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Hindi Section ( 5 Dec 2012, NewAgeIslam.Com)

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The Shia-Sunni divide: How real and how deep - Can we Muslims move towards genuine unity शिया सुन्नी मतभेद: कितने वास्तविक और कितने गहरे - क्या हम वास्तविक एकता कायम कर सकते हैं


 सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम

7 अक्टूबर, 2008

ईदुल फित्र के मौक़े पर शिया और सुन्नी समुदायों को एकजुट करने की मौलाना कल्बे सादिक़ की कोशिश से देश के मुसलमानों में खुशी की लहर दौड़ गई, और वैसा ही प्रतिक्रिया देखने में आई जब सय्यदा हामिद ने काज़ी के रूप में पहली बार एक सुन्नी जोड़े का निकाह पढ़ाया। इसलिए शायद शिया सुन्नी वैचारिक मतभेद और दोनों समुदायों में एकता की संभावना पर वस्तुनिष्ठ तरीके से बात करने के लिए ये उचित अवसर है और इसके लिए माहौल भी तैयार है।

मैं शुरुआत में इस बात को स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मेरे सुन्नी पृष्ठभूमि के कारण हो सकता है कि मेरे अंदर भी कुछ सुन्नी गलतफहमी और पूर्वाग्रह हों लेकिन चेतना के स्तर पर मैं खुद को ये एहसास दिलाता रहता हूँ कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम न तो शिया थे और न ही सुन्नी और अनिवार्य रूप से हम सब सिर्फ पैग़म्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पैरोकार हैं। कोई भी दूसरा आदरणीय और पवित्र इस्लामी रहनुमा आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के बाद आता है। और शिया सुन्नी मतभेद की प्रकृति राजनीतिक थी और वैचारिक मतभेद बाद में सामने आए ताकि शायद इन मतभेदों को बल मिले और राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त किए जा सके।

मैं ये भी महसूस करता हूँ कि आज के समय में जब मीडिया चौबीस घंटे हमारी निगरानी कर रहा है और ये जानता है कि कौन किस राजनीतिक प्रेरणा के तहत क्या कर रहा है।  सातवीं सदी की लड़ाईों में शामिल होना हमारे लिए बेफयदा है क्योंकि हम वक़्त को पीछे नहीं ले जा सकते और पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के साथ मैदाने ओहद और बदर में जंग नहीं कर सकते। इसी तरह हम अतीत में जाकर कर्बला में हज़रत पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्ल्म के अहले बैत को क़त्ले आम से नहीं बचा सकते। आज हमें ये फैसला करना है कि हम इस चौदह सौ साल की लड़ाई को जारी रखें या इससे अलग होकर आपस में शांति स्थापित करें ताकि इन चुनौतियों का सामना कर सकें और उन लक्ष्यों की ओर आगे बढ़ सकें जो हमारे समय में अधिक महत्वपूर्ण हैं। इनमें से एक 21वीं सदी में इस्लामी एजेंडे का निर्धारण और समकालीन सच्चाइयों की रौशनी में इस्लामी मामलों में इज्तेहाद के अमल को आम करना। इस बात से मुक्त होकर कि समाज में मौजूद दकियानूसी (रुढिवादी) तत्व इसका विरोध करेंगे।

हालांकि विभिन्न देशों सहित पड़ोसी देश पाकिस्तान में शिया और सुन्नी समुदाय एक दूसरे के खून के प्यासे हैं।  भारतीय मुसलमान जो इंडोनेशिया के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी है, बहुत कम ही एक दूसरे के खिलाफ हिंसक हुए हैं। बल्कि एक शिया परिवार की मोहतरमा सय्येदा हामिद ने लखनऊ में एक सुन्नी जोड़े का निकाह पढ़ाया।

इसी तरह कई अन्य देशों में शिया सुन्नी संघर्ष और हिंसा नहीं के बराबर हुए हैं। इसमें शक नहीं कि हाल के वर्षों में लेबनान जैसे विभाजित समाज में दोनों समुदायों के बीच आपसी सहयोग बढ़ा है हालांकि मतभेद अपनी जगह हैं और भविष्य में हिंसक रुख अख्तियार कर सकते हैं अगर वैश्विक मुस्लिम बिरादरी इस वैचारिक खाई को जो प्रत्यक्ष रूप से व्यापक है, लेकिन वास्तव में बहुत छोटी है (जैसा कि आगे चलकर जारी बहस में ज़ाहिर हो जाएगा) पाटने की जागरूक कोशिश नहीं की। जैसा कि अमेरिका या कम से कम उसके प्रशासन का एक छोटा वर्ग दक्षिणी सऊदी अरब और इराकी तेल के क्षेत्रों के आसपास में अलग शिया राज्य के गठन पर गंभीरता से विचार कर रहा है जो इतने छोटे हैं कि उन्हें अपनी संरक्षण में चलाया जा सके। इस्लामी दुनिया शिया वैचारिक मतभेद को तुरंत दूर करने में एक बड़ी रुकावट का सामना करेगा।

और अगर इस परियोजना को अमली जामा न भी पहनाया जा सका तो इस बात की अधिक सम्भावना है कि इराक ईरान की तरह कोई रूढ़िवादी सरकार सद्दाम हुसैन की धर्मनिरपेक्ष सुन्नी सरकार की राख से उठे और इस्लामी जगत में नहीं तो कम से कम अरब क्षेत्र में ताकत के नाजुक मसलकी (साम्प्रदायिक) संतुलन को बिगाड़ कर रख दे। अब सवाल उठता है कि क्या उमम्ते मुस्लेमा इस तरह की चुनौती का सामना कर सकेगी?  मौलाना कल्बे सादिक़ की कोशिश इस दिशा में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम है और इसलिए मैं अपनी पूरी ताक़त से इस बात पर जोर देता हूँ कि जो मौक़ा और माहौल तैय्यार हुआ है उसे हाथ से जाने न दें।

शिया सुन्नी मतभेद कितना वास्तविक और कितना गहरा?

