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Hindi Section ( 10 Apr 2023, NewAgeIslam.Com)

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Please Hold Your Tongue ज़रा जुबान संभाल कर रखिये जनाब

मुफ़्ती सनाउल हुदा कासमी

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

31 मार्च 2023

हमें अपनी बात दूसरों तक पहुँचाने के जो तरीके दिए गए हैं, उनमें वार्तालापभाषण, व्याख्यान, संवाद और वाद-विवाद का विशेष महत्व है। हम अपनी बातें लिखित रूप में भी दूसरों तक पहुंचाते हैं। और हरकात व सकनात के माध्यम से भी जिसे बॉडी लैंग्वेज या सांकेतिक भाषा कहते हैं, मानो ये सब बातें अभिव्यक्ति का माध्यम हों।

इसीलिए हर युग में ठोस, तर्कसंगत, उचित और प्रभावी बातचीत को महत्व दिया गया है और इसका प्रभाव राष्ट्रों की नियति बदलने, सरकारों के उत्थान और पतन और राजनीतिक उतार-चढ़ाव पर रहा है। दूसरी ओर कुछ दिनों से देखने में आ रहा है कि हमारे नेता ऐसी भाषा का प्रयोग करने लगे हैं, जिसे कुलीनों की भाषा नहीं कहा जा सकता और ये वाक्य निश्चित रूप से किसी व्यक्ति या वर्ग विशेष का अपमान है। इन वाक्यों के कहने वालों पर अब तक कार्रवाई नहीं हो सकी है और शायद हो भी नहीं। हालांकि, राहुल गांधी का यह बयान कि पैसा लेकर भागने वाले सभी लोगों के परिवार का नाम मोदी ही क्यों है। सूरत की एक अदालत द्वारा दो साल की सजा सुनाए जाने के बाद उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई है और उन्हें 22 अप्रैल तक घर खाली करना होगा।

उत्तर में जो भाषा बोली जा रही है वह भी चिंटूखाने की ही भाषा है और यह एक गलती करके दूसरी गलती सुधारने के समान है। कैसा लगता है, जब हमारे राजनेता भी इस तरह के बेतुके बयान देते हैं। ऐसे में किससे उम्मीद की जा सकती है कि उनके बयान समाज में नेक मूल्यों को बढ़ावा देने में सक्षम होंगे। यह केवल राजनीति का मामला नहीं है बल्कि जो लोग धर्म के मामले में अतिवादी हैं और उनमें पूर्वाग्रह जड़ जमा चुके हैं, वाद-विवाद के शौकीन हैं, वे अपनी बात को साबित करते हुए दूसरे धर्म के लोगों का मजाक उड़ाने से भी परहेज नहीं करते। बात वाजिब हो और भाषा शुद्ध हो तो हर्ज नहीं है, जो बात सत्य समझी जाए, वह कहनी चाहिए, पर उपहास और हरजा गोई सत्य को सिद्ध करने में सहायक नहीं होती, बल्कि इल्मी लोगों के अंदर इस शैली से द्वेष होता है और वह ऐसी पुस्तकों को छूने और ऐसे भाषणों को सुनने से बचते हैं। इससे सामाजिक अशांति पैदा होती है और कभी-कभी यह मामला हत्या तक ले जाता है। घरेलू झगड़ों और निज़ाअ का भी यही हाल है, उसमें प्रयुक्त होने वाली भाषा को हम सभ्य नहीं कह सकते। मतभेद होते रहते हैं और अपने अधिकार को हासिल करने के लिए हर स्तर पर संघर्ष करना चाहिए। यह निश्चित रूप से निंदनीय नहीं है, लेकिन इसके लिए जिस भाषा का उपयोग किया जाता है, क्या यह आवश्यक है कि यह सोफियाना हो, माता और पिता से मुक्त हो, जब हमें किसी कौम का उपहास न करने का आदेश दिया गया हो। इसी तरह किसी औरत को दूसरी औरत का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए, क्योंकि मज़ाक हमेशा खुद को बड़ा और अच्छा समझकर किया जाता है, हालाँकि अल्लाह ही जानता है कि कौन अच्छा है। ऐसा हो सकता है कि जो मजाक कर रहा है वह नैतिकता और चरित्र के लिहाज से कमजोर और बदतर हो। इसके अलावा इस प्रक्रिया के फलस्वरूप देश, जनजाति, समाज और परिवार में फूट, अराजकता, मतभेद के द्वार खुल जाते हैं, इसलिए हमें कोई भी बयान देने से पहले सोच लेना चाहिए कि इससे किसी का दिल नहीं दुखता। बात करते समय, स्थिति, श्रोता के पक्ष और बातचीत के उद्देश्य को बनाए रखने के लिए सावधानी बरतनी चाहिए। व्यर्थ के वाद-विवाद, आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत आक्षेप और अपशब्दों से भी बचना चाहिए। अभिव्यक्ति और असहमति व्यक्त करने में विनम्र और सम्मानपूर्ण रहें। जहाँ सज्जनता है, वहाँ सौंदर्य है। जहाँ सज्जनता नहीं है, वहाँ कुरूपता है। वहाँ फूहड़ पन है।

