
सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम
बहुत से मुसलमान, जो अब भी वहाबी कहलाना पसंद नहीं करते हैं इसके बावजूद सल्फ़ी रवैय्या अख्तियार कर लिया है। मिसाल के तौर पर आप पाकिस्तान में और अब हिन्दुस्तान में भी बहुत से मुसलमानों को अरबी अंदाज़ के लिबास पहने देख सकते हैं। दाढ़ी और हिजाब न सिर्फ पूर्व में बल्कि पश्चिमी देशों में आम हो गया है। औरतें जिनकी दादी ने कभी पर्दा, बुर्का या हिजाब नहीं पहना था, गुलामी की इस निशानी को हर जगह पहन रही हैं। कुछ उदारवादी, स्वतंत्र विचार वाले मुसलमान हर प्रकार के मीडिया से आने वाले सल्फ़ी प्रोपगंडा से खुद इतना प्रभावित हैं कि वह अपने मन में खुद को मुनाफिक मानना शुरू कर चुके हैं। कुछ इस्लाम छोड़ रहे हैं और खुद को पूर्व मुसलमान कहला रहे हैं। इस प्रतिक्रिया से कोई मदद मिलने वाली नहीं है।
मुख्य-धारा के उदारवादी, स्वतंत्र विचार वाले मुसलमानों को अपने धर्म का अध्ययन करना होगा। वो इस कदर मानवता, चेतना और आध्यात्मिकता इसमें पाएंगे कि उनके संदेह और अविश्वास खत्म हो जाएंगे; उग्रवादी वहाबी प्रोपगंडा के ज़रिए उन पर किए गए सभी जादू का असर खत्म हो जाएगा। और फिर उन्हें मिसाली बन जाना चाहिए। जो भी थोड़ा सा संसाधन है, उसे इस लहर को रोकने के लिए खर्च किया जाना चाहिए। आखीर में इस्लाम ने हमेशा इस ग्रुप को शिकस्त दी है। और ये ऐसा दोबारा करेगा। लेकिन हमें इसके बारे में कुछ करना पड़ेगा। नज़रिये का मुकाबला एक नज़रिये से ही किया जा सकता है, एक बेहतर नज़रिये के साथ न कि हथियारों के साथ। हमें हमारे अपने नज़रिये और इस्लाम की हमारी अपनी तफहीम को फरोग़ देने पर काम करना होगा। जैसा कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने एक बार कहा है: "अच्छा होना काफी नहीं है"। सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम, 14 मार्च 2012 को जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र में इंटरनेशनल ह्युमनिस्ट एण्ड इथीकल यूनियन, नेशनल सेकुलर सोसाइटी और न्यु एज इस्लाम फ़ाउण्डेशन के ज़रिये आयोजित और प्रायोजित किए गए सम्मेलन को संबोधित करते हुए।
कांफ्रेंस में अन्य वक्ताओं में थेः राहील रजा, कनाडा के मुस्लिम कार्यकर्ता, जिन्होंने 'पश्चिम में मज़हबी अदालतों में इजाफा’ पर संबोधित किया। कीथ वूड, नेशनल सेकुलर सोसाइटी के युनाईटेड किंगडम एक्ज़िक्युटिव डायरेक्टर ने चर्च का असर, यूरोप में सिद्धांत कानून और सिविल कानून, पर संबोधित किया। और लियो इगवे, आई.एच.ई.यू. के नाइजीरिया अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधि ने अफ्रीका में रिलिजन, विच-हण्ट, होमो-फ़ोबिया एण्ड ह्युमन राइट्स पर संबोधित किया। अध्यक्ष राय डब्ल्यु ब्राउन थे, जो आई.एच.ई.यू., संयुक्त राष्ट्र, जेनेवा के पूर्व अध्यक्ष और अब विशेष प्रतिनिधि हैं।
भाषण का पूरा भाग
