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Hindi Section ( 27 March 2014, NewAgeIslam.Com)

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Jihadist Magazine Azaan's Call for Western Muslims to Attack Their Own Homelands मुसलमानों को अपने ही देश पर आतंकी हमला करने के लिए प्रेरित करना- इस्लाम के सभी सिद्धांतों का उल्लंघन है

 

 

 

 

 

ग़ुलाम ग़ौस , न्यु एज इस्लाम

20 फरवरी, 2014

तालिबानी जिहादी अंग्रेज़ी मैग्ज़ीन अज़ान कहती है कि ''अगर आप पश्चिमी देशों में रहते हैं तो अपने ही देश पर हमला करें, ये आपकी धार्मिक ज़िम्मेदारी है, शहीदी आपरेशन (आत्मघाती बम धमाकों के लिए जिहादी छद्म नाम) निश्चित रूप से आपको जन्नत में ले जायेगा जहां 72 हूरें आपके गले लगने के लिए आपका इंतेज़ार कर रही हैं।''

ये अज़ान मैग्ज़ीन का चौथा अंक है और इसने मार्च, 2013 में अपना प्रकाशन शुरु किया। इस मैग्ज़ीन के खुरासान स्थित एक मीडिया समूह द्वारा प्रकाशित किये जाने का दावा किया जाता है, जो अफ़गानिस्तान के अलावा उज़्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, ईरान के पूर्वी भागों, पाकिस्तान के पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे हिस्सों पर क़ब्ज़ा करने के तालिबानी सपनों को दर्शाता है। इस बड़े भूभाग का ऐतिहासिक नाम खुरासान है।

पिछले अंकों की तरह ही ये अंक भी इस्लाम के नाम पर ऐसे विचारों से भरा पड़ा है जो ज़हरीले इस्लाम विरोधी प्रोपगंडा से ज़्यादा कुछ नहीं है। दूसरी जिहादी मैग्ज़ीनों की ही तरह ये भी इस्लाम का सबसे अधिक अपमान करने वाली है जिसे पाकिस्तान बढ़ावा देता है और इसे प्रकाशित करने की इजाज़त देता है। इस तरह की मैग्ज़ीन में पेश किए गए विचारों का खंडन करने पर पाकिस्तान में न्यु एज इस्लाम (NewAgeIslam.com) पर प्रतिबंध है, और ये विचार दिनों दिन बढ़ावा पा रहे हैं। हालांकि इस वेबसाइट के एडिटर सुल्तान शाहीन ने सितम्बर 2013 में आयोजित हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सत्र में माँग की थी कि इस्लाम के अपमान के बारे में किसी भी संकल्प पर उस समय तक विचार न किया जाए जब तक कि पहले इस्लाम को इस्लामी दुनिया में जिहादी साहित्य के द्वारा होने वाले अपमान से सुरक्षित नहीं कर लिया जाता है।

अज़ान मैग्ज़ीन के इस अंक को मिसाल के तौर लेते हुए मुझे ये स्पष्ट करने दें कि इस तरह की मैग्ज़ीन इस्लाम और मुस्लिम समाज और खासकर युवाओं को क्या नुकसान पहुँचा रही हैं। इस मैग्ज़ीन की सामग्री संवेदनशील मुस्लिम युवाओं को ये एहसास दे सकती है कि जैसे वो मारने के लिए या मरने के लिए पैदा हुए हैं, और अगर वो सच्चे मुसलमान हैं तो उनके लिए अपने जीवन का इससे अच्छा उद्देश्य कुछ हो ही नहीं सकता। और इस प्रकार ये उनके विश्वास के लिए नुकसानदेह है क्योंकि ये न लड़ने वाले नागरिकों सहित सभी काफिरों को मारने का औचित्य प्रदान करता है। यहां ये याद रखना महत्वपूर्ण है कि काफिर की जिहादी- वहाबी परिभाषा में गैर वहाबी मुसलमान भी शामिल हैं जिनके हृष्ट पुष्ट मर्दों को मार दिया जाना चाहिए, बूढ़े और बच्चों को गुलाम  और औरतों को जिहादियों की रखैल बनाया जाना चाहिए।

