
डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी, न्यू ऐज इस्लाम
(भाग–1)
21 अप्रैल, 2026
यह सच्चाई है कि इस्लाम एक फ़ितरी धर्म है। यह इंसान की ज़रूरतों, मक़ासद और जीवन के तरीक़े के बारे में बुनियादी और अहम मार्गदर्शन देता है। इंसानी जीवन की सबसे महत्वपूर्ण ज़रूरतों में से एक पर्यावरण है, जिस पर बायोडायवर्सिटी का वजूद निर्भर करता है।
पर्यावरण प्रदूषण का एक बड़ा कारण यह है कि इंसान फ़ितरी संसाधनों में बेवजह दख़ल देने लगता है। ऐसा दख़ल अक्सर जिहालत और ख़ुदा के डर की कमी की वजह से होता है। अज्ञानता के कारण लोग उन कारणों और तत्वों को पहचान नहीं पाते जो पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाते हैं। उन्हें यह समझ नहीं आता कि पर्यावरण के बिगड़ने से समाज पर क्या असर पड़ता है, इसके कारण क्या हैं, और इसे कैसे ठीक किया जा सकता है।
यह भी ध्यान देने की बात है कि स्वार्थ और ख़ुदा के डर की कमी इंसान को अपने निजी फ़ायदे को समाज और लोगों के फ़ायदे पर तरजीह़ देने पर मजबूर कर देती है। कई बार इंसान यह जानते हुए भी कि उसके काम पर्यावरण और बायोडायवर्सिटी को नुक़सान पहुँचा रहे हैं, फिर भी अपने निजी लाभ के लिए वही काम करता रहता है। अगर उसके दिल में ख़ुदा का डर होता, तो वह कभी भी अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को नुक़सान नहीं पहुँचाता।
पर्यावरण को हर तरह के प्रदूषण से बचाने के लिए ज़रूरी है कि इंसान ज्ञान, शोध और समझ के साथ-साथ ख़ुदा के प्रति ज़िम्मेदारी का एहसास भी पैदा करे। जब इंसान इल्म और ईश्वर-भय से मार्गदर्शित होता है, तो वह न केवल पर्यावरण को साफ़ रखता है बल्कि अपने कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों को भी संतुलित और सही ढंग से निभाता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में रिश्तों और अधिकारों की अहमियत को समझता है।
यह भी ज़रूरी है कि आज के समय में पर्यावरण प्रदूषण को केवल हवा, पानी, ज़मीन और मिट्टी के प्रदूषण तक सीमित कर दिया गया है। लेकिन अगर गहराई से सोचें, तो पता चलता है कि प्रदूषण सिर्फ़ इन्हीं चार चीज़ों तक सीमित नहीं है। इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण प्रकार हैं, जैसे नैतिक प्रदूषण, धार्मिक प्रदूषण, आर्थिक प्रदूषण, राजनीतिक प्रदूषण, शैक्षिक प्रदूषण और सामाजिक प्रदूषण।
अगर इन पहलुओं को संतुलन के साथ नहीं निभाया गया और इनमें लापरवाही हुई, तो ये पर्यावरण को बहुत नुक़सान पहुँचा सकते हैं। दरअसल, विज्ञान जिन कारणों को पर्यावरण प्रदूषण का कारण बताता है, उनका संबंध भी कहीं न कहीं नैतिकता, धर्म और समाज से जुड़ा हुआ है। इसलिए पर्यावरण को साफ़ और शुद्ध बनाने के लिए इंसान को अपने चरित्र, नैतिकता, धर्म और सामाजिक व्यवहार पर भी गंभीरता से ध्यान देना होगा और उनमें संतुलन और सामंजस्य बनाए रखना होगा।
माहिरीन अच्छी तरह जानते हैं कि पर्यावरण प्रदूषण समाज को दो तरह से प्रभावित करता है: मानसिक और नैतिक रूप से, और शारीरिक रूप से। इससे यह साफ़ होता है कि प्रदूषण केवल ज़मीन, पानी, हवा और मिट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नैतिक गिरावट और सामाजिक अव्यवस्था भी शामिल है।
