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Hindi Section ( 12 Dec 2012, NewAgeIslam.Com)

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The Truth Behind Taliban's Fatwa Justifying Killings Of Innocent Civilians नवाये अफगान जिहाद का फतवा और उसकी वास्तविकता: (किस्त 3)- खुदकुशी, नशीली दवाओं और खारिजियत पर आधारित तालिबानी फिक्र और अमल

 

सोहेल अरशद, न्यु एज इस्लाम

तालिबान का गैर शरई और इस्लाम विरोधी व्यवहार

खुदकुशी

तालिबान की जंग की रणनीति आतंकवादी हमलों और आत्मघाती बम धमाकों पर आधारित है। ये मुस्लिम नौजवानों को जिहाद के नाम पर आत्मघाती बम

धमाकों की प्रेरणा और ट्रेनिंग देते हैं। जमीअत उलेमाए इस्लाम के तहत पाकिस्तान- अफगानिस्तान सीमावर्ती इलाकों में चलाए जाने वाले मदरसों में जिन मोहाजिरीन (अप्रवासियों) बच्चों को तालीम दी जाती है बाद में उन्हीं बेसहारा छात्रों को तालिबानियों में शामिल किया जाता है और उन्हें खुदकुशी के लिए प्रेरित किया जाता है। खुद तालिबानी कमांडरों के हुक्म पर नौजवान आत्मघाती धमाके कर के अपनी जान के साथ अनगिनत मासूम लोगों की जानों को भी बर्बाद कर देते हैं, जिनमें ज़्यादातर मासूम और बेकसूर लोग होते हैं जिनमें बच्चे बूढ़े और औरतें भी शामिल होती हैं। इस तरह आत्मघाती धमाके करने वाले नौजवान दोहरे गुनाह के दोषी होती हैं। एक तो वो खुदकुशी जैसे हराम अमल के दोषी होते हैं और अल्लाह की दी हुई ढेर सारी नेमत को अपने हाथों ही बर्बाद कर देते हैं और दूसरे खुदकुशी के नतीजे में दर्जनों मासूम लोगों के क़त्ल के दोषी भी होते हैं। इसलिए, खुदकुशी को जंग की रणनीति का हिस्सा बनाने वाला गिरोह कभी हक़ पर नहीं हो सकता। क़ुरान कहता है-

ला-तक़तोलू अनफ़ोसाकुम (सूरह अलनिसाः 29)

(अपनी जान को हलाक़त में न डालो)

मोफस्सिरीन (व्याख्या करने वाले) इस बात पर सहमत हैं कि ऊपरोक्त आयत खुदकुशी की हुर्मत पर है। इस तरह क़ुरान खुदकुशी को हराम करार देता है।

हदीसों में भी खुदकुशी करने वाले लोगों को जहन्नमी (जहन्नम) करार दिया गया है।

अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हू से रवायत है कि हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया,

'' जो कोई भी खुद को मारने के लिए पहाड़ से कूदता है वो जहन्नम में भी हमेशा खुद को पहाड़ से गिरा कर मारता रहेगा। जो कोई भी खुद को मारने के लिए ज़हर पीता है वो जहन्नम में ज़हर पी कर अपने आपको बार बार मारता रहेगा और जो खुद को किसी लोहे (के औज़ार) से मारता है वो जहन्नम में खुद को उसी हथियार से मारता रहेगा। (सही बुखारी)

हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम खुदकुशी करने वाले की नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ाते थे।

जाबिर बिन समोरा ने कहा कि एक व्यक्ति ने अपने आपको एक बरछी से मार लिया। और जब उसकी मैय्यत लाई गई तो हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने नमाज़े जनाज़ा पढ़ाने से इनकार कर दिया।

इसलिए, ऐसी जमात जो लोगों को खुदकुशी और अनावश्यक और अकारण खून खराबे की प्रेरणा दे वो गैर शरई और गैर इस्लामी होगी और ऐसे अमल करने के दोषी लोग बग़ैर शक के जहन्नम में जाने वाले होंगे।