इस्लामी कट्टरपंथ को विभिन्न तरीकों से परिभाषित किया गया हैः उग्रवाद, आतंकवाद के पर्यायवाची शब्द या वहाबियत, सल्फ़ियत, देवबंदियत, कुतबियत या मौदूदियत के नज़रियों के तौर पर। लेकिन मैं इस्लामी कट्टरपंथ को तानाशाह, इस्लामी सर्वश्रेष्ठता के एक आंदोलन के रूप में व्याख्या करूंगा जिनका मानना है कि स्वर्ग, सच्चाई और इंसाफ पर उनका एकाधिकार है। यह आंदोलन मुख्य-धारा के विश्व समुदाय से मुसलमानों को अलगाव की ओर ले जा रहा है- यहाँ तक कि गैर मुस्लिम बहुल देशों में अपने बहु संस्कृति, बहु धार्मिक समाज से अलग कर रहा है।
उग्रवाद और आतंकवाद इस तरह के रवय्यों का नतीजा है और ये विशेष रूप से इस्लामी राज्य की स्थापना के उद्देश्य की दिशा में नहीं हो सकता है। जाहिरी तौर पर शांतिपूर्ण तरीके से केवल धर्मनिरपेक्ष समाज के बीच तथाकथित "शरीयत कंट्रोल ज़ोन "स्थापित करने के लिए किया जा सकता है।
लेकिन कट्टरपंथ कई स्थानों में हिंसा में बदल रहा है क्योंकि सच्चाई पर एकाधिकार रखने के विचार में हिंसा शामिल है। लेकिन हिंसा और विशेष रूप से लगातार जारी रहने वाली हिंसा कई कारकों पर निर्भर है जिनमें बुनियादी मदद, राज्य का रवैय्या आदि शामिल है। इसलिए मेरे अनुसार विश्व दृश्य जिसने अब तक हिंसा की राह नहीं दिखाई है, उसे किसी तरह से कम कट्टरपंथ समझने की ज़रूरत नहीं है। यदि और कुछ नहीं, कट्टरपंथी रवैया जो दूसरों को हिंसा के लिए उत्तेजित कर सकता है उन्हें खुद ही व्यक्तिगत रूप से विचार करना चाहिए।
इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस्लामी कट्टरपंथ पूरी दुनिया में मुख्य धारा में शामिल हो रहा है और पूर्व में भी इसी तरह हो रहा है। दक्षिण एशिया में अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र इस्लामी चरमपंथियों की हिंसा और आतंकवाद के लिए जाना जाता है। लेकिन दक्षिण पूर्वी एशिया भी इससे बहुत पीछे नहीं है। आखिरकार, सिविल सोसाइटी पर 9/11 के बाद दूसरा सबसे हिंसक हमला इंडोनेशिया के बाली शहर के एक नाइट क्लब में हुआ जिसमें 202 लोगों की जानें गईं थी और मरने वालों में अधिकतर ऑस्ट्रेलिया के नागरिक थे। हाल के कुछ दशकों में दक्षिण और दक्षिण पूर्वी एशिया दोनों ने सांप्रदायिक और धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर किए गए आतंकवादी हमलों का लगातार सामना किया है। इन लोगों ने सूफी संतों के मज़ारात पर हमले किए हैं जिनका आबादी का बहुसंख्यक हिस्सा सम्मान करता है। लेकिन पाकिस्तान में इस्लामी आतंकवादी राज्य से भी मुक़ाबिल हैं जिन्होंने वास्तव में उन्हें बनाया और उनकी मदद की है और राज्य के कई विभाग आज भी उनकी मदद करना जारी रखे हुए हैं। एक मरहले पर पाकिस्तान के इस्लामी अतिवादियों ने स्वात घाटी पर कब्जा कर लिया था जो की राजधानी इस्लामाबाद से बहुत करीब है। ये लोग रावलपिंडी में पाकिस्तान सेना के सैनिक मुख्यालय और महरान एयर बेस जैसे संवेदनशील निशाने पर हमला कर चुके हैं। बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तानी आतंकवादियों के लिए इस्लामाबाद और उसके परमाणु प्रतिष्ठानों पर कब्जा को सपने की बात के तौर पर इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।
