जहीर अलआवनी
24 सितम्बर, 2013
इस्लाम लोकतंत्र के साथ सुसंगत है या नहीं, ये एक ऐसा सवाल है जिसने अनगिनत और अलग अलग समस्याओं और विचारों को जन्म दिया है। एक तरफ तो पश्चिम में मौजूदा मीडिया और बौद्धिक क्षेत्रों के लोगों ने इस्लाम को मध्य एशिया में तानाशाही पर आधारित नीतियों की बुनियाद पर समझा है। उनके लिए इस्लाम पुरुष प्रधान व्यवस्था है और इसमें नागरिकता और स्वतंत्रता की कल्पनाओं की कमी है। इसलिए कि इसमें खुदा की संप्रभुता का विश्वास पाया जाता है। जिसने सार्वजनिक शक्ति को कम कर दिया है। ऐसा दावा किया जाता है कि इस्लाम 'एक ऐसी दुनिया को व्यवहारिक रूप देता है जहां मानव जीवन को वो मूल्य प्राप्त नहीं जो पश्चिम में इंसानी जीवन को हासिल हैं, जहां आज़ादी, लोकतंत्र, खुलापन और रचनात्मकता नहीं है।''

पश्चिम के विद्वानों की एक बड़ी संख्या का कहना है कि एक धर्म और संस्कृति के रूप में इस्लाम ऐसी अनगिनत रुकावटें पैदा करता है जो लोकतंत्र की स्थिरता के प्रतिकूल हैं। एक अमेरिकी दार्शनिक और राजनीति-शास्त्री फ्रांसिस फ़ोकोयाना ने लगातार ये कहा है कि "इस्लाम सिर्फ एक ऐसी सांस्कृतिक व्यवस्था है, जो लगातार ओसामा बिन लादेन या तालिबान जैसे लोगों को पैदा करता है जो पूरी तरह से आधुनिकता को खारिज करते हैं।" इसी सिलसिले में सभ्यताओं के संघर्ष के हटिंग्टन के सिद्धांत ने शीत युद्ध के बाद के विवादों का मुख्य कारण लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को करार दिया है।
जब हम इस मुद्दे के दूसरे पहलू पर नज़र डालते हैं तो हम स्पष्ट रूप से ये पाते हैं कि ऐसे कई विद्वान भी हैं जो इस बात का पक्का विश्वास रखते हैं कि लोकतंत्र हमेशा इस्लाम का एक हिस्सा रहा है। उनके अनुसार शूरा (परामर्श) की कुरानी अवधारणा लोकतंत्र के साथ इस्लाम के सुसंगत होने को सुनिश्चित करने के लिए है।
वास्तव में मौजूदा बहस से एक सवाल पैदा होता है जिसे सैद्धांतिक पहलू के अभाव या स्पष्ट बौद्धिक कपट के कारण नज़र अंदाज़ कर दिया गया। एक इंसान किस पैमाने पर आधारित तुलनात्मक समानता स्थापित कर सकता है। सरकार की राजनीतिक व्यवस्था, लोकतंत्र या किसी धार्मिक विश्वास, इस्लाम के पैमाने पर? यहां ये उल्लेख करना आवश्यक है कि इस्लाम हुकूमत के बारे में, दरअसल उसकी तीनों शाखाओं, प्रशासन, विधायिका और न्यायपालिका के बारे में विशेष निर्देश देता है। इसलिए पश्चिमी लोकतंत्र के हाल के एक निष्पक्ष विचार का किसी धार्मिक व्यवस्था के एक सुरक्षित रूप से तुलना व्यावहारिक विश्लेषण और परिणाम दोनों में सैद्धांतिक आधारों की कमी पैदा करेगा।
सैद्धांतिक तत्व को नज़र अंदाज करने और मौजूद दलील को अपनाने से विरोधियों के द्वारा इस्लाम और लोकतंत्र के बीच सुसंगत होना पेश किया जाता है। इस्लाम और तथाकथित "कट्टरपंथियों" के बीच एक जबरदस्त अंतर पैदा किया जाना ज़रूरी है। इन्हीं बातों के बीच आजकल ये सवाल पूछा जाना चाहिए, खास तौर पर उसके बीच जो मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका में हो रहा है, कि बड़े इस्लामी राजनीतिक दल किस हद तक इस्लामी हैं? क्या वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में दोनों के बीच सुसंगतता पैदा करना उचित हो सकता है? ज़्यादा अहम बात ये है कि उनकी प्रशासनिक रणनीति में शरीयत (इस्लामी कानून) कहां है?
इस्लामी शिक्षाओं का एक सरसरी जायज़ा लेने के बाद इन व्यापक दूरियों को खत्म करना आसान हो जाएगा कि हुकूमत के तीनों स्तरों पर कट्टरपंथियों से इस्लाम को अलग कर रहे हैं। इसलिए सार्वजनिक विचारों को एक "धर्म" के तौर पर शब्दावली के व्यापक अर्थों में उन राजनीतिक दलों और इस्लाम के बीच अंतर पैदा करना होगा। बाद में जिसका वर्णन (इस्लाम धर्म) किया गया उसको बहुत से मुस्लिम विद्वान एक ऐसी व्यवस्था समझते हैं कि जीवन के सभी क्षेत्रों अर्थात् राजनीति, अर्थशास्त्र, विधायी, विज्ञान, मानवता, स्वास्थ्य, मनोविज्ञान और समाजशास्त्र को अपने में शामिल करता है। स्पष्ट रूप से इस आसान परिभाषा को ऐसे बहुत से देशों के द्वारा विरूपित कर दिया गया है जिनका नेतृत्व इस्लामी राजनीतिक दल कर रहे हैं। इसलिए वो अगर अपने विरोधी शिक्षा को बढ़ावा देने में नहीं तो अपने कई वादों का लिहाज़ करने या शरीयत के कुछ प्रावधानों को लागू करने में नाकाम ज़रूर साबित हुए हैं।
इस सम्बंध में ये उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि उल्टे ही इन जमातों ने बहुत उल्लेखनीय जनमत को अपने भरोसे में लेने के लिए अपने समकक्षों को अवसर प्रदान किया है और साथ ही साथ वैश्विक सतह पर लापरवाही, असहिष्णुता और कभी कभी इस्लामोफ़ोबिया को बल और स्थिरता प्रदान किया है। परिणाम स्वरूप और स्वाभाविक रूप से भी मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका की जनता ने इनमें विश्वास खो दिया है और अगले चुनाव में बिल्कुल वोट न देकर या अन्य सेकुलर दलों को सरकार बनाने का अवसर प्रदान कर बदला लेने की योजना बना रहे हैं।
उपरोक्त तत्वों को ध्यान में रखकर विश्वास के साथ ये कहा जा सकता है कि इस्लाम और लोकतंत्र के सुसंगत होने पर चर्चा को सुलझाना बहुत कठिन है। ये और भी सैद्धांतिक पारदर्शिता और मुस्लिम बहुल समाज के मौजूदा हालात के गहरे विश्लेषण का अवसर प्रदान करता है।
स्रोत: http://www.moroccoworldnews.com/2013/09/106096/islam-and-democracy-in-the-current-context-untapped-questions/
URL for English article: https://newageislam.com/islam-politics/islam-democracy-current-context-untapped/d/13729
URL for Urdu article: https://newageislam.com/urdu-section/islam-democracy-current-context-untapped/d/13814
URL for this article: https://newageislam.com/hindi-section/islam-democracy-current-context-untapped/d/34576