इस पूरी समीक्षा में एक सवाल उभर कर सामने आता है कि शिया- सुन्नी मतभेद कितना वास्तविक और कितना गहरा है?  ये विवाद कितना वैचारिक और कितना सामाजिक और राजनीतिक हितों से प्रेरित है?  क्या इसमें जनजातीय, जातीय और वर्ग संघर्ष का तत्व भी शामिल है? दूसरी ओर साम्प्रदायिक एकता में बाहरी कारकों जैसे हिंदुस्तान में हिंदू कट्टरपंथियों से खतरा और इराक में अमेरिकी फौजों को देश से निकाल बाहर करने की ज़रूरत, किस हद तककाम कर रही है।

शिया समुदाय, जो विश्व मुस्लिम जनसंख्या के 15 प्रतिशत हैं और सुन्नी समुदाय जो शेष आबादी है।  दोनों मूलतः एक ही विचारधारा के पैरोकार हैं। छोटे मोटे वैचारिक मतभेद और गहरी गलतफहमियाँ 1400 साल के इस्लामी इतिहास में इनकी आपसी लड़ाई के कारण एक दूसरे के बारे में पैदा हो गई हैं।

शिया- सुन्नी मतभेद की शुरुआत 632 में हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की वफात (मृत्यु) के बाद बल्कि उनके अंतिम संस्कार से पहले उनके उत्तराधिकारियों के मसले से हुई जो वर्तमान इराक के कर्बला में आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के अहले बैत और नवासों के क़त्ल की वजह बनी। शिया- सुन्नी मतभेद का कोई औचित्य तब बनता जब किसी सुन्नी ने कर्बला के क़त्ले आम का समर्थन किया होता। कोई सुन्नी ऐसा नहीं करता। कर्बला के पीड़ितों को सार्वभौमिक रूप से शहीद का दर्जा दिया गया है। शिया और सुन्नी दोनों समुदाय मोहर्रम के महीने में उनकी शहादत का मातम करते हैं और इस दर्दनाक घटना का चहल्लम मनाते हैं। आशूरा के दौरान जंगे कर्बला को याद करते हैं और ज़ाकरीन मातमी जलसों में सीना कोबी करते हुए हाज़िरीन के सामने कर्बला के दृश्य का मार्मिक रूप से बयान करते हैं, तो सुन्नी भी इसी तरह की रस्में निभाते हैं। अंतर केवल तीव्रता का होता है। सुन्नी लोग कर्बला के दृश्य का वर्णन सुनकर अपने हाथों से छाती पीटते और आंसू बहाते हैं जबकि शिया समुदाय के लोग छोटे छोटे चाकुओं और धारदार सामान से अपने सीने और कंधों पर चोट लगाते और खून बहाते हैं।

हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के दामाद अली रज़ियल्लाहू अन्हू को चौथा और अंतिम खलीफा स्वीकार करते हैं। वो हज़रत अबु बकर रज़ियल्लाहू अन्हू (634- 632), हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हू (644- 634) और हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहू अन्हू (656- 644) के बाद खलीफा बने। शियों की राय है कि खलीफा प्रथम हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू को होना चाहिए था और खिलाफ़त हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू और हज़रत फ़ातिमा रज़ियल्लाहू अन्हा के वसीले से हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के खानदान वाले को स्थानांतरित होती। वो लोग अक्सर खुद को अहले बैत (हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के परिवार वाले) भी कहते हैं।

दंगे जैसा कि अक्सर पाकिस्तान में होते हैं, शिया समुदाय के लोगों के द्वारा मोहर्रम के जुलूसों के दौरान यहां तक कि सुन्नी इलाकों से गुज़रते हुए भी प्रथम तीन खुल्फाए राशिदीन को गालियां देने और सुन्नियों के द्वारा उन्हें भड़काऊ अमल से रोकने पर होती हैं।

शियों का विश्वास है कि प्रथम तीनों खलीफा ने खिलाफ़त पर कब्जा किया जो कि हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू का जायज़ हक़ था। सुन्नी समुदाय के लोग हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू से उतनी ही अक़ीदत रखते हैं जितनी कि पहले तीन खुल्फाए राशिदीन से। और शियों की रस्म तबर्रा (तीनों खुल्फाए राशिदीन की शान में अपमानजनक शब्द) को पसंद नहीं करते। शिया उलमा का कहना है कि तबर्रा उनके समुदाय की प्रचलित परंपरा नहीं है बल्कि कुछ गुमराह लोग ही इस पर अमल करते हैं। अमेरिकी इस्लामी आलिम शाहिद अख्तर कहते हैं, '' अगर कुछ शिया लोग तीनों खुल्फाए राशिदीन की शान में तबर्रा कहते हैं तो वो ऐसा अज्ञानता की बिना पर कहते हैं और उन्हें खुदा से माफी मांगनी चाहिए।'' शिया लोग प्रथम तीन खुल्फाए राशिदीन को हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के सहाबा और प्रबंधनकर्त्ता मानते हैं,  इमाम नहीं। शिया इमाम हज़रत जाफर सादिक़ खुद पहले खलीफा हज़रत अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हू के खानदान के एक सदस्य थे। लेकिन सुन्नियों का विश्वास है (जो कि गलत है) कि सभी शिया लोग तीनों खुल्फाए राशिदीन पर व्यंग्य  करते और उनकी बेइज़्ज़इती करने को निशाना बनाते हैं।  अगर खुलेआम सड़कों पर ऐसा न भी करते हों तो अपने घरों में तो जरूर करते हैं और इसलिए वो इस पर ऐतराज़ करते हैं।

