तनवीर ज़मान खान (लंदन)
28 नवंबर, 2012
(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)
इस्लाम फार यू.के. के प्रवक्ता अंजुम चौधरी जो कि पिछले कई वर्षों से ब्रिटेन में शरीयत को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। 30 नवंबर यानी अगले शुक्रवार के दिन इस्लाम की रौशनी फैलाने लाल मस्जिद, इस्लामाबाद में शरीयत फॉर पाकिस्तान कांफ्रेंस में भाग लेंगे। इस बात का खुलासा मुझे एक पोस्टर से प्राप्त हुआ जिसके विवरण की पुष्टि मैंने इस कांफ्रेंस के मीडिया कंट्रोल सेल पर फोन कर के कर ली। प्रसिद्ध लाल मस्जिद, इस्लामाबाद में आयोजित होने वाली ये कांफ्रेंस पांच बिंदुओं पर अपने ज्ञान से भरे भाषणों से इस्लामी गणतंत्र पाकिस्तान के गैरइस्लामी होने की पोल खोलेगा, जिसमें दुनिया भर से उलेमा की देखरेख में प्रेसीडेंसी की तरफ लाल मस्जिद के लाउडस्पीकरों का मुंह करके पूरे जोर शोर से अपने पक्ष को स्पष्ट करेंगें।
ब्रिटेन और अन्य देशों से इस कांफ्रेंस को खिताब (भाषण) करने के लिए जाने वाले अहम लोगों में अंजुम चौधरी (प्रवक्ता, इस्लाम फार यू.के.), उमर बकरी (अमीर, अलमोहाजरून) अबुवाला (डायरेक्टर, ट्रुथ कमीशन) अबु बरा (माहिर, इस्लामिक ज्युरिसप्रुडेंस) अबु रमीस (चेयरमैन, न्यु मुस्लिम सोसायटी) शामिल हैं। कांफ्रेंस का मकसद तो इसके बिंदुओं से विशेष रूप से ज़ाहिर हो रहा है जबकि इस पोस्टर की थीम (Theme) बड़ी अस्पष्ट है जिसमें कायदे आज़म, आसिफ़ ज़रदारी और मलाला आग में घिरे हुए हैं। जबकि मज़ारे क़ायद गोलीबाज़ के निशाने पर स्थित है। कांफ्रेंस में भाग लेने के लिए विदेशों से जाने वाले सभी मेहमान वो लोग हैं जो या तो अपनी हिंसक विचारधारा की वजह से जिनके कई देशों में प्रवेश पर पाबंदी है या खुफिया एजेंसियां उन्हें अपनी आब्ज़र्वेशन (Obervation) में रखे हुए हैं। यहां समस्या उनकी विचारधारा का नहीं। हर व्यक्ति का किसी भी व्यक्ति या विचारधारा के बारे में दृष्टिकोण हो सकता है। वो जिन्ना, ज़रदारी या मलाला को जो भी समझें उनका हक़ है। वो पाकिस्तान के संविधान को घर का संविधान कहते रहें। या इन सभी बिंदुओं को अपने ईमान का हिस्सा बना के रखें। किसी को कोई ऐतराज़ नहीं, लेकिन जब कोई व्यक्ति या जमात ऐसे विचारों को समाज पर जबरदस्ती थोपना चाहती हो तो जनता और राज्य का अधिकार बनता है कि ऐसे विचारधारा को रखने वालों को कठघरे में खड़ा करें।
ये तो है सभ्य समाज की बात, ऐसी विचारधारा को रखने वालों को हम पिछले दो दशकों से देख रहे हैं कि उन्होंने पूरी दुनिया की शांति को तहस नहस कर के रख दिया है। 