मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम डाट काम (अंग्रेज़ी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)
इस्लामी सभ्यता के एक हज़ार साल तक शरई कानून इंसाफ और बराबरी का पर्याय रहा लेकिन अब इस्लामी सभ्यता और विश्व शांति के लिए एक खतरा है, और इस्लाम के नज़रिये इंसाफ में एक मिसाली परिवर्तन की आवश्कता है।
मोहम्मद यूनुस (सह-लेखक) इस्लामी का असल पैगाम, आमना पब्लिकेशन, यूएसए 2009
शीर्षक वाकई चौंकाने वाला है और लेख का शुरुआती बयान इस हैरानी को मरणोपरांत महिमा, चिंता और चुनौती में परिवर्तित कर रहा है। लेख प्रचीन इस्लामी (शरई) कानून और शरीअते इलाही (कुरान) में अंतर और इस्लामोफोबिया (इस्लाम के प्रति भय) और इस्लामोफासिज़्म को फरोग देने में प्रचीन इस्लामी (शरई) कानून की भूमिका को सामने लाने की केशिश भर है। ये दो लानतें ऐसी हैं जो एक दूसरे को बल प्रदान करती हैं और इस्लाम को हिसंक, गैर-सहिष्णु धर्म बनाती हैं और सभ्यताओं के संघर्ष के लिए उकसाती हैं और इस्तामी सभ्यता और विश्व शांति के लिए खतरा पैदा करती हैं।
कुरान शरअ लफ्ज़ का इस्तेमाल करता है जिसका अर्थ कानून के निज़ाम या उसूल (5:48, 45:18) से है। कुरान ये भी ऐलान करता है कि ये किताबे हिकमत (10:1, 31:2, 43:4, 44:4) है जिसने रौशन और वाज़ेह (12:1, 15:1, 16:64, 26:2, 27:1, 36:69, 43:2, 44:2) कर दिया है, तमाम तरह की मिसालों (17:89, 18:54, 30:58,39:27) से ताकि सभी इंसान रहनुमाई हासिल कर सकें और वो ‘अंधेरे से रौशनी की जानिब’ आ सकें ये एक मुहावरे दार लेखन का अंदाज़ है जो सामाजिक चरित्र और नैतिक सुधार की और इशारा करता है और ‘उन पर से बोझ और तोक जो उन (के सिर) पर (और गले में) थे उतारते हैं।‘(7:157)
कुरान के मानदंड अब्दी (अनन्त) हैं और नाज़िल होने के बाद से ही ये किसी विस्तार या तब्दीली से आज़ाद हैं और इसे विभिन्न लेखन सामग्रियों के साथ ही याद करके संरक्षित किया गया है (80-:11-16)। कुरान ज़िंदगी की मुस्तकिल मिज़ाजी पर खास ज़ोर देता है, किस तरह एक इंसान जमाने और वक्त से अलग व्यवहार करता है। इस तरह कुरान आलमगीर मानदंडो का अहाता करता है और उनमें इंसाफ, आज़ादी, बराबरी, आमाले स्वालेहा (नेक काम), पड़ोसी और दूसरे विश्वास के लोगों के साथ सम्बंध, गरीबों में धन का बंटवारा, गुलामी का खात्मा, महिलाओं के लिए हराम करार दी गयी बहुत सी बातों से आज़ादी, निजी जीवन में अत्याचार, हैवानियत, अच्छी कारोबारी नैतिकता, वस्तुओं और सेवाओं की सही कीमत अदा करना, ज़रूरतमंद की माली मदद करना, अकल का इस्तेमाल करना, उत्कृष्ठता के लिए लगातार प्रयास करना वगैरह को इन मानदंडों के हिस्से के रूप में पेश किया जा सकता है।
प्राचीन इस्लामी (शरई) कानून व्यापक रूप से कानूनी परम्पराऐं हैं जो इस्लाम के प्राचीन फुकहा (धर्म शास्त्रियों) के फतवा और उनकी राय को शामिल करती हैं। लेहाज़ा खिलाफत की स्थापना (10-40 हिजरी, 632-661 ई.) से लेकर मध्यकाल और वर्तमान समय की परम्पराओं, रस्मों और सामाजिक व राजनीतिक हालात, फिकही कवायद (धर्मशास्त्रीय नियम) और इस्लामी सभ्यता के विभिन्न ऐतिहासिक पहलुओं की समझ ने इसके विकास में मदद की है। इसलिए ये कानून दूसरे बेशुमार आदेशों