ति हालांकि वह देखने में कमज़ोर हो; लेकिन वह अच्छे खासे डील डौल वाले इंसान पर भी ताफव्वुक हासिल कर लेता है, यही सबसे बड़ी ताकत है, एक इल्म वाला व्यक्ति एक हज़ार अशिक्षित लोगों पर भारी होता है, एक ऐसी कौम जो इल्म व फन से बहरावर हो हालांकि वह संख्या के एतेबार से छोटी हो; लेकिन वह ऐसी कौमों पर भारी हो जाती है, जो संख्या की कसरत के एतेबार से रेगिस्तान के कणों से भी बढ़ी हुई हो मगर इल्म से तही दस्त और फ़िक्र व नज़र के सरमाए से तही दामन हो।
दुनिया में इसकी बहुत से मिसालें हैं, जिनको सर आँखों से देखा जा सकता है और जिनके कारनामे इतिहास के पन्नों पर अपनी महानता के चिन्ह छोड़े हुए हैं। मुख्तसर यह कि ताकत की कई किस्में होती हैं बल्कि यहाँ जिन्हें दर्ज किया गया है उसके अलावा भी ताकत के प्रकार हैं। अभी कल की बात है कि हम ब्रिटिश के गुलाम थे, जो अंग्रेज़ ब्रिटिश से भारत आए, भारत के मूल निवासियों के मुकाबले में उनकी संख्या इतनी कम थी कि शायद आटे में नमक का अनुपात भी उससे अधिक होता है; लेकिन यह वह दौर था जब पूरब से पश्चिम तक ब्रिटेन के सत्ता का सूरज चमक रहा था। कहा जाता है कि अंग्रेजों की साम्राज्य में सूरज के डूबने की नौबत नहीं आती थी, अगर पश्चिम में अमेरिका और कैनेडा तक ब्रिटेन ने राज किया है तो सुदूर पूर्व के देश भी उसकी गुलामी के नीचे जीवन व्यतीत करते रहे हैं; हालांकि ब्रिटेन के निवासी ने केवल संख्या के एतेबार से बहुत कम थे; बल्कि असल ब्रिटिश साम्राज्य का क्षेत्रफल भी इतना सीमित था कि भारत का छोटे से छोटा राज्य भी अपने क्षेत्रफल में उससे बढ़ा हुआ होगा, मुझे ब्रिटेन जाने का मौक़ा मिला तो मालुम हुआ कि ब्रिटेन के एक तरफ से दुसरे तरफ का फासला केवल छः सौ मील या उससे कुछ अधिक है।
इसके बावजूद अगर ब्रिटेन ने इतनी ताकत हासिल कर ली थी कि उसकी सरकार पश्चिम से पूरब तक फैली हुई थी तो सोचने का मकाम है कि यह किस ताकत का असर था? यह जिस्मानी ताकत का नतीजा नहीं था, यह इल्म और तकनीक की ताकत थी। दुनिया के नक़्शे पर और भी देश हैं जिनका हजम या रकबा बहले ही कम हो मगर उनकी राजनीतिक, आर्थिक और वैज्ञानिक ताकत खुद को मनवाए बिना नहीं रहती। एक मिसाल जापान भी है। देख लीजिये कि एक छोटा सा और कुछ जज़ीरों पर आधारित देश है; लेकिन उसकी तकनीक की ताकत का करिश्मा है कि पुरी दुनिया उसके सामने सर झुकाती है, अगर एक ही चीज जापान की बनाई हुई हो और किसी दुसरे देश की भी, तो खरीदार विवरण मालुम किये बिना झिझक ख्याल करता है कि जापान की बनाई हुई चीज मंहगी तो हो सकती है; लेकिन मेयार के एतेबार से वही फेक होगी, यह इल्म और तकनीक की शक्ति का असर है।
अगर इस पृष्ठभूमि में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशाद को समझा जाए तो मोमिन के ताकतवर होने का महुम बहुत व्यापक हो जाता है और इस व्यापकता में यह बात शामिल है कि जो मोमिन इल्म की ताकत से आरास्ता हो, और शिक्षित हो, वह उस मुसलमान से बेहतर है जो अज्ञानता से संतुष्ट है और जो ज्ञान के प्रकाश से वंचित है। शायद इसका जिक्र करते हुए, अल्लाह के रसूलसल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा कि अल्लाह एक मोमिन से प्यार करता है जो कला और तकनीक से परिचित है: अल्लाहु युहिब्बूल मोमिनुल मुतहर्रिफ (अल मोजमुल वस्त, हदीस नंबर 8934)। इसका कारण यह है कि जिस कौम के पास ज्ञान और कला है, जिस कौम के पास उद्योग और प्रौद्योगिकी का धन है, जिस कौम के पास विचार और कला की पूंजी है, वह दूसरों को देने की क्षमता रखता है। उसके पास लेने वाला हाथ नहीं है; बल्कि, एक देने वाला हाथ है, दुनिया को इसकी जरूरत है, और अपनी क्षमता के माध्यम से सरबुलंदी व सरफ़राज़ी हासिल करती है। इसका एक उदाहरण भी देखें: यहूदियों की संख्या कितनी कम है? अमेरिका जैसे देश में इनकी संख्या पांच फीसदी से भी कम है। लेकिन मास मीडिया जैसा एक प्रभावी संसाधन पूरी तरह से उनके हाथ में है, बैंकिंग प्रणाली 100% उनके हाथों में है, इसलिए किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की मजाल नहीं कि वह खुल कर यहूदियों की आलोचना करे और जिन लोगों ने दबे शब्दों में आलोचना की उनको नाकों चने चबवा दिए गए।
