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Hindi Section ( 7 May 2012, NewAgeIslam.Com)

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Limiting Maintenance of Divorced Women for the Iddat Period is Brazenly Un-Islamic तलाक शुदा महिलाओं के नान-नुफ्का को इद्दत तक बहाल रखने को महदूद करना गैर इस्लामी अमल है


मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम

14 नवम्बर, 2011

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

मोहम्मद यूनुस, सह लेखक (अशफाक अल्लाह सैय्यद के साथ),  इस्लाम का असल पैग़ाम, आमना पब्लिकेशन, यू.एस.ए. 2009

शाह बानो के तलाक (इंदौर, हिंदुस्तान, 1978) का मामला हिंदुस्तानी पाठकों के मन में होगा। मुख्तसर (संक्षेप) में, जब इस मामले में शौहर ने शादी के 30 साल से ज़्यादा के बाद अपनी बीवी को तलाक दिया तो शौहर ने सिर्फ महेर का अपने पास रखा हुआ हिस्सा और तीन महीने का नान- नुफ्का अदा दिया। 62 साल की उम्र में, बिना किसी काम के तजुर्बे और गिरते स्वास्थ्य के साथ उसे शिद्दत के साथ गुजारे के लिए नान-नुफ्का की जरूरत थी और इसी सिलसिले में उसने अदालत से संपर्क किया। ये मामला निचली अदालत से हाईकोर्ट और आखीर में सुप्रीम कोर्ट की बेंच तक पहुंचा (1985) अदालत ने शाहबानो  के पक्ष में फैसला दिया, अदालत का फैसला व्यापक कुरानी पैगाम के मुताबिक था। मुस्लिम विद्वानों और जनता ने आदेश के खिलाफ ऐसे हालात पैदा किये जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया, उन लोगों ने फैसले को पलटने और मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार मामले को हल करने की मांग की जिसके अनुसार नान-नुफ्का केवल इद्दत के तीन महीनों तक ही मिलता है। भारत सरकार को संसद में इस मामले को उठाने पर मजबूर किया गया। बाद में सरकार ने मुस्लिम महिलाओं (तलाक से संबंधित अधिकारों की रक्षा) अधिनियम, 1986 को स्वीकार किया। मुस्लिम पर्सनल लॉ के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उलट दिया गया। यह गैर इस्लामी फरमान था जिसने बहुत गरीब मुस्लिम महिला को उसके पूर्व पति से बाज़गर्द (पुनरावर्ती) नान-नुफ्के के अधिकार से इन्कार किया और इस्लामी कानून के फरसूदा हिस्से को बनाए रखा।

एक पुरानी कहावत है: आप सब लोगों को हर वक्त बेवकूफ नहीं बना सकते हैं, और इस्लाम के नाम पर फरसूदा मुस्लिम पर्सनल लॉ के चैंपियन लोगों का समय अब ​​बीत चुका है। जैसा कि कोई भी निडर और ईमानदार बच्चा सच का दावा कर सकता है इसी तरह कोई भी निडर और हक को तलाश करने वाला भी उस वक्त के हालात को ध्यान दिये बिना मुस्लिम महिलाओं के लिए प्रतिबंधों वाले नान-नुफ्का के बारे में कानून के चैंपियंस के लैंगिक भेदभाव को साबित कर सकता है। धार्मिक या उनकी अंधी तक़लीद करने वाले लोगों के प्रकोप के डर के बिना कोई भी दुनिया के किसी भी कोने से अपने सच्ची प्रतिक्रिया बिना अपनी पहचान बदले दे सकता है। इसके साथ हम कुरान का रुख करते हैं जो हिकमत और हक को सामने लाने का अंतिम स्रोत है।

कुरान पुरुषों को उनकी तालकशुदा पत्नियों के लिए उपयुक्त नान-नुफ्का का आदेश देता हैः

"और तलाक़याफ्ता औरतों को भी मुनासिब तरीके से खर्चा दिया जाए, यह परहेज़गारों पर वाजिब है (2:241) इसी तरह अल्लाह तुम्हारे लिए अपने एहकाम वाज़ेह फरमाता है ताकि तुम समझ सको" (2:242)