इस मैग्ज़ीन का सबसे खतरनाक हिस्सा संभावित जिहादियों को उनके स्वयंभू जिहाद में शामिल होने के लिए दिशा निर्देश प्रदान करता है और पश्चिमी देशों में हमले करने के लिए सभी आवश्यक संसाधनों को उपलब्ध कराने के लिए उन्हें आश्वस्त करता है।

मैग्ज़ीन की ''To the Jihadis in the West'' (पश्चिमी देशों के जिहादियों के नाम) शीर्षक से लिखी कवर स्टोरी को अबु सलामह अल-मुहाजिर नाम के एक पश्चिमी जिहादी विचारक ने लिखा है, इस लेख के द्वारा मैग्ज़ीन अपने संवेदनशील नौजवानों पाठकों के मन में नापाक इरादों का ज़हर घोलना चाहती है। ये लेख पश्चिमी देशों के युवाओं को तब तक अपने देश में हमला करने के लिए भड़काता है जब तक कि मुस्लिम देशों के प्रति उनके देशों की विदेश नीति में कोई बेहतर परिवर्तन न आ जाए। युवाओं को उग्रवादी बनाने के लिए जिस नारे को बार बार दोहराया गया है वो ये है कि (गैर वहाबी मुसलमानों सहित) पश्चिमी देश इस्लाम से युद्धरत हैं।

पश्चिमी जिहादी विचारक अबु सलामह अल-मुहाजिर ने इस बारे में कई तर्क दिये हैं। इस मैग्ज़ीन में मुस्लिम युवाओं को पूरी दुनिया में अकेले ही लड़े जाने वाले जिहादी युद्ध को शुरु करने के लिए आह्वाहन को न्यायोचित ठहराने के लिए कुरान और हदीस को संदर्भ के खिलाफ पेश किया गया है। इस्लाम की कट्टरपंथी व्याख्याओं से मुस्लिम युवाओं को प्रेरित करते हुए ऐसी कई स्थितियों की समीक्षा की गयी है जिसमें जिहादी गतिविधियां शुरू करने और शहादत पाने के लिए अपने माँ बाप, बीवी बच्चों, घर और यहां तक कि अपने कॉलेजों तक को छोड़ सकते हैं।

इस लेख के निम्नलिखित अंश इस बात को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त होंगे कि तालिबानी जिहादी इस्लाम और उसकी शांतिपूर्ण शिक्षाओं के सबसे बड़े दुश्मन हैं। यहां तक ​​कि मुस्लिम विचारकों में तालिबान के समर्थक भी इन इस्लाम विरोधी खतरनाक विचारधाराओं पर अपनी चुप्पी तोड़ कर उनकी मदद करने में सक्षम नहीं होंगे।  

“biggest contribution” (सबसे बड़ा योगदान) शीर्षक वाले लेख में लिखा है कि ''जिहादी पश्चिमी देशों पर हमला करके उनके अभियान में मदद कर सकते हैं।'' लेख में आगे लिखा है कि, ''जिस तरह इन देशों की सेना पर दूसरे देशों में हमले होते हैं उसकी तुलना में काफिरों का नुकसान तब ज़्यादा बड़ा होता है जब उनके खिलाफ हमला उनकी ही धरती पर किया जाए। हमारे लक्ष्यों में इन्हें अपने ही धरती पर असुरक्षित महसूस कराना, इनकी अर्थव्यवस्था को तबाह करना, इनके हौसले पस्त करना और उम्मत के खिलाफ इनकी आक्रामकता को भय के द्वार रोकना, शामिल है।''

पश्चिमी जिहादी विचारक आगे लिखता है, ''जब कभी भी पश्चिमी देशों के किसी शहर में हमला किया जाता है तो इससे उनकी अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ता है। हमले के तुरंत बाद से ही शहर में बंदी होती है जो सभी प्रकार के कारोबार को  नुकसान पहुँचाती है। इस हमले में मारे गये लोगों और घायलों के परिवार वालों को मुआवज़ा दिया जाता है। भले ही ये हमला शहादत हासिल करने के लिए किया गया हो तब भी हमले के फौरन बाद मुजाहिद की तलाश शुरु हो जाती है, और प्रशासन की नज़रें इसके बाद फिर किसी सम्भावित हमले पर टिक जाती हैं। उन्हें स्थायी रूप से अपने सुरक्षा बलों में वृद्धि करनी पड़ती है इसकी उन्हें न केवल एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है बल्कि इससे उनके नागरिकों का जीवन भी बुरी तरह प्रभावित होता है।''