पाकिस्तान में कई धार्मिक और जातीय सेनाएं हैं और इसमें कुछ को कट्टर इस्लामी राजनीतिक दल चलाते हैं, ये न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि पड़ोसी देश भारत और बड़े पैमाने पर पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर खतरा है। यह सभी किसी न किसी स्तर पर दुनिया भर के जिहादियों और अल-कायदा के साथ एकजुट हैं।
मेरे मुताबिक पूर्व के देशों में सबसे परेशान करने वाली बात जो हो रही है वो मुस्लिम समाज का कट्टरपंथी बनना है। ये सिर्फ मदरसा से पढ़े लिखों को ही कट्टरपंथी नहीं बना रहे हैं बल्कि ऐसे मुसलमान जो आम, सरकारी या निजी संस्थानों से पढ़ कर निकले हैं उन्हें भी सामाजिक दबाव के तहत समान रूप से कट्टरपंथी बनाया जा रहा है। इस्लाम का शुष्क और बद सूरत रूप जो धर्म की चेतना, मानवता और आध्यात्मिकता से खाली है इसके विकास के लिए अरबों पेट्रो-डॉलर खर्च किया जा रहा है और एक ऐसा माहौल पैदा किया जा रहा है जो संवेदनशील मन को प्रभावित कर रहा है। पिछले साल जब पाकिस्तानी पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर अपने बॉडी गार्ड द्वारा मारे गए तो एक ऐसा मुल्ला तलाशना मुश्किल था जो नमाज़ जनाज़ा पढ़ाने के लिए तैयार हो। हत्यारे को जब अदालत में ले जाया गया तो सैकड़ों वकीलों ने उस पर गुलाब की पनखड़ियों की बारिश की और उसे अपना हीरो कहा। वो जज जिसने उसे मौत की सज़ा सुनाई उसे निर्वासित जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाना पड़ा।
पंजाब के शहीद नेता ने सिर्फ ये किया था कि उन्होंने एक बदकिस्मत ईसाई औरत के लिए राष्ट्रपति से दया की अपील की थी जो संभावित रूप से नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का अपमान नहीं कर सकती थी। किसी ने भी ये सवाल किया नहीं किया कि कैसे एक ईसाई पर रसूल का अपमान करने का आरोप लगाया जा सकता है और तौहीने रिसालत कानून के तहत मुकदमा चलाया गया जबकि वो न तो इस्लाम और न ही मुहम्मद (स.अ.व.) के पैग़म्बर होने पर ईमान रखती थी।
सलमान तासीर की हत्या के बाद पाकिस्तान के संघीय मंत्रिमंडल में एकमात्र ईसाई शहबाज़ भट्टी की भी हत्या कर दी गई। उन्होंने भी सज़ा पाई ईसाई महिला आसिया बीबी के साथ सहानुभूति जताई थी और उसके मामले की वकालत की थी। आसिया बीबी के मामले ने यह तथ्य स्पष्ट कर दिया कि सिर्फ ईसाई और हिंदू ही अपने विश्वास के कारण सजा नहीं पाते हैं बल्कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों जैसे शिया, अहमदी और इस्माइली हैं जिनका सामान्य रूप से इनका उत्पीड़न और इनके साथ भेदभाव किया जाता है और हत्या की जाती हैं। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने हाल ही में एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जो बताती है कि अन्य बातों के साथ पाकिस्तान में कम से कम 20 से 25 लड़कियां हर महीने अपहरण होती हैं और उन्हें उनकी मर्ज़ी के खिलाफ इस्लाम स्वीकार करवाया जाता है।