हिदायत व्यापक अर्थ में है। ये मर्द को नहीं कहता है कि वह अपनी तलाकशुदा बीवी के लिए एक बारगी व्यवस्था बनाने की जरूरत है और न ही जब तक वह दूसरी शादी या उसका उसका निधन हो जाए, उसे बाज़गर्द (पुनरावर्ती) नान-नुफ्के के लिए कहता है। इस तरह नान-नुफ्का की अवधि और मात्रा निर्धारित नहीं की गई है। उसे हालात और वित्तीय कारकों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने के लिए अदालत या सालिसों (मध्यस्थों) पर छोड़ दिया गया है। इस तरह सीमित संसाधनों वाला एक आदमी अगर शादी के बाद अपनी अमीर बीवी को तलाक देता है तो उससे उसी स्तर के वित्तीय दायित्व उठाने की उम्मीद नहीं की जा सकती है जैसे एक लंबे वैवाहिक जीवन बिताने के बाद संसाधन सम्पन्न मर्द अपनी गरीब बीवी को तलाक देता है। लेकिन, कुरान मर्दों को बुद्धि का प्रयोग करने की सलाह देता है और तर्क के लिए आधार प्रदान करता है।

आयात 2:236 और 33:49 मर्दों को उन औरतों जिनके साथ सिर्फ शादी की है और उन्हें छुआ नहीं है, उन्हें अपनी आमदनी के अनुसार व्यवस्था करने का हुक्म देता है:

"तुम पर इस बात में (भी) कोई गुनाह नहीं कि तुमने (अपनी मनकीहा) औरतों को उनके छूने या उनके महेर मोकर्रर करने से भी पहले तलाक दे दिया है तो उन्हें (ऐसी सूरत में) मुनासिब खर्चा दे दो, वुस्अत वाले पर उसकी हैसियत के मुताबिक (लाज़िमी) है और तंगदस्त पर उसकी हैसियत के मुताबिक, (हालांकि ) ये खर्च मुनासिब तरीके पर दिया जाये, ये भलाई करने वालों पर वाजिब है "(2:236)

"ऐ ईमान वालो! जब तुम मोमिन औरतों से निकाह करो फिर तुम उन्हें तलाक दे दो कब्ल इसके कि तुम तुम उन्हें मस् करो (यानि खिलवते सहीहा करो) तो तुम्हारे लिए इन पर कोई इद्दत (वाजिब) नहीं है कि तुम उसे शुमार करने लगो, पस उन्हें कुछ माल और मता दो और उन्हें अच्छी तरह हुस्ने सुलूक के साथ रुख्सत करो "(33:49)

आयत 2:237 में मर्दों को अपनी तलाकशुदा बीवी के मामले में उदार बर्ताव करने और उन्हें पूरा महेर देने को कहता है [1]  यहां तक ​​कि उन्हें छुआ भी नहीं हालांकि महेर मोकर्रर किया गया था:

"और अगर तुमने उन्हें छूने से पहले तलाक दे दिया हालांकि तुम उनका महेर मोकर्रर कर चुके थे तो उस महेर का जो तुमने मोकर्रर किया था, आधे देना ज़रूरी है सिवाय इसके कि वो (अपना हक़) खुद माफ कर दें या वो (शाहर) जिसके हाथ में निकाह की गिरह है माफ कर दे (यानी बजाय निस्फ के ज़्यादा या पूरा अदा कर दे) और (ऐ मर्दो!) अगर तुम माफ कर दो तो ये तक़्वा के क़रीबतर है, और (कशीदगी के उन लम्हात में) आपस में एहसान करना न भूला करो, बेशक अल्लाह तुम्हारे आमाल को खूब देखने वाला है "(2:237)

कुरान की इन स्पष्ट नसीहतों की रोशनी में पुरुषों को शादी के समय मेहर या बराबर माल (यदि यह नहीं तय है) को देने को कहा गया है और तलाक के समय मामलों के समाधान के लिए महेर का एक हिस्सा अपने पास बनाए रखना शादी की आत्मा को कमजोर करता है। इसी तरह 30 साल से अधिक वैवाहिक जीवन के बाद एक गरीब औरत को बाज़गर्द (पुनरावर्ती) नान-नुफ्का से इनकार करना कुरान की उदार भावना के खिलाफ है जिसकी एक मर्द से उसकी तलाकशुदा बीवी के मामले में उम्मीद की जाती है, यहां तक ​​कि अगर बीवी को छूने से पहले ही तलाक हो जाता है (2:237)

लेकिन यही सब कुछ नहीं है। कुरान एक मर्द को अपनी बीवी के तलाक के अमल में उनके प्रति तीन महीने की निर्धारित इद्दत की अवधि और गर्भवती बीवी के मामले में दो साल की नर्सिंग अवधि तक ज़िम्मेदारियों को स्पष्ट करता है।