11 सितम्बर के बाद ये ताकतें अधिक बेलगाम हो चुकी हैं। और अब पोस्टर में दिखाया जाने वाला मज़ारे जिन्ना ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया उनके निशाने पर है। कांफ्रेंस में भाग लेने वाले लगभग सभी वक्ता इस बात पर एकमत हैं कि जिन्ना ब्रिटिश एजेंट था इसलिए उसे द्वितीय विश्व युद्ध से थोड़ा समय पहले भारतीय राजनीति में वापस बुलाया गया था। मुसलमानों का बहुत बड़ा वैचारिक धोखा है कि जिन्ना पाकिस्तान में इस्लामी नेज़ाम (व्यवस्था) लागू करना चाहता था। अगर ऐसा होता तो वो जोगिन्दर नाथ मंडल को पहला क़ानून मंत्री न बनाता। कादियानी को पहला विदेश मंत्री न बनाता। जनरल फ़्रैंक मसर्वी को पहला आर्मी चीफ न बनाता। अब आसिफ़ ज़रदारी भी जिन्ना की तक़लीद (अनुकरण) में वही कुछ कर रहा है जो जिन्ना का तरीका था। ये है दृष्टिकोण शरीयत फॉर पाकिस्तान के प्रस्तावकों का। जो इन्हीं कारणों के आधार पर पाकिस्तान के संविधान को भी कुफ्र का संविधान समझते हैं। क्योंकि इसमें लोकतंत्र और आज़ादियों की जो बात की गई है वो शरीयत के खिलाफ है। इसलिए इसके खिलाफ भी फतवा जारी करना इस्लाम के फर्ज़ में शामिल है। ये कांफ्रेंस इस्लामाबाद में आई.एस.आई के दफ़्तर से कुछ कदम दूर लाल मस्जिद में आयोजित होगी। लाल मस्जिद कोई मामूली जगह नहीं है।
इस मस्जिद से पूरी दुनिया परिचित है जहां इस्लामी तालीम हासिल करने वाली बुर्क़ा पहने महिलाओं ने इस्लामाबाद के कई कारोबार और दुकानें इसलिए बंद करवा दी थीं और कई दुकानदारों का अपहरण करके भी लाल मस्जिद में ले गई थीं क्योंकि वो उनके कारोबार को गैर शरई समझती थीं। जनरल ज़ियाउल हक़ के ज़माने में इस्लामाबाद के बीच में ये मस्जिद इसलिए निर्मित कराई गयी थी कि वो देश भर में बनाए जाने वाले मुजाहिदीन के नेटवर्क को कंट्रोल करे। ये नेटवर्क जो कि जिहादी तत्वों को बनाने की फैक्ट्री थी जिन्हें मदरसा कहा जाता है। इन मदरसों ने बड़ी कामयाबी से ऐसे जेहादियों की बड़ी तादाद को तैय्यार किया। जिन्हें मज़हब के नाम की चाबी लगा के जो चाहे इस्तेमाल करे। वो उसे फरमाने इलाही समझ कर क़ुर्बान होने को तैयार हो जाते हैं। धार्मिक भावना के इस्तेमाल में क़ुर्बान हो जाने की मिसाल 1977 के नेज़ामे मुस्तफ़ा की क़ौमी इत्तेहाद का आंदोलन था। जिसमें क़ौमी इत्तेहाद ने अपनी सत्ता के लिए सैकड़ों लोगों को नेज़ामे मुस्तफ़ा के नाम पर कुर्बान किया। अब पिछले बारह साल से चरमपंथी संगठनों के तैय्यार किए नौजवान बच्चे शरीयत लागू करने के नाम पर अपने मुसलमान भाइयों के खिलाफ आत्मघाती बम बनाकर भेजे जाते हैं। जो अपने ही देशवासियों के क़त्ल के बदले जन्नत ले रहे हैं। जिस शरीअत फॉर पाकिस्तान कांफ्रेंस की हम चर्चा कर रहे हैं उसके सभी वैचारिक रक्षक पूरी दुनिया में नेज़ामे खिलाफ़त क़ायम करना चाहते हैं क्योंकि वो खुद के अलावा सारी दुनिया को काफ़िर समझते हैं। और इन काफिरों के खिलाफ सशस्त्र जिहाद दीन का फर्ज़ है। शरीयत फॉर पाकिस्तान के सर्वोच्च सिद्धांत के अनुसार दरअसल पाकिस्तान का संविधान कुफ्र है। इसलिए इस कुफ्र के संविधान के तहत चलने वाला राज्य भी काफ़िर राज्य है।