ऐसा महसूस होता है कि हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू ने खुद ही पहले दोनों खलीफा हज़रत अबु बकर रज़ियल्लाहू अन्हू और हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हू को बिना किसी ऐतराज़ के खुद स्वीकार किया था, हालांकि वो उनकी कुछ नीतियों से सहमति न रखते रहे हों। वो खिलाफ़त के उम्मीदवार दूसरे खलीफा की शहादत के बाद हुए। वह हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहू अन्हू की खिलाफ़त को क़ुबूल नहीं कर सके और विरोधियों की जमात में जल्दबाज़ी में शामिल हो गए। वह तक़वा के मामले में मर्दे कामिल थे और कुरान मजीद और हदीस पाक की व्याख्या में तीनों खुल्फाए राशिदीन खासकर हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहू अन्हू से मतभेद रखते थे।

खिलाफत एक प्रशासनिक ओहदा था। तक़वा और बहादुरी से अधिक राजनीतिक समझ और व्यवहारिकता की आवश्यकता थी। हालांकि, खलीफा राज्य का रूहानी और दुनियावी पेशवा दोनों होता था। ये विशेषता पारस्परिक रूप से विशिष्ट नहीं होती हैं लेकिन निश्चित रूप से दुर्लभ हैं। और सुन्नियों का यक़ीन है कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम शायद विरासत के सिद्धांत को बढ़ावा नहीं दे सकते थे क्योंकि जो कुरान वो इस दुनिया में लेकर आए वो बार बार ये हिदायत करता है कि सिवाय तक़वा के विरासत, नस्ल या खानदान किसी व्यक्ति को श्रेष्ठता नहीं प्रदान करता।

हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू को सभी लोगों का आदर व सम्मान प्राप्त था। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने खुद उन्हें बाबुल इल्म (इल्म का दरवाजा) का उपनाम दिया था। लेकिन जब उनके दौरे खिलाफ़त का अध्ययन करें तो इस बात का अंदाज़ा होता है कि सत्ताधारी क़बीला क़ुरैश ने हुजूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्ल्म की मृत्यु के बाद क्यों दर्जए खिलाफ़त पर उनको बिठाने के लिए उनके अपना खयालात रखते थे।

हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू का दौरे खिलाफ़त आपसी संघर्ष, असमंजस और गलत फैसलों से अस्थिरता वाला समय था। वो पहले दिन से ही विवादों में घिर गए थे। वो एक असामान्य स्थिति में खलीफा चुने गए थे। तीसरे खलीफा हज़रत उस्मान रज़ि. अपने घर में कुरान की तिलावत करते हुए विद्रोहियों के हाथों मारे गए। उनके साथ दूसरे खलीफा हज़रत उमर के पुत्र भी मारे गए। उन्होंने कुछ समय के लिए घेराबंदी का सामना किया। उनके क़त्ल से पहले होने वाले खून ख़राबे के दौरान हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू ज़्यादातर अलग थलग रहे और उस वक़्क के खलीफा का बचाव नहीं किया। बल्कि कई बार विद्रोहियों के प्रवक्ता की भूमिका निभाई।

इसलिए उनके खलीफा चयनित होते ही उन्हें सबसे पहले उसी सवाल का सामना करना पड़ा कि उनके पूर्ववर्ती के हत्यारों के साथ क्या व्यवहार किया जाए। उन्होंने उनके खिलाफ कोई कदम न उठाने का फैसला किया। लेकिन हज़रत आइशा रज़ियल्लाहू अन्हा ने उनका विरोध किया। उन्होंने हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू पर उस्मान रज़ियल्लाहू अन्हू के कातिलों को उनके अंजाम तक पहुंचाने के मामले में नरमी से काम लेने का आरोप लगाया। हज़रत आइशा रज़ियल्लाहू अन्हा की सेनाओं के हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू की सेनाओं से जमल की जंग में हार खाने के बाद हज़रत आइशा रज़ियल्लाहू अन्हा ने हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू से क्षमा मांग ली और एकांतवास में चलीं गयीं।

बहरहाल, हज़रत उसमान रज़ियल्लाहू अन्हू के रिश्तेदार और सीरिया के शक्तिशाली गवर्नर हज़रत मोआविया ने इस स्थिति को स्वीकार नहीं किया। वो चाहते थे कि हज़रत उसमान रज़ियल्लाहू अन्हू के हत्यारों को उनके अंजाम तक पहुँचाया जाये। उन्होंने नए खलीफा के  हाथ पर बैअत करने से इन्कार कर दिया। हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू अपनी सेना के साथ उन्हें आज्ञाकारिता सिखाने के लिए रवाना हुए। हज़रत मोआविया ने उन्हें सफीन नाम के स्थान पर रोका। कई महीने तक दोनों एक दूसरे के सामने डटे रहे और उसके बाद दोनों में एक मशहूर जंग हुई। जब हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू जीत के करीब थे हज़रत मोआविया के सैनिकों ने नेज़ों पर कुरान की जिल्दें बुलंद कर संघर्ष विराम और विवाद को मध्यस्थता के द्वारा समाधान करने का संकेत दिया। हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू ने मध्यस्थता का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। लेकिन उनके कुछ वफ़ादारों का मानना था कि ये कुरान के निर्देशों के खिलाफ था इसलिए उन लोगों ने वफादारी बदल ली। यही विरोधी खारिजी कहलाए।

