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The Message of Unity in the Writings of Professor Akhtarul Wasey प्रोफेसर अख्तरुल वासे की तह़रीरों में एकता का संदेश

डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी, न्यू ऐज इस्लाम

(गुज़िशता से पैवसता)

8 जून 2026

भारत की बहुलतावादी (Pluralistic) परम्पराओं और सदियों पुरानी सामाजिक एकता को बनाए रखने के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता निहायत ज़रूरी है। हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए किए जाने वाले प्रयास तभी सफल हो सकते हैं, जब लोगों के भीतर एक-दूसरे के प्रति मित्रता और सहयोग की भावना मौजूद हो। एकता, आपसी सहयोग और सामूहिकता किसी भी समाज की उन्नति और खख़ुशह़ाली के लिए ज़रूरी क़दरैं हैं। इनके बिना एक शांतिपूर्ण और स्वस्थ समाज की कल्पना नहीं की जा सकती।

प्रोफेसर अख्तरुल वासे

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आज भारत में बढ़ती हुई नफ़रत और अविश्वास का एक बड़ा कारण हिन्दू-मुस्लिम संबंधों का कमज़ोर होना है। इतिहास गवाह है कि जब हिन्दू और मुसलमान एकजुट होकर साथ खड़े हुए, तब अंग्रेज़ों को भारत छोड़ना पड़ा। इसलिए जो लोग अपने स्वार्थ के लिए इस एकता को तोड़ना चाहते हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उनका यह प्रयास केवल दो समुदायों के रिश्तों को ही नुक़सान नहीं पहुँचाएगा, बल्कि भारत की महान परम्पराओं को भी नुक़सान पहुँचाएगा। दुनिया भारत को हिन्दू-मुस्लिम एकता और सामाजिक सौहार्द के लिए भी पहचानती है। यदि यह संबंध कमज़ोर होगा, तो भारत की यह सकारात्मक छवि भी प्रभावित होगी।

इसी कारण ऐसे साहित्य को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जो हिन्दू-मुस्लिम सहयोग और सामाजिक सद्भाव को मज़बूत करे। प्रोफेसर अख्तरुल वासे की तह़रीरों में मानव-एकता, इन्सान दोस्ती और सद्भावना से जुड़े विचार  मिलते हैं। उनकी तह़रीरैं भारतीय समाज के लिए मार्गदर्शक का कार्य करती हैं।

निम्नलिखित उद्धरण उनके विचारों को स्पष्ट करते हैं।

अपने लेख सर सैयद और मौलाना आज़ाद के विचारों में बहुलतावाद के अनासिरमें प्रोफेसर अख्तरुल वासे, सर सैयद अहमद ख़ाँ का यह इक़तिबास पेश करते हैं:

जो लोग यह समझते हैं कि दूसरे धर्मों के लोगों से सच्ची मित्रता और प्रेम करना मना है, वे ग़लत हैं। ईश्वर ने मनुष्य की प्रकृति में जो भावनाएँ रखी हैं, वे सत्य और स्वाभाविक हैं। हमें हर धर्म के लोगों के साथ सच्ची मित्रता, सद्भावना और सम्मान का व्यवहार करना चाहिए। ऐसे संबंध हमारी साझा विरासत पर आधारित होने चाहिए, जबकि धार्मिक भाईचारा समान आस्था और विश्वास से जुड़ा होता है। यही शिक्षा इस्लाम हमें देता है।

(तहज़ीब-उल-अख़लाक़, भाग 5, रबीउल सानी 1291 हिजरी, पृष्ठ 58)

इसी लेख में प्रोफेसर वासे ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के देशप्रेम और हिन्दू-मुस्लिम एकता से संबंधित कई महत्वपूर्ण इक़तिबास भी पेश किए हैं। उनमें से एक इक़तिबास इस प्रकार है:

