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Hindi Section ( 8 Dec 2012, NewAgeIslam.Com)

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The Truth Behind Taliban's Fatwa Justifying Killings Of Innocent Civilians नवाये अफगान जिहाद का फतवा और उसकी वास्तविकता. (क़िस्त- 2)

 तालिबान मौजूदा दौर के खारिजी हैं और उनका अस्तित्व कुरान, हदीस और फ़िक़्ह के मुताबिक गैर इस्लामी और गैर शरई है।

सोहेल अरशद, न्यु एज इस्लाम

7 दिसम्बर, 2012

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

इससे पहले कि अफगान तालिबान के फतवा का विश्लेषण किया जाए, आइए उससे पहले कुरान और हदीस और फ़िक़्ह की रौशनी में खुद तालिबान के अस्तित्व, उसके व्यवहार और उसके विचारों का विश्लेषण करें।

अफगान तालिबान और तहरीके तालिबान पाकिस्तान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान का गैरकानूनी और आतंकवादी संगठन हैं, जो अफगानिस्तान और पाकिस्तान की संवैधानिक सरकारों को नहीं मानता और उनके खिलाफ गोरिल्ला युद्ध में लगे रहते हैं। अफगानिस्तान में ये संगठन वहां की संवैधानिक सरकार से संघर्षरत रहता है और वहां के सैनिक, राजनयिक और शहरी स्थानों को अपनी हिंसक गतिविधियों का निशाना बनाते रहते हैं जिसके नतीजे में सैनिकों और नागरिकों की जानी व माली नुकसान होता है। ये संगठन लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखता और अपनी एक समानांतर सरकार चलाता है। रूस के अफगानिस्तान से निकलने के बाद जब अहमद शाह मसूद के नेतृत्व में अफगानिस्तान में संयुक्त सरकार का गठन हुआ तो इसमें शामिल होने की दावत को तालिबान ने ठुकरा दिया, क्योंकि उसकी नज़र में उनके अलावा बाकी सभी जमातें गैर इस्लामी और गैर शरई थीं। इसलिए हुकूमत करने का अधिकार केवल उन्हें था। पाकिस्तानी तालिबान जो विचारधारा, व्यवहार और राजनीतिक उद्देश्यों के आधार पर अफगानिस्तान तालिबान से अलग नहीं हैं, पाकिस्तान हुकूमत के खिलाफ आतंकवादी कार्रवाईयों को अंजाम देते रहते हैं। पाकिस्तान के सैन्य संगठनों, अल्पसंख्यक संस्थानों और मासूम और निहत्थे नागरिकों के खिलाफ आत्मघाती बम हमले के ज़रिए से अनगिनत जानी और माली नुकसान का कारण बनते हैं। बावजूद इस बात के कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अधिसंख्य आबादी मुस्लिम है और वहाँ मुसलमानों की निर्वाचित सरकार है। इसलिए इस तरह के देश की संवैधानिक सरकार को न मानने वाले लड़ाकू समूहों को कुरान और हदीस के अनुसार विद्रोही (बाग़ी) कहा जाता है और उनके खिलाफ कुरान, हदीस और फ़िक़्ह में बहुत सख्त आदेश है। इसलिए कुरान और फ़िक़्ह की रौशनी में उनके अस्तित्व, उनके व्यवहार और विचारों का विश्लेषण नीचे प्रस्तुत है।

तालिबान एक बाग़ी और गैर शरई जमात है

इमाम अब्दुर्रहमान अलजज़ारी अपनी किताब अलफ़िकह अलमज़ाहिब अलअरबा पेज 419 में फ़रमाते हैः

'' अगर एक जमात (किसी मुल्क की) मुस्लिम हुकूमत के खिलाफ बग़ावत करती है और खुदा या इंसानों के अधिकारों के अमल दरआमद में रुकावट होती है या हुकूमत के आदेशों को मानने से इनकार करती है और उसका तख्ता पलटने का इरादा रखती है, इस बात के बावजूद कि वो हुकूमत अत्याचारी है तो हुकूमत के लिए ये ज़रूरी है कि वो इन बाग़ियों को चेतावनी दे लेकिन अगर इसके बावजूद, अगर वो आज्ञाकारिता से इनकार कर दें तो तलवार से उनसे जंग करे।