मध्यस्थता का विवाद:

इस चरण में हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू का असमंजस विनाशकारी साबित हुआ। उन्होंने अपने कुछ बेहद मुत्तक़ी और पक्के जां निसारों की राय को खारिज करते हुए मध्यस्थता ऐसे समय में कुबूल कर ली जब लंबे और कठिन संघर्ष के बाद जीत उनसे दो कदम दूर थी, पर जब सार्वजनिक राय उनके खिलाफ गई थी तो उन्होंने क़ुबूल नहीं की थी।

दोनों विरोधियों के द्वारा नियुक्त किए गए मध्यस्थों ने ये फैसला सुनाया कि हज़रत उसमान रज़ियल्लाहू अन्हू को इन्यायपर्ण तरीके से क़त्ल किया गया है। इसलिए उनके हत्यारों को सजा दी जानी चाहिए। बहरहाल मोआविया के खिलाफ अपने अभियान को अद्यतन करने की कोशिश से पहले उन्होंने खारिजियों से वापस आने की अपील की।

लेकिन खारिजी, जिनमें से अधिकांश परहेज़गार मुस्लिम थे, उनका ये आग्रह था कि हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू ने मध्यस्थता स्वीकार कर कुरान की नाफरमानी की है इसलिए वो उनकी बैअत के पात्र नहीं हैं। खारिजियों ने उनकी अपील नहीं सुनी तो हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू ने उनके क़त्ल का क़स्द किया और इस तरह उन्होंने अपने कई खैरख्वाहों और वफ़ादारों को अपना बदतरीन दुश्मन बना लिया। वो हज़रत मोआविया के खिलाफ पेश क़दमी नहीं कर सके क्योंकि उनके कई वफ़ादारों ने ये कहकर कर उनका साथ छोड़ दिया कि मध्यस्थता के समझौते का उल्लंघन करके गैर इस्लामी काम के दोषी हुए हैं।  इसके बाद खलीफा नामज़द करने का काम दो मध्यस्थों के सुपुर्द किया गया जिनमें से एक खुद हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू ने निर्धारित किया था। दोनों में से कोई भी खिलाफ़त के उम्मीदवार के रूप में उनके नाम पर ग़ौर नहीं करना चाहता था। हो सकता है कि ये सब अपने सुन्नी पृष्ठभूमि के कारण कह रहा हूँ मगर एक खलीफा की हैसियत से उनके कार्यप्रदर्शन पर ग़ौर करने पर हुजूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की मृत्यु के बाद के संकट के दौर में भी मुसलमानों के उन्हें खलीफा चयनित नहीं करने के फैसले पर सवाल उठाना मुश्किल लगता है। बहरहाल, हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपनी आखरी बीमारी के दौरान इमामत के लिए सहाबी और अपने जिगरी दोस्त हज़रत अबु बकर रज़ियल्लाहू अन्हू को खड़ा करके उनके पक्ष में अपनी प्राथमिकता स्पष्ट कर दी थी।

विवाद का इतिहास:

हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू की मृत्यु के बाद हज़रत मोआविया ने अपनी खिलाफ़त का ऐलान कर दिया। हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू के बड़े बेटे हज़रत हसन रज़ियल्लाहू अन्हू ने खिलाफ़त के अपने दावे को छोड़ने के लिए पेंशन क़ुबूल ली। एक साल के भीतर ही उनकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि उन्हें जहर दे दिया गया। हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू के छोटे बेटे हजरत हुसैन रज़ियल्लाहू अन्हू ने हज़रत मोआविया की मौत तक खिलाफ़त पर अपना दावा स्थगित कर दिया। बहरहाल 680 ई. में हज़रत मोआविया के निधन के बाद उनके बेटे यज़ीद ने खिलाफ़त पर कब्जा कर लिया। हुसैन रज़ियल्लाहू अन्हू ने यज़ीद के खिलाफ लश्कर लेकर पेश क़दमी की मगर कर्बला के मैदान में यज़ीद की भारी फौजों ने उनका और उनके साथियों की हत्या कर दी। हज़रत हुसैन रज़ियल्लाहू अन्हू के सबसे छोटे बेटे अली ज़िंदा बच गए और इस तरह पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्ल्म की नस्ल चलती रही। यज़ीद ने खानदाने उमवी हुकूमत की नींव डाली। कुछ मुसलमान जो यज़ीद की हत्यारी सरकार में भी उन शहीदों के समर्थक और मानने वाले रह गए वो खुद को शीयाने अली या केवल शिया कहने लगे। और मुसलमानों का बहुमत जिन्होंने खामोशी से यज़ीद की इताअत क़ुबूल कर ली और वो सुन्नी कहलाए।

शिया समुदाय हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के परिवार में हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू और हज़रत इमाम हसन रज़ियल्लाहू अन्हू से पैदा होने वालों को इमाम या रूहानी पेशवा स्वीकार कर के उनसे प्रति श्रद्धा व्यक्त करते रहे। लेकिन ये पीढ़ी 873 ई. में अंतिम शिया इमाम हज़रत अलअस्करी के चार साल की उम्र में इमामत के पद पर बैठने के कुछ ही दिनों के बाद लापता होने से विलुप्त हो गई। उनका कोई भाई नहीं था। शियों ने इस बात को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया कि उनका निधन हो गया है और इस विश्वास को प्राथमिकता दी कि वो पर्दे में चले गए हैं और लौट आएंगे। जब वो कई सदियों के बाद भी लौटकर नहीं आए तो आध्यात्मिक सत्ता 12 उलमा की मजलिस को स्थानांतरित हो गया, जिसने एक सुप्रीम इमाम का चुनाव किया। शिया सुप्रीम इमाम की सर्वश्रेष्ठ वर्तमान मिसाल ईरान के रूहानी पेशवा मरहूम आयतुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी हैं, जिन्होंने 1979 में अमेरिका के समर्थित शाह का तख्ता पलट कर ईरानी क्रांति की नींव डाली।

कैथोलिक- प्रोटेस्टेंट विभाजन से समानता:

इस्लाम में शिया- सुन्नी विभाजन कई लिहाज से धीरे धीरे ईसाई धर्म में कैथोलिक- प्रोटेस्टेंट विभाजन से समानता रखता है। जिसमें शिया समुदाय कैथोलिको के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है जबकि सुन्नी समुदाय कई लिहाज से प्रोटेस्टेन्ट से समानता रखता है। शिया इमाम को पोप की तरह आदर व सम्मान दिया गया है और शियों का मज़हबी सिलसिला और धार्मिक प्रभाव के आधार पर कैथोलिक चर्च से अलग नहीं है। दूसरी ओर सुन्नी समुदाय स्वतंत्र प्रोटेस्टेन्ट चर्च से भी कम पाबंद है।

शियों के विपरीत सुन्नियों का कोई रूपानी पेशवा नहीं होता। वो इस्लामी विद्वानों और फ़ुक़्हा (धर्मशास्त्रियों) का सम्मान करते हैं, मगर खुद को उनके फतवों के अधीन नहीं समझते। शिया लोगों का यक़ीन है कि उनका सुप्रीम इमाम एक पूरा रूहानी रहनुमा है जिसे हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का रूहानी फैज़ हासिल है। शिया इमाम को कानून और रवायत का बेख़ता तर्जुमान माना जाता है।

नस्ली और क़ौमी इफ़्तिख़ार ने भी बाद में दोनों समुदायों के बीच संबंधों को बिगाड़ा। गैर अरब संस्कृतियों खासकर ईरानी और भारतीय संस्कृतियों के वारिसों ने भी अपनी अलग पहचान बनाने और कभी कभी अरब शासकों के व्यवहार पर असंतोष व्यक्त करने के लिए भी शिया विचारधारा को अपनाया।

हालांकि शिया विचारधारा का विस्तार हमेशा स्वैच्छिक नहीं था। सोलहवीं शताब्दी के शुरू में ईरान के सफ़वी सल्तनत ने सुन्नी आबादी पर शिया विचारधारा को थोप दिया। आर. एम. सैवोरी (RM SAVORY) टोरंटो युनिवर्सिटी, अपनी किताब कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इस्लाम में लिखते हैं, '' एक ऐसे देश में जहां का बहुमत सुन्नी था, शिया विचारधारा को लागू करना, कम से कम सरकारी तौर पर, जाहिर है बिना विरोध और विरोध करने वालों पर ज़ुल्म व ज़बर्दस्ती के बिना संभव नहीं हो सकता। पालन न करने की सज़ा मौत थी और शुरू से ही उत्पीड़न का भय रहता था। जहाँ तक आम नागरिकों का सम्बंध है,  उत्पीड़न और ज़बर्दस्ती का डर ही काफी था। उलेमा कुछ ज्यादा ही विद्रोही थे। कुछ को मौत की सजा दी गई। कई दूसरे उन क्षेत्रों की ओर भाग गए जहां सुन्नी बहुल इलाका था जैसे हेरात, और सफ़वी हुकूमत के द्वारा ख़ुरासाँ पर कब्जे के बाद बुखारा की राजधानी से उज़बैग की तरफ।'

हालांकि सभी मुस्लिम देशों में शिया हर जगह मौजूद हैं, शिया बहुमत वाला एकमात्र देश ईरान है। इराक, अज़रबईजान और यमन का बहुसंख्यक शिया हैं। बहरीन, सऊदी अरब के पूर्वी तट और लेबनान में भी शिया लोगों की खासी आबादी है। हिज़्बुल्ला, जिसने सन् 2000 में इसराइल को दक्षिण लेबनान से खदेड़ दिया, शिया समुदाय से संबंध रखता है।

तालमेल और सामंजस्य बनाने की कोशिश:

 पूरी दुनिया में शिया और सुन्नी दोनों समुदायों से जुड़े मुसलमान सामंजस्य और तालमेलको बढ़ाने की कोशिशों में लगे हैं। उनकी दलील है कि जिन घटनाओं ने इस्लाम में विभाजन की नींव डाली उनके तेरह चौदह सौ साल गुज़र जाने के बाद आज इस्लाम के ऐतिहासिक व्यक्तित्वों और उनकी प्रेरणाओं के बारे में कोई अंतिम राय नहीं है। दरअसल आज के दौर में भी विश्व मीडिया की मौजूदगी में भी लोगों और घटनाओं के बारे में अंतिम राय कायम करना सम्भव नहीं है।

मिसाल के लिए आज अगर कोई पूरे विश्वास के साथ ये नहीं कह सकता कि सद्दाम हुसैन पश्चिमी (सभ्य) दुनिया के लिए वास्तव में खतरा थे, कोई कैसे ये फैसला कर सकता है कि 656 ई. में हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू, हज़रत उसमान रज़ियल्लाहू अन्हू के क़त्ल में शामिल थे हालांकि वो उनके हत्यारों का अपनी पूरी खिलाफ़त के दौरान बचाते रहे। और बहुत से लोग पूछते हैं कि क्या हमें आज उनके बारे में राय देने की जरूरत भी है?