इस्लाम ने इस बात पर जोर दिया है कि राय की अभिव्यक्ति में न्याय किया जाना चाहिए। मामला आपका हो या आपके माता-पिता का, आपके रिश्तेदारों का, अमीरों का या ज़रूरतमंदों का, सभी मामलों में न्याय होना चाहिए और किसी भी कौम की दुश्मनी आपको न्याय के रास्ते से नहीं भटका सकती है। आज आलम यह है कि किसी से दुश्मनी हो तो सरहदें लांघ जाते हैं और दोस्ती हो तो आसमान और धरती के कलावे मिला देते हैं। कल तक जो लान तान कर रहा था, आज पार्टी में शामिल हो गया तो पार्टी सुप्रीमो को दण्डित भी कर रहा है और कसीदा पर कसीदा कहा जा रहा है शेख सादी की एक मशहूर कहावत है कि दुश्मनी में भी इस बात का ख्याल रखना कि कभी दोस्त बनो तो शर्मिंदगी न हो। संयम की इस कमी ने सबके कथन को निरर्थक बना दिया है।

कथन के बाद दूसरा चरण क्रिया है। क्रिया विहीन कथन को ही "बयान बाज़ी" कहा जाता है। कथन में जीवन तब होता है जब उसके पीछे क्रिया की शक्ति होती है। अमल न हो केवल कथन ही कथन हो, बयान ही बयान हो तो यह अत्यंत माजमूम काम है, अमल है लेकिन कौल के उलट है तो यह कौल व अमल का विरोधाभास है। कथनी और करनी के इस विरोधाभास के कारण सरकार घोषणा के बाद घोषणा करती रहती है और लोग उसे विश्वसनीय नहीं मानते। यदि हम कम बोलेंगे और अधिक करेंगे, तो जनता सब कुछ अच्छा करेगी और लोगों का विश्वास बहाल हो जाएगा, लेकिन दुर्भाग्य से यह अभी तक नहीं हो रहा है। हमारे राजनीतिक नेता इस मामले में सबसे आगे हैं। सरकारों द्वारा दसियों वर्षों में कितनी ही घोषणाएं की गई हैं और आज भी उन पर अमल के मामले में पहला दिन है। इस व्यवहार ने राजनीतिक लोगों की मूल्य में गिरावट की प्रवृत्ति को बढ़ा दिया है। पहले राज करने की नीयत होती थी, अब राज ही राज है, नीयत का पता नहीं। राजनीति में विचारधाराएं और नीतियां हुआ करती थीं, लेकिन अब यह किस्सा ए पारीना और अतीत की कहानी है। कल तक सेकुलरिज्म का नारा लगाने वाला, कब ओहदा और टिकट मिलने की वजह से फिरका परस्तों की गोद में जा बैठे गा, कहा नहीं जा सकता और फिर उसकी जुबान से क्या कुछ निकलने लगे गा और किस किस की पगड़ी उछाली जाएगी कहना कठिन है। यह सिर्फ एक विचार नहीं है, अपने दिमाग पर थोड़ा दबाव डालें तो आपके दिमाग में कई नाम घूमने लगेंगे।

फिर चुनाव आ रहा है, मतदाताओं को जोड़ने का अभियान चल रहा है और मतदाताओं को तोड़ने का भी, शुरू होने वाला है उग्र बयानों का सिलसिला पहले पहाड़ ज्वालामुखी थे, अब हमारी भाषा भी ज्वालामुखी हो गई है, हमें इनसे हर हाल में सावधान रहना होगा। बोलते हुए भी और सुनते हुए भी। बोलते समय शब्दों को तौलना चाहिए, क्योंकि अल्लाह ने हमारे शब्दों पर पहरेदार रखा है और सुनते समय उनकी प्रतिक्रिया से बचना चाहिए, ताकि हमारी भाषा प्रदूषित न हो। याद रखें, कौमी मुद्दे कठोर, गंदे और असभ्य शब्दों से हल नहीं होते हैं और समाज का भी अच्छा नहीं होता है। मौलाना अबुल कलाम आजाद के शब्दों में भाषा को अत्यंत संयमित रखना चाहिए, कुछ इस तरह कि गरिमा, गंभीरता और सम्मान आगे बढ़ कर इनकी बालाएं लेने लगे।

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Urdu Article: Please Hold Your Tongue زبان سنبھال کر ذرا رکھیے جناب

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