इसी तरह तालिबान जैसी बाग़ी आतंकवादी संगठनों के बारे में इमाम मरगनानी ने लिखा है।

''जब मुसलमानों का एक समूह किसी इलाके पर कब्जा जमा ले और वहां की मुस्लिम सरकार के खिलाफ बग़ावत कर दे तो सरकार को चाहिए कि वह उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल होने की दावत दे और उनके धोखा देने वाले तर्कों को रद्द करे, ठीक जिस तरह हज़रत अली रज़ि. ने जंग से पहले हारवरा के खारिजियों के साथ किया था। इसके अलावा ये दो विकल्प में से आसान भी है ताकि शायद इससे बुराई को रोका जा सके। सो,  पहले हुकूमत उन्हें वापसी की दावत दे, और जब तक वो आक्रामक कार्रवाई न करें तब तक जंग की शुरुआत न करे। और जब वो हिंसक कार्रवाईयाँ शुरू करें तो उनसे जंग करे और उनके सैनिकों में बिखराव पैदा करे (और उनकी ताकत को कुचल डाले)''

इसलिए, तालिबान जैसे आतंकवादी और मुस्लिम हुकूमत की इताअत से इनकार करने वाले और खून खराबा और कत्ल करने की विचारधारा में विश्वास रखने वाले संगठन के बारे फुकहा (धर्मशास्त्रियों) और विद्वानों का कहना है कि ये गैर इस्लामी और गैर शरई संगठन हैं और इनके साथ मुस्लिम हुकूमतों को सख्ती से पेश आना चाहिए और उनका खात्मा कर देश में शांति की राह प्रशस्त की जाए। जिस तरह हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू ने हारवरा के खारिजियों के साथ व्यवहार किया था। कुरान में भी उनसे संबंधित स्पष्ट आयतें हैं जो उनके इस हिंसक विचारधारा और कार्यों की निंदा और विरोध करती हैं और उनको हराने का आदेश देती हैं। सूरे बकरा में अल्लाह फरमाता है।

'और जब उनसे कहा जाता है कि ज़मीन पर फसाद मत मचाओ तो वो कहते हैं कि हम तो इस्लाह (सुधार) करने वाले हैं। बेशक वही हैं फसाद करने वाले मगर वो समझते नहीं' (अलबकराः 11-12)

एक दूसरी जगह कुरान कहता है

'और अगर दो फिरक़े (समुदाय) मुसलमानों के आपस में लड़ पड़ें तो उनमें मिलाप करा दो। फिर अगर चढ़ा जाये एक इनमें दूसरे पर तो लड़ो उस चढ़ाई वाले से, जब तक फिर आवे अल्लाह के हुक्म पर, फिर अगर पलट आया तो मिलाप कराओ, उनमें बराबर और इंसाफ करो। बेशक अल्लाह को पसंद हैं इंसाफ वाले।' (सूरे अलहुजरात: 9)

इसलिए, तालिबान बाग़ियाना रविश की निंदा और विरोध कुरान, हदीस और फ़िक़्ह स्पष्ट रूप से करते हैं और इसे गुमराह लोगों और लूट मार करने वालों की जमात से ताबीर देते हैं और उनके लिए वही सज़ा का सुझाव देते हैं जो लुटेरों के लिए प्रस्तावित की जाती है।

इमाम अबु जाफर तहावी फरमाते हैं,

'' हम उम्मत के खिलाफ तलवार के इस्तेमाल का समर्थन नहीं करते। सिवाय उसके लिए जिसके लिए तलवार का इस्तेमाल जरूरी है। हम अपने शासकों के खिलाफ विद्रोह का समर्थन नहीं करते और न ही उनके खिलाफ जिनके ज़िम्मे हमारे मामले हैं। बावजूद इसके कि वो अन्याय करने वाले हैं। हम न उनके खिलाफ हुक्म जारी करते हैं और न उन्हें अपनी आज्ञाकारिता के लिए कहते हैं। (अलतहावी- अलअक़ाएद अलतहाविया, पेज 71-72)

उपरोक्त अंश से स्पष्ट होता है कि मुसलमान हुकूमत न्याय न करने वाली भी हो, तो भी उसके खिलाफ सशस्त्र विद्रोह करना और मुल्क में बदअमनी, अराजकता, हत्या, मारधाड़ करना मना है। बल्कि इसके लिए शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके अपनाने का निर्देश दिया गया है। क्योंकि बहुत से न्यायपूर्ण और नेक लोग होते हैं जिनके साथ मिल कर हुकूमत में फैले भ्रष्टाचार और अन्याय को दूर किया जा सकता है।

इसलिए, अपनी किताब अलफ़िक़्हा अलइब्सात में इमाम अबु हनीफा रहिमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं।

