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Hindi Section ( 25 Dec 2015, NewAgeIslam.Com)

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What Is Halal (Permissible) And What Is Haram (Forbidden) In The Quran? क़ुरान मजीद के नज़रिए से हलाल क्या है और हराम क्या है?

 

 

 

नसीर अहमद, न्यु एज इस्लाम

9 अगस्त 2015

कुरान ने इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि जब कोई आदमी अल्लाह की हलाल की हुई चीज़ों को हराम करता है और हराम की हुई चीज़ों को हलाल करता है तो वह पाप करता है। उदाहरण के लिए:

५७:२७......रहा संन्यास, तो उसे उन्होंने स्वयं घड़ा था। हमने उसे उनके लिए अनिवार्य नहीं किया था, यदि अनिवार्य किया था तो केवल अल्लाह की प्रसन्नता की चाहत। फिर वे उसका निर्वाह न कर सकें, जैसा कि उनका निर्वाह करना चाहिए था।.....

: ९३ ....खाने की सारी चीज़े इसराईल की संतान के लिए हलाल थी, सिवाय उन चीज़ों के जिन्हें तौरात के उतरने से पहले इसराईल ने स्वयं अपने हराम कर लिया था। कहो, "यदि तुम सच्चे हो तो तौरात लाओ और उसे पढ़ो।" .....

क्या अम्बिया उन चीज़ों को हराम क़रार दे सकते है जिन्हें क़ुरान ने हराम नहीं कहा है?

निम्नलिखित आयात पर विचार करें:

७:१५७ "(तो आज इस दयालुता के अधिकारी वे लोग है) जो उस रसूल, उम्मी नबी का अनुसरण करते है, जिसे वे अपने यहाँ तौरात और इंजील में लिखा पाते है। और जो उन्हें भलाई का हुक्म देता और बुराई से रोकता है। उनके लिए अच्छी-स्वच्छ चीज़ों का हलाल और बुरी-अस्वच्छ चीज़ों का हराम ठहराता है और उनपर से उनके वह बोझ उतारता है, जो अब तक उनपर लदे हुए थे और उन बन्धनों को खोलता है, जिनमें वे जकड़े हुए थे। अतः जो लोग उसपर ईमान लाए, उसका सम्मान किया और उसकी सहायता की और उस प्रकाश के अनुगत हुए, जो उसके साथ अवतरित हुआ है, वही सफलता प्राप्त करनेवाले है।"

१५८: कहो, "ऐ लोगो! मैं तुम सबकी ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ, जो आकाशों और धरती के राज्य का स्वामी है उसके सिवा कोई पूज्य नहीं, वही जीवन प्रदान करता और वही मृत्यु देता है। अतः जीवन प्रदान करता और वही मृत्यु देता है। अतः अल्लाह और उसके रसूल, उस उम्मी नबी, पर ईमान लाओ जो स्वयं अल्लाह पर और उसके शब्दों (वाणी) पर ईमान रखता है और उनका अनुसरण करो, ताकि तुम मार्ग पा लो।"

९:२९: "वे किताबवाले जो न अल्लाह पर ईमान रखते है और न अन्तिम दिन पर और न अल्लाह और उसके रसूल के हराम ठहराए हुए को हराम ठहराते है और न सत्यधर्म का अनुपालन करते है, उनसे लड़ो, यहाँ तक कि वे सत्ता से विलग होकर और छोटे (अधीनस्थ) बनकर जिज़्या देने लगे"

क्या उपरोक्त आयात से यह बात साबित होती है कि नबी के पास वह एख्तेयार होता है कि वे उन चीजों को मना करे जिसे कुरान ने मना नहीं किया है? उपरोक्त आयतों में जिस संदर्भ में अहल ए किताब का उल्लेख है, उस से केवल यह साबित होता है कि नबी उन्हीं चीजों से मना करता है जिन्हें अल्लाह ने अपनी वही के ज़रिए हराम किया है और जो कुरान में वर्णित हैं। इसके अलावा, खुदा ने नबी को खुद उन चीजों को हराम करने से मना किया है जिन्हें अल्लाह ने हराम नहीं किया है, जैसा कि निम्नलिखित आयत से स्पष्ट है.