पाकिस्तान एक ऐसा देश है जो 1947 में इस कट्टरपंथी विचार से अस्तित्व में आया कि मुसलमानों का अन्य धार्मिक वर्गों के साथ सह-अस्तित्व नहीं हो सकता है। उसके बाद अमेरिका की मदद से उसने जान बूझ कर जिहादियों का एक समूह बनाया जिसने अफगानिस्तान में उस समय सोवियत संघ से लड़ाई लड़ी। लाखों मदरसों की स्थापना की गई और कई लाख छात्रों के विचारों को ज़बरदस्ती हिंसक जेहादी विचारधारा में बदला गया। इन मदरसों को आज भी आर्थिक सहायता और उन्हें चलाना जारी रखा गया है और न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि दक्षिण एशिया के देशों के गरीब छात्रों की आवश्यकताओं को पूरा किया जा रहा है। पाकिस्तान में कट्टर इस्लामी राजनीतिक दल हैं जिनकी अपनी सेना है और जो मदरसों से प्रशिक्षित छात्रों को अपनी सेना में भर्ती कर रहे हैं।
इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ कोई भी पाकिस्तानी समाज के कट्टरपंथ को समझ सकता है। लेकिन भारतीय मुस्लिम समाज में भी इसी तरह का व्यवहार क्या ज़ाहिर करता है? अगर कोई भारतीय मुस्लिम प्रेस को पढ़ता है तो उसे मालूम होगा कि सलमान तासीर की हत्या पर यहाँ भी प्रतिक्रिया बिल्कुल पाकिस्तान के ही जैसी थी। जानकारी के लिए मैं बताना चाहूंगा कि भारतीय उपमहाद्वीप में दो इस्लामी विचारधाराएं हैं जिनकी नुमाइंदगी बरेलवी और देवबन्दी करते हैं। देवबन्दी वहाबी हैं और सभी पाकिस्तानी मदरसों जो सशस्त्र जिहाद सिखाते हैं, देवबन्दी पाठ्यक्रम को मानते हैं। बरेलवी दक्षिण एशिया के मुसलमानों की बहुसंख्यक आबादी हैं। वो सूफी संतों से शफाअत तलब करने में विश्वास रखते हैं, जैसे भारतीय हिंदू, सिख और अन्य दूसरे करते हैं। ये लोग मज़ारों पर साथ जाते हैं और ये स्वाभाविक रूप से एक अर्द्ध धार्मिक माहौल में हिस्सेदारी का एहसास पैदा करता है और राष्ट्रीय एकता में मदद करता है। सल्फ़ी, वहाबी और अन्य चरमपंथी वर्ग मुसलमानों के अन्य वर्गों के साथ संपर्क को पसंद नहीं करते हैं और धार्मिक प्रकार के मंच पर तो बहुत ही कम करते हैं।
जैसा कि पाकिस्तान में पहले ही हो चुका है देवबन्दी, वहाबी, सल्फ़ी इमामों को अब भारतीय बरेलवी मस्जिदों पर थोपा जा रहा है। इससे कभी कभी हिंसा भी पैदा हो जाती है। वहाबी तो इतने आक्रामक हो गए हैं कि उन्होंने एक गांव की मस्जिद में बिना दाढ़ी के नमाज़ अदा करने के कारण उन लोगों की पिटाई की और उनके घरों पर पथराव करने की जुर्रत की। तीन साल पहले की ये घटना रमज़ान महीने के दौरान सहारनपुर जिले की एक मस्जिद में हुआ था। बिना दाढ़ी वाले एक शख्स की सात साल की बेटी इस पथराव में गंभीर रूप से घायल हो गई थी और जिसकी बाद में मौत हो गयी थी।
इस तरह की घटनाएं और पाकिस्तान में जो कुछ हो रहा था उसको नज़र में रख कर भयभीत, भारत के 80 सबसे महत्वपूर्ण दरगाहों के प्रमुखों ने कुछ महीने पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक शहर में मुसलमानों की एक बड़ी रैली का संयुक्त रूप से आयोजन किया। इस रैली में पहली बार हिन्दुस्तान में एक सार्वजनिक सभा में "बढ़ते वहाबी उग्रवाद" के बारे में चर्चा की गयी, वास्तव में इस वाक्य का इस्तेमाल पहली बार किया गया। एक लाख से अधिक मुसलमान मुरादाबाद में जमा हुए और देश की सबसे बड़ी दरगाहों के कई उलमा से भारत में बढ़ते वहाबी उग्रवाद के बारे में चेतावनी को सुना। इसे मुस्लिम प्रेस में महत्वपूर्ण खबर होना चाहिए था लेकिन किसी भी अख़बार ने इस रैली की रिपोर्ट नहीं दी। तीन अखबारों ने रैली और वहाँ दिये गये भाषण की रिपोर्ट दी लेकिन वहाबी उग्रवाद का कोई ज़िक्र किए बगैर, पूरी तरह सेंसर करके खबर दी।
वहाबियत ने भारत जैसे बहु धार्मिक समाज में इस तरह का असर पैदा कर दिया है जिसे खतरे की घंटी माना जाना चाहिए। हाल ही में जमाते इस्लामी के कुछ गुंडों ने जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल (साहित्यिक मेले) में सलमान रशदी के वीडियो लिंक द्वारा इसमें शामिल होने तक को रोकने में कामयाब हो गए।
हाल ही की एक और घटना जिस पर ऊँची आवाज़ में खतरे की घंटी बजनी चाहिए थी वह 100 फीसद मुस्लिम देश मालदीव में निर्वाचित सरकार को बदलना है। पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में एक जानी पहचानी शख्सियत हैं। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में मानव अधिकारों के लिए संघर्ष किया है और एक बार फिर वैसा ही संघर्ष करने के लिए सड़कों पर हैं। हालांकि उन्होंने चुनाव में जीत हासिल की और सहयोगियों की मदद से गठबंधन सरकार बनाकर सत्ता में आए। सशस्त्र सेना, पुलिस और अफसरशाही में कट्टरपंथी वर्ग ने उनकी धर्मनिरपेक्ष राजनीति को स्वीकार नहीं किया। सबसे ज़्यादा हैरानी उनके सत्ता से बेदखल होने के तरीके पर है। इस्लामी गणतंत्र पाकिस्तान ने हाल ही में हुए सार्क शिखर सम्मेलन के अवसर पर मालदीव को उपहार दिया जिसमें पाकिस्तान के बौद्ध अतीत से इस्लामी बनने को बताने वाली तस्वीर शामिल थी। सल्फ़ी लोगों ने इस पर आपत्ति जताई और इस तोहफे के स्वीकार करने को मूर्ति पूजा के बराबर बताया। एक व्यक्ति ने उपहार को तोड़ डाला, लेकिन पाकिस्तान में सलमान तासीर के हत्यारे की तरह, कुछ दल जो गठबंधन सरकार का हिस्सा थे, उनके सहित सभी राजनीतिक वर्ग का उसे समर्थन मिला।
स्पष्ट रूप से कट्टरपंथी इस्लाम बढ़ रहा है ये जितना दक्षिण और दक्षिण पूर्वी एशिया में मुख्य धारा में शामिल हो रहा है उतना ही पूर्व के साथ ही मध्य एशिया या और कहीं शामिल हो रहा है। ये एक खतरनाक स्थिति है, और सबसे बड़ा खतरा इस तथ्य से है कि खामोश रहने वाली अधिकांश आबादी अब और भी बहुत खामोश है। यहां तक कि जहां ये हलचल पैदा करना शुरू कर रहा है, वहां उदारवादी इस्लाम के मानने वाले ये पा रहे हैं कि इस बढ़ती लहर से निपटने के लिए उनके पास आवश्यक संसाधन भी नहीं हैं।
