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Hindi Section ( 11 May 2012, NewAgeIslam.Com)

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Flogging of Women for Sex Outside Marriage Stands Brutal and Un-Islamic Today शादी से अलग शारीरिक सम्बंध के लिए औरतों को कोड़े मारना क्रूरता और गैर-इस्लामी अमल है


मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम

16 नवम्बर, 2011

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

मोहम्मद यूनुस, सह लेखक (अशफाक अल्लाह सैय्यद के साथ),  इस्लाम का असल पैग़ाम, आमना पब्लिकेशन, यू.एस.ए. 2009

पश्चिमी दुनिया के अतीत में औरतों पर बदकारी (व्यभिचार) के मामूली शक पर उन्हें दर्दनाक सजा दी जाती थी। एक अजनबी के साथ बिस्तर में पकड़े जाने पर, उसका शौहर उसे कानूनी तौर पर क़्तल कर सकता था। बदकारी के अमल के शक में उसे ज़िंदा जलाया या दूसरे गैरइंसानी तरीकों से मारा जा सकता था और इससे संबंधित सामग्री तक इंटरनेट पर आसानी से पहुँचा जा सकता है [1] और जो काफी प्रसिद्ध है और किसी भी तरह की वज़ाहत (स्पष्टीकरण) इसे बेमज़ा करेगी। दूसरी महत्वपूर्ण संस्कृतियों में भी औरतों की स्थिति कोई खास बेहतर नहीं थी। आज बख्शने, रहमत और शादी से सम्बंधित कुरानी मेयार [2] आलमी इंसानी समाज में सरायत कर गए हैं, दुनिया के अधिकांश हिस्सों ने औरतों को सज़ा देने के ज़ालिमाना तरीकों से तौबा कर लिया है और सज़ा देने के साधारण तरीकों को अपनाया है। लेकिन इस्लाम के कुछ केन्द्र विशेष संदर्भ वाली मिसाली (आदर्श) सजा (जनता के बीच कोड़े मारना) से अब तक चिपके हुए हैं जो उस ज़माने में सख्त नहीं मानी जाती थी लेकिन आज की दुनिया में सज़ा के प्रोटोकाल में तब्दीली से ये अब बहुत अधिक बर्बर मानी जाती हैं। इस तरह औरतों पर अन्याय और यातना पहुँचाने के अमल में बदलाव आया है। हम इस पहलू के साथ एक नई बसीरत के लिए कुरान की तहक़ीक़ करेगें।

कुरान 'अवामी बदकारी' या ज़िना के लिए कोड़े मारने की सज़ा का हुक्म देता है उस ज़माने में एक रिवाज था जो औरतों को इजाज़त देता था कि उनके शौहर अगर व्यापार, हमले या किसी मिशन के लिए घर से दूर हों तो वो अजनबियों के साथ रह सकती हैं (24:2) इस रिवाज ने बच्चों के पिता को तय करने का विवाद पैदा किया जो वैवाहिक जीवन से बाहर पैदा हुए बच्चों की पहचान के लिए जमा होने पर बच्चों के चेहरे मुहरे को उसके पिता से तुलना करके किया जाता था और उसके बाद बच्चों के पिता का फैसला किया जाता था [3] ये अमल, एक सामाजिक मेयार बन गया था, जो मर्दों को औरतों, जिनके साथ उन्होंने अस्थायी शादी की थी या साथ रहे थे, उनके प्रति सभी सामाजिक और वित्तीय ज़िम्मेदारियों से मुक्त करता था, यो औरतों को आर्थिक फायदे के लिए बदकारी पर मजबूर करता था, और इस तरह के संबंधों से पैदा हुए बच्चों को समाज के रहमो करम पर छोड़ देते थे। ये कुरान के परिवार कानून के बिल्कुल विरोधी था जो (1) पुरुषों को यौन, आर्थिक और सामाजिक लाइसेंस से महरूम करने, (2) बदकारी  को संस्थागत बनने को खत्म करने, (3) औरतों को कानूनी, आर्थिक, विरासत और व्यक्तिगत अधिकार प्रदान करने और (4) तौलीदी मरहले में औरतों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए था। इसलिए एक हंगामी (आपात) कदम के तौर पर इश्तेआल अंगेज़ अमल को कुरान को रोकना था, जिसके लिए एक खास शब्द, 'ज़िना' (25:68, 17:32) और साथ ही साथ 'फाहिशतः' की आम शब्दावली का इस्तेमाल करता है (4:15) उसी के मुताबिक, कुरान नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से फरमाता है, जब आपकी खिदमत में मोमिन औरतें इस बात पर बैअत करने के लिए हाज़िर हों कि वो अल्लाह के साथ किसी चीज़ को शरीक नहीं ठहरायेंगी औऱ चोरी नहीम करेंगी औऱ बदकारी नहीं करेंगी (60:12), तो उनकी बैअत कुबूल कर लिया करें।