भारत के सात करोड़ मुसलमान अपने बाईस करोड़ हिन्दू भाइयों के साथ इस प्रकार मिल जाएँ कि वे सब मिलकर एक भारतीय राष्ट्र बन जाएँ। मैं अपने मुस्लिम भाइयों को याद दिलाना चाहता हूँ कि ईश्वर के कलाम के बाद सबसे महान बात हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की थी। उन्होंने जो मुआहिदा तैयार किया, उसमें यह शब्द थे: हम मदीना के आसपास रहने वाले सभी क़बीलों के साथ शांति से रहेंगे। हम सब मिलकर एक क़ोम और एक समुदाय बनना चाहते हैं।’”

( ह़वाला साबिक़)

भारत : धार्मिक बहुलता की आमाजगाह

हिन्दू-मुस्लिम एकता के महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता। आज भी त्योहारों, विवाह समारोहों और अनेक सामाजिक अवसरों पर आपसी मेल-जोल और सद्भाव के उदाहरण देखने को मिलते हैं। हालाँकि कुछ स्वार्थी तत्व इन संबंधों को कमज़ोर करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए उन परम्पराओं को सुरक्षित रखना और आगे बढ़ाना ज़रूरी है, जिन्होंने हमारे सामाजिक संबंधों को मज़बूत बनाया है।

धार्मिक बहुलता भारत की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है और उसकी पहचान का अटूट हिस्सा भी है। प्रोफेसर अख्तरुल वासे ने अपनी तह़रीरों में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने धार्मिक बहुलता के महत्वको स्पष्ट करते हुए लिखा है कि भारत प्राचीन काल से ही विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों का संगम रहा है।

भारत सदियों से विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले लोगों का स्वागत करता रहा है। व्यापारी, यात्री, धार्मिक प्रचारक या शरण लेने वाले लोगसभी को यहाँ स्थान मिला। समय के साथ लोगों ने मिलकर एक ऐसा समाज बनाया जो धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई विविधता का सम्मान करता है।

भारत की यही विशेषता उसे दुनिया की अनेक परम्पराओं और संस्कृतियों का केन्द्र बनाती है। यहाँ आने वाले लोग इसकी विविधता में अपनेपन को मह़सूस करते हैं।

बहुलतावाद भारत के इतिहास और पहचान का पुराना हिस्सा है। यह कोई नई अवधारणा नहीं है। भारत की विविधता उसके धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों में स्पष्ट दिखाई देती है।

आज दुनिया के कई देश सामाजिक विभाजन की समस्याओं से जूझ रहे हैं। भारत ने भी ऐसी चुनौतियों का सामना किया है, लेकिन विविधता के साथ रहने के अपने लंबे अनुभव के कारण उसने सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के प्रभावी तरीक़े इख़्तियार किए हैं।

इस्लाम और मुसलमानों की बात करें तो मुसलमान इस्लाम के शुरुआती दौर से ही भारत में मौजूद रहे हैं। इतिहास के अलग-अलग चरणों में उन्होंने विभिन्न भूमिकाएँ निभाई हैं। कभी वे शासित रहे, तो कभी शासन का हिस्सा भी बने। आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में वे समान अधिकारों वाले नागरिक हैं और राष्ट्रीय जीवन में सक्रिय भागीदारी करते हैं।

भारत का बहुलतावादी समाज कठिनाइयों से पूरी तरह़ मुक्त नहीं रहा है। समय-समय पर तनाव, संघर्ष और गलतफहमियाँ पैदा हुई हैं। कभी-कभी अलग-अलग समुदायों के बीच दूरी भी बढ़ी है। फिर भी विविधता में एकताकी भावना भारत की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक रही है। इसी भावना ने विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोगों को जोड़कर रखा है और उन्हें शांति तथा सहयोग के साथ रहने की प्रेरणा दी!( जारी)

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डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी इस्लामिक इसकोलर, मुसन्निफ़ और न्यु ऐज इस्लाम के मुसतक़िल कालम निगार हैं।

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Article:  The Message of Unity in the Writings of Professor Akhtarul Wasey प्रोफेसर अख्तरुल वासे की तह़रीरों में एकता का पैग़ाम

Article:  The Message of Unity in Professor Akhtarul Wasey's Writings प्रोफेसर अख्तरुल वासे की तह़रीरों में एकता का संदेश

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