इस्लाम सभी मनुष्यों के जीवन, सम्मान, गरिमा और धर्म की स्वतंत्रता के संरक्षण का सम्मान करता है। इसलिए पश्चिमी देशों के शहरों को निशाना बनाना जिसका उद्देश्य पश्चिम देश के शहरों की अर्थव्यवस्था और वहाँ के लोगों के जीवन को बड़ा नुकसान पहुँचाना विश्व शांति के लिए नुकसानदेह है और स्पष्तः ये इस्लाम के लिए अपमान का कारण है।

पश्चिमी जिहादी विचारक अबु सलामह अल-मुहाजिर ने इस लेख में ऐसी आक्रामक तकनीक को पेश किया है जिसके माध्यम से  जिहादी पश्चिमी सरकारों को अपने दबाव के आगे झुकने को मजबूर करने का प्रस्ताव देते हैं:

''जो भी हमले होते हैं उन्हें हर साल विशेष समारोहों और दो मिनट का मौन धारण कर याद किया जाता है। कल्पना कीजिए कि अगर हर सलीबी देश में हर महीने पिछले हमले को याद करने के लिए एक विशेष समारोह आयोजित हों तो निश्चित रूप से वहाँ के नागरिक अपनी सरकारों पर दबाव डालेंगे कि वो मुसलमानों के खिलाफ अपनी विदेश नीति में बदलाव करें और नतीजे में मुसलमानों के प्रति अपनी आक्रामकता में बदलाव करेंगे।''

इस बात को समझना बिल्कुल मुश्किल नहीं है कि इस तरह के उपदेश से पश्चिमी देशों में रहने वाले मुसलमानों के गैर मुस्लिम पड़ोसियों या किसी दूसरे गैर मुस्लिम बहुसंख्यक देशों में रहने वालों के मन में इस्लाम का भय और मुसलमानों के प्रति असुरक्षा  और असंतोष पैदा होने वाला है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि बहुत से लोगों के दिलों में इस्लाम का भय पैदा हो रहा है।  अगर हम मुसलमान इस्लामी सिद्धांतों के आधार पर इस तरह के घृणित दावों का विरोध स्पष्ट रूप से नहीं करेंगे तो क्या हमें बढ़ते हुए इस्लामोफ़ोबिया की शिकायत करने का कोई आधार रह जाता है?

जिहादी विचारक आग को हवा देते हुए कहता है कि, ''आपके सोचने के लिए व्यावहारिक समस्याएं भी हैं। हो सकता है कि आपके पास ऐसा कोई गाइड न हो जो आपको जिहाद के मोर्चों पर ले जाए और हो सकता है कि आपको ऐसा कोई गाइड मिलने में लंबा समय लग जाए। उस समय में आप हमले के लिए योजना और खुद को तैयार कर सकते हैं।''

इस पश्चिमी जिहादी विचारक की सलाह है कि पश्चिमी देशों में हर महीने एक हमला होना चाहिए ताकि वो इस्लामी दुनिया के प्रति अपनी विदेश नीती को बदलने पर मजबूर हो जाएं। ऐसे हमले जिनसे काफिरों को अधिकतम नुकसान और अपमान हो उसके लिए पश्चिमी देशों में रहने वाले मुसलमान सबसे अधिक उपयुक्त हैं क्योंकि वो ''बिना संदेह के अपना काम आसानी से कर सकते हैं।'' ये उल्लेखनीय है कि काफिरों को नुकसान पहुँचाने का मतलब गैर वहाबी मुसलमानों, शिया, अहमदियों, ईसाइयों, हिन्दुओं और उन सभी लगों को बम धमाकों का निशाना बनाना है जो इस्लाम के जिहादी-वहाबी संस्करण को नहीं मानते हैं। जैसा कि ये हमलों के लिए पश्चिमी देशों के मुसलमानों के उपदेश को प्राथमिकता देता है और हमले कैसे किये जाएं इसके निर्देश भी देता है।