 "ऐ नबी! जब आपकी खिदमत में मोमिन औरतें इस बात पर बैअत के लिए हाज़िर हों कि वो अल्लाह के साथ किसी चीज़ को शरीक नहीं ठहराएँगी और चोरी नहीं करेंगी है और बदकारी नहीं करेंगी और अपनी औलाद को कत्ल नहीं करेंगी और अपने हाथों और पैरों के बीच से कोई इल्ज़ाम घड़ कर नहीं लायेंगी (यानी अपने शौहर को धोखा देते हुए किसी गैर के बच्चे को अपने पेट से जना हुआ नहीं बताएँगी) और (किसी भी) अमरे शरीयत में आपकी नाफरमानी नहीं करेंगी, तो आप उनसे बैअत ले लिया और उनके लिए अल्लाह से बख्शिश तलब फरमाएं, बेशक अल्लाह बड़ा बख्शने वाला बड़ा मेहरबान है "(60:12)

कुरान चार गवाहों की शहादत की शर्त पर, घर में मौत तक कैद (4:15) की अंतरिम सजा के साथ शुरुआत करता है (4:15):

"और तुम्हारी औरतों में से जो बदकारी का इर्तेकाब कर बैठें तो उन पर अपने लोगों में से चार मर्दों की गवाही तलब करो, अगर वो गवाही दे दें तो उन औरतों को घरों में बंद कर दो यहां तक ​​कि मौत उनके अर्सए हयात को पूरा कर दे या अल्लाह उनके लिए कोई राह (यानी नया हुक्म) मोक़र्रर फ़रमा दे (4:15)

इसके बाद कुरान, ज़िना के दोनों साझेदारों (अवामी बदकारी) को कोड़े मारने की लोकप्रिय सज़ा सेट करता है।

"बदकार औरत और बदकार मर्द (अगर गैर शादीशुदा हों) तो इन दोनों में से हर एक को (शराएत हद के साथ जुर्मे ज़िना साबित हो जाने पर) सौ (सौ) कोड़े मारो (जबकि शादीशुदा मर्द और औरत की बदकारी पर सज़ा रजम है और ये सज़ाए मौत है) और तुम्हें इन दोनों पर अल्लाह के दीन (के हुक्म के इजरा) में ज़रा तरस नहीं आना चाहिए अगर तुम अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हो, और चाहिए कि इन दोनों की सज़ा (के मौके) पर मुसलमानों की (अच्छी खासी) जमात मौजूद हो (24:2) बदकार मर्द सिवाय बदकार औरत या मुशरिक औरत के (किसी पाकीज़ा औरत से) निकाह (करना पसंद) नहीं करता और बदकार औरत से (भी) सिवाए बदकार मर्द या मुशरिक के कोई (सालेह इंसान) निकाह (करना पसंद) नहीं करता, और यह (उल ज़िना) मुसलमानों पर हराम कर दिया गया है "(24:3)

एक पाकबाज़ औरत को किसी भी झूठे इल्ज़ाम से बचाने के लिए झूठी गवाही को काबिले सज़ा जुर्म (24:5) का ऐलान किया जाता है।