आय का हराम स्रोत

विभिन्न सर्वेक्षणों और रिपोर्टों से ये बात स्पष्ट हो गई है कि तालिबान अपनी जंग को जारी रखने के लिए अफ़ीम और मादक पदार्थों के व्यापार में हिस्सेदारी और उसके संरक्षण और जबरन वसूली जैसे गैर शरई माध्यम से फण्ड इकट्ठा करते हैं। अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था की निर्भरता अफ़ीम की खेती पर है। अफ़ग़ानिस्तान के अफ़ीम का व्यापार सालाना चार अरब डॉलर का है और इसलिए तालिबान को अपनी जंग जारी रखने के लिए अफ़ीम और मादक पदार्थों के व्यापार से होने वाली आमदनी पर निर्भर करना पड़ता है जो कि इस्लामी शरीयत के मुताबिक हराम है। हाल ही में ग्रीचीन पीटर्स के शोध पत्र 'अफ़ीम तालिबान को किस तरह लाभ पहुंचाता है में विस्तार से ये बताया गया है कि तालिबान कमांडरों ने अपनी इस जंग को जारी रखने और अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए अफ़ीम के व्यापार और खेती में हिस्सा लिया। इस पत्र में कहा गया है।

'शुरु से ही इस तहरीक (आंदोलन) ने (तालिबान) ड्रग तस्करों, व्यापारियों और ट्रक वालों के नापाक गठजोड़ के वित्तीय सहयोग पर निर्भर किया है। इस शोधपत्र के लेखक के अनुसार कई तालिबान कमांडरों और लीडरों ने अफ़ीम के व्यापार में पैसे लगाए। बहुत से कमांडरों ने खुफिया तौर पर जमा किये गये अफ़ीम के भंडारों को बेच कर दौलत कमाई। अफ़ीम की खेती और इसके परिवहन को सुरक्षा प्रदान करने के बदले पैसे वसूलना भी तालिबान के लिए आमदनी का अच्छा स्रोत है। सर्वे किए गए लोगों में से 65 फीसद ने बताया कि तालिबान की मुख्य गतिविधि अफ़ीम की फसल को सुरक्षा प्रदान करना और फिर फार्म एरिया से उन्हें निकाल कर इच्छित स्थान तक हिफाज़त से भेजना है। अफगानिस्तान में अफ़ीम से लदे हुए ट्रकों से cut money वसूलना इस इलाके के ताकतवर लीडरों के लिए आमदनी का आम स्रोत है। मुल्ला उमर के दाहिने हाथ और एक पूर्व कमांडर हाजी बशर नूरज़ई तालिबान के लिए लाखों डॉलर की हीरोइन स्मगल करने के इल्ज़ाम में मैनहटन की जेल में आजीवन कारावास की सज़ा भुगत रहे हैं।

तालिबान का वैचारिक आतंकवाद या खारिजियत

हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू के शासनकाल में खारिजियत का फित्ना उठा था। खारिजी खुद को इस्लाम का सच्चा अलम बरदार मानते थे और इस आधार पर हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू की इमामत या क़यादत (नेतृत्व) को स्वीकार करने से इनकार करते थे। उन्होंने अपने दृष्टिकोण के विरोधियों चाहे वो मुसलमान ही क्यों न हो, के क़त्ल को जायज़ करार दिया था। ठीक उसी तरह तालिबान भी आज के दौर के खारिजीन हैं जो इस्लाम की एक अतिवादी व्याख्या पेश करते हैं और अन्य सभी समुदायों को काफ़िर और वाजिबुल क़त्ल बताते हैं। पाकिस्तान में इन लोगों ने शिया, अहमदियों और बरेलवी मसलक (पंथ) के लोगों के खिलाफ हिंसक वैचारिक युद्ध छेड़ रखा है और इन समुदायों के लोगों का क़त्ल और उनकी इबागतगाहों पर आत्मघाती हमले, उनके उलेमा की नज़र में जायज़ हैं। हर साल तालिबान के द्वारा इन समुदायों और इनकी इबादतगाहों पर तालिबान के हमलों और आत्मघाती धमाकों में सैकड़ों लोग मौत का शिकार बनते हैं। पाकिस्तान में अपने प्रभुत्व वाले इलाकों में उन्होंने दाढ़ी शेव करने पर हज्जामों की दुकान को बंद कर दिया है, लड़कियों की तालीम पर प्रतिबंध लगा दिया है और उनके स्कूलों को जबरन बंद करा दिया है। और ताक़त के बल पर शरीयत की उनकी पेश की हुई व्याख्या को लागू करना चाहते हैं।