''हर मुजाहिद को अपने हालात के मुताबिक काम करना चाहिए। पश्तून कबीले का व्यक्ति कभी भी किसी ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए काफिरों के गढ़ में प्रवेश करने का सपना नहीं देख सकता, लेकिन उसने बचपन से ही हथियारों को देखा है और वो दिन भर पहाड़ों पर ऊपर नीचे कर सकता है। जबकि आप उस देश से अच्छी तरह परिचित होते हैं जहाँ आप पैदा हुए हैं और वहाँ बिना शक के अपना काम अंजाम दे सकते हैं। और अगर आप किसी मोर्चे पर जाते हैं तो आप सहनशक्ति और स्थानीय मालूमात के मामले में किसी अंसार से मुक़ाबला नहीं कर सकते। इसलिए अल्लाह ने आपको जो नवाज़ा है उनका इस्तेमाल करते हुए अपना काम करें और काफिरों को वहाँ मारे जहाँ उन्हें सबसे ज़्यादा तकलीफ हो।

पश्चिमी जिहादी विचारक ने ये भी लिखा है किः ऐसे भी कुछ भाई हो सकते हैं जो लगातार खुफिया विभाग की निगरानी में हों, हमारे ऐसे भाइयों के लिए पश्चिम में कोई हमला करना बहुत ही कठिन है, अगर आप इस श्रेणी में आते हैं तो आपको जिहाद की धरती के लिए पलायन कर जाने की ज़िम्मेदारी से आपको छूट नहीं मिलती है। ऐसे में देश छोड़ कर कहीं और जाना और यात्रा करना सम्भव है। इसलिए चाहे आप पश्चिमी देशों पर हमला कर सकते हैं या पलायन कर सकते हैं, तो इसकी तैयारी आज से ही शुरू करने की ज़रूरत है।''

उपरोक्त दावों और अपनी बातों के समर्थन के लिए तालिबानी विचारक सलामह अल-मुहाजिर ने इस्लामी स्रोतों से धार्मिक औचित्य पेश करने के लिए दो कुरानी आयतों का हवाला उनके संदर्भ से हट कर पेश किया है:

''अल्लाह तो उन लोगों से प्रेम रखता है जो उसके मार्ग में पंक्तिबद्ध होकर लड़ते है मानो वो सीसा पिलाई हुए दीवार हैं'' (61: 4)

''ऐ ईमान लानेवालो! तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुमसे कहा जाता है, "अल्लाह के मार्ग में निकलो" तो तुम धरती पर ढहे जाते हो? क्या तुम आख़िरत की अपेक्षा सांसारिक जीवन पर राज़ी हो गए? सांसारिक जीवन की सुख-सामग्री तो आख़िरत के हिसाब में है कुछ थोड़ी ही!'' (9: 38)

अपने तर्क को साबित करने के लिए लेखक ने खुद कुरान और इसके आदेशों का उल्लंघन किया है जो समाज में न्याय, सहिष्णुता, धैर्य, सांप्रदायिक सद्भाव, शांति और सौहार्द की शिक्षा देती हैं। जबकि वास्तविकता ये है कि ये दोनों आयतें ऐसे समय में नाज़िल हुई थीं जब युद्ध की स्थिति बनी हुई थी और पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को मुसलमानों के छोटे से समुदाय की रक्षा में युद्ध करना ज़रूरी था। मूल रूप से ये आयतें ऐसे समय के लिए थीं जब मुसलमानों के पास कोई और विकल्प नहीं रह गया था सिवाय इसके कि वो या तो बचाव में युद्ध करें या अपना जीवन गँवा दें और अपनी पंसद के धर्म के पालन करने के अपने अधिकार खो दें। उदारवादी मुख्यधारा के इस्लामी विद्वान, न्यायशास्त्री और मोफ़स्सिर (व्याख्या के विशेषज्ञ) इस आयत को सिर्फ रक्षात्मक स्थितियों में ही लागू करते हैं। इसलिए निर्दोष लोगों की हत्या करने के लिए इस आयत को औचित्य के रूप में इस्तेमाल किसी भी मुसलमान को पूरी तरह अस्वीकार्य है। ये आयतें मुसलमानों को आज हिंसा की किसी भी कार्रवाई में शामिल होने की इजाज़त नहीं देती हैं।