"और जो लोग पाक दामन औरतों पर (बदकारी की) तोहमत लगायें फिर चार गवाह पेश न कर सकें तो तुम उन्हें (सज़ाए कज़फ के तौर पर) अस्सी कोड़े लगाओ और कभी भी उनकी गवाही क़ुबूल न करो, और यही लोग बद किरदार हैं (24:4) सिवाय उनके जिन्होंने इस (तोहमत लगने) के बाद तौबा कर ली और (अपना) इस्लाह कर ली, तो बेशक अल्लाह बड़ा बख्शने वाला निहायत मेहरबान है (उनका शुमार फ़ासिकों  में नहीं होगा लेकिन इससे हदे कज़फ माफ़ नहीं होगी"(24:5)

लेकिन, अगर शौहर ही अपनी बीवी की बदकारी में शामिल होने का एकमात्र गवाह था, तो उसकी बीवी कई बार हलफ (शपथ) ( 24:6-9) लेकर सजा से बच सकती है।

"और जो लोग अपनी बीवियों पर (बदकारी की) तोहमत लगायें और उनके पास सिवाय अपनी ज़ात के कोई गवाह न हों तो ऐसे किसी भी एक शख्स की गवाही ये है कि ( वो खुद) चार मर्तबा अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दे कि वो (इल्ज़ाम लगाने में) सच्चा है (24:6) और पांचवीं मर्तबा ये (कहे) कि उस पर अल्लाह की लानत हो अगर वो झूठा हो (7) और (इसी तरह) ये बात इस (औरत) से (भी) सज़ा को टाल सकती है कि वो चार बार अल्लाह की क़सम खाकर (खुद) गवाही दे कि वो (मर्द इस तोहमत के लगाने में) झूठा है (8), और पांचवीं मर्तबा ये (कहे) कि उस पर (यानी मुझ पर) अल्लाह का गजब हो अगर ये (मर्द इस इल्ज़ाम लगाने में) सच्चा हो"(24:9)

जैसा कि ये आयत औरतों को बज़ाहिर किसी भी सबूत को छोड़े बिना बदकारी का इर्तेकाब का लाइसेंस देती है लेकिन कुरान तीन सतह पर 'दुरुस्त' करने के नेज़ाम को मोतार्रुफ (परिचित) कराया जिसके बाद मामले में सालिसी (मध्यस्थता) होनी चाहिए (4:34-35) एक मर्द जो अपनी बीवी पर बदकारी का शक करता है तो उसे हुक्म दिया जाता है कि वो उन्हें नसीहत करे, उन्हें अस्थायी रूप से बिस्तर पर अपने से अलग कर दे और अंत में अनुशासनात्मक कार्रवाई करें, इसमें असफल रहने पर अपने तब्के के लोगों को शामिल करे और तलाक हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए (4:34-35)

"मर्द औरतों पर मुहाफिज़ और मुंतज़िम हैं इसलिए कि अल्लाह ने उनमें से बाज़ को बाज़ पर फज़ीलत दी है और इस वजह से (भी) कि मर्द (उन पर) अपने माल खर्च करते हैं, इसलिये नेक बीवियाँ इताअत शुआर होती हैं शौहरों की अदम-मौजूदगी में अल्लाह की हिफाजत के साथ (अपनी इज़्ज़त की) हिफाज़त करने वाली होती हैं, और तुम्हें जिन औरतों की नाफरमानी व सरकशी का अंदेशा हो तो उन्हें नसीहत करो और (अगर न समझें तो) उन्हें ख्वाबगाहों में (खुद से) अलैहदा कर दो और (अगर फिर भी इस्लाह पज़ीर न हों तो) उन्हें (तादीबन हल्का सा) मारो, फिर अगर वो तुम्हारी फरमांबरदार हो जायें तो पर उन पर (ज़ुल्म का) कोई रास्ता तलाश न करो, बेशक अल्लाह सबसे बुलंद सबसे बड़ा है। और अगर तुम्हें इन दोनों के दरम्यान मुखालिफत का अंदेशा हो तो तुम एक मुंसिफ मर्द के खानदान से और एक मुंसिफ औरत के खानदान से मोक़र्रर कर लो, अगर वो दोनों (मुंसिफ) सुलह कराने का इरादा रखें तो अल्लाह उन दोनों के दरम्यान मवाफिकत पैदा फरमा देगा, बेशक अल्लाह खूब जानने वाला खबरदार है "(4:34-35)