"तुम इन (मोतल्लका) औरतों को वहीं रखो जहाँ तुम अपनी वुस्अत के मुताबिक रहते हो और उन्हें तकलीफ़ मत पहुंचाओ कि उन पर (रहने का ठिकाना) तंग कर दो, और अगर वो हामला हों तो उन पर खर्च करते रहो जब तक वो अपना बच्चा जन लें, अगर वो तुम्हारी खातिर (बच्चे को) दूध पिलाएँ तो उन्हें उनका मुआवज़ा अदा करते रहो, और आपस में (एक दूसरे से) नेक बात का मशविरा (हस्बे दस्तूर) कर लिया करो, और अगर तुम बाहम दुश्वारी महसूस करो तो उसे (अब कोई) दूसरी औरत दूध पिलायेगी (65:6) साहब वुस्अत को अपनी वुस्अत (के लिहाज़) से खर्च करना चाहिए, और जिस शख्स पर उसका रिज़्क तंग कर दिया हो तो उसी (रोजी) में से (बतौरे नुफ्का) खर्च करे जो उसे अल्लाह ने अता फ़रमाई है। अल्लाह किसी शख्स को मोकल्लफ नहीं ठहराता मगर उसी कदर जितना कि उसने अता फरमा रखा है, अल्लाह अंकरीब तंगी के बाद कशाईश पैदा फरमा देगा "(65: 7)

"और माँएं अपने बच्चों को पूरे दो साल तक दूध पिलाएँ ये (हुक्म) उसके लिए है जो दूध पिलाने की मुद्दत पूरी करना चाहे, और दूध पिलाने वाली माओं का खाना और पहनना दस्तूर के मुताबिक बच्चे के बाप पर लाज़िम है, किसी जान को उसकी ताकत से बढ़कर तकलीफ़ न दी जाए, (और) न माँ को उसके बच्चे के बाइस नुकसान पहुंचाया जाए और न बाप को उसकी औलाद के सबब, और वारिसों पर भी यही हुक्म आयद होगा, फिर माँ बाप दोनों बाहमी रज़ामन्दी और मशविरे से (दो बरस से पहले ही) दूध छुड़ाना चाहें तो उन पर कोई गुनाह नहीं, और फिर तुम अपनी औलाद को (दाया से) दूध पिलवाने का इरादा रखते हो तब भी तुम पर कोई गुनाह नहीं जबकि जो तुम दस्तूर के मुताबिक देते हो उन्हें अदा कर दो, और अल्लाह से डरते रहो और ये जान लो कि बेशक जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उसे खूब देखने वाला है "(2:233)

यदि कुरान की योजना एक व्यक्ति की जिम्मेदारी को सिर्फ इद्दत (तीन महीने) तक और गर्भवती बीवी के मामले में महिला की स्थिति का ध्यान किये बिना ज़चगी के बाद दो साल तक ही सीमित करना होता तो कुरान को एक औऱ फरमान जारी करने की अमली तौर पर कतई जरूरत नहीं होती जो तलाकशुदा महिला के मामले में परहेज़गार बंदों के लिए जायेज़ बंदोबस्त करने को लाज़िमी बनाती है (ऊपर 2:241) ये कुरान की महिलाओं के लिए गहरी चिंता का सबूत है। आयत 4:20 में यह चिंता स्पष्ट होती है जिसमें मर्द को अपने वैवाहिक जीवन के दौरान दिए गए किसी उपहार को तलाक के समय वापस लेने से मना फ़रमाया है:

"और अगर तुम एक बीवी के बदले दूसरी बीवी बदलना चाहो और तुम उसे ढेरों माल दे चुके हो तब भी इसमें से कुछ वापस मत लो, क्या तुम नाहक इल्ज़ाम और सरीहे निगाह से वो माल (वापस) लेना चाहते हो" (4: 20)