अगर ये पश्चिमी जिहादी विचारक मुसलमान है तो उसे कुरानी आयत (2: 190) को नज़र अंदाज़ नहीं करना चाहिए जिसमें अल्लाह ने मुसलमानों को केवल उन्हीं लोगों से लड़ने का हुक्म दिया है जो तुमसे लड़ते हैं और अल्लाह ने किसी भी तरह की ज़्यादती से मना किया है। कुरान कहता है, ''अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता।'' ये आयत उस वक्त नाज़िल हुई थी जब काफिरों ने मुसलमानों को स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का पालन करने के मानवाधिकारों से वंचित करके उन्हें उनकी मातृभूमि मक्का से बाहर कर दिया था और यहाँ तक कि उनके नये शरण स्थल मदीना में भी उन पर हमला किया। इससे पहले पैग़म्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और उनके पवित्र साथियों को अपने जीवन की रक्षा करने की भी इजाज़त नहीं थी। उन्हें लगभग एक दशक से ज़्यादा तक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। जब उन लोगों ने सारी हदें पार कर ली और ज़िंदा रहने के लिए जब उनके पास कोई चारा नहीं रह गया तो अल्लाह ने मुसलमानों को उन काफिरों से अपनी रक्षा के लिए लड़ने की इजाज़त दी। इसीलिए इस आयत में कहा गया है कि ''उनसे लड़ो जो तुमसे लड़ते हैं'' और ''अपनी हद से आगे मत बढ़ो।'' अगर ये आयत आने वाले सभी समयों के लिए निर्धारित की होती तो सर्वशक्तिमान अल्लाह ने इस आयत को रक्षात्मक युद्ध के संदर्भ में केवल अरब के काफिरों तक ही सीमित नहीं रखा होता।

हम पाते हैं कि पश्चिमी जिहादी विचारक सलामह अल-मुहाजिर के विचार पूरी तरह से स्थिति के तथ्यों के विपरीत हैं। इसलिए हम ये समझते हैं कि हिंदुस्तान, अमेरिका और यूरोपीय देशों जैसे गैर मुस्लिम बहुल देशों में मुसलमानों को अधिक धार्मिक अधिकार मिले हैं और ये मुसलमानों की संस्कृति की रक्षा भी करते हैं, जबकि इस्लाम के केन्द्र कहे जाने वाले देश सऊदी अरब में भी मुसलमानों को इतने अधिकार हासिल नहीं हैं। मिसाल के तौर पर भारत में मुसलमानों को इस्लामी अनुष्ठानों के पालन करने और अल्लाह के सभी नबियों का जन्म दिन पूरे धूमधाम से मनाने की पूरी आज़ादी है जिनकी इजाज़त सऊदी अरब में नहीं होगी।  इसलिए मुसलमानों को इस्लामी देश बनाने के बारे में सोचने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि गैर मुस्लिम बहुल देशों में उन्हें अपने धर्म के पालन का हर एक अधिकार और सुविधाएं हासिल हैं कि जिनकी मुस्लिम देशों में भी कल्पना नहीं की जा सकती है।

सर्वशक्तिमान अल्लाह ने बार बार मुसलमानों को उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और वो चाहे पूरब में हों या पश्चिम में पृथ्वी पर शांति बहाल रखने का हुक्म दिया है। इसलिए कि क़ुरान की आयतें (28: 56), (3: 20), (5: 99), (2:  256), (109: 7), (10: 99), (32: 13), (11: 118), (64: 2), (9: 6) आदि मुसलमानों को गैर मुस्लिम बहुल देशों में सहिष्णुता की शिक्षा देती हैं।