लेकिन, अगर एक शख्स ने अपनी बीवी पर बदकारी का इल्ज़ाम लगाने को मुंतखब किया है तो उसे चार ऐनी शाहिदीन (प्रत्यक्षदर्शियों) लाना चाहिए (4:15), जो बदकारी के साथ पोशीदगी को मद्देनज़र रखते हुए, तक़रीबन तमाम मामलात में तलाश कर पाना नामुमकिन है। दूसरी जानिब झूठे गवाह खड़े करने वालों को कड़ी सजा के लिए मजबूर किया जाएगा (24:4) तो शायद सबसे अच्छा एक आदमी ये कर सकता है कि वो उसे तलाक दे दे, या उसे तलाक देने की स्थिति पैदा कर दे। इसलिए, वही के नुज़ूल के दौरान हंगामी (आपातकालीन) कदम (अवामी तौर पर कोड़े मारने का अमल) खुले तौर पर और राएज बदकारी  के अमल पर पूरी तरह रोक लगाने और पारंपरिक रूप से पोशीदा तरीके से होने वाली बदकारी को नसीहत और मध्यस्थता में बदलना था (4:34)

एक लफ्ज़ के तौर पर क्या कोड़े मारने का हुक्म दायमी रहा है?

कोड़े मारना, उस ज़माने की सजा के लोकप्रिय कानून से लिया गया था। कुरान कोड़े मारने के आले (उपकरण) (छड़ी या चाबुक),  अमली तरीका और किस अंग को कोड़े मारना है, और उसकी शिद्दत की सतह की वज़ाहत नहीं करता है। इसलिए कुरान में कोड़े मारने का जो ज़िक्र है वो सजा के प्रतीक के तौर पर है (24:2)- जैसा कि ये मौते रजम के अलावा सज़ा देने का एकमात्र रास्ता था. इलाही कानून (5:48) की गतिमान प्रकृति को देखते हुए, इंसान इसके तरीके को बदल सकते हैं- जैसा कि उन्होंने कुरान के पहले से मौजूद उसूलों में किया है, जिसका इज़हार पहले की एक रिपोर्ट में किया गया है [2]

इसलिए, एकांत में सजा की प्रकृति (कोड़े मारने) को देखते हुए- दूसरी मसालेहत आमेज़ कुरानी आयात(4:34-35, 24:8-9) की अनदेखी कर उसे बिना ऐतिहासिक संदर्भ के सकथ् या ज़ालिमाना कहना गुमराहकुन होगा। कुरान इंसानियत को सज़ा देने के लिए नाज़िल नहीं किया गया है बल्कि इंसानियत को जज़ा देने के लिए उतारा गया है। "और उन से उनके बारे गिराँ और तौक़ (कयूद) जो उन पर (नाफ़रमानियों के बाइस मुसल्लत) थे, साकित फ़रमाते (और उन्हें नेमते आज़ादी से बहरेयाब करते) हैं (7:157) और इसके अज़ीम मकासद के लिए लामोहाला कुछ मुद्त के लिए मुश्किल कदम जरूरी होंगे, जैसा कि मोर्चा बंद सामाजिक व्यवस्था में अचानक परिवर्तन के लिए ज़रूरी है।