यह सच है कि जब आर्थिक हालात ख़राब होते हैं, परिवार की स्थिति ठीक नहीं होती और बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं होतीं, तो इंसान मानसिक और नैतिक रूप से प्रभावित होता है। जब समाज नैतिक रूप से कमज़ोर हो और आसपास गंदगी और अव्यवस्था हो, तो जीवन बहुत कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में इंसान शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से प्रभावित होता है—ख़ासकर वहाँ जहाँ सही भोजन, कपड़े, रहने की जगह और सफ़ाई की व्यवस्था नहीं होती और हर जगह गंदगी और गंदा पानी होता है।
इसीलिए इस्लाम हर तरह से पर्यावरण को साफ़ रखने पर ज़ोर देता है, ताकि इंसान शारीरिक और मानसिक रूप से सुख और शांति के साथ जीवन जी सके। हर व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है कि वह पर्यावरण को साफ़ बनाए।
असल में, इंसानी जीवन को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाले तत्व केवल बाहरी गंदगी नहीं होते, बल्कि वे चीज़ें भी होती हैं जो आत्मा से जुड़ी होती हैं। अगर इन आध्यात्मिक पहलुओं को सही रखा जाए, तो ये आत्मा को शांति देते हैं। लेकिन अगर इनमें गड़बड़ी हो जाए, तो यह अंदरूनी जीवन को नुक़सान पहुँचाती है और पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ाती है।
इस्लाम की बुनियादी शिक्षाओं में से एक यह है कि इंसान के लिए एक शांतिपूर्ण और स्वस्थ वातावरण तैयार किया जाए। लेकिन इस्लाम पर्यावरण की सफ़ाई की शुरुआत अंदरूनी और मानसिक शुद्धता से करता है। वह सबसे पहले इंसान के दिल और दिमाग़ को हर तरह की बुराई से साफ़ देखना चाहता है। क्योंकि इंसान के विचार उसके कर्मों को बनाते हैं। अगर विचार अच्छे होंगे, तो कर्म भी अच्छे होंगे, जिससे इंसान को अंदरूनी शांति मिलेगी।
इसी वजह से इस्लाम अच्छे और सकारात्मक विचारों पर ज़ोर देता है और इसके लिए ईमान और सही विश्वास को ज़रूरी मानता है। सही विश्वास रखने वाले व्यक्ति को मोमिन कहा जाता है। एक सच्चा मोमिन वह है जो ईमानदारी से अल्लाह पर विश्वास रखता है, उससे डरता है और सामाजिक ज़िम्मेदारियों को संतुलित तरीक़े से निभाने की कोशिश करता है। वह मानता है कि अल्लाह ही पूरी दुनिया का पैदा करने वाला, मालिक और पालनहार है; जीवन और मृत्यु उसी के हाथ में हैं; इज़्ज़त और बेइज़्ज़ती उसी से मिलती है; और वही ज़रूरतों को पूरा करने वाला है।
इन सभी बातों पर अमल करने से पर्यावरण प्रदूषण दो तरह से कम होता है: एक, माद्दी रूप से, जिससे पर्यावरण साफ़ और शुद्ध होता है; और दूसरा, नैतिक और आध्यात्मिक रूप से, जिससे समाज में पवित्रता आती है।
इसलिए, पर्यावरण को इंसानियत के लिए लाभकारी बनाने के लिए ज़रूरी है कि हम उसे माद्दी और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर साफ़ करें। इस्लाम हमें केवल बाहरी प्रदूषण को खत्म करने की ही शिक्षा नहीं देता, बल्कि दिल और दिमाग को भी शुद्ध करने की शिक्षा देता है। इसके लिए हमें अपने नैतिक मूल्यों, धार्मिक शिक्षाओं, बौद्धिक प्रयासों और शिक्षा प्रणाली को मज़बूत करना होगा।
यह भी ज़रूरी है कि पर्यावरण प्रदूषण के इस दूसरे पहलू को उजागर किया जाए और लोगों को बताया जाए कि आत्मा, दिमाग़ और चरित्र की गंदगी भी पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाती है। जब इंसान का अंदरूनी स्वरूप ख़राब हो जाता है, तो उसका समाज पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
आने वाले क़िसतौं में पर्यावरण प्रदूषण के और भी आध्यात्मिक पहलुओं पर चर्चा की जाएगी।
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डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी इस्लामी इसकोलर , मुसन्निफ़ और न्यू ऐज इस्लाम के मुसतक़िल कालम निगार हैं।
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