उन्होंने 2010 में क्वेटा और मर्दान में आत्मघाती बम धमाके करके कम से कम 55 लोगों को मारा। जब शियों का एक जुलूस यौमे क़ुद्स पर बैतुल मक़दस पर इस्राइली क़ब्जे का विरोध कर रहा था। (क्या इस तरह वो इसराइल का समर्थन कर रहे थे?) इसी तरह उन्होंने मर्दान में एक मस्जिद के बाहर आत्मघाती हमला किया और दर्जनों लोगों की क़त्ल कर दिया और 200 लोग ज़ख़्मी हुए।

तालिबान ने 2008 में पाकिस्तानी सेना की हथियार फैक्ट्री पर दो आत्मघाती हमले करवाये जिसके नतीजे में 59 लोग मारे गए और मरने वालों में ज़्यादातर मुसलमान थे।

अप्रैल 2011 में तालिबान ने डेरा ग़ाज़ी ख़ान में एक सूफी दरगाह पर हमला किया जिसके नतीजे में 41 लोग मौत का शिकार हुए। तालिबान प्रवक्ता एहसानुल्लाह एहसान ने इसकी जिम्मेदारी कुबूल की।

2008 में वाह में धमाका कर के 70 नागरिकों का क़त्ल किया।

जुलाई 2010 में दाता गंज बख्श के दरबार में दो आत्मघाती हमले हुए जिनमें 42 मासूम लोग मारे गए। इससे पहले अहमदियों पर हमला किया गया जिसमें 94 अहमदियों का क़त्ल हुआ था। इस तरह तालिबानियों ने अहमदियों, शियों और सूफियों समेत अन्य इस्लामी समुदायों के खिलाफ क़त्ल व ख़ून का बाजार गर्म कर रखा है।

इस साल मोहर्रम में डेरा इस्माइल ख़ान में भी तालिबान ने शियों के आशूरा जुलूस में बम धमाका किया जिसमें पांच शियों की मौत हो गई। पाकिस्तानी तालिबान ने हमलों की जिम्मेदारी क़ुबूल की। इसी तरह रावलपिंडी में भी आशूरा के जुलूस पर तालिबान ने आत्मघाती हमला किया जिसमें सात लोग मारे गए। इस तरह उन्होंने पांच दिनों में पांच हमले किए जिनमें कुल 30 लोग मारे गए।

ऊपरोक्त हमलों का विवरण देने का उद्देश्य ये स्पष्ट करना है कि तालिबान ने निहत्थे मासूम लोगों को बेखबरी में मारने को अपना मज़हब बना लिया है और उसका उसे न कोई मलाल है न मरने वालों का ग़म। क्योंकि उनके मुताबिक़ यही इस्लाम है और उनके अनुसार मरने वाले गुनहगार और काफ़िर थे, उन उलमा (विशेष कर ओसामा बिन लादेन के करीबी यूसुफ अलउबैरी) के मुताबिक जायज़ और काबिले तारीफ है। जबकि क़ुरान, हदीस और फ़िक़्ह के मुताबिक निहत्थे नागरिकों और मासूम बच्चों, औरतों और बुज़ुर्गों चाहे वो मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम बहुत ही वहशियाना अमल है और इसमें शामिल लोग जहन्नमी हैं।

क़ुरान ने इंसानी जान की हुर्मत को हर चीज़ पर प्राथमिकता दी है। इसके मुताबिक़ एक जान को बिना किसी शरई कारण के क़त्ल करना मानो जैसे पूरी मानवता का क़त्ल है और एक व्यक्ति को मौत से बचा लेना जैसे पूरी मानवता को बचा लेना है।

क़ुरान की ज़बान में

'जो कोई किसी का क़त्ल करे, सिवाय क़त्ल की सज़ा के तौर पर या ज़मीन पर फसाद पैदा करने की सज़ा के तौर पर तो जैसे उसने सारी इंसानियत का खून कर दिया। (सूरे अलमाएदाः 32)