६६:१ ऐ नबी! जिस चीज़ को अल्लाह ने तुम्हारे लिए वैध ठहराया है उसे तुम अपनी पत्नियों की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए क्यो अवैध करते हो? अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है.

इसलिए, नबी उन बातों से दूसरों को कैसे मना कर सकते हैं जिन्हें अल्लाह ने हराम नहीं किया है? इसलिए, नबी ने केवल उन्हें बातें से दूसरों को मना किया है जिन्हें अल्लाह ने हराम किया है, उन्ही बातों का हुक्म दिया है जिन बातों का हुक्म अल्लाह ने दिया है। कुरान मजीद में हराम की हुई चीज़ों के अलावा उनके लिए कुछ भी हराम नहीं है। इसलिए, हराम की हुई चीज़ों की जानकारी के लिए हदीसों का सहारा न लें।

खुदा ने किन बातों का हुक्म दिया है और किन बातों को हराम किया है?

६:१५० कह दो, "अपने उन गवाहों को लाओ, जो इसकी गवाही दें कि अल्लाह ने इसे हराम किया है।" फिर यदि वे गवाही दें तो तुम उनके साथ गवाही न देना, औऱ उन लोगों की इच्छाओं का अनुसरण न करना जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और जो आख़िरत को नहीं मानते और (जिनका) हाल यह है कि वे दूसरो को अपने रब के समकक्ष ठहराते है।

१५१: कह दो, "आओ, मैं तुम्हें सुनाऊँ कि तुम्हारे रब ने तुम्हारे ऊपर क्या पाबन्दियाँ लगाई है: यह कि किसी चीज़ को उसका साझीदार न ठहराओ और माँ-बाप के साथ सद्व्य वहार करो और निर्धनता के कारण अपनी सन्तान की हत्या न करो; हम तुम्हें भी रोज़ी देते है और उन्हें भी। और अश्लील बातों के निकट न जाओ, चाहे वे खुली हुई हों या छिपी हुई हो। और किसी जीव की, जिसे अल्लाह ने आदरणीय ठहराया है, हत्या न करो। यह और बात है कि हक़ के लिए ऐसा करना पड़े। ये बाते है, जिनकी ताकीद उसने तुम्हें की है, शायद कि तुम बुद्धि से काम लो।

१५२: "और अनाथ के धन को हाथ न लगाओ, किन्तु ऐसे तरीक़े से जो उत्तम हो, यहाँ तक कि वह अपनी युवावस्था को पहुँच जाए। और इनसाफ़ के साथ पूरा-पूरा नापो और तौलो। हम किसी व्यक्ति पर उसी काम की ज़िम्मेदारी का बोझ डालते हैं जो उसकी सामर्थ्य में हो। और जब बात कहो, तो न्याय की कहो, चाहे मामला अपने नातेदार ही का क्यों न हो, और अल्लाह की प्रतिज्ञा को पूरा करो। ये बातें हैं, जिनकी उसने तुम्हें ताकीद की है। आशा है तुम ध्यान रखोगे।

१५३: और यह कि यही मेरा सीधा मार्ग है, तो तुम इसी पर चलो और दूसरे मार्गों पर न चलो कि वे तुम्हें उसके मार्ग से हटाकर इधर-उधर कर देंगे। यह वह बात है जिसकी उसने तुम्हें ताकीद की है, ताकि तुम (पथभ्रष्टता से) बचो

२: १७३: उसने तो तुमपर केवल मुर्दार और ख़ून और सूअर का माँस और जिस पर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और का नाम लिया गया हो, हराम ठहराया है। इसपर भी जो बहुत मजबूर और विवश हो जाए, वह अवज्ञा करनेवाला न हो और न सीमा से आगे बढ़नेवाला हो तो उसपर कोई गुनाह नहीं। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है ।

२: २७५: और लोग ब्याज खाते है, वे बस इस प्रकार उठते है जिस प्रकार वह क्यक्ति उठता है जिसे शैतान ने छूकर बावला कर दिया हो और यह इसलिए कि उनका कहना है, "व्यापार भी तो ब्याज के सदृश है," जबकि अल्लाह ने व्यापार को वैध और ब्याज को अवैध ठहराया है। अतः जिसको उसके रब की ओर से नसीहत पहुँची और वह बाज़ आ गया, तो जो कुछ पहले ले चुका वह उसी का रहा और मामला उसका अल्लाह के हवाले है। और जिसने फिर यही कर्म किया तो ऐसे ही लोग आग (जहन्नम) में पड़नेवाले है। उसमें वे सदैव रहेंगे।

४: १९: ऐ ईमान लानेवालो! तुम्हारे लिए वैध नहीं कि स्त्रियों के माल के ज़बरदस्ती वारिस बन बैठो, और न यह वैध है कि उन्हें इसलिए रोको और तंग करो कि जो कुछ तुमने उन्हें दिया है, उसमें से कुछ ले उड़ो। परन्तु यदि वे खुले रूप में अशिष्ट कर्म कर बैठे तो दूसरी बात है। और उनके साथ भले तरीक़े से रहो-सहो। फिर यदि वे तुम्हें पसन्द न हों, तो सम्भव है कि एक चीज़ तुम्हें पसन्द न हो और अल्लाह उसमें बहुत कुछ भलाई रख दे।

५: ३: तुम्हारे लिए हराम हुआ मुर्दार रक्त, सूअर का मांस और वह जानवर जिसपर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और का नाम लिया गया हो और वह जो घुटकर या चोट खाकर या ऊँचाई से गिरकर या सींग लगने से मरा हो या जिसे किसी हिंसक पशु ने फाड़ खाया हो - सिवाय उसके जिसे तुमने ज़बह कर लिया हो - और वह किसी थान पर ज़बह कियी गया हो। और यह भी (तुम्हारे लिए हराम हैं) कि तीरो के द्वारा किस्मत मालूम करो। यह आज्ञा का उल्लंघन है - आज इनकार करनेवाले तुम्हारे धर्म की ओर से निराश हो चुके हैं तो तुम उनसे न डरो, बल्कि मुझसे डरो। आज मैंने तुम्हारे धर्म को पूर्ण कर दिया और तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दी और मैंने तुम्हारे धर्म के रूप में इस्लाम को पसन्द किया - तो जो कोई भूख से विवश हो जाए, परन्तु गुनाह की ओर उसका झुकाव न हो, तो निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।

५: ६३: उनके सन्त और धर्मज्ञाता उन्हें गुनाह की बात बकने और हराम खाने से क्यों नहीं रोकते? निश्चय ही बहुत बुरा है जो काम वे कर रहे है।

५:७९: जो बुरा काम वे करते थे, उससे वे एक-दूसरे को रोकते न थे। निश्चय ही बहुत ही बुरा था, जो वे कर रहे थे।

७: ३३: कह दो, "मेरे रब ने केवल अश्लील कर्मों को हराम किया है - जो उनमें से प्रकट हो उन्हें भी और जो छिपे हो उन्हें भी - और हक़ मारना, नाहक़ ज़्यादती और इस बात को कि तुम अल्लाह का साझीदार ठहराओ, जिसके लिए उसने कोई प्रमाण नहीं उतारा और इस बात को भी कि तुम अल्लाह पर थोपकर ऐसी बात कहो जिसका तुम्हें ज्ञान न हो।"