'इसलिए बाग़ियों के खिलाफ उनके बागियाना प्रवृत्ति (रविश) के कारण जंग करो, उनके विश्वास की वजह से नहीं। न्यायपूर्ण और उदारवादी जमात का साथ दो और बाग़ी जमात के साथ मत रहो। अगर मुख्य धारा की बहुसंख्यकों वाली जमात में ज़ालिम और भष्ट लोग होते हैं तो उनमें नेक लोग भी हैं जो ज़ालिमों और भ्रष्ट लोगों के खिलाफ तुम्हारी मदद करेंगे। हाँ अगर जमात या बहुमत भी बग़ावत की हालत में हो, तो इस सूरत में दूसरों के पास मदद के लिए जाओ। ख़ुदा कहता है कि '' क्या खुदा की ज़मीन वसी (व्यापक) नहीं थी कि तुम इस हालत में वहां से हिजरत (पलायन) कर जाते? (सूरे अलनिसाः 97)

उपरोक्त अंश इस बात की दलील देते हैं कि इस्लाम में लोकप्रिय और चुनी हुई अवाम की हुकूमत के खिलाफ़ बग़ावत करके और सिर्फ खुद को ही सही मार्ग पर चलने वाली जमात करार देना और इस आधार पर निर्दोष लोगों का खून खराबा और अशांति के दलदल में धकेलना खिलाफे शरीअत काम है और ऐसे लोगों और जमातों के खिलाफ जनता को भी हुकूमत का साथ देना चाहिए। क्योंकि इस तरह की जमातें फित्ना हैं जिस तरह हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू के दौरे खिलाफ़त में खारिजी एक फित्ना थे।

इमाम अलनोवी रहिमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं,

'इमाम अलबग़वी की राय है कि ये लोग फ़ासिक और ज़लील हैं जो बग़ावत करते हैं और उनके बारे में वही हुक्म है जो डाकुओं और लुटेरों का है। ये हुक्म कानूनी मकतब और मतन के मुताबिक है और बहुसंख्यकों का धर्म है। इमाम (अलबग़वी) की खारिजियों को ईमान से खारिज करार देने के बारे दो राय हैं। उन्होंने कहा कि अगर हम उनके खिलाफ कुफ्र के तहत हुक्म नहीं लगाते तो उनके साथ मुर्तदों (स्व धर्म त्याग करने वाले) से सम्बंधित हुक्म के तहत व्यवहार किया जाएगा। ये भी कहा जाता है कि उनके साथ बाग़ियों के लिए महफूज़ (सुरक्षित) फतवा के तहत भी सुलूक किया जाता है। (इमाम अलनोवी: रौज़ातुल तालिबीन 10: 51-52)

तालिबान जैसे बाग़ी संगठन की हज़रत आबेदीन अलशामी ने अपनी किताब रद्द अलमोहतार (4: 262) में तारीफ (परिभाषा) इस तरह पेश की है।

'बाग़ी जमात वो समुदाय है जिसके पास हथियार हो और उसका मकसद सत्ता हासिल करना हो। वो एक ग़लत व्याख्या और तावील के आधार पर इंसाफ करने वालों से जंग करते हैं और ये दलील देते हैं कि ''हम हक़ पर हैं और ये कि '' हम ही शरई तौर पर हक़ीक़ी हाकिम (वास्तविक शासक) हैं।''

अपनी मशहूर किताब अलमुगनी में इमाम इब्ने कदामा अलमुकदसी (9.4)  फ़रमाते हैः

'मोहद्देसीन की एक जमात की राय है कि बाग़ी (विद्रोही) लोग काफ़िर और मुर्तद हैं, और उनका हुक्म भी मुर्तद के हुक्म के इस तरह बराबर है कि उनका खून और उनकी दौलत हलाल है। अगर वो लोग एक विशिष्ट स्थान पर केंद्रित हो जाते हैं और ताकत और फौज जमा कर लेते हैं तो वो दूसरे कुफ़्फ़ार की तरह अहले अलहर्ब (लड़ाका) करार पाते हैं। और अगर वो हुकूमत की कैद में हों तो उनसे तौबा के लिए कहा जाए जिस तरह मुर्तद से तौबा के लिए कहा जाता है। अगर वो तौबा करते हैं (तो उनके हक़ में बेहतर है) वरना उन्हें मार दिया जाए और उनकी संपत्ति को फए (बिना जंग के हाथ आया हुआ माले ग़नीमत) करार दिया जाये। और उनके वारिसों का इसमें से कुछ हिस्सा नहीं होगा।

इसलिए, तालिबान भी ऐसा ही संगठन है जो बावजूद ये कि शरई तौर पर गलत और बागी जमात हैं अपने आप को हक़ पर समझते हैं और अपनी हुकूमत को ही इस्लामी हुकूमत करार देते हैं और इस आधार पर इंसाफ करने वालों से जंग और मासूम औरतों और बच्चों के क़त्ल को उचित और शरीअत के मुताबिक़ क़रार देते हैं।

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