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Hindi Section ( 25 Dec 2012, NewAgeIslam.Com)

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Taliban fatwa against 'Merry Christmas' has far reaching consequences क्रिसमस की मुबारकबाद के खिलाफ तालिबान का फतवा गैर इस्लामी है

 

न्यु एज इस्लाम अपने ईसाई भाईयों को क्रिसमस की मुबारकबाद पेश करता है

हमारे पाठक लोग गैर मुस्लिमों के क़त्ल के समर्थन में तालिबानी फ़तवे को पढ़ चुके हैं। हमने उसका खंडन भी प्रकाशित किया है तालिबान की ओर से एक और फतवा जारी किया गया है जिसमें मुसलमानों को ईसाइयों (अहले किताब) को क्रिसमस की मुबारकबाद देने से मना किया गया है और इसे हराम और गैर शरई अमल करार दिया है। ये उनकी ओर से बहुलवादी समाज में मुसलमानों और ईसाइयों के बीच मतभेद को बढ़ावा देने की एक कोशिश है। इस तरह के फतवे नफरत को बढ़ावा देते हैं और मुसलमानों को एक ऐसे क़ौम के रूप में पेश करते हैं जो सांप्रदायिक सद्भाव, अंतर्धार्मिक सांस्कृतिक बातचीत में यक़ीन नहीं रखती, जिस पर क़ुरान में जोर दिया गया है। पैगम्बर मोहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्ल्म) गैर मुस्लिमों के उपहार और निमंत्रण स्वीकार करते थे। मुस्लिम समाज में इस तालिबानी दृष्टिकोण और मानसिकता की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इंडोनेशिया में धार्मिक लोगों की ओर से इस साल मुसलमानों को ईसाईयों को क्रिसमस की बधाई देने से मना किया गया है, उनकी दावत स्वीकार करना और उनकी खुशी में शामिल होना तो दूर की बात है। यहां तक ​​कि उन्होंने वहां के राष्ट्रपति से राष्ट्रीय क्रिसमस समारोह में शामिल न होने की दरख्वास्त की है, जबकि एक बहुलवादी देश के राष्ट्रपति के रूप में उन्हें ऐसे समारोह में शामिल होना चाहिए। इसलिए, ये स्पष्ट है कि ये तालाबानी फतवे दूरगामी प्रभाव वाले हैं और इस मानसिकता की घोर निंदा की जानी चाहिए और सामूहिक रूप से इसका मुकाबला करना चाहिए।

अंत में हम अपने सभी अहले किताब भाईयों को क्रिसमस की मुबारकबाद देते हैं और नए साल में उनकी सलामती और खुशहाली के लिए दुआ करते हैं। हम यहाँ नवाये अफगान जिहाद में प्रकाशित लेख की नकल पेश कर रहे हैं और अपने पाठकों से अनुरोध करते है कि इस पर अपनी राय व्यक्त करें।--- न्यु एज इस्लाम एडिट डेस्क

 

Taliban fatwa against 'Merry Christmas' has far reaching consequences

New Age Islam wishes Christians a Merry Christmas!

Dec 24, 2012

Our readers have gone through the Taliban's fatwa justifying the killings of non-Muslims published in their mouth-piece Nawa-e-Afghan Jihad. We have published the refutations of it. In yet another fatwa on the issue of extending greetings to Christians (ahl-e-Kitab) on Christmas, they have declared saying "Merry Christmas 'to Christians haram and un-Islamic. This is another attempt at creating rifts between Muslims and Christians in a multicultural society. Fatwas like this only promote hatred and present Muslims as a community that does not believe in communal harmony and interfaith cultural exchanges and dialogue which the Quran encourages and emphasises. The holy Prophet (PBUH) accepted invitations and gifts from non-Muslims and stood by them in their joy and sorrow.

