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Hindi Section ( 7 March 2026, NewAgeIslam.Com)

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Dignity and Respect in Islam-Part-3 इस्लाम में सम्मान और गरिमा का अधिकार

डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी, न्यू ऐज इस्लाम

(भाग तीन)

7 मार्च 2026

सम्मान और गरिमा का तकाज़ा यह है कि किसी पर झूठा आरोप न लगाया जाए। झूठे इल्ज़ाम और बहुतान ऐसे गंभीर काम हैं जो न केवल समाज में झगड़े और फ़साद पैदा करते हैं बल्कि जिस व्यक्ति पर आरोप लगाया जाता है उसकी इज़्ज़त और सम्मान को भी नुक़सान पहुँचाते हैं। आज हम अपने समाज में देखते हैं कि कई झगड़े और विवाद सिर्फ इसलिए पैदा हो जाते हैं क्योंकि किसी को बिना सबूत के दोषी ठहरा दिया जाता है या उसके ख़िलाफ़ झूठे आरोप लगा दिए जाते हैं। पहली नज़र में यह बहुत बड़ा अपराध नहीं लगता, लेकिन हक़ीक़त में यह ऐसा काम है जो समाज की शांति को नष्ट कर देता है और लोगों के दिलों से सुकून और भरोसा ख़त्म कर देता है।

जब हम इस संदर्भ में इस्लाम की शिक्षाओं का अध्ययन करते हैं तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इस्लाम बहुत साफ़ तौर पर लोगों को बहुतान जैसे गंभीर अपराध से बचने की हिदायत देता है। यह भी समझना ज़रूरी है कि इस्लाम की ये शिक्षाएँ सब के लिए हैं। इनका संबंध किसी ख़ास जाति, नस्ल या धर्म से नहीं है बल्कि यह सभी इंसानों के लिए हैं।

क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

وَالَّـذِيْنَ يَرْمُوْنَ الْمُحْصَنَاتِ ثُـمَّ لَمْ يَاْتُوْا بِاَرْبَعَةِ شُهَدَآءَ فَاجْلِدُوْهُـمْ ثَمَانِيْنَ جَلْـدَةً وَّلَا تَقْبَلُوْا لَهُمْ شَهَادَةً أَبَدًا ۚ وَأُولَـٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ (النور: 4)

जो लोग पाक-दामन औरतों पर इल्ज़ाम लगाते हैं और चार गवाह पेश नहीं करते, तो उन्हें अस्सी कोड़े मारो और आगे कभी उनकी गवाही स्वीकार न करो। यही लोग नाफ़रमान हैं।

इस आयत से पता चलता है कि किसी की इज़्ज़त पर झूठा आरोप लगाना कितना बड़ा अपराध है। अगर कोई व्यक्ति किसी पर आरोप लगाए और उसे साबित न कर सके तो क़ुरआन में उसके लिए साफ़ तौर पर सज़ा का ऐलान किया गया है। यह सज़ा इसलिए दी जाती है क्योंकि किसी व्यक्ति की इज़्ज़त और पाकदामनी को नुक़सान पहुँचाया गया है। ऐसे अपराधों से बचना न केवल व्यक्ति के लिए बल्कि पूरे समाज की शांति और सुरक्षा के लिए भी ज़रूरी है।

इस आयत की व्याख्या करते हुए मौलाना मौदूदी लिखते हैं कि इस ह़ुक्म का उद्देश्य समाज में लोगों के आपसी अवैध संबंधों की अफवाहों को पूरी तरह रोक देना है। ऐसी बातें समाज में बहुत सी बुराइयाँ फैलाती हैं। एक व्यक्ति किसी के बारे में सच्ची या झूठी कहानियाँ मज़े लेकर बयान करता है, फिर दूसरा व्यक्ति उसमें और बढ़ा-चढ़ाकर बातें जोड़ देता है और आगे फैला देता है। इस तरह समाज में बुरे विचार फैलने लगते हैं और बुरे इरादे रखने वाले लोगों को मौके तलाशने का रास्ता मिल जाता है। इस्लामी शरीअत इस बुराई को शुरुआत में ही रोक देना चाहती है। एक तरफ अगर ज़िना का अपराध पक्के सबूतों से साबित हो जाए तो इस्लाम उसकी कड़ी सज़ा देता है, और दूसरी तरफ अगर कोई व्यक्ति बिना सबूत के ऐसा आरोप लगाए तो उसे भी सज़ा दी जाती है ताकि लोग बिना प्रमाण के किसी पर इल्ज़ाम लगाने की हिम्मत न करें।

क़ुरआन में एक और जगह अल्लाह तआला फ़रमाता है:

وَالَّذِينَ يُؤْذُونَ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ بِغَيْرِ مَا اكْتَسَبُوا فَقَدِ احْتَمَلُوا بُهْتَانًا وَإِثْمًا مُّبِينًا (الأحزاب: 58)

जो लोग मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों को बिना किसी अपराध के तकलीफ़ पहुँचाते हैं, उन्होंने झूठे आरोप और खुले गुनाह का बोझ उठा लिया है।

यह आयत भी बताती है कि किसी को तकलीफ़ पहुँचाना चाहे हाथ से हो या ज़ुबान से, हर हाल में बुरा काम है। इसमें बहुतान और ग़ीबत जैसी गंभीर सामाजिक बुराइयाँ भी शामिल हैं। समाज में सम्मान और गरिमा को बनाए रखने के लिए ज़रूरी है कि हर उस काम से बचा जाए जिससे किसी की इज़्ज़त को ठेस पहुँचे।

सम्मान और गरिमा को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि किसी की ग़ीबत न की जाए। ग़ीबत और चुग़ली ऐसे बुरे काम हैं जो समाज की एकता, तरक़्क़ी और खुशहाली को नष्ट कर देते हैं। इस्लाम ने इस बुरी आदत से सख्ती के साथ मना किया है।

अब सवाल उठता है कि ग़ीबत क्या है?