वैचारिक मतभेद:

अतीत में हुई घटनाओं से दोनों समुदायों के बीच पैदा होने वाले वैचारिक मतभेद दोनों के सम्बंध में आड़े रहे हैं। फिर भी इस्लाम धर्म के पालन में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वास्तव में इन मतभेदों की सुन्नियों के ही चार देशों के बीच मतभेद से ज़्यादा अहम नहीं है। फिर भी सुन्नियों को इस बात का गिला है कि शिया इस्लाम के बुनियादी तत्वों को अधिक महत्व नहीं देते और ज़्यादा अहमियत हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू के आदर और हज़रत हुसैन रज़ियल्लाहू अन्हू और अहले बैत की शहादत को देते हैं।

शिया लोगों में शहादत और क़ुर्बानी के प्रति गंभीर भावनाएं कई सुन्नी मुसलमानों में कड़वाहट का कारण हैं। शिया लोगों के बारे में ये मानना है कि सुन्नियों के लिए गहरी नफरत की भावना रखते हैं। लेकिन जो लोग इस तथ्य से परिचित हैं कि दक्षिण एशिया में बरेलवी, वहाबी और देवबन्दी जैसे सुन्नी समुदाय एक दूसरे को काफ़िर क़रार देकर कितनी सख्त नफरत से लड़ते हैं,, उनके लिए शिया सुन्नी मतभेद कोई महत्व नहीं रखते।

वास्तव में इस्लाम के शुरुआती दौर में शिया लोगों को मुस्लिम समाज से बाहर नहीं किया गया हालांकि उस वक्त भी सुन्नी और शिया उलमा में गर्मा गर्म बहसें चलती थीं। इमाम अबु हनीफा रहिमतुल्लाह अलैहि और इमाम शाफ़ेई रहिमतुल्लाह अलैहि जिनकी सुन्नियों की अक्सरियत पारवी करती थी, दोनों शियों के विभिन्न मामलों में उनके समर्थक रहे हैं। इमाम शाफ़ेई रहिमतुल्लाह अलैहि ने यमन में शियों की विद्रोह में भाग लिया और इमाम अबु हनीफा रहिमतुल्लाह अलैहि इराक में ज़ैदी शियों के विद्रोह में शामिल रहे। निस्संदेह, इमाम अबु हनीफा रहिमतुल्लाह अलैहि ने हदीस पाक की तालीम में शियों के छठे इमाम हज़रत सादिक़ की एहसान मंदी को स्वीकार किया है।

बहरहाल, सदियों पुरानी रंजिशों के बावजूद अहमदी समुदाय के मामले में कामयाबी से हौसला पाकर सुन्नियों ने ये मांग करना भी शुरू कर दिया है कि शियों को गैर मुस्लिम करार दिया जाये। सऊदी अरब जहां के शासक मसलकी (पंथीय) नफरत को फैलाने में सबसे आगे हैं, वहाँ के शेख बिन बाज़ ने कथित तौर पर एक फतवा में यहाँ तक कह दिया है कि अहले किताब (यहूदी और ईसाई) का गोश्त मुसलमानों के लिए हलाल है लेकिन शियों के ज़रिए ज़िबह किया हुआ गोश्त हलाल नहीं है।

वहाबियों की असल शिकायत ये है कि शिया लोगों ने ईमान की बुनियादी शहादत को ही बदल दिया है। सुन्नी कल्मए शहादत यूँ है:

 ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मदुर रसूलुल्लाह

 (अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, मोहम्मद अल्लाह के रसूल हैं)

लेकिन शिया लोग नीचे लिखे कलमात को भी जोड़ देते हैं:

 अली होवा सिद्दीक़ अल्लाह, खलीफतुर रसूलुल्लाह वलखलीफतुल अव्वल

(अली अल्लाह के दोस्त हैं और रसूलुल्लाह के उत्तराधिकारी और पहले खलीफा हैं)

व्यवहारिक मतभेद:

शिया- सुन्नी समुदायों में धार्मिक संस्कारों के मामले में भी कुछ मतभेद हैं। शियों के यहां अज़ान जरा सी अलग है जिसमें अली रज़ियल्लाहू अन्हू की शान में कुछ शब्द जोड़ दिए गए हैं। वो लोग वज़ू और नमाज़ थोड़े अलग तरीके से अदा करते हैं। मिसाल के तौर पर वो सज्दा सीधे जाए नमाज़ नहीं बल्कि कर्बला की मिट्टी के टुकड़े पर करते हैं। वो नमाज़ों को मिलाकर पढ़ लिया करते हैं यानी दिन में पांच वक्त के बजाय तीन बार। लेकिन ये सहूलत के आधार पर व्यक्तिगत तरीका है और ऐसी नमाज़ पढ़ना, न पढ़ना बराबर है। बहरहाल, शिया मस्जिद में सुन्नी मस्जिदों में पाँचों वक्त की नमाज़ अदा की जाती है।