This Talibani ideology and mindset has taken deep roots in all Muslim societies. This is evident from the fatwa issued by ulema from a section of religious community in Indonesia and other Muslim countries urging Muslims not to say Merry Christmas to the Christians, not to speak of accepting their invitations to their festivities. In Indonesia they have even asked the President not to attend the national Christmas celebrations which he should do as the President of a multi-religious country. The Taliban fatwa, therefore, seems to have far-reaching consequences and this mindset has to be condemned in the harshest possible terms and fought collectively. At the end, we wish all our ahl-e-kitab Christian brethren a very happy Christmas and pray for their well being and prosperity in the New Year. We are producing the article published in the Nawa-e-Afghan Jihad so that Muslims may be aware of what is going on their society. Now when they hear these same arguments from a seemingly well-educated, even westernised liberal, they can judge where these arguments are coming from, sometimes even without the express understanding of the speaker. We hope readers will express their views on it. - New Age Islam Edit Desk

 

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क्रिसमस में ईसाइयों के साथ किसी प्रकार का सहयोग और मुबारकबाद देना बिल्कुल नाजायज़ और हराम है

हज़रत मुफ्ती हमीदुल्लाह जान साहब दामत बर्कातुहुम अलआलिया

दिसम्बर, 2012

बिस्मिल्लाहे वल्हमदोलिल्लाहे वस्सलातो वस्सलाम अला रसूलुल्लाहे व आलेहि वसहबिहि वमिन वाला

अऊज़ोबिल्लाहे मिनस्-शैतानिर्रजीम

या अइयोहल्लज़ीना आमनू लातत्तखेज़ुल यहूदा वन्नसारा औलियाआ बादोहुम औलियाओ बादिन वमन यतवल्लहूम मिनकुम फइन्नहू मिन्हुम इन्नल्लाहा लायहदिल क़ौमज़्ज़ालिमीन

मेरे प्यारे भाइयों! आज का पश्चिम हम पर अपनी व्यवस्था थोपना चाहता है। ये ईसाइयों की व्यवस्था है, ईसाईयत ने इसीलिए हमारे हवाले किया है ताकि मुसलमान बाहरी तौर पर तो मुसलमान हों लेकिन व्यवस्था हमारी हो .... और ये इसी व्यवस्था की  'बरकत' है कि आज हम हर उस लानत में उनके साथ 'सहिष्णुता' का नाम देकर शामिल होते हैं ...... कभी गठबंधन करते हैं ..... कभी चंदे इकट्ठे करते हैं ...... बल्कि कुछ साल पहले ...... दो या तीन साल पहले जब परवेज़ मुशर्रफ का दौर था तो एक बैठक बुलाई गयी थी इस्लामाबाद में उसकी अध्यक्षता में, इस बैठक में ईसाई भी मौजूद थे तथा दूसरी विचारधाराओं के उलेमा भी मौजूद थे। वहां ईसाइयों ने खुलकर बयान किया कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम खुदा के बेटे हैं (अलएबाज़ बिल्लाह) ..... उन्होंने अपना अक़ीदा (विश्वास) खुलकर बयान किया ..... लेकिन हमारे उलेमा ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की बल्कि कुछ लोगों ने वहां खुशामद की ..... इसलिए एक आलिम ने मेरे सामने ये बात कही कि ''इस बैठक से हम निकले लेकिन ईमान छोड़कर निकले '......कि वो कुफ़्र बकते रहे और हम सुनते रहे ..... अफसोस की बात ये है कि हमारे उलमा कोई उनके साथ केक काटता है .... कोई उनको मुबारकबाद देता है ..... उलेमा ये करते हैं तो जनता का क्या हाल होगा?

हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम हमारे रसूल हैं ..... हम हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की महानता से इंकार नहीं करते हैं .... बल्कि वास्तव में उनकी महानता के कायल तो हम हैं .... हम कहते हैं आसमानों पर चढ़ गए थे, वो कहते हैं सूली पर चढ़े थे ..... सम्मान हम उनका करते हैं! लेकिन ये त्योहार जो वो मनाते हैं, ये उनका धार्मिक त्योहार है .... और काफ़िरों के किसी भी धार्मिक त्योहार में भागीदारी करना नाजायज़ है ..... इसलिए उलमा को चाहिए बल्कि जनता को भी चाहिए कि दूसरे मुसलमान भाइयों को भी जागरूक करें। लेकिन हम क्या कर रहे हैं? हर काफ़िर के साथ, मिर्जाईयों के साथ हम घुल मिल चुके हैं, ईसाइयों के साथ हम घुल मिल चुके हैं। और फिर ऐसी स्थिति में जब ईसाइयों के साथ हमारी आलमी (वैश्विक) जंग है ..... ऐसी स्थिति में उनके साथ संबंध रखना ...... अल्लाहो अकबर!!! शेखुल इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनी रहिमतुल्लाह अलैहि .... मेरे पास इरशादाते मदनी मौजूद है .... कुछ लोग मुझे कहते हैं कि मैं सख्ती करता हूँ .... मैं उनका इरशाद नक़ल करता हूँ .... अगर सख्ती की है तो उन्होंने की है, नरमी की है तो उन्होंने की है ..... मैं नक़ल करने वाला हूँ ......