इसके अलावा कुरान में ऐसी कई आयतें हैं जो लोगों के बीच बिना किसी भेदभाव के मानवता के प्रति अन्याय, हिंसा, अत्याचार , उत्पीड़न, आक्रामकता, और क्रूरता को हराम करार देती हैं। यहाँ मैं तीन ऐसी कुरानी आयतें और एक प्रमाणिक हदीस पेश कर रहा हूँ जो लेखक के द्वारा पश्चिमी देशों में रहने वाले मुसलमान युवाओं का हमला करने के लिए अह्वाहन करने का खंडन करती हैं:

''जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इंसानों की हत्या कर डाली। और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो सारे इंसानों को जीवन दान किया।'' (5: 32)

''अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है'' (60: 8)

''और यदि वे संधि और सलामती की ओर झुकें तो तुम भी इसके लिए झुक जाओ और अल्लाह पर भरोसा रखो। निस्संदेह, वह सब कुछ सुनता, जानता है'' (8: 61)

अबु शरीह से रवायत है कि नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि:

''अल्लाह की क़सम वो मोमिन नहीं है, वो मोमिन नहीं है, वो मोमिन नहीं है, किसी ने पूछा कि कौन या रसूलुल्लाह? तो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ''वो व्यक्ति जो अपने पड़ोसियों को शांति और सुरक्षा न प्रदान कर सके'' (सही अलबुखारी, वाल्यूम 8, नंबर 45)

ये हदीस सभी पड़ोसियों चाहे वो मुस्लिम हों या गैर मुस्लिम पर लागू होती है, एक सच्चा मुसलमान वो है जो रंग और नस्ल पर ध्यान दिये बिना सभी पड़ोसियों को शांति और सुरक्षा प्रदान करता है। ये हदीस स्पष्ट रूप से पश्चिमी जिहादी विचारक के ''पश्चिमी देशों में आतंकवादी हमले'' करने के लिए युवाओं के अह्वाहन का खंडन करती हैं और अंतर- विश्वास सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए अभूतपूर्व मिसाल पेश करती हैं।

संक्षेप में इस तरह की मैग्ज़ीनें आतंकवादियों के इरादों की बात करती हैं और स्पष्ट रूप से इस्लाम को बदनाम करती हैं। उनकी मार काट और कुरान की व्याख्या करने के उनके तरीके उनके बुरे इरादों, निंदनीय विचारों और उनके विश्वास को बताती हैं। इन लोगों की घिनौनी कार्रवाईयों का पवित्र विश्वास से कोई सम्बंध नहीं है। इसलिए ये हमेशा ध्यान दिया जाना चाहिए कि ये अपराधी, विद्रोही और बुराईयों के सौदागर जिहाद के नाम पर अपनी क्रूर और हिंसक कार्रवाईयों के लिए जो भी झूठे औचित्य पेश करें उनका इस्लामी शिक्षाओं से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है। जहां तक इस प्रकार की मैग्ज़ीनों और लेखों का सम्बंध है जिन्हें इंटरनेट के द्वारा लोगों तक पहुँचाया जा रहा है, धरती पर शांति के लिए इन पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए। ये कितना बड़ा मज़ाक है कि इस्लाम का अपमान करने वाली इस प्रकार की पत्रिकाओं पर प्रतिबंध लगाने के बजाय पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देश न्यु एज इस्लाम जैसी वेबसाइट पर पाबंदी लगाता है, जो इस तरह के विचारों और इस्लाम की ऐसी व्याख्याओं का नियमित रूप से खंडन करता है।

न्यु एज इस्लाम के स्थायी स्तंभ लेखक , ग़ुलाम ग़ौस सूफीवाद और आध्यात्मिकता से जुड़े एक आलिम व फाज़िल (क्लासिकल इस्लामी स्कालर) हैं। उन्होंने दिल्ली स्थित सूफी विचारधारा वाली इस्लामी संस्था जामिया हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, ज़ाकिर नगर​​, नई दिल्ली से तफ्सीर, हदीस, अरबी और इस्लाम के शास्त्रीय अध्ययन में विशेषज्ञता हासिल की है। उन्होंने आलिमीयत औऱ फ़ज़ीलत क्रमशः जामिया वारसिया अरबी कॉलेज, लखनऊ और जामिया मंज़रे इस्लाम, बरेली, उत्तर प्रदेश से किया है और जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली से वो अरबी में स्नातक हैं।

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