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Hindi Section ( 6 Jul 2025, NewAgeIslam.Com)

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Qur’anic Descriptions of the Punishment of the People of Thamūd: Perceived Contradiction or Mastery of Divine Wisdom? क़ौमे समूद पर अज़ाब की क़ुरआनी व्याख्याएँ: क्या यह विरोधाभास का भ्रम है या हिकमत का कमाल?

लेखक: ग़ुलाम ग़ौस सिद्दीकी

दिनांक: 1 जुलाई 2025 (उर्दू से अनुवाद)

6 जुलाई 2025

क़ौम समूद पर अज़ाब से संबंधित शंका का निवारण

अल्लाह तआला ने क़ुरआन मजीद को अपनी आख़िरी और अबदी (शाश्वत) किताब के रूप में नाज़िल फ़रमाया। यह सिर्फ़ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि इंसानियत के लिए एक मुकम्मल रहनुमा (मार्गदर्शक) है। अल्लाह ने अपने इस कलाम के दिव्य स्रोत पर कई मज़बूत दलीलें पेश कीं, जिनमें एक सबसे अहम दलील यह है कि क़ुरआन मजीद हर प्रकार के तज़ाद (विरोधाभास) और तनाक़ुज़ (परस्पर विरोध) से पूर्णतः पाक और मुक्त है।

इसी हक़ीक़त को क़ुरआन ने स्वयं अत्यंत स्पष्ट, शक्तिशाली और तर्कपूर्ण ढंग से बयान किया है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:

أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ ۚ وَلَوْ كَانَ مِنْ عِندِ غَيْرِ اللّٰهِ لَوَجَدُوا فِيهِ  اخْتِلَافًا كَثِيرًا

"तो क्या वे लोग क़ुरआन में ग़ौर व फ़िक्र नहीं करते? अगर यह अल्लाह के अलावा किसी और की ओर से होता, तो वे इसमें बहुत सारा विरोधाभास (इख़्तिलाफ़) ज़रूर पाते।"(सूरतुन्निसा, आयत 82)

यह आयत हमें सीधा यह संदेश देती है कि जो भी व्यक्ति ईमानदारी, न्यायप्रियता और खुले मन से क़ुरआन का अध्ययन करेगा, वह इस सच्चाई को साफ़ तौर पर महसूस करेगा कि यह इंसानों का लिखा हुआ नहीं, बल्कि अल्लाह का पाक और महफूज़ कलाम है, क्योंकि इसमें न कोई विरोध है, न अंतर्विरोध।

क़ुरआन मजीद की एक विशेषता यह भी है कि इसमें अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग अंदाज़, शैली (उसलूब) और ताअबीरें (प्रस्तुतिकरण की विधियाँ) अपनाई गई हैं। यह उसकी बलाग़त (वाक्पटुता), हिकमत (गहनता) और व्यापकता का प्रमाण है। लेकिन कभी-कभी कुछ लोग — ख़ासकर वे जो अरबी भाषा की गहराई, क़ुरआन की भाषिक सुंदरता और तफ़सीरी हिकमत से अनभिज्ञ होते हैं — भ्रमित हो जाते हैं, और फिर वे अपने भ्रम को दूसरों में भी फैलाने की कोशिश करते हैं।

कभी-कभी कुछ आयतें देखने में एक-दूसरे से विपरीत प्रतीत होती हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता। इसके पीछे या तो उनकी भाषाई अज्ञानता होती है, या “नासिख़-मनसूख़” जैसी क़ुरआनी प्रक्रिया की जानकारी का अभाव। हर आयत, अपनी जगह पर, अपने विशेष संदर्भ (सियाक़ व सबाक़), मक़सद और समय के अनुसार नाज़िल हुई होती है। यही क़ुरआन की हिकमत का कमाल है — कि वह हर युग, हर परिस्थिति और हर इंसानी ज़रूरत को अपने अंदाज़ में मार्गदर्शन देता है।

अतः क़ुरआन में कोई तज़ाद नहीं, बल्कि हर पहलू में हिकमत, सामंजस्य और पूर्णता है।

उलमा-ए-किराम ने इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है, और तफ़्सीर की किताबों में इस मसले को वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण ढंग से अच्छी तरह स्पष्ट किया गया है।

इस लेखक को क़ुरआन मजीद की कुछ आयतों की एक सूची मिली है, जिससे यह शंका उत्पन्न करने की कोशिश की गई है कि क़ुरआन करीम की आयतों में — नऊज़ु बिल्लाह — विरोधाभास (तज़ाद व तनाक़ुज़) पाया जाता है।

यहाँ उद्देश्य यह है कि इस शंका का समाधान उर्दू, अंग्रेज़ी और हिंदी — तीनों भाषाओं में प्रस्तुत किया जाए।

हमारे बुज़ुर्गों और उम्मत के सच्चे और ईमानदार बुज़ुर्ग आलिमों ने इस विषय पर अच्छा काम किया है, इसलिए उन्हीं से लाभ उठाते हुए, और उनके बिखरे हुए लेकिन सारगर्भित और विविध पहलुओं को अध्ययन का हिस्सा बनाकर इस शंका को दूर करने की कोशिश की जा रही है।

दुआ है कि अल्लाह तआला इस कोशिश को क़बूल फरमाए। और रही बात तौफ़ीक़ व हिदायत की — तो वह केवल अल्लाह तआला की रहमत और करम से ही मिलती है। वह जिसे चाहता है, दीन की सेवा की तौफ़ीक़ देता है और उसी के ज़रिये जिसे चाहता है, हिदायत अता फरमाता है।

पहली शंका: क़ौम-ए-समूद पर अज़ाब में अलग-अलग शब्द क्यों?

एक आम शंका यह उठाई जाती है कि क़ौम-ए-समूद के बारे में क़ुरआन में अलग-अलग शब्द इस्तेमाल हुए हैं, जो देखने में अलग-अलग प्रकार के अज़ाब (सज़ा) को दर्शाते हैं। उदाहरण के लिए:

1.            सूरह हूद (11:67):

فَأَخَذَ الَّذِينَ ظَلَمُوا الصَّيْحَةُ

अनुवाद: "तो ज़ालिमों (क़ौम-ए-समूद) को एक तेज़ चिल्लाहट (चीख़) ने आ दबोचा।"

इसका मतलब है कि क़ौम-ए-समूद को "सईहाह" (तेज़ आवाज़/चीख़) से हलाक किया गया।

2.            सूरह अल-अ'राफ़ (7:78):

فَأَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ

अनुवाद: "तो उन्हें एक ज़लज़ले (भूकंप) ने पकड़ लिया।"

यानी क़ौम-ए-समूद को "रज्फ़ा" (भूकंप) से हलाक किया गया।

3.            सूरह-अज़-ज़ारियात (51:44):

فَأَخَذَتْهُمُ الصَّاعِقَةُ

अनुवाद: "तो उन्हें साअिक़ा (बिजली या गड़गड़ाहट वाली विनाशकारी आवाज़) ने आ लिया।"

4.            सूरह अल-हाक़्क़ा (69:5):

فَأَمَّا ثَمُودُ فَأُهْلِكُوا بِالطَّاغِيَةِ

अनुवाद: "रही बात समूद की, तो उन्हें ताग़ियाह (हद से बढ़ जाने वाली चीज़) से हलाक किया गया।"

अब शंका करने वाले यह सवाल उठाते हैं:

"आख़िर असली हलाकत का कारण क्या था? क्या ये सब अलग-अलग बयान विरोधाभासी नहीं हैं?"

वैज्ञानिक और तफ़्सीरी उत्तर:

क़ुरआन के इन विभिन्न शब्दों में कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि यह एक ही घटना के विभिन्न विवरण और दृष्टिकोण हैं — जैसे किसी एक ही चित्र को अलग-अलग कोणों से देखा जाए।

क़ुरआनी आयतों के अनुसार, उनके विनाश (हलाकत) का विस्तृत दृश्य कुछ इस प्रकार था:

             जिब्रील (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह के आदेश से एक अत्यंत तीव्र आवाज़ (चीख़) उठाई।

             उस चीख़ के कारण धरती हिलने लगी और एक भयंकर भूकंप (रजफ़ा) उत्पन्न हो गया।

             इस भयावह स्थिति में उनके दिल फट गए और वे ज़मीन पर औंधे गिर पड़े।

ऐसे समझिए:

             अस्सैह़ा (الصیحہ - चीख़): वह आवाज़ थी जो अज़ाब (दंड) की शुरुआत का कारण बनी।

             अर्रजफ़ा (الرجفہ - भूकंप): उस चीख़ का ज़मीनी प्रभाव था।

             अस्साअिका (الصاعقہ - गर्जन / बिजली): उस विनाशकारी आवाज़ को कहते हैं जो आकाश से आती है।

             अत्ताग़िया (الطاغیہ - सीमा पार कर जाना): क्योंकि यह अज़ाब अत्यधिक, असामान्य और अत्यंत भयंकर था, इसलिए इसे "अत्ताग़िया" कहा गया — अर्थात सिरकशी और सीमा का अतिक्रमण।

इन चारों अभिव्यक्तियों को समझने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि ये सभी एक ही अज़ाब (दंड) के विभिन्न पहलू हैं, जैसे:

  अज़-ज़लज़ला (الزلزلہ) निकट कारण (Near Cause) था।

  अस्सैह़ा (الصیحہ) दूरस्थ कारण (Remote Cause) था।

  अस्साअिका (الصاعقہ) उस अज़ाब (दंड) का सामान्य नाम था।

  अत्ताग़िया (الطاغیہ) उस अज़ाब की तीव्रता और भयावहता की अभिव्यक्ति थी।

एक मत यह भी है कि क़ौम समूद पर आसमान से चीख़ (अज़ाब) आया और नीचे से भूकंप —जैसा कि तफ्सीर जलालैन, सूरह अ'राफ़, आयत 78 में है:

ٱلزَّلْزَلَةُ ٱلشَّدِيدَةُ مِنَ ٱلْأَرْضِ وَٱلصَّيْحَةُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ

अर्थात्: धरती से भयंकर भूकंप आया और आसमान से तेज़ चिंगाड़ की आवाज़ (चीख़) आई।

अल्लामा सावी इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं:

لِأَنَّ عَذَابَهُمْ كَانَ بِهِمَا مَعًا

अनुवाद: क्योंकि उन पर एक साथ दोनों प्रकार — अर्थात ऊपर (आसमान) और नीचे (धरती) — से अज़ाब आया।

यह बात बिल्कुल वैसी ही है जैसे किसी व्यक्ति का नाम हसनैन हो, लेकिन घर के लोग कभी उसे "बेटा", कभी "क़ारी साहब", कभी "डॉक्टर", और कभी "हसनैन" कहकर पुकारें।

हर नाम या संबोधन अपने स्थान पर सही होगा, लेकिन सबका इशारा एक ही व्यक्ति की ओर होगा।

अब कल्पना कीजिए कि किसी क्षेत्र में एक भीषण भूकंप आया, जिसकी वजह से कई इमारतें ज़मीन में समा गईं और बहुत-से लोगों की जान चली गई।

यदि विभिन्न लोग इस घटना का वर्णन करें, तो उनके बयान इस प्रकार अलग-अलग हो सकते हैं:

             एक व्यक्ति कहेगा: "ये लोग भूकंप के कारण मारे गए।"

             दूसरा कहेगा: "ये इमारत के ढहने से दबकर मर गए।"

             तीसरा कहेगा: "इनकी मृत्यु दीवारों के गिरने से हुई।"

             कोई कह सकता है: "धरती के हिलने से इनकी जानें चली गईं।"

हालाँकि ये सभी बयान बाहरी रूप से अलग-अलग लगते हैं, लेकिन वास्तविकता में ये एक ही घटना के विभिन्न पहलू हैं।

इन सभी का आधार एक ही सच्चाई है — "भूकंप"।

भूकंप ही मुख्य और मूल कारण था, जिसने इमारतों को गिराया, दीवारों को ढहाया और अंततः लोगों की मृत्यु का कारण बना।

इसी सिद्धांत को क़ुरआन मजीद में क़ौम-ए-समूद पर आए अज़ाब के संदर्भ में भी समझा जा सकता है।

वहाँ भी एक ही अज़ाब के विभिन्न पहलुओं को अलग-अलग अभिव्यक्तियों (ताबीरों) के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है:

"सैह़ा" (चीख़), "रजफ़ा" (भूकंप), "साअिका" (कड़क या बिजली), और "ताग़िया" (सीमा से बढ़ी हुई विपत्ति) ।

इन अभिव्यक्तियों का उद्देश्य कोई विरोध या भ्रम उत्पन्न करना नहीं है, बल्कि इस भयावह अज़ाब की तीव्रता और विविध प्रभावों को इस तरह दर्शाना है कि सुनने वाले के दिल पर उसकी हकीकत का गहरा असर हो।

इसलिए, जैसे भूकंप से हुई मृत्यु को अलग-अलग अंदाज़ में बयान करना विरोधाभास नहीं, बल्कि विवरण की विविधता है —उसी तरह क़ुरआन में क़ौम-ए-समूद पर आए अज़ाब को विभिन्न शब्दों और रूपकों में प्रस्तुत करना, एक ही सच्चाई के व्यापक, गहन और हिकमत से भरे हुए प्रस्तुतीकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है।

मुफ़स्सिरीन किराम की राय(प्रख्यात कुरआन व्याख्याकारों की टिप्पणियाँ)

अल्लामा ग़ुलाम रसूल सईदी अपनी प्रसिद्ध और बहुचर्चित उर्दू तफ़्सीर "तिबयानुल कुरआन" में, सूरह अल-आ'राफ़ की आयत 73 के अंतर्गत लिखते हैं:

एक आपत्ति यह की जाती है कि क़ौमे समूद पर आए अज़ाब को कुरआन में विरोधाभासी या परस्पर अलग-अलग शब्दों से व्यक्त किया गया है।एक स्थान पर इस अज़ाब को "अर-रजफ़ा" (भूकंप) कहा गया (सूरह अल-आ'राफ़: 78), और दूसरे स्थान पर इसे "अत-ताग़िया" (अत्यधिक बढ़ जाने वाली विपत्ति) कहा गया है(सूरह हूद: 67, सूरह अल-हिज्र: 83, और सूरह अल-क़मर: 31)

वे आगे इसका उत्तर देते हुए लिखते हैं:

वास्तव में यह अज़ाब एक अत्यंत भयावह भूकंप की शक्ल में आया था, और भूकंप में स्वाभाविक रूप से भयभीत कर देने वाली आवाज़ (चीख़) होती है, इसलिए उसे "अस्सैह़ा (الصَّيحَة)" से भी व्यक्त किया गया। और क्योंकि वह आवाज़ बहुत अधिक तीव्र और सीमा पार करने वाली थी, इसलिए उसे "अत-ताग़िया (الطَّاغِيَة)" से भी अभिव्यक्त किया गया।

अंत में, वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि क़ुरआन मजीद में क़ौम समूद का उल्लेख निम्न सूरतों में किया गया है: अल-आ'राफ़, हूद, अल-हिज्र, अश-शुआरा, अन-नम्ल, फुस्सिलत, अन-नज्म, अल-क़मर, अल-हाक़्क़ा, और अश-शम्स।

इसी प्रकार, इमाम क़ुर्तुब़ी, इमाम आलूसी और अन्य प्रसिद्ध मुफस्सिरीन ने भी यही तत्बीक़ (समन्वय) प्रस्तुत किया है।

उर्दू तफ़्सीरें जैसे कि "सिरातुल जन्नान", "तफ़्सीर-ए-नईमी" आदि में भी यही व्याख्या दी गई है कि क़ुरआन मजीद में कोई विरोधाभास (तज़ाद) नहीं है, बल्कि यह तो बलाग़त (अलंकारिक सौंदर्य) और हिकमत की पराकाष्ठा है कि एक ही सच्चाई को विभिन्न अंदाज़ों में प्रस्तुत किया गया है, ताकि उसका प्रभाव और गहराई और अधिक बढ़ जाए, और अज़ाब की भयावहता दिलों पर स्थायी रूप से अंकित हो जाए।

सारांश (ख़ुलासा-ए-कलाम):

क़ुरआन करीम के उसलूब (शैली) में जो विविधता (तनव्वुअ) है, वह विरोधाभास नहीं, बल्कि फसाहत (शुद्धता), बलाग़त (अलंकारिक श्रेष्ठता) और हक़ीक़तनिगारी (यथार्थ चित्रण) की उच्चतम मिसाल है। क़ौम-ए-समूद पर जो अज़ाब आया, वह:

             "चीख़ (الصیحہ)" की शक्ल में आरंभ हुआ,

             "ज़मीन की कंपन (الرجفہ)" के रूप में प्रकट हुआ,

             इतना तीव्र और प्रचंड था कि उसे "साअिका (الصاعقہ)" भी कहा गया,

             और क्योंकि वह अत्यंत घातक और सीमा से बढ़ा हुआ अज़ाब था,

इसलिए उसे "ताग़िया (الطاغیہ)" भी कहा गया।

इसलिए कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि यह एक ही घटना की व्यापक और विविध अभिव्यक्तियाँ हैं।

अब तक की व्याख्या से उपरोक्त शंका का समाधान हो चुका है।

हालाँकि, आगे और गहन वैचारिक एवं वैज्ञानिक लाभ के लिए हम डॉ. मुहम्मद ग़लूश की एक अरबी पोस्ट से चयनित उद्धरण का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि पाठकगण इस विषय की वैज्ञानिक व्याख्याओं से भी भली-भाँति लाभ उठा सकें।

क़ौम-ए-समूद पर अज़ाब की विभिन्न कुरआनी अभिव्यक्तियाँ और आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्याएँ

कुछ लोग यह आपत्ति करते हैं कि क़ुरआन मजीद ने क़ौम-ए-समूद पर आए अज़ाब को अलग-अलग तरीक़ों से प्रस्तुत किया है: कहीं उसे "सैह़ा" (चीख़/गर्जना) कहा गया है, कहीं "रजफ़ा" (भूकंप), कहीं "साअिका" (कड़क/बिजली), और कहीं "हश़ीम" (जली हुई सूखी घास/फूस की राख)।

तो ऐसे सवाल उठाने वालों के मन में यह विचार आता है कि जब इन शब्दों के अर्थ अलग-अलग हैं, तो फिर उनके बीच सामंजस्य और मेल कैसे संभव है?

हम इस आपत्ति के उत्तर में कहते हैं कि — जी हाँ! अल्लाह तआला ने अज़ाब-ए-समूद को विभिन्न अभिव्यक्तियों (ताबीरों) के माध्यम से वर्णित किया है, लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों ने इन सभी अभिव्यक्तियों की तार्किक, वैज्ञानिक और अनुभवसिद्ध व्याख्या कर दी है, और यह व्याख्या क़ुरआन की वर्णनात्मक शैली (बयान की तरतीब) से पूर्णतः मेल खाती है।

आइए, अब इन चरणों को क्रमवार समझते हैं:

1. प्रचंड आवाज़ (सैह़ा) और उससे उत्पन्न भूकंप (रजफ़ा)

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

فَأَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ

अनुवाद: “तो उन्हें भूकंप (रजफ़ा) ने आ लिया।”

(सूरह अल-आ'राफ़, आयत 78)

विज्ञान यह बताता है कि ध्वनि (आवाज़) दरअसल कंपनात्मक तरंगों (Vibrational Waves) का समूह होती है।

जब किसी व्यक्ति को अत्यंत तीव्र और तेज़ आवाज़ का सामना करना पड़ता है — विशेषतः यदि वह आवाज़ 200 डेसिबल से अधिक की तीव्रता वाली हो —तो उसके शरीर में कंपन, कांपने, और भूकंप जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

यही वह अवस्था है, जिसे क़ुरआन मजीद ने "रजफ़ा" (भूकंप, कंपन) से अभिव्यक्त किया है।

और इस रजफ़ा (भूकंप) की जड़ या मूल कारण वही प्रचंड चीख़/चिंगाड़ (सैह़ा) थी,

जो आसमानी अज़ाब के रूप में आई — और वही आवाज़ भूकंप का कारण बनी।

2. तीव्र दबाव, अग्नि और ऊष्मा: "साअिका" का भावार्थ

क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

فَأَخَذَتْهُمُ الصَّاعِقَةُ

अनुवाद: “तो उन्हें साअिका ने आ लिया।”

(अर्थात अत्यंत तीव्र बिजली या अग्नि जैसी आवाज़ ने उन्हें आ घेरा।)

विज्ञान यह बताता है कि जब अत्यधिक तीव्र ध्वनि या अत्युच्च आवृत्ति (फ्रिक्वेंसी) वाली तरंगें वायुमंडल में प्रवेश करती हैं, तो वे हवा को अचानक तेज़ी से फैलाती हैं और फिर अत्यंत बलपूर्वक संकुचित कर देती हैं।इस प्रक्रिