न्यु एज इस्लाम एडिट डेस्क
16 मई, 2013
एक खुफिया दस्तावेज़ जो कि पिछले साल लीक हुआ था, उससे पता चलता है कि किस तरह सऊद ने सिर्फ इस्लामी सिद्धांतों की नहीं बल्कि जिनेवा कन्वेंशन की धाराओं का भी उल्लंघन किया है।

एक बार फिर इस्लामी सिद्धांतों के स्वयंभू पालनकर्ता यानि सऊदी अरब का चेहरा बेनकाब हो गया है। पिछले साल लीक हुए एक खुफिया दस्तावेज़ से पता चलता है कि कैसे सऊद ने सीरिया के शिया शासक बशर अल असद को सत्ता से हटाने के जुनून में न सिर्फ इस्लामी सिद्धांतों का बल्कि जिनेवा कन्वेंशन की धाराओं का भी उल्लंघन किया है।
हाल ही में सऊदी अरब के मुफ्ती मोहम्मद अलआरिफी ने जुमा की नमाज़ के दौरान सीरिया की धर्म भ्रष्ट सरकार के खिलाफ जिहाद का अह्वाहन किया था और युवाओं, रिटायर्ड फौजियों और सऊदी अरब की जनता को सीरिया में बशर अल असद के खिलाफ 'जिहाद' में शामिल होने के लिए प्रेरित किया था।
उनके भाषण के बाद सऊदी युवाओं में सीरिया में जिहाद में शामिल होने का उत्साह में वृद्धि हुई थी। कई अमीर सऊदी ऐसे लोगों के सीरिया जाने में वित्तीय सहायता प्रदान कर रहे हैं और सऊदी अरब की सरकार इस तरह के युवाओं को सीरिया जाने और सीरिया के मर्दों, औरतों और बच्चों की हत्या, सीरिया के मुसलमान और ईसाई महिलाओं के साथ बलात्कार करने और उनकी संपत्ति को तबाह करने में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
हालांकि, सऊदी अरब सरकार दरअसल एक कदम और आगे बढ़ गई है। उन्होंने राज्य के विभिन्न जेलों में बंद मौत की सज़ा पाये अपराधियों को सीरिया युद्ध में शामिल होने पर सहमत होने पर माफी की पेशकश की है। और इनमें से कई ने पहले ही इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। लीक दस्तावेज़ से पता चलता है कि सीरिया में जिहाद में शामिल होने पर राज़ी होने वाले अपराधियों में 105 यमनी, 21 फिलिस्तीनी, 212 सऊदी, 96 सूडानी, 254 सीरियाई, 82 जॉर्डन, 68 सोमाली, 32 अफगानी, 194 मिस्री, 203 पाकिस्तानी, 23 इराकी और 44 कुवैती नागरिक हैं।
इनमें से हर एक अपराधी ने हत्या, बलात्कार, चोरी आदि जैसे गंभीर अपराध किये हैं और सऊदी अदालतों ने इन लोगों को मौत की सज़ा पहले ही सुनाई है।
दस्तावेज़ बताते हैं कि अधिकारियों ने इस तरह के घोर अपराधियों की रिहाई का आदेश इस शर्त पर दिया है कि वो सीरिया में विध्वंसक गतिविधियों में शामिल होंगे। ये युद्ध के दौरान नागरिकों और कैदियों के अधिकारों के बारे में जिनेवा कन्वेंशन का उल्लंघन है। ये हेग स्थित अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक अदालत में सऊदी सरकार के खिलाफ मुकदमा चलाने का मार्ग भी प्रशस्त कर सकता है।
सीरिया जाने से पहले सभी अपराधियों को प्रशिक्षण शिविर में भाग लेना होगा जहां वो हथियार और गोला बारूद का प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे। रिपोर्ट्स के अनुसार जब तक वो ‘जिहाद’ में शामिल रहेंगे, उनका परिवार सरकार की हिरासत में ये सुनिश्चित करने के लिए रहेगा कि वो युद्ध के मैदान से न भागें। इस अवधि के दौरान उनके परिवार वालों को मासिक भत्ता मिलेगा और उन्हें देश को छोड़ कर जाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी।
रिपोर्ट्स के अनुसार चूंकि सीरिया के साथ सऊदी अरब की सीमाएं मिली हुई नहीं हैं इसलिए ये अपराधी तुर्की और जॉर्डन के रास्ते सीरिया में प्रवेश करेंगे।
इन 'अपराधियों' में सऊदी अरब के वो युवा भी हैं जो सऊदी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए गिरफ्तार किए गए हैं। इसी तरह के एक मामले में एक जज ने राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोपों का सामना कर रहे 19 नौजवानों को अपने केबिन में बुलाया और उनके असली दुश्मन यानी शियाओं से लड़ने की ज़रूरत के बारे में एक लंबा भाषण दिया और उनसे कहा कि उन्हें देश के अंदर नहीं लड़ना चाहिए। इसके बाद ज़्यादातर युवाओं को सीरिया में विद्रोहियों के साथ शामिल होने के लिए छोड़ दिया गया। इनमें से एक युवक मोहम्मद अल-तल्क़ की सितम्बर, 2012 में सीरिया में मौत हो गई जिसके बाद उसके पिता ने जज के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई लेकिन सरकार ने उनकी शिकायत का कोई जवाब नहीं दिया।
इससे पहले 2010 में एक इराकी समाचार एजेंसी द्वारा एक सऊदी सरकार का एक खुफिया दस्तावेज़ लीक किया गया था, जिसने अलकायदा के साथ सऊदी सरकार के सम्बंधों को उजागर किया। The Buratha न्यूज़ सर्विस ने दस्तावेज़ प्रकाशित किया था जिसने ये खुलासा किया कि सऊदी अरब सरकार ने इराक में अलकायदा को कितनी राशि दी थी। दस्तावेज़ से ये भी पता चला कि सऊदी सरकार इराक में अलनुस्रह फ्रंट की मदद और उसका समर्थन कर रही थी। आश्चर्य की बात है कि सऊदी सरकार ने इन आरोप से इंकार नहीं किया। दोषी अफसरों पर काररवाई के तौर पर सऊदी सरकार ने खुफिया अधिकारियों पर कारर्वाई की और कुल 37 खुफिया अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया।
हाल ही में तालिबान की अंग्रेजी प्रवक्ता मैग्ज़ीन अज़ान के पहले अंक में ये दावा किया गया कि तालिबान ने अपने दुश्मनों (सीरिया, अमेरिका, पाकिस्तानी सेना और भारतीय सेना आदि) पर विनाशकारी हमले के लिए सभी 'संसाधन' हासिल कर लिया है। ये तेल पैदा करने वाले खाड़ी देशों से उन्हें प्राप्त होने वाली वित्तीय सहायता के स्पष्ट संकेत हैं।
सऊदी अरब ये दावा करता है कि वो आतंकवाद का विरोध करता है लेकिन कई घटनाओं ने स्थित को इसके विपरीत साबित किया है। 9/11 के हमलावरों में से 19 सऊदी नागरिक थे। सऊदी अरब के दो शहज़ादे अलकायदा के लिए लड़ते हुए मारे गए हैं।
हाल ही में इराक में अलकायदा की शाखा जुबहत अलनुस्रह फ्रंट के लिए सऊदी अरब का वित्तीय समर्थन कोई ढकी छिपी बात नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार सऊदी सरकार का पूरा खुफिया तंत्र बंदर बिन सुल्तान के नेतृत्व में सीरिया में बम धमाकों, नरसंहार और बलात्कार करने में अलनुस्रह फ्रंट की सहायता कर रहा है। क़तर के साथ सऊदी अरब, तुर्की सहित पड़ोसी देशों के सहयोग से सीरिया में विस्फोटकों की तस्करी और आतंकवादियों को भेज रहा है। इन लोगों ने तुर्की में कमांड सेन्टर भी स्थापित किया है ताकि वो वहां से सीरिया में अपने आपरेशन को कंट्रोल कर सकें। ये सीरिया और तुर्की के बीच सम्बंधों में बढ़ती कड़वाहट की वजह है। सऊदी अरब, क़तर और तुर्की ने सीरिया की राजधानी दमिश्क में असद को सत्ता से हटाने के लिए एक शक्तिशाली हमले की योजना बनाई है, इसके लिए वो दो मोर्चों से विद्रोहियों को भेजने की कोशिश कर रहे हैं- उत्तर में तुर्की और दक्षिण में जॉर्डन से। और इस मकसद के लिए सऊदी अरब के अपने देश में कैद अपराधियों को अपने तथकथित जिहाद में शामिल होने के लिए मजबूर करने में संकोच नहीं कर रहा है, और जो न सिर्फ जिनेवा कन्वेंशन का उल्लंघन है बल्कि इस्लामी शिक्षाओं का भी उल्लंघन है जिसका वो स्वयंभू पालनकर्ता होने का दावा करता है।
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