जैसे, अनैतिक सम्बंध के लिए पत्थरों से मार मार कर मौत की सज़ा, इर्तेदाद और अहानते रसूल (अपने विश्वास से पलटने और ईश निंदा) के लिए मौत की सज़ा, समलैंगिकता के लिए सज़ा, गुलामी, गैर मुसलमानों के प्रति भेदभाव औऱ नफरत, मुसलमान और गैर मुसलमान आबादी के आधार पर पूरी दुनिया को बांटना, ज्ञान को इस्लामी और गैर इस्लामी आधारों पर बांटना, अस्थायी शादियाँ, फौरन तलाक, मां बाप होने के नाते बच्चे के शोषण की अज़ादी, लिंग असमानता इत्यादि का ये खज़ाना है और ये कुरानी शिक्षा के खिलाफ हैं। ऐतिहासिक संदर्भ में ये कल्पनाएं दूसरी सभ्यताओं से अलग नहीं हैं लेकिन इनमें उलझना अपने विषय से भटकना होगा। वास्तविकता ये है कि आज के प्रचीन इस्लामी (शरई) कानून के कई बुनियादी कल्पनाएं और आदेश वर्तमान समय की वास्तविकता और कुरानी शिक्षा के विरुद्ध है।
इस्लाम ऐसे वक्त में आया जब दुनिया में बड़े पैमाने पर जेहालत (अज्ञानता), नाइंसाफी (अन्याय), दमन और शोषण था। आलमगीर इंसाफ (विश्वव्यापी न्याय) की कल्पना को अभी सामने आना बाकी था। छोटी मोटी चोरी का जिस पर इल्ज़ाम होता था उसके हाथ पैर बांधकर तालाब में फेंक दिया जाता था अगर वो डूब जाता था तो उसका जुर्म साबित हो जाता था और उसको सज़ा मिल जाती थी, लेकिन अगर वो किसी तरह तैरता रहता था तो उसे बुरी आत्माओं से प्रभावित माना जाता था और उसे छड़ी से दागा जाता था। गुलामों को जंजीरों में बांधा जाता था और उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था और वो पूरे जीनव गुलाम ही रहते थे। अगर वो शादी करते थे और उनके बच्चे होते थे, तो पूरा परिवार गुलाम कहलाता था। महिलाओं को वस्तु के रूप में बेचा जाता था और इनके पति अगर किसी अजनबी के साथ इनको बिस्तर पर पा जाते थे तो उन्हें कत्ल कर सकते थे और महिलाओं को अपने पति की मौत पर उसकी चिता के साथ ही ज़िंदा जल जाना होता था और ये सामाजिक नियम था। समाज के दलित और वंचित समुदाय के लोग जैसे अंधे, अपंग, कोढ़ी और न ठीक होने वाली बीमारी से दोचार लोगों को खुदा की बद्दुआ पाने वाले लोग माना जाता था। इनकी निंदा की जाती थी और इनको देश-निकाला की सज़ी दी जाती थी और इन लोगों के नज़दीकी रिश्तेदार भी उन्हें अलग थलग रहने के लिए मजबूर करते थे। अपराधियों और जंग के कैदियों के कत्ल कर दिया जाता था और दूसरे अत्याचार किये जाते थे, इनकी कोई कानून सुनवाई भी नहीं होती थी और न ही इन्हें अपनी रक्षा का मौका मिलता था। अभिजात वर्ग के लोग जानवरों के द्वारा इंसानों के शरीर के टुकड़े टुकड़े होते देखने के खेल का मज़ा लेते थे और अपने अस्तित्व के लिए अपने विरोधियों का बेतहाशा कत्ल करते थे.........इंसानों की हैवानी फितरत जारी थी।
भावनाओं से भरा इस तरह का ड्रामा प्रचीन समय से ही रोज़ाना खेला जाता रहा है। कुरान पूरी दुनिया को इस तरह की वहशी विरासत से निजात दिलाने के लिए नाज़िल हुआ। इसलिए सभी क्रांतिकारी सुधारों समेत इस्लाम ने इंसाफ (7:29, 16:90, 4:58) पर खास तवज्जो दी और सभी को इंसाफ का पाबंद (6:152) होने का ऐलान किया और पूरी इंसानियत को सच्ची शहादत (गवाही) देने की शिक्षा दी, चाहे उसका सम्बंध खुद से हो, या अपने माता पिता से, या रिश्तेदारों से, गरीबों से या अपने पहले के दुश्मनों (5:8, 4:135) से हो, और इसके लिए तरबियत याफ्ता लोग हों, जो न्याय करने वालों को इंसाफ पर कायम (7:181, 7:159) रहने की शिक्षा दे सकें। परिणामस्वरूप इसके लागू होते ही इस्लामी राज्यों में न्याय पर आधारित प्रशासन की बुनियाद पड़ गयी। ये खलीफा हज़रत उमर रज़ि. के अपने गवर्नरों को दिये गये निम्नलिखित आदेशों से और भी स्पष्ट हो जाता है।