मौलाना इदरीस साहब रहिमतुल्लाह अलैहि की बात याद आ गयी .... मौलाना इदरीस रहिमतुल्लाह अलैहि से किसी ने पूछा कि हज़रत कमरे में एसी लगाना कैसा है? तो मौलाना ने कहा कि हज़रत थानवी रहिमतुल्लाह अलैहि फरमाया करते थे कि घर में चार चीजें मकसूद हैं .... रिहाइश .... ज़ेबाईश ..... आसाइश, सहूलत, पंखे लगाना आदि और नुमाइश ...... हज़रत थानवी रहिमतुल्लाह अलैहि ने फरमाया कि आखरी नुमाइश नाजायज़ है बाकी सब जायज़ है .... तो उस व्यक्ति ने मौलाना इदरीस साहब कांधलवी रहिमतुल्लाह अलैहि से पूछा कि हज़रत! आपकी क्या राय है ? ये तो आपने हज़रत थानवी का इरशाद नक़ल किया, आपकी क्या राय है? तो मौलाना इदरीस साहब रहिमतुल्लाह अलैहि ने फरमाया,'' अच्छा मौलवी साहब! हमारी क्या हैसियत है? हमारी हैसियत तो हद औसत की है, हद औसत सुग़रा को कुबरा से मिलाकर दरमियान से गिर जाता है ..... हम तो बड़े की बात आप तक पहुंचाते हैं, हमारी क्या हैसियत है ..... बड़ों की बात आप तक पहुंचाने वाले हैं ..... तो मैं भी यही गुज़ारिश कर रहा हूँ कि मैं बड़ों की बात आप तक पहुंचा रहा हूँ ..... फिर आप खुद फैसला करें।

हज़रत शेखुल इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनी रहिमतुल्लाह अलैहि ने इरशादाते मदनी में बहुत कुछ फरमाया है, मैं उसका खुलासा और निचोड़ रखता हूँ .... जब काफ़िर मुसलमानों पर हमलावर हों, जैसे रूस, अफगानिस्तान में आया, अमेरिका, अफगानिस्तान में आया .... जब काफ़िर, मुसलमान पर हमलावर हों .... शेखुल इस्लाम मौलाना मदनी रहिमतुल्लाह अलैहि का फैसला नक़ल कर रहा हूँ .... मैं नक़ल करने वाला हूँ .... तो जो मुसलमान उस काफ़िर का साथ दे, वो बदतरीन काफ़िर है .... सिर्फ 'काफ़िर शब्द नहीं कहा, लेकिन कहा कि वो बदतरीन काफ़िर है ...... आज हम उन्हीं ईसाइयों के साथ सहिष्णुता दिखाते हैं, उनके साथ कांफ्रेंस करते हैं .... उनके साथ केक काटते हैं .... उनके साथ मोहब्बत का इज़हार करते हैं ..... अल्लाह का फरमान है:

या अइयोहल्लज़ीना आमनू- ऐ ईमान वालो!  लातत्तखेज़ुल यहूदा वन्नसारा- यहूदी व ईसाई को दोस्त न बनाओ। औलियाआ बादोहुम औलियाओ बादिन- ये अपने दरमियान एक दूसरे के दोस्त हैं ..... सब इकट्ठे हैं ना, नहीं हैं ? नाटो के नाम पर या ऐसाफ के नाम पर ..... जो भी नाम रखते हैं, सबसे इकट्ठे हैं आपके खिलाफ।  वमन यतवल्लहूम मिनकुम फइन्नहू मिन्हुम- और जिसने उनको दोस्त बनाया वो भी उन्हीं में से हैं, मोफस्सिरीन (व्याख्या करने वाले) लिखते हैं फहकमह हकमहु- उनका हुक्म भी वही है, जो उनका है। इस इसलिए मैं ये दरख्वास्त कर रहा हूं कि उलमा अपनी मस्जिदों में इसको विषय बनायें और एक सामूहिक फैसला भी करें और जिन लोगों की बात मीडिया में सुनी जाती है, वो उस ज़रिए से भी इस बात की व्याख्या कर दें कि मुसलमानों को क्रिसमस में ईसाइयों के साथ किसी तरह का सहयोग और मुबारकबाद देना बिल्कुल नाजायज़ और हराम है। ये उनका धार्मिक त्योहार है और कुफ्फार के किसी भी धार्मिक त्योहार में उनके साथ मेल जोल या घालमेल या दोस्ती नुमा पालिसी ये सब नाजायज़ है .... अल्लाह करीम सबको समझ अता फरमाए .... आजकल क्रिसमस का मौका है और फिर इसमें कांफ्रेंसें भी होती हैं, फिर उलेमा भी इसमें में चले जाते हैं .....

मैं उलेमा से दरख्वास्त करूंगा न खुद जाएं बल्कि दूसरों को भी रोकें .... खुदा के वास्ते न जाएं ..... खुदा के वास्ते न जाएं .... खुदा के वास्ते न जाएं.... कुछ लोग कहते हैं कि हम वहाँ हक़ बात कह देते हैं .... लेकिन वो जो कुफ्र बकते हैं, उस कुफ्र को तो आप नहीं रोकते! आप के होते हुए कुफ़्र बकते हैं .... उलेमा न जाएं उनकी कांफ्रेंस में तो ये उनकी नाकामी होगी कि उलमा नहीं आ रहे .... जब आप चले जाते हैं तो उनकी कांफ्रेंस कामयाब हो जाती है .... चाहे आप गालियां भी दें लेकिन उनकी कांफ्रेंस कामयाब हो जाती है ...... वो अपनी कामयाबी पर खुशी मनाते हैं कि विभिन्न विचारधारा के उलमा इकट्ठे हुए थे, बरेलवी भी थे देवबन्दी भी थे, अहले हदीस भी थे .... सभी विचारधारा के कारण लोग जमा हुए थे .... तो उन्हें मजबूती मिल जाती है कि सभी विचारधारा के उलेमा आए थे .... इसलिए उन्हें नाकाम बनाने का तरीका ये है कि उनका बायकाट (बहिष्कार) किया जाए, उनकी किसी भी तरह की कांफ्रेंस में जो सामूहिक कांफ्रेंस हो, मुसलमानों को विशेष तौर पर उलमा को बिल्कुल शिरकत नहीं करनी चाहिए .... और इसमें शामिल होना गुनाह है .... सवाब नहीं है, ये एक गलत विचार है। वास्तव में शैतान धोखा देता है .... मैं वहाँ हक़ बात करूंगा .... बादशाह के साथ, मंत्री के साथ मंजरों के साथ मेरा फोटो भी आ जाएगा और मेरा नाम भी आ जाए कि ये भी बड़ा आदमी है। तो अंदर बीमारी कुछ और होती है .... और बाहरी तौर पर बात कुछ और होती है .... अल्लाह ताला आप और हम सब की हिफ़ाज़त फरमाए, आमीन। यही मेरी गुज़ारिश है ..... यही मेरा फतवा है और ये भी शुक्र है कि उलमा ने मेरा समर्थन किया और जैसे इस फतवा में मैं अलग नहीं हूँ और अद्वितीय नहीं हूँ बल्कि उलमा साथ हैं .... अल्लाह उन्हें जज़ाए खैर दे।

वआखिरों दावाना अनिलहम्दोलिल्लाहे रब्बिलआलिमीन

दिसम्बर, 2012 , स्रोत: नवाये अफगान जिहाद

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