नतीजा: जो भी हो इसमें कोई शक नहीं है कि बदकारी के लिए सज़ाए रजम की तज्वीज़ कुरान से नहीं ली गई है। उस ज़माने में सार्वजनिक रूप से राएज बदकारी के अमल कुरान के खानदानी कानूनों से मोतासादिम थे और तब कुरान एक हंगामी (आपातकालीन) कदम के तौर पर बदकारी के लिए कोड़े मारने की सजा तय की। लेकिन ये एक औरत जो बिना किसी सबूत के बदकारी का इर्तेकाब करती हो वो वो सिर्फ बेगुनाही का हलफ लेकर सजा से बच सकती है (24:8-9) इसी तरह, एक बगैर शादीशुदा औरत जो एक बच्चे को जन्म देती है उसे भी सज़ा से छूट मिल सकती है, इस बिना पर कि वो बार बार तस्दीक (हलफ के तहत) करे कि वो आदमी जिसने उससे शादी करने का वादा किया था उसने उसे धोखा दिया, बलात्कार किया है, जैसा कि आमतौर पर होता है, जबकि जिस शख्स ने औरत को गर्भवती बनाया उसके यौन अपराध-चाहे बलात्कार या धोखा- की गंभीरता पर निर्भर करते हुए सजा का हकदार होना चाहिए- जिस नापाकी का ज़िक्र पहले किया गया, जिसके एहतेराम के लिए खुदा हुक्म देता है (4:1)  और  बाद में ज़िक्र किये गये खुदा के अहेद की भी हिफाज़त करना होगी (2:177, 6:152, 23:8, 70 : 32)। मुसलमान फुकहा हज़रात को कुरानी मिसालों से मेल रखने वाली आधुनिक शरीयत का निर्माण करना होगा, जिस इलाही शरीयत की वज़ाहत इस पर्चे में की गई है।

संक्षेप में, एक विशेष संदर्भ वाले आपातकालीन कानून (अवामी तौर पर कोड़े मारने, बुनियादी तौर पर इसकी शिद्दत औरते बर्दाश्त करें) हर वक्त हर जगह लफ्ज़ परस्ताना इत्लाक़ (शब्दशः लागू) सातवीं सदी के अरब के इस्लाम पूर्व के तथ्यों के अनुसार था और कुरान के कानूनसाज़ी की गतिशीलता पर फरमान को ध्यान दिये बगैर, ये विशेष को आम में तब्दील करता है और कुरान की रहम और सहानुभूति की भावना और औरतों के प्रति उसकी गहरी चिंता को मांद करता है, और इस्लाम को उसकी सुंदरता और सज्जनता से बाहर निकालता है और इस तरह इस्लाम को क्रूर और गैर-इस्लामी बनाता है।

www.medievalwarfare.info / torture.html [1]

- Www.middle-ages.org.uk/burned-at-the-stake.htm

 www.elizabethan-era.org.uk/elizabethan-crime-and-punishment.htm

[2] एक  माँ काफी कमज़री बाद एक बच्चे को जन्म देती है (31:4), "वो कष्ट सहती है और तकलीफों से उन्हें जन्म देती हैं" (46:15)

[3] मोहम्मद हुसैन हैकल, दी लाइफ ऑफ मोहम्मद, इंग्लिश ट्रांसलेशन बाई मोहम्मद इस्माइल रागी, 8वां एडिशन, 1989ई. कराची, पेज 319

मोहम्मद यूनुस ने आईआईटी से केमिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की है और कार्पोरेट इक्ज़ीक्युटिव के पद से रिटायर हो चुके हैं और 90 के दशक से क़ुरान का गहराई से अध्ययन और उसके वास्तविक संदेश को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी किताब इस्लाम का असल पैग़ामको साल 2000 में अलअज़हर अलशरीफ, काहिरा की मंज़ूरी प्राप्त हो गयी थी और इसे यूसीएलए के डॉ. खालिद अबुल फ़ज़ल का समर्थन भी हासिल है। मोहम्मद यूनुस की किताब इस्लाम का असल पैग़ामको आमना पब्लिकेशन मेरीलैण्ड, अमेरिका ने साल 2009 में प्रकाशित किया।

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