‘खुदा की इबादत के बाद इंसाफ का कयाम एक आवश्यक ज़िम्मेदारी है। सभी इंसानों के साथ एक बराबर सुलूक करो, चाहो तुम्हारी मौजूदगी में हो या तुम्हारी अदालत में हो , ताकि कोई कमज़ोर इंसाफ की उम्मीद न छोड़े और कोई मुजरिम आपसे रिआयत की उम्मीद न करे। जो कोई भी दावा करे उसे साबित करे, जो इंकार करे उसे हलफ (शपथ) लेना चाहिए। समझौते की इजाज़त होगी बशर्ते कि ये हलाल को हराम में तब्दील न कर दे और इसी तरह इसके विपरीत। अगर कल किसी मसले पर फैसला देना है तो आज उस पर ऐहतियात के साथ गौरो फिक्र कर लो। अगर तुम्हें किसी चीज़ पर शक है जिसका ज़िक्र कुरान में या सुन्नते नबवी स.अ.व. में नहीं है, तो उस पर गहराई से गौर कर लो और इस तरह का घटनाओं और इससे सम्बंधित राय को भी महत्व दो और उन पर तार्किक दृष्टि से गौर कर लो।’ (1)
इस तरह इस्लाम के नागरिक प्रशासन में प्रमाण के साथ न्याय की स्थापना और तरबियत याफ्ता फुकहा (धर्मशास्त्रियों) ने केन्द्रीय स्थान हासिल कर लिया, इससे न्याय के पेशे में बौद्धिक कार्य को बल मिला। इससे सम्बंधित विवरण में जाना हमारे इस प्रयास से अलग हटना होगा। इसके बावजूद ये कहना काफी होगा कि इस्लाम की शुरुआती तीन सदियों में बड़े फुकहा पैदा हुए और आगे बढे। इस समय के सबसे ज़्यादा पढे लिखे फुकहा में हनफी, हम्बली, शाफई, मालिकी और जाफरी का शुमार होता है जिनके नाम की शुरुआत से ही मक्तबे फिक्र भी हैं (2)। इसलिए इतिहास में एक हज़ार साल के बाद आज ये आलमगीर और गैरजानिबदाराना रूह, न्यायिक सख्ती, जोश, अनुशासन, गहराई, हिकमत और पहला सदी में कुरान से साम्य रखने वाले कानून की नुमाइंदगी नहीं करता है। दरअसल उग्रवाद पाकिस्तानियों और अफगानिस्तानियों के हाथों में काबू से बाहर के दायरे में बढ़ गया है और जैसा कि कहा जाता है कि अपनी पहले की शक्ल का बदतरीन रूप है, जो वक्त के साथ और बिगड़ रहा है।
4. किस तरह कुरान के पैगाम को उलट दिया गया ताकि इसके विरोधाभासी पैगाम को बढ़ने दिया जाये
जैसे ही इस्लाम नई सभ्यताओं और संस्कृतियों में दाखिल हुआ उसका सामना उन रस्मों और फिकही कवायद से हुआ जो इस्लाम के पैगाम के विरोधभासी थे। इनको इस्लाम में शामिल करने के लिए फिकह के माहिरों ने ऐलान किया किः ‘कुरान की कोई भी आयत जो हमारे आकाओं की राय के विपरीत होगी उन्हें रद्द हुआ माना जायेगा या तरजीह देने का कायदा इस पर आजमाया जायेगा। ये बेहतर है कि आयत की व्याख्या इस तरह की जाये ताकि ये उनकी राय के अनुरूप हो जाये।(3)’
फिकह के माहिरों ने विभिन्न आयतों पर कुरान से बाहर के इन आदेशों को लागू कर दिया। इस तरह आयत 3:110 का शुरुआती ऐलान, ‘जितनी उम्म्तें लोगों में पैदा हुई हैं तुम उनमें से सबसे बेहतर हो।’ इस आयत ते ऐतिहासिक संदर्भ को ध्यान में न रख कर ये लोग दलील देते हैं कि ‘बेहतरीन उम्मत के गाइड और लीडर होने के नाते वो कभी भी गलत नहीं कर सकते हैं, यहाँ तक कि अगर उनके खयालात कुरान से विरोधाभास रखते हों तब भी।’ इस तरह आयत 2:143 का शुरुआती ऐलान ‘इस तरह हमने तुमको उम्मेत मोतदेल बनाया है’, को मुसलमानों के लिए हमेशा के वास्ते खुदा के खास करम को बताया जाता है। ‘ऐ मोमिनों खुदा का हुक्म मानो और रसूल की इत्तेबा करो और उनकी जो तुम में अमीर हों उसकी ऐताअत करो’......आयत (4:159) को इस मुराद से लेते हैं जिस अमीर का ज़िक्र कुरान में है, उससे इंसाफ करने में गलती हो ही नहीं सकती है और वो जिसकी ऐताअत की बात कही गयी है वो गलतियों से पाक होना चाहिए। उलमा के इज्मा में कोई गल्ती नहीं होती इसे साबित करने के लिए मुबाहिसे का तरीके कार अपनाया गया। फुकहा इसके समर्थन में हदीस ले आये (4)। कानून के माहिरों ने इस हदीस को अप्रत्यक्ष रूप से वही बता कर दुरुस्त करार दिया ताकि अपने न्यायिक कल्पना और सिद्धांतों के लिए औचित्य पेश कर सकें। इस तरह हदीस को कुरान के बाद कानून के लिए दूसरा सबसे अहम स्रोत करार दिया। ये एक सरल कानूनी धारणा है जो बाद में इस्लामी फिकह का बुनियादी नज़रिया बन गया। ये इस्लाम की दूसरी और तीसरी सदी में हुआ जब फिकह और कानून से सम्बंधित गतिविधियाँ अपने चरम पर थीं।
इन कानूनी आदेशों और सिद्धांतों से लैस होकर कानून के माहिर कोई भी फतवा जारी करने के लिए आज़ाद थे और अगर इनमें से कुछ ही इस पर एकमत थे तो इसके औचित्य के रूप में हदीसों को पेश करते थे। और इस तरह कुरानी पैगाम को उलट कर उस दौर के आला तब्के के निजी स्वार्थ को ध्यान में रखते हुए उस वक्त की सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक वास्विकता की ज़रूरत के मुताबिक फतवा देने का सिलसिला शुरु हो गया और न खत्म होने वाला ये सिलसिला बिना किसी रुकावट के आज तक जारी है।
5. इस ऐतिहासिक मोड़ पर प्राचीन इस्लामी (शरई) कानून के प्रभाव
इसमें कोई शक नहीं कि दूसरी बातों के अलावा (1) प्राचीन इस्लामी (शरई) कानून न सिर्फ कुरानी पैगामों बल्कि सेकुलर कल्पना और वैश्विक मूल्यों के भी खिलाफ हैं। (2) मिसाल के तौर पर कुछ इस्लामी देश जैसे पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान में इन कानूनों पर अमल से महिलाओं के विरुद्ध अत्याचार, उत्पीड़न, मानवाधिकारों के उल्लंघन, विकासात्मक कार्यों में ठहराव, तानाशाही, लोकतांत्रिक आशाओं और अपने नागरिकों के अधिकारों को हासिल करने को हतोत्साहित किया गया और उनके भविष्य को अंधकारमय बनाया है।(3) इस कानून के महिलाओं के प्रति भेदभाव के कारण ज़्यादातर मुस्लिम देशों में महिलाओं के सशक्तिकरण और उनके विकास को नुक्सान पहुँचाया है। (4) अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैय्या और मुस्लिम बहुलता वाले इलाकों और शरई कानून पर अमल करने वाले देशों में इर्तेदाद और अहानते रसूल कानून अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का माध्यम बन रहे हैं। (5) मुजरिमों के लिए इसका वहशियाना इंसाफ, ज़्यादतियाँ और पूरी दुनिया को इस्लाम को मानने वाला बनाने की इसकी तमन्ना इस्लामोफोबिया में इजाफा कर रहा है। (6) आतंकवाद के इनके पूर्ववर्ती लोगों के अमल कट्टरता और इस्लामोफासिज़्म को बढ़ावा दे रहा है। (7) खेल और दूसरी सांस्कृतिक सरगर्मियों से दूर रहने से इन देश में जहाँ मुसलमान अल्पसंख्यक के रूप में रह रहे हैं वहाँ इनको मुख्यधारे में शामिल होने से दूर कर रहे हैं और उन्हें अलग थलग रहने की शिक्षा दे रहे हैं। (8) ज्ञान के इस्लामी और गैर इस्लामी में बंटवारे, जैसा कि अब भी कई मदरसों में हैं, ये मुसलमानों में वैश्विक ज्ञान के फैलाव में रुकावट और उनके बौद्धिक क्षितिज के विस्तार को कम कर रहा है। (9) धन की उनकी कल्पना और जायज़ का खयाल रखे बिना सिर्फ धन का 2.5 फीसद (कुरान में कहीं भी इसका ज़िक्र नहीं है, और न कोई संख्या दी गयी है) देकर भ्रष्टाचार को फैला रहा है और ये आमदनियों में फर्क और मुस्लिम देश में गरीबी में इजाफा कर रहा है। (10) इसका सिर्फ रस्मों पर ज़ोर और बाकी को ध्यान न देने , यहाँ तक कि सामाजिक, चारित्रिक और नैतिक और कुरान की मन को सक्रिय कर देने वाले मानदंडों को नज़रअंदाज़ करने के कारण इस्लाम को सिर्फ एक सम्प्रदाय में परिवर्तित कर रहा है जो आधुनिक सभ्यताओं में अपनी छाप छोड़ने में नाकाम है। (11) धर्म को केन्द्र में रखकर की जाने वाली इसकी राजनीति और दुनिया को मुस्लिम और गैर मुस्लिम में बांटने की इसकी कल्पना अब किसी काम की नहीं है, पूरी दुनिया में बढ़ रहे सेकुलर रुझान की तो बात ही छोड़िए, अब गैर मुस्लिम ताकते जैसे, हिंदुस्तान, अमेरिका और यूरोपी यूनियन इनकी आज़ादी की जंग (जैसा कि पूर्वी पाकिस्तान, अफगानिस्तान, लीबिया) में मदद कर रहे हैं और नाटो के यूगोस्लाविया में हमले के कारण ही इस ज़मीन से अल्बानिया के मुसलमानों का वजूद खत्म होने से बच गया। (12) प्रचीन धर्म के आधार पर विभाजन पर अमल से इस्लाम के अंदर ही साम्प्रदायिकता को बढ़ावा मिल सकता है।
उपरोक्त बिंदुओं पर गौर (इनमें संशोधन कर सकते हैं) करने पर मालूम चलता है कि वो वक्त आ गया है कि जब मुसलमानों के कुलीन वर्ग, पढ़े लिखे तब्के और बुद्धीजीवियों को प्राचीन इस्लामी (शरई) कानून और कुरान के शरीअत इलाही में फर्क पर ध्यान देना चाहिए। कुरान इनमें से किसी भी प्रभाव और अनुपयुक्तता से इंकार नहीं करता है। इस कड़वी सच्चाई से नज़र हटाना इस मसले को और बढ़ावा देगा जैसा मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी वाले देशों और जहाँ मुसलमान अल्पसंख्यक हैं वहाँ पर प्राचीन इस्लामी (शरई) कानून या पोट्रो-डॉलर के ज़रिए पैदा फितने को लागू करने के कारण परेशानी उठानी पड़ रही है।
नोट्सः
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मोहम्मद यूनुस ने आईआईटी से केमिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की है और कार्पोरेट इक्ज़ीक्युटिव के पद से रिटायर हो चुके हैं और 90 के दशक से क़ुरान का गहराई से अध्ययन और उसके वास्तविक संदेश को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी किताब ‘इस्लाम का असल पैग़ाम’ को साल 2000 में अलअज़हर अलशरीफ, काहिरा की मंज़ूरी प्राप्त हो गयी थी और यूसीएलए के डॉ. खालिद अबुल फ़ज़ल का समर्थन भी हासिल है। मोहम्मद यूनुस की किताब ‘इस्लाम का असल पैग़ाम’ को आमना पब्लिकेशन मेरीलैण्ड, अमेरिका ने साल 2009 में प्रकाशित किया।
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