यह सब है शिक्षा का करिश्मा; इसलिए हम देखते हैं कि दुनिया के सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय सम्मान, नोबेल पुरस्कार पाने वालों में अधिकांश यहूदी हैं। एक और उदाहरण हमारे देश का ही है जहाँ आप ब्राह्मणों को देख सकते हैं। उनकी संख्या तीन से चार प्रतिशत से अधिक नहीं है; लेकिन व्यावहारिक रूप से पूरे देश की शक्ति उनके हाथ में है, वे राजनीतिक चुनावों की जीत और हार का फैसला करते हैं और देश की आंतरिक और विदेश नीति तैयार करते हैं। यह कैसे हो सकता है? वास्तव में यह उनके अकादमिक प्रयासों और इस क्षेत्र में अथक प्रयासों का परिणाम है। इसका प्रभाव यह है कि देश के प्रमुख पदों में साठ प्रतिशत से अधिक ब्राह्मणों या भारत की उच्च जातियों के लोग हैं। हम इन तथ्यों से परिचित होने के बावजूद कुछ भी सीखना नहीं चाहते हैं। यदि कोई पूछे कि ऐसी परिस्थितियों में हमें क्या करना चाहिए, तो इसका उत्तर बहुत ही सरल और आसान है कि हम ज्ञान के रत्नों से सुशोभित और उद्योग और प्रौद्योगिकी की क्षमता से समृद्ध कौम बनें; ताकि हमारा हाथ ऊंचा रहे, हम देश को कुछ देने के काबिल बनें। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: एक ऊँचा हाथ एक नीचे हाथ से बेहतर है इस हदीस का मफहूम यह है कि जो व्यक्ति देने वाला हाथ रखता है वह उस व्यक्ति से बेहतर है जिसके पास केवल लेने वाला हाथ हो, एक कौम जो लोगों को देने की क्षमता रखती है, उससे बेहतर है जिस कौम के हाथ में मांगने का कटोरा हो, और वह अन्य देशों से पैसा, सम्मान, नौकरी, आर्थिक मदद और राजनीतिक पदों के लिए भीख मांगती रही। अल्लाह तआला ने एक मौके पर फरमायाः ऐ पैग़म्बर! आप कह दीजिये कि जिनके पास ज्ञान है और जो ज्ञान से वंचित हैं, क्या वे दोनों समान हो सकते हैं? केवल बुद्धिमान लोग ही नसीहत पाते हैं: قُلْ ھَلْ یَسْتَوِیْ الَّذِیْنَ یَعْلَمُوْنَ وَالَّذِیْنَ لَا یَعْلَمُوْنَ اِنَّمَا یَتَذَکَّرُ اُوْلُوْا الْاَ لْبَابِ" (अल ज़ुमर: 9) यह आयत हालांकि एक विशेष पृष्ठभूमि में नाज़िल हुई है लेकिन इसमें दो बातों का एक स्पष्ट संकेत है, एक ज्ञानी और अज्ञानी, शिक्षित और अज्ञानी, समान नहीं हैं। यह उन लोगों का काम है जिनके पास ज्ञान और समझ है और जिन्होंने अकादमिक प्रयासों के माध्यम से अपनी समझ और अंतर्दृष्टि को बढ़ाया है।
यह याद रखना चाहिए कि ज्ञान वालों और ज्ञान से वंचित लोगों के
बीच असमानता न केवल आखिरत में दिखाई देगी;
बल्कि इसके उदाहरण दुनिया में
दिन-रात हमारे सामने आते रहते हैं, हर क्षेत्र में शिक्षित और अशिक्षित लोगों में अंतर होता है, एक शिक्षित कौम को ज्ञान के साथ
राजनीतिक व्यवस्था में हिस्सा मिल सकता है। अशिक्षित कौम कभी वह असर व रसूख प्राप्त
नहीं कर सकती, जो गिरोह ज्ञान से लैस हो वह समूह युद्ध के क्षेत्र में ज्ञान से वंचित कौम को
हरा सकता है, यह अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भी सम्मान और गौरव प्राप्त करता है, और जो कौमें इल्म से वंचित होती
हैं अपमान, गरीबी, रुसवाई और पिछडापन उनका मुकद्दर
बन जाता है। जो समूह शिक्षित और इल्म वाला होता है, वह हुकूमत के मुख्य और उच्च पदों पर होता है,
उसकी हर बात कान लगा लगा कर सुनी
जाती है, और जो गिरोह अज्ञानता
के दलदल में फंसा हुआ हो वह चीख चीख कर अपनी मज़लूमियत का रोना रोए और हज़ार तावीलें
पेश करे, तब भी न किसी की आँख
नं होती है और न किसी की आवाज़ उसके हक़ में बुलंद हो पाती है। यह तमाम बातें समझने की
हैं मगर अफ़सोस कि हम समझ कर भी नहीं समझते या समझने के बावजूद अमल के मर्तबे पर फायज
होने की कोशिश नहीं करते। उपर ज़िक्र किये गए पसे मंजर में यह कहा जाए तो बेजा नहीं
होगा कि अज्ञानता में फंसे हुए लोग न केवल दीन के एतेबार से अहले इल्म की बराबरी हासिल
नहीं कर पाते; बल्कि वह हर मैदान में उनसे पीछे रहते हैं, बिलवास्ता तौर पर उनकी महकूमी में आजाते हैं और उनके
शोषण या ज़ुल्म व सितम का निशाना बनते हैं। ऐसी सूरत में उनकी ज़िल्लत व ख्वारी की दास्तान
तवील तर होती जाती है और वह गम की तस्वीर बने दिखाई देते हैं। (जारी)
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