९: ७१: रहे मोमिन मर्द औऱ मोमिन औरतें, वे सब परस्पर एक-दूसरे के मित्र है। भलाई का हुक्म देते है और बुराई से रोकते है। नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते है और अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करते हैं। ये वे लोग है, जिनकर शीघ्र ही अल्लाह दया करेगा। निस्सन्देह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।

१६: ९०: निश्चय ही अल्लाह न्याय का और भलाई का और नातेदारों को (उनके हक़) देने का आदेश देता है और अश्लीलता, बुराई और सरकशी से रोकता है। वह तुम्हें नसीहत करता है, ताकि तुम ध्यान दो।

१६:११५: उसने तो तुमपर केवल मुर्दार, रक्त, सुअर का मांस और जिसपर अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो, हराम ठहराया है। फिर यदि कोई इस प्रकार विवश हो जाए कि न तो उसकी ललक हो और न वह हद से आगे बढ़नेवाला हो तो निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।

२२: ४१: ये वे लोग है कि यदि धरती में हम उन्हें सत्ता प्रदान करें तो वे नमाज़ का आयोजन करेंगे और ज़कात देंगे और भलाई का आदेश करेंगे और बुराई से रोकेंगे। और सब मामलों का अन्तिम परिणाम अल्लाह ही के हाथ में है

२४: ३: व्यभिचारी किसी व्यभिचारिणी या बहुदेववादी स्त्री से ही निकाह करता है। और (इसी प्रकार) व्यभिचारिणी, किसी व्यभिचारी या बहुदेववादी से ही निकाह करते है। और यह मोमिनों पर हराम है।

३१: १७: "ऐ मेरे बेटे! नमाज़ का आयोजन कर और भलाई का हुक्म दे और बुराई से रोक और जो मुसीबत भी तुझपर पड़े उसपर धैर्य से काम ले। निस्संदेह ये उन कामों में से है जो अनिवार्य और ढृढसंकल्प के काम है"।

४०: ६६: कह दो, "मुझे इससे रोक दिया गया है कि मैं उनकी बन्दगी करूँ जिन्हें अल्लाह से हटकर पुकारते हो, जबकि मेरे पास मेरे रब की ओर से खुले प्रमाण आ चुके है। मुझे तो हुक्म हुआ है कि मैं सारे संसार के रब के आगे नतमस्तक हो जाऊँ।"

६०: ८: अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है।

(९) अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की। जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम है।

वह कौन सी गलत बातें हैं जिनसे लोगो एक दूसरे को मना कर सकते हैं ?

(३:१०४) और तुम्हें एक ऐसे समुदाय का रूप धारण कर लेना चाहिए जो नेकी की ओर बुलाए और भलाई का आदेश दे और बुराई से रोके। यही सफलता प्राप्त करनेवाले लोग है

सत्य या अक़्लमांदी के खिलाफ विद्रोह करना, अन्याय, अभद्रता, विद्रोह, सूदखोरी, हराम चीज़ों को खाना या पीना, अन्य धर्मों के उन लोगों के साथ कठोरता और अनुचित तरीके से पेश आना जो अपने धर्म के लिए तुम से युद्ध नहीं है, अवैध हत्या, अपने अधीन रहने वाले अनाथों का माल खाना, कीययी को अल्लाह का साझी ठहराना, जुआ, अतिशयोक्ति और अपव्यय जैसी बातें हैं जिनसे लोग एक दूसरे तो माना कर सकते हैं।

लोग किन नेक बातों का आदेश एक दूसरे को दे सकते हैं?