नतीजा: जब एक मर्द अपनी बीवी को तलाक देता है तो कुरान निम्नलिखित आदेश देता है. 1) तलाक को अटल बनाने के लिए अपनी बीवी को इद्दत के दौरान उसी तरह रखो जैसे वो पहले रहती थी (65:6) (2) गर्भवती तलाकशुदा बीवी के मामले में ज़चगी (प्रसव) और पैदा हुए बच्चे का खर्च दो साल तक बर्दाश्त करने को कहता है (65:6 2:233) (3) गुजारे के लिए उचित खर्च देना- ये अकल के तकाज़े के मुताबिक एक आम हिदायत है (2:242) (4) अगर अपनी बीवी को छूने से पहले या महेर मोक़र्रर होने से पहले वो शादी तोड़े तो उचित मुआवजा दे (2:236 33:49) (5) अगर बीवी को छूने से पहले वो वैवाहिक रिश्ता खत्म कर देता है तो तयशुदा महेर की कम से कम आधी या पूरा महेर अदा करे (6) कोई भी कीमती तोहफा जिसे उसने शादीशुदा जीवन के दौरान दिया है तो उसे अपने पास नहीं रखना चाहिए।  शादीशुदा जीवन की अवधि, उसकी सेहत और माली हालत को ध्यान दिये बिना किसी भी गैर गर्भवती महिला के नान-नुफ्का को रोकने का कोई भी प्रस्ताव पूरी तरह और शर्मनाक तरीके से गैर इस्लामी है और तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को अन्याय से बचाने के लिए इसे सही किया जाना चाहिए।

पुराने इस्लामी कानून जिससे भारतीय उलेमा चिपके हुए हैं जो सिर्फ मध्यकाल के उलेमा की राय की नुमाइंदगी करता है जो लामोहाला तौर पर कई बार उस ज़माने की ऐतिहासिक हकीकत को सूचित करती है जिसमें अन्य बातों के बीच एक से अधिक शादी पर पुरुष प्रधान प्रणाली की ओर झुकाव को भी देखा था। इसमें कोई शक नहीं कि  इस दौर में पुराने इस्लामी कानून ने महिलाओं को जिन अधिकार की पेशकश की थी वो गैर मुस्लिम संस्कृतियों में उनके समकालीन लोगों को जो प्राप्त था, उसे बिल्कुल अच्छा था, और मुसलमानों को इस पर बजा तौर पर फख्र हो सकता है। लेकिन हालिया दौर में लैंगिक हरकयात (गतिमानता) में महत्वपूर्ण मिसाली (आदर्श) परिवर्तनों के साथ, जो गैर मुस्लिम महिलाओं को अधिकार उनके संबंधित संस्कृतियों में मिलता है वो इस्लामी कानून में उनके मुकाबले अब बहुत कम है। क्योंकि कुरआन ने उपरोक्त में दर्ज और अन्य आयतों के द्वारा महिलाओं के सशक्त बनाने का स्पष्ट रूप से प्रदर्शन किया है, मुस्लिम फुकहा अगर अपने पुरुष प्रधान हितों को बचाना और उसका संरक्षण करना नहीं चाहते हैं और पश्चिमी देशों की नज़रों में खुद को शैतान का एजेंट बताना नहीं चाहते हैं  तो उन लोगों को तत्काल कुरान के मध्यकाल के मोफस्सिरीन की राय के बजाय कुरान के पैगाम के मुताबिक इन कानूनों की समीक्षा करनी चाहिए।

[1] आयत को निम्नलिखित सरल नियमों में विभाजित किया जा सकता है:

        अगर मर्द तलाक की प्रक्रिया शुरू करता है तो उसे बीवी को आधे महेर का भुगतान करना होगा, जब तक बीवी उसे माफ न कर दे।

        अगर एक औरत तरफ से शादी तोड़ी जाती है, जो महेर एक मर्द से शादी तोड़ने पर उसे मिलता, उसके आधे के अपने दावे को उस औरत को छोड़ना होगा।

        एक मर्द, जो तलाक देता है उसे अधिकार है कि वो छोड़े गए महेर के आधे हिस्से से दस्तबरदार होकर सखावत दिखाते हुए उसे औरत को पूरा महेर देना चाहिए।

        तलाक लेने वाले दोनों पक्ष एक दूसरे के प्रति उदार व्यवहार करें और एक दूसरे का शोषण करने से उन्हें दूर रहना चाहिए।

मोहम्मद यूनुस ने आईआईटी से केमिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की है और कार्पोरेट इक्ज़ीक्युटिव के पद से रिटायर हो चुके हैं और 90 के दशक से क़ुरान का गहराई से अध्ययन और उसके वास्तविक संदेश को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी किताब इस्लाम का असल पैग़ामको साल 2000 में अलअज़हर अलशरीफ, काहिरा की मंज़ूरी प्राप्त हो गयी थी और इसे यूसीएलए के डॉ. खालिद अबुल फ़ज़ल का समर्थन भी हासिल है। मोहम्मद यूनुस की किताब इस्लाम का असल पैग़ामको आमना पब्लिकेशन मेरीलैण्ड, अमेरिका ने साल 2009 में प्रकाशित किया।

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