हालांकि दोनों समुदायों की बुनियादी इल्हामी किताब एक ही यानी क़ुरान है। शिया लोग हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की कुछ विभिन्न हदीसों और उनके रावियों पर विश्वास करते हैं। वो हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू और हज़रत फ़ातिमा रज़ियल्लाहू अन्हा की रवायतों को दूसरे सहाबा खासकर आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा की रवायतों पर तर्जीह (प्राथमिकता) देते हैं। शिया लोगों के यहाँ अस्थायी शादी जिसे मुताह कहते हैं, उसकी इजाज़त है जबकि ये सुन्नियों के यहां मना कर दिया गया है। मुताह हुजूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के वक्त में प्रचलन में थी। इस्लामी आलिम हुसैन अब्दुल वहीद अलीम के अनुसार रूढ़िवादी मौलवियों और महिला अधिकारों के अलमबरदारों के द्वारा अब ईरान में इसे आम किया जा रहा है। इसके पीछे उद्देश्य ये है कि महिला कौमार्य के बारे में दोनों समुदायों में जो जुनून है उसे कम किया जाए और इसके लिए ये कारण पेश किया जाता है कि हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के 13 अज़्वाजे मोत्तहेरात (पत्नियाँ) में से सिर्फ एक शादी के वक्त कुंवारी थीं।

सभी विरोधियों के दावों और आरोपों में विरोधाभास है। हज़रत उसमान रज़ियल्लाहू अन्हू के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण आरोप ये था कि उन्होंने धर्म में नवाचार और कुरान के आदेशों और रसूले पाक सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के हदीसों से आगे निकल गए। हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू इन बिदआत और नवाचारों के खिलाफ लड़े। मगर उनके पूर्व वफादार और समर्थक खारिजियों की तरफ से मध्यस्थता के मामले में वही आरोप लगाए गए।

शिया लोग सही तौर पर उम्मवी खानदान पर अपनी हुकूमत बनाने का आरोप लगाते हैं जो कोई भी इस्लाम के बारे में जरा सी भी जानकारी रखता है, उसे मालूम है कि इस्लाम इंसानों के बीच समानता का सबक़ देता है सिवाय तक़वा (परहेज़गारी) के। लेकिन शिया लोगों का ये भी मानना है कि खिलाफ़त का सिलसिला हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के खानदान में जारी रहनी चाहिए थी, इस बात पर ध्यान दिये बिना कि खिलाफ़त के वारिस इस लायक़ थे या नहीं। बहुत से सुन्नी इस विचार को ही तौहीने रिसालत सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम मानते हैं कि हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम खानदानी सिलसिलए खिलाफ़त जारी करना चाहते थे।

शिया- सुन्नी एकता का मौक़ा 750 ई. में आया था। अबुल अब्बास सुफ्फा के नेतृत्व में मिस्र के जंगे ज़ब में अम्मवी खानदान का पूरी तरह सफाया हो गया था। ये सलाह दी गई कि हुसैन रज़ियल्लाहू अन्हू के पर पोते जाफर सादिक को खलीफा नियुक्त किया जाए। लेकिन 754 ई. में जाफर की मौत तक इस मामले को अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता था कि अब्बास के भाई मंसूर ने हज़रत जाफर रज़ियल्लाहू अन्हू की हत्या कर दी और खिलाफ़त पर कब्जा करके बगदाद में अब्बासी सल्तनत की नींव डाली जो 1258 सन् तक बगदाद की बर्बादी के समय तक सत्तारूढ़ रहे। इसके काफी समय बाद एक दूसरा मौका भी आया। 1959 में सुन्नी समुदाय के विशाल और दुनिया की सबसे पुरानी युनिवर्सिटी काहिरा के अलअज़हर के स्कूल ऑफ थियोलोजी के प्रमुख शेख महमूद शलतूत ने फतवा जारी किया कि जाफ़री मसलक (मसलक) को जिसको शियों का बहुमत मानता है, उसे मुसलमानों का एक मसलक माना जाए।

फ़तवे के दो महत्वपूर्ण बिंदुः

(1) इस्लाम किसी मुस्लिम पर विशेष मसलक की पाबंदी नहीं लगाता। बल्कि हम ये कहते हैं कि हर मुस्लिम को ये हक़ है कि वो किसी भी मसलक की पैरवी कर सकता है, जो सही तरीके से बनाया गया हो और उसके कानून उसकी किताबों में सुरक्षित हैं। और हर कोई अपने मसलक को छोड़कर दूसरे मसलक में शामिल हो सकता है और ऐसा करते हुए वो किसी जुर्म का दोषी नहीं होगा।

(2) जाफ़री मसलक जिसे अलशिया अलउम्मिया अलअस्ना अस्रिया (बारह इमामों को मानने वाले शिया) कहा जाता है, भी धार्मिक रूप से उतना ही सही है जितना सुन्नी मसलक। मुसलमानों को इस बात की जानकारी होनी चाहिए और किसी विशेष मसलक के बारे में बेजा ईर्ष्या और भेदभाव नहीं रखना चाहिए क्योंकि अल्लाह दीन और शरीयत को किसी एक मसलक तक कभी सीमित नहीं किया गया। उनके फ़ुक़हा अल्लाह के अनुसार मक़बूल हैं और किसी भी गैर मुज्तहिद के लिए ये जायज़ है कि वो उनकी पैरवी और तक़लीद इबादत और दूसरे मामलों में कर सकता है।

कई लोगों का मानना है कि ये फतवा सामंजस्य और तालमेल के लिए आधार बनाया जा सकता है। ये कम से कम शिया सुन्नी मतभेद के लिए पुल का काम कर सकता है। ईरान के मरहूम इमाम आयतुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी ने इस दिशा में पेश कदमी की थी। 1979 ई. में शाह को अपदस्थ करने के लिए उनकी क्रांति को कभी शिया क्रांति नहीं कहा गया बल्कि इस्लामी क्रांति कहा गया।

