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Questions That Need Unambiguous Answers सवालात जिनके स्पष्ट जवाबात की आवश्यकता है

सुमित पाल, न्यू एज इस्लाम

9 अगस्त 2022

जब तक मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फिरका जिंदा रहेगा, मुसलमानों में रूहानियत का हकीकी इदराक संभव नहीं है।

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क्या आपने कभी गौर किया है कि कलमा ला इलाहा इल्लल्लाह मुहमदुर्र्र्सुलुल्लाह तकब्बुर और अना परस्त है? इसके शाब्दिक अर्थ हैं: अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, और मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं।

कुरआन में 25 नबियों का ज़िक्र है, हालांकि कुछ लोगों का ख्याल है कि उनकी संख्या 124000 हो सकती है। चूँकि यह माना जाता है कि उम्मी मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को आसमानसे वही हासिल हुईं है और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसमें कोई तहरीफ़ नहीं की है, इसलिए यह दलील सहीह है कि एक कादिरे मुतलकऔर आलिमुल गैबअल्लाह को मोहम्मद के जरिये यह एलान करवाने की जरूरत पड़ी कि और कोई नहीं केवल वही इबादत के लायक है और मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके रसूल हैं?

अगर अल्लाह पाक ने तमाम अदवार में क्रमिक सुधारके लिए अंबियाभेजे, तो उसने अब धरती पर नए अंबियाभेजना क्यों बंद कर दिया? इससे ज़ाहिर होता है कि इस्लाम की जड़ कलमा जो कि इस्लाम में ईमान का हसर करता है, मेगालू मानिका और हेंग फैनोटा है (जो कि डच लॉ इदारिया बैंडिक्ट इस्पेस्नोज़ा की इस्तेलाह है और इसका इस्तेमाल इंसानी मुदाखेलत के मुश्तबा अनासिर के साथ तथाकथित खुदाईएलान के लिए किया जाता है)।

सुबह व शाम मोअज्जिन अपनी अज़ान का आगाज़ इन अल्फाज़ के साथ करता है, “اشھد ان اللہ الہ الا اللہ و اشھد ان محمد رسول اللہमैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं)। यह सरासर रूहानी तकब्बुर है और दुसरे धर्मों और उनके माबुदों की तौहीन है। अगर मोहम्मद आखरी रसूल हैं तो इस्लाम के बाद आने वाले धर्मों और उनके बानियोंया अंबिया का क्या होगा?

आप बहाई अकीदे के संस्थापक (इरान में शिया इस्लाम से अलग होने वाले) बहाउल्लाह को कैसे और कहाँ रखेंगे जिसने खुद को मोहम्मद के इस्लाम से अलग कर दिया था? अहमदी काफिर हैं और अब इस्लाम के दायरे से बाहर, तो क्या मुसलमान मिर्ज़ा गुलाम अहमद काद्यानी को रियाकार कहेंगे? इसाइयत ने मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को एक झूटा नबी भी कहा, इतना कि इतालवी दांते अलेघरी ने अपनी क्लासिक डिवाइन कॉमेडीमें मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अबदी जहन्नम की आग में झोंक दिया।

अल्लाह या सामी देवतादुसरे माबुदों से क्यों हसद करते है? हसद एक आम इंसानी खसलत है। फिर यह खुदाई सिफत कैसे हो सकती है क्योंकि अल्लाह पाक काफिर और मुशरिक बुतों को तबाह करने का हुक्म देता है और मुशरिकीन के क़त्ल की इजाज़त कुरआन में देता है? इस्लाम और मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ अल्लाह की मज़हबी गुफ्त व शुनीद बंद हो गई जब कि केवल 500 साल पुराने सिख मज़हब में एक नहीं बल्कि दस रौशन ख्यालगुरु थे जो सिखों के नज़दीक किसी दौर के किसी नबी से कम नहीं थे। वह (सिख) अपने दृष्टिकोण से सहीह हैं, बिलकुल उसी तरह जैसे मुसलमान यह समझते हैं कि हक़ पर केवल उनकी मुकम्मल इजारादरी है।

अल्लाह ने कलमा में मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जगह मूसा और इसा (यहूदियत और इसाइयत) को क्यों नहीं शामिल किया? क्या इसाइयत या यहूदियत किसी तरह भी इस्लाम से कम से कम है? अल्लाह पाक ने ज़मीन के एक विशेष हिस्से से संबंध रखने वाले अंबियापर वही क्यों नाज़िल की जबकि मशरिकी दुनिया को इससे महरूम रखा?

आखिर में, अगर कुरआन एक आसमानी किताब है तो क्या मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जिम्मेदारी यह नहीं थी कि वह अपनी जिंदगी में इसे मुरत्तब कर देते? आखिरकार, यह पैगामात अल्लाह की तरफ से वहीहोते हैं! जब इसे पहली बार मुदव्विन किया गया तो बहुत से अरबों ने कुरआन पर तनकीद की क्योंकि उनका मानना था कि खुदा या अल्लाह  की तरफ से एक तथाकथित हकीकी किताब यकलख्त नाज़िल की जाएगी और उसमें तकरार नहीं होगी।

कुरआन एक अंदर अक्सर बहुत मामूली बातों पर हास्यास्पद तौर पर पाए जाने वाले तकरार के बारे में किसी की दो राय नहीं हो सकती। यहाँ तक कि सहराए अरब के दहका भी कुरआनी आयतों की सदाकत पर शक करते थे। मैंने यह परेशान कुन सवालात उस वक्त पूछे जब मैं धर्मों का अध्यन कर रहा था। कोई भी मुझे तसल्ली बख्श जवाब नहीं दे सका। मुस्लिम उलमाने बहुत मुबहम, खोखली, हैरान करने वाली और गुमराह कुन वाजाह्तें पेश कीं। आश्चर्य की बात नहीं कि अब अधिक से अधिक सवाल करने वाले मुसलमान इस्लाम छोड़ रहे हैं जो खुद को पूर्व मुसलमान कहते हैं।

जब तक मोहम्मद का फिरका जिंदा है, मुसलमानों में रूहानियत का हकीकी इदराक संभव नहीं है। मैं जानता हूँ कि जदीद इमाम गज्जाली और इब्ने अरबी इन एतेराज़ की वजाहत पेश करने की जी तोड़ कोशिशें करेंगे, लेकिन नाकाम ही रहेंगे, क्योंकि इस्लाम और साधारणतः किसी भी धर्म की बुनियादें इन्तहाई कमज़ोर और शस्ता हैं।

वह मेरी निंदा करेंगे, लेकिन किसको परवाह है? सच्चाई हमेशा तख्ता ए दार पर होता है। अहमद फराज़ ने कहा था, “आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर/ क्या अजब कल वह जमाने को निसाबों में मिलें

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न्यू एज इस्लाम के लिए एक बाकायदा कालमनिगार, सुमित पाल, इस्लाम के खुसूसी हवाले से तकाबुली मज़ाहिब के मुहक्किक हैं। उन्होंने फ़ारसी सहित कई भाषाओं में दुनिया की आला इशाअतों में मज़ामीन का हिस्सा डाला है।

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English Article:  Questions That Need Unambiguous Answers

Urdu Article:  Questions That Need Unambiguous Answers سوالات جن کے واضح جوابات کی ضرورت ہے

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