लोग एक दूसरे को माता पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने, अनाथ, रिश्तेदारों और कमजोर पर ध्यान देने, न्याय के साथ मापने और तौलने, लगातार ज़कात और सदकात अदा करने, धैर्य, संयम बरतने, क्षमा करने, नियमित प्रार्थना करने, खुदा का हुक्म मानने और वादों का वाफा करने का आदेश दे सकते हैं।

कुरान में विशेष रूप से जिन बातों का उल्लेख है उनके अलावा कही गयी बातों को अनदेखा किया जा सकता है या अपने स्मझ के अनुसार अमल किया जा सकता है. लेकिन वह बातें उसके ऊपर अनिवार्य नहीं है। किसी भी मामले में सीमा पार न किया जाए, जैसा कि निम्नलिखित आयत में चेतावनी दी गई है।

(१६:११६) और अपनी ज़बानों के बयान किए हुए झूठ के आधार पर यह न कहा करो, "यह हलाल है और यह हराम है," ताकि इस तरह अल्लाह पर झूठ आरोपित करो। जो लोग अल्लाह से सम्बद्ध करके झूठ घड़ते है, वे कदापि सफल होनेवाले नहीं

इसके अलावा इन चीजों के बारे में जिसे हराम करार दिया गया है, और जो बात स्पष्ट कर दिया गया है, अत्यधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है. जैसा कि कुरान मजीद का हुक्म है:

(४:३१) यदि तुम उन बड़े गुनाहों से बचते रहो, जिनसे तुम्हे रोका जा रहा है, तो हम तुम्हारी बुराइयों को तुमसे दूर कर देंगे और तुम्हें प्रतिष्ठित स्थान में प्रवेश कराएँगे।

खुदा का शुक्र अदा करते हुए जीवन के सभी खुशी का आनंद लें

इस दुनिया की सारी अच्छी चीज़ें हमारे लिये हैं। खुशी मनाना और आनंद लेना मना नहीं है, लेकिन अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए जीवन के सभी खुशीयों का आनंद लें जैसा कि अल्लाह का फरमान है।

(७:३१) ऐ आदम की सन्तान! इबादत के प्रत्येक अवसर पर शोभा धारण करो; खाओ और पियो, परन्तु हद से आगे न बढ़ो। निश्चय ही, वह हद से आगे बदनेवालों को पसन्द नहीं करता।

(३२) कहो, "अल्लाह की उस शोभा को जिसे उसने अपने बन्दों के लिए उत्पन्न किया है औऱ आजीविका की पवित्र, अच्छी चीज़ो को किसने हराम कर दिया?" कह दो, "यह सांसारिक जीवन में भी ईमानवालों के लिए हैं; क़ियामत के दिन तो ये केवल उन्हीं के लिए होंगी। इसी प्रकार हम आयतों को उन लोगों के लिए सविस्तार बयान करते है, जो जानना चाहे।"

मामूली बातों पर नहीं बल्कि महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान केंद्रित किया जाए.

उन नेक बातों पर अपना ध्यान केंद्रित करें जिनका आदेश अल्लाह ने हमें दिया है और उन बातों से परहेज करें जिनसे अल्लाह ने स्पष्ट रूप से हमें रोका है। केवल विशिष्ट प्रतिबंधित चीजों के लिए नहीं बल्कि अन्य सभी चीजों के लिए अपनी बुद्धि और विवेक का उपयोग करें और उन चीजों से बचें जो हमें हमारी जिम्मेदारी, अच्छाई और ईमानदारी से दूर ले जाती हैं। यदि हम एक बार अपने ऊपर फ़र्ज़ की गई नेकियों को प्राथमिकता दे दें तो हम स्वतः ही उन चीजों से बच जाएंगे जो हमें उनसे दूर करती हैं। ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान दे कर मामूली गलतियों से बचने से कहीं ज्यादा बेहतर और महत्वपूर्ण है, हमारा नेक और अच्छे कामों में व्यस्त होना। गैर ज़रूरी तब्लीगी सभाओं पर पसीना बहाने के बजाय सच्चाई, न्याय, अच्छे पड़ोसी के अधिकार, दया, क्षमा और धन्यवाद पर अधिक ध्यान दिया जाए तो बेहतर है। हम ज़हरी देखावे से आदमी को धोखा दे सकते हैं अल्लाह को नहीं।

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