ग़ीबत का मतलब है किसी व्यक्ति की गैर-मौजूदगी में उसके बारे में ऐसी बात कहना जिसे अगर वह सुन ले तो उसे बुरा लगे।

ग़ीबत की परिभाषा एक हदीस में इस तरह बयान की गई है। एक व्यक्ति ने पैग़म्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से पूछा: ग़ीबत क्या है?”

आपने फरमाया: अपने भाई के बारे में ऐसी बात कहना जो उसे नापसंद हो।

उस व्यक्ति ने पूछा: अगर मेरी बात सच हो तो?”

आपने जवाब दिया: अगर वह बात सच है तो वह ग़ीबत है, और अगर वह सच नहीं है तो वह बहुतान है।

इस हदीस से पता चलता है कि किसी के दोष को उसकी ग़ैर-मौजूदगी में बयान करना ग़ीबत है, और अगर वह दोष उसमें है ही नहीं तो वह बहुतान बन जाता है।

आज अगर हम अपनी बैठकों, समाज और संस्थाओं को देखें तो मालूम होता है कि ग़ीबत को अक्सर बुरा नहीं समझा जाता। अफसोस की बात यह है कि आज के दौर में कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि जो व्यक्ति जितनी ज़्यादा ग़ीबत करता है लोग उसके उतने ही क़रीब हो जाते हैं।

क़ुरआन इस बुरे काम की सख़्त निंदा करता है। अल्लाह तआला फरमाता है:

وَلَا يَغْتَب بَّعْضُكُم بَعْضًا ۚ أَيُحِبُّ أَحَدُكُمْ أَن يَأْكُلَ لَحْمَ أَخِيهِ مَيْتًا فَكَرِهْتُمُوهُ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ تَوَّابٌ رَّحِيمٌ (الحجرات: 12)

तुम में से कोई भी एक-दूसरे की ग़ीबत न करे। क्या तुम में से कोई अपने मरे हुए भाई का मांस खाना पसंद करेगा? तुम तो इससे घृणा करोगे। इसलिए अल्लाह से डरो। बेशक अल्लाह तौबा क़बूल करने वाला और दयालु है।

इस आयत की व्याख्या करते हुए सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि अल्लाह ने ग़ीबत को मरे हुए भाई का मांस खाने से तुलना करके यह बताया है कि यह काम कितना घृणित है। मरे हुए जानवर का मांस खाना ही घिनौना है, लेकिन यहाँ तो इंसान के मांस की बात है और वह भी अपने ही भाई का। इस उदाहरण को सवाल के रूप में पेश करके क़ुरआन इंसान को अपने दिल से सोचने पर मजबूर करता है। अगर कोई व्यक्ति अपने मरे हुए भाई का मांस खाने की कल्पना से भी घृणा करता है, तो वह कैसे यह पसंद कर सकता है कि अपने भाई की ग़ैर-मौजूदगी में उसकी इज़्ज़त पर हमला करे, जबकि वह ख़ुद अपना बचाव भी नहीं कर सकता और उसे पता भी नहीं कि उसकी बुराई की जा रही है।

इन सभी प्रमाणों से यह बात साफ़ हो जाती है कि इस्लाम हर व्यक्ति की इज़्ज़त और गरिमा की रक्षा करता है। किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह बहुतान या ग़ीबत के ज़रिए किसी का अपमान करे। यह दोनों बुराइयाँ न केवल व्यक्तियों को बल्कि पूरे समाज को नुक़सान पहुँचाती हैं।

जब लोग एक-दूसरे की गैर-मौजूदगी में बुराई करते हैं या झूठे आरोप लगाते हैं तो आपसी संबंध ख़राब हो जाते हैं और समाज की एकता प्रभावित होती है। इसके परिणामस्वरूप समाज में शक, झगड़े और विभाजन बढ़ जाते हैं। ये बुराइयाँ न केवल व्यक्ति की इज़्ज़त को ठेस पहुँचाती हैं बल्कि समाज की नैतिक नींव को भी कमज़ोर कर देती हैं।

इस्लाम इन बुराइयों से सख़्ती से रोकता है और लोगों को सिखाता है कि वे अपनी ज़ुबान की हिफाज़त करें और दूसरों की कमियाँ ढूँढने के बजाय अपने चरित्र को सुधारने पर ध्यान दें। अगर समाज ग़ीबत और बहुतान जैसी बुराइयों से मुक्त हो जाए तो प्रेम, भाईचारा और भरोसे का माहौल पैदा हो सकता है। यही मूल्य एक स्वस्थ, शांतिपूर्ण और मज़बूत समाज की नींव बनते हैं।

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Part-1:  Human Rights in Islam-Part-1इस्लाम में इंसानी हूक़ूक़

Part-2:   Dignity and Respect in Islam-Part-2 इस्लाम में गरिमा और सम्मान

URL:  https://newageislam.com/hindi-section/dignity-respect-islam-part-3/d/139151

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