सलमान रुश्दी के विरूद्ध मौत का फतवा:

1989 में सलमान रुश्दी की किताब शैतानी आयात के लिए उनके खिलाफ खुमैनी का फतवा कई लिहाज़ से काफी विवादास्पद था। लेकिन ये सच्चाई अपनी जगह है कि ये फतवा हुजूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की अज़्वाजे मोत्तहेरात (पत्नियों) खासकर हज़रत आइशा रज़ियल्लाहू अन्हा को बचाने में था जिन्होंने ने हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू के खिलाफ जंग किया था और इसलिए शिया लोग उनके बारे में अच्छी राय नहीं रखते। रुश्दी ने शिया आलोचकों के अनुसार भी हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू या शिया लोगों का अपमान नहीं किया था। उसने इस्लाम,, पैगम्बर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और उनकी अज़्वाजे मोत्तहेरात को निशाना बनाया था।

इस फ़तवे के नकारात्मक प्रभाव जैसे पश्चिम में मुसलमानों की धार्मिक जुनूनियों के रूप में पहचान पर ध्यान दिये बिना उसका सकारात्मक पहलू ये था कि उसने धार्मिक स्वभाव के शिया और सुन्नी लोगों को एक मंच पर ला खड़ा किया था। लेकिन इस मौक़े को खो दिया गया। यहां तक कि वो मुसलमान जो इस फतवा के विरोधी थे, वो स्वीकार करते कि ये फतवा शिया फतवा बिल्कुल नहीं था।

पूरे अरब में अमेरिका के नये हस्तक्षेप से पैदा हुए हालात में सहमति और तालमेल की तत्काल आवश्यकता फिर से महसूस की जा रही है। इस्लामी मीडिया और इंटरनेट पर होने वाली बहस इस बात का इशारा दे रही है कि इस दिशा में जल्द ही कोई पेश क़दमी होने वाली है। बहुत से सुन्नी और शिया लोगों ने अनावश्यक और बुनियादी रूप से निरर्थक विभाजन पर असंतोष व्यक्त किया है।

हिंदुस्तान की शिया- सुन्नी एकता, आशा की एक किरणः

बहरहाल, ये स्वीकार भी करना पड़ता है कि ये काम इतना आसान नहीं है। ये सब जानते है कि पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन सिपाहे सहाबा जिस पर शियों की हत्या का आरोप है, वर्षों से सऊदी अरब के वहाबी शासकों से आर्थिक सहायता प्राप्त करता रहा है। इसी तरह ईरान के बारे कहा जाता है कि वो पाकिस्तान में चरमपंथी शिया संगठन तहरीके नेफाज़े जाफरिया की वित्तीय सहायता करता है। ये दोनों संगठन पाकिस्तान में शिया- सुन्नी मतभेद को हवा देने का काम करते रहे हैं।

जहां तक अरब जगत का सवाल है, अमेरिका में रहने वाले इस्लामी आलिम सैय्यद हुसैन नस्र कहते हैं, पिछले कुछ वर्षों में सत्ता में बैठे लोगों के द्वारा राजनीतिक हितों के मद्देनजर फारस की खाड़ी में स्थित देशों में शियों व सुन्नियों के बीच नफरत की आग को भड़काने के लिए काफी धन खर्च किया गया है।

इस घटना को अधिक समय नहीं बीता कि 1980 में अरबों ने सद्दाम हुसैन के द्वारा ईरान पर हमले का इस आधार पर समर्थन किया था कि खाड़ी क्षेत्र में शिया शक्ति का विकास सुन्नी अरब देशों के लिए एक खतरा था। 8 साल के इराक- ईरान युद्ध का, जिसने शिया- सुन्नी विभाजन को और भी बल प्रदान कर दिया, पश्चिमी शक्तियों ने इसमें पूरी ताकत से साथ दिया।

सद्दाम के इराक की सेकुलर अरब राष्ट्रीयता, सऊदी अरब की वहाबी इस्लामी कट्टरवाद और पश्चिमी साम्राज्यवाद और उसके असीमित मीडिया और संसाधन के नापाक गठबंधन ने मिलकर शिया- सुन्नी विभाजन को काफी संगीन बना कर पेश किया है। इसलिए ये बेवजह नहीं है कि पश्चिमी मीडिया बहुत कम ही किसी इराकी को मुसलमान के रूप में पेश करता है। इराक में मुसलमान हैं ही नहीं, केवल शिया हैं, सुन्नी या कुर्द हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह उनके लिए कोसोवो में मुसलमान नहीं केवल अलबानियाई मूल के लोग थे।

इराक में ये भय सही साबित नहीं हुआ कि कई दशकों पर आधारित सुन्नी प्रभुत्व के खिलाफ गंभीर प्रतिक्रिया सामने आएगी, जो ये दर्शाता है कि बांटो और राज करो के साम्राजी परियोजना को इस देश में कम से कम अब तक कामयाबी नहीं मिली है। अब इस्लामी दुनिया के शियों व सुन्नियों की जिम्मेदारी है कि इराक की मिसाल को सामने रखते हुए साम्राज्यवादी शक्तियों की साजिशों और चरमपंथियों की परवाह न करते हुए सद्भाव और शांति को बढ़ावा दें। हिंदुस्तान के शिया और सुन्नी समुदाय इस अमल में उम्मीद की किरण बन सकते हैं। हम मौलाना कल्बे जव्वाद और मोहतरमा सैय्यदा हमीद के पद चिन्हों पर चल कर तालमेल और सामंजस्य द्वारा वास्विक एकता की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

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