यही स्थिति फिर राज्य के सभी संस्थानों की है। उनके ब्लॉग (Blog) में बहुत स्पष्ट लिखा है कि वो जिन्ना को ग़द्दारे इस्लाम समझते हैं इसलिए मज़ारे क़ायद को तबाह करना उनका पहला मकसद है। क्योंकि संविधान, देश और देश के संस्थापक सब कुफ्र पर खड़े हैं। इसलिए जनता भी कुफ्र की इसी पंक्ति में खड़ी है। इसलिए अगर कोई आत्मघाती बमबार आम जनता को निशाना बनाता है तो यह अचंभे की बात है। क्योंकि उनका ये अमल इन शरीयत वालों के बुनियादी प्रोग्राम से संघर्षरत नहीं है। इतने विरोधाभास के बाद जब मलाला का ज़िक्र होगा तो उसका भी शरई अदालत में ट्रायल प्रस्तावित किया गया है। क्योंकि उनकी शरीयत की रौशनी में मलाला के आँसू मगरमच्छ के आँसू हैं। प्रेसीडेंसी और प्रधानमंत्री हाउस भी, क्योंकि इस्लाम से विरोधाभास रखने वाले वाली शिक्षा पर चल रहे हैं इसलिए उन्हें भी छोड़ा नहीं जा सकता। जब शरीयत लागू करने के मामले पर अंजुम चौधरी और उमर बकरी बात करेंगे तो ये कांफ्रेंस एक ऐलाने जंग का दृश्य बनायेगी। यहाँ गौरतलब समस्या ये है कि इस तरह की नफरत भरी विचारधारा के प्रचार की इजाज़त कौन देता है। इतने सारे लोग जो विदेशों से पाकिस्तान जाएंगे उन्हें कौन सी अथारिटी वीज़ा जारी करेगी। यहां सवाल ये भी पैदा होता है कि लाल मस्जिद प्रबंधन किस प्रकार के लोगों के हाथों में है। सरकारें कब तक धर्म के नाम पर हत्या, मारधाड़ की तालीम को फैलाने की इजाज़त देती रहेंगी। इन लोगों की जनता में क्या नुमाइंदा हैसियत है। ये मुट्ठी भर लोग किस तरह हुक्मरानों और मीडिया को ब्लैकमेल कर लेते हैं।
मीडिया में इनके एजेंट बैठे हैं। जो इन्हें प्रोजेक्ट करते हैं। आम टीवी शोज़ में देखा जाता है कि आम तौर पर राजनीतिक पृष्ठभूमि के जो लोग बुलाए जाते हैं उनकी जनता में कोई हैसियत होती है। जबकि अनगिनत धार्मिक तत्वों को महत्वपूर्ण और संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दों पर राय देने के लिए बुलाया जाता है। जिनकी न तो कोई लोकप्रियता होती है न ही कोई हैसियत, उन्हें अन्य कारणों के अलावा इसलिए भी बुलाया जाता है कि मीडिया वाले उनकी नुक्सान पहुंचाने की ताकत और क्षमता से डरते हैं। आज इस बारह साल लंबी आतंकवाद की लड़ाई से अगर हमारे हुक्मरान और अवाम ये सबक न सीखें कि किन तत्वों को हतोत्साहित करना चाहिए और कौन से तत्वों को लाईम लाइट में लाना चाहिए। तो वापसी के लगभग सभी रास्ते बंद होने वाले हैं। लाल मस्जिद अगर ऐसे ही तत्वों की शरणस्थली बन रहा है, तो फिर वहाँ से नफरत का लावा ही उबलेगा। और हम मज़हब के नाम पर धोखा खाते रहेंगे। धोखा खाना और उस पर खुश होना खुदा को धोखा देना है कोई समझदारी नहीं।
28 नवंबर, 2012, स्रोत: रोज़नामा जदीद खबर, नई दिल्ली
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