हाल ही में भारतीय सूफी मज़ारों के प्रमुखों की कोशिश एक उदाहरण है। यहां तक कि जब उन्होंने खुद कार्रवाई करने की कोशिश की तो वो कोई असर पैदा नहीं कर सके और एक बार फिर मायूस हैं। इसे इस्लाम के अंदर ही एक जंग मानकर काफ़ी हद तक सरकारें हस्तक्षेप करने को तैयार नहीं लग रही हैं। हकीकत में ये इस्लाम के भीतर एक जंग है, ये मुसलमान ही हैं जो सल्फ़ी आतंकवादियों के प्रमुख निशाने हैं, उन्हीं लोगों को इसका विरोध करने की हिम्मत जुटानी होगी।
इस्लाम के पूरे इतिहास में ऐसे हिंसक चरमपंथियों ने शांति को नुक्सान पहुंचाया है। उन्हें कई बार खत्म किया गया है लेकिन एक बार फिर हारने के लिए वो खड़े हो गए हैं। इंसानी रूहानियत और शऊर (चेतना) पर इस्लाम के जोर देने की शिक्षा ने हमेशा उनके वैचारिक खालीपन से खुद को अफज़ल (श्रेष्ठ) साबित किया है।
लेकिन इस बार आतंकवादी, वहाबी पहले के मुकाबले में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में हैं। वो इसलिए क्योंकि एक खास अमीर अरब देश जो हमारे पवित्र स्थानों का संरक्षक होने का दावा करता है और जिसकी दुनिया की एक मात्र महाशक्ति सुरक्षा करती है, इस कट्टरपंथ के पीछे हैं। सऊदी अरब वहाबी सल्फ़ी कट्टरपंथ को अपने देश का नज़रिया मानता है। यहां तक कि आप उनके देश में कुरआन की एक ऐसी प्रति के साथ प्रवेश नहीं कर सकते हैं जो उनके देश से प्रकाशित नहीं हुई है। सऊदी अरब के लिए कट्टरपंथ को फैलाना एक साम्राज्यवादी मंसूबा है। इस्लाम के खुश्क तसव्वुर के साथ ही, वो अरब की संस्कृति, भाषा, लिबास, और वास्तुशिल्प को दूसरे देशों मे भेजने पर भी ज़ोर देते हैं।
सऊदी अरब ने लगभग 300 इस्लामी इतिहास से जुड़ी यादगारों को ध्वस्त कर दिया है। इनमें से कुछ ही बाकी हैं। इनकी विचारधारा का इतिहास के साथ संघर्ष है। ये लोग पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व.) और उनकी सीरत को एक विशेष समय और संदर्भ प्रदान करते हैं। अगर कुरान की लड़ाई को पसंद करने वाली आयतों को संदर्भ के साथ पढ़ा जाए तो ये उस समय और खास हालात के ही मुताबिक थी, जाहिर हो जाएगा जिस समय और हालात में ये नाज़िल हुई थीं; उन्हें हर हालात में लागू नहीं किया जा सकता है। ये काफिरों पर एक मुस्तक़िल जंग के ज़रूरी होने के लिए एक रुकावट है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को देखते हुए अधिकांश मक्का में नाज़िल हुई कुरान की शांति के लिए आयात हर समय के अनुसार रहेंगीं। युद्धों को रोका जाना आवश्यक होगा। अरब साम्राज्यवाद प्रगति करने के काबिल नहीं रह सकेगा। पाकिस्तान और अन्य स्थानों में भर्ती किए गए आत्मघाती बम्बारों की फौज को दूसरे कामों के लिए फिर प्रशिक्षण देना होगा। जन्नत में जाने के लिए मुसलमानों को नबी करीम (स.अ.व.) के ज़रिए बताए गए महान जिहाद, जिहाद बिल नफ्स यानी अपनी नफ्स के खिलाफ संघर्ष करना होगा।
तेल के बहुत अधिक दौलत की वजह से सऊदी अरब के साम्राज्यवादी मनसूबे को दुनिया की लगभग सभी सरकारों का समर्थन हासिल है जिनमें अमरीका जैसे देश भी शामिल हैं जो खुद कट्टरपंथ का शिकार रहा है। 9/11 के 19 में से 16 आत्मघाती हमलावर सऊदी अरब के नागरिक थे, जिनकी तरबियत इनके अतिवादी विचारधारा के स्कूलों में हुई थी। इनका सबसे बड़े साथी पाकिस्तान की फौज कोई गलती नहीं कर सकती है। उसे ओसामा बिन लादेन और मुल्ला उमर की मेजबानी करने भी इजाज़त दी गई थी। पाकिस्तान अमेरिका का महत्वपूर्ण गैर-नाटो सहयोगी बना रहा है। मुख्य धारा के इस्लाम (या जिसे मैं उम्मीद करता हूँ कि मुख्य धारा का इस्लाम है) की तरफ से कोई भी नहीं है। सभी सरकारें, मुस्लिम बहुसंख्यक वाली या गैर-मुस्लिम बहुल देशों का सऊदी अरब के साथ या तो उनका तेल खरीदने के लिए / या हथियार बेचने के लिए सम्बंध रखते हैं।
अर्द्ध शिक्षित मोबल्लगीन (प्रचारकों) से भरे सैकड़ों विमान जेद्दा से दुनिया के दूरदराज के इलाकों के मुसलमानों को सल्फ़ियत में शामिल करने के लिए लगभग रोजाना उड़ान करते हैं। बहुत से मुसलमान, जो अब भी वहाबी कहलाना पसंद नहीं करते हैं इसके बावजूद सल्फ़ी रवैय्या अख्तियार कर लिया है। मिसाल के तौर पर आप पाकिस्तान में और अब हिन्दुस्तान में भी बहुत से मुसलमानों को अरबी अंदाज़ के लिबास पहने देख सकते हैं। दाढ़ी और हिजाब न सिर्फ पूर्व में बल्कि पश्चिमी देशों में आम हो गया है। औरतें जिनकी दादी ने कभी पर्दा, बुर्का या हिजाब नहीं पहना था, गुलामी की इस निशानी को हर जगह पहन रही हैं। कुछ उदारवादी, स्वतंत्र विचार वाले मुसलमान हर प्रकार के मीडिया से आने वाले सल्फ़ी प्रोपगंडा से खुद इतना प्रभावित हैं कि वह अपने मन में खुद को मुनाफिक मानना शुरू कर चुके हैं। कुछ इस्लाम छोड़ रहे हैं और खुद को पूर्व मुसलमान कहला रहे हैं। इस प्रतिक्रिया से कोई मदद मिलने वाली नहीं है।
मुख्य-धारा के उदारवादी, स्वतंत्र विचार वाले मुसलमानों को अपने धर्म का अध्ययन करना होगा। वो इस कदर मानवता, चेतना और आध्यात्मिकता इसमें पाएंगे कि उनके संदेह और अविश्वास खत्म हो जाएंगे; उग्रवादी वहाबी प्रोपगंडा के ज़रिए उन पर किए गए सभी जादू का असर खत्म हो जाएगा। और फिर उन्हें मिसाली बन जाना चाहिए। जो भी थोड़ा सा संसाधन है, उसे इस लहर को रोकने के लिए खर्च किया जाना चाहिए। आखीर में इस्लाम ने हमेशा इस ग्रुप को शिकस्त दी है। और ये ऐसा दोबारा करेगा। लेकिन हमें इसके बारे में कुछ करना पड़ेगा। नज़रिये का मुकाबला एक नज़रिये से ही किया जा सकता है, एक बेहतर नज़रिये के साथ न कि हथियारों के साथ। हमें हमारे अपने नज़रिये और इस्लाम की हमारी अपनी तफहीम को फरोग़ देने पर काम करना होगा। जैसा कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने एक बार कहा है: "अच्छा होना काफी नहीं है"।
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