इसी तरह बिना किसी जुर्म या कुसूर के किसी का कत्ल की क़ुरान ने इजाज़त नहीं दी है।

अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हू से रवायत है कि हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया- अगर कोई किसी मुसलमान के क़त्ल में किसी तरह की मदद करता है यहां तक ​​कि कुछ शब्दों से, तो वो अल्लाह से इस हालत में मिलेगा कि उसके माथे पर लिखा होगा 'खुदा की रहमत से मायूस'

इस्लाम सिर्फ़ मुसलमानों की जान और माल की हिफाज़त की ज़मानत (गारंटी) नहीं देता बल्कि अपनी हुकूमत में बसने वाले सभी अल्पसंख्यकों जैसे यहूदियों, ईसाइयों, हिन्दुओं और मुस्लिम समुदायों जैसे शियों और अहमदियों को भी जान व माल, संपत्ति और मज़हबी आज़ादी की हिफाज़त की गारंटी देता है। क़ुरान और हदीस और फ़िक़्ह इस्लामी में इस विषय पर स्पष्ट निर्देश हैं जबकि तालिबान अपने अतिवादी विचारों के आधार पर अपने सिवा सभी को काफ़िर करार देते हैं और उन्हें क़त्ल करने को सवाब (पुण्य) का काम बताते हैं।

अबु बकर रज़ियल्लाहू अन्हू से रवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया

'' अगर कोई मुस्लिम किसी गैर मुस्लिम को नाजायज़ तौर पर क़त्ल करता है जिसके साथ समझौता है तो जन्नत उसके लिए हराम है। (अलनिसा)

इस तरह हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर ने रवायत की कि पैगम्बर मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया,

 '' अगर कोई मुस्लिम किसी गैर मुस्लिम मुआहिद को क़त्ल करता है तो वह जन्नत की खुश्बू नहीं पाएगा हालांकि जन्नत की खुश्बू चालीस साल की दूरी से भी पाई जा सकती है।'' (सही बुखारी)

इसलिए ये स्पष्ट करना जरूरी है कि वो गैर मुस्लिम जो किसी मुस्लिम देश में एक नागरिक की हैसियत से रहते हैं और वहाँ के क़ानूनों को मानने का इक़रार करते हैं और देश के कानूनों का सम्मान करते हुए जीवन बिताते हैं, तो वो शरीयत के मुताबिक मुआहिद होते और उनकी जान और माल, इज़्ज़त व आबरू, उनकी इबादतगाहों और अन्य नागरिक और सामाजिक अधिकारों की रक्षा मुसलमानों की जिम्मेदारी होती है। और ऐसे गैर मुस्लिमों के क़त्ल करने वाले पर हदीस के मुताबिक़ जन्नत हराम कर दी जाती है।

हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हू इब्ने तालिब का क़ौल (कथन) है-

'' अगर कोई मुस्लिम किसी ईसाई को क़त्ल करे तो कसास (बदले) में उसको क़त्ल किया जाएगा। (अलशियानी- अलहुज्जतः 4:349)

इसी तरह इमाम अबु हनीफा रहिमहुल्लाह अलैहि का फतवा है,

'' एक अमन पसंद यहूदी, ईसाई या ज़रतुश्ती का खून बहा एक आज़ाद मुसलमान के खून बहा के बराबर है।

इस तरह हदीस और फिकह की किताब में गैर मुस्लिमों के अधिकारों के बारे में उलमा और फुकहा के बेशुमार फतवें हैं जो गैर मुसलमानों की जान और माल और जायदाद को मुसलमानों के बराबर करार देते हैं। लेकिन तालिबान जैसे गैर इस्लामी गुट मुसलमानों के साथ गैर मुस्लिमों के आम नागरिकों और अमन पसंद लोगों का क़त्ले आम करके अपने को असल मुसलमान और हक़ पर होने का दावा करते हैं, और अपने तथाकथित उलमा से फतवा हासिल कर के अपनी हिंसक गतिविधियों और नफरत पर आधारित विचारों का औचित्य पेश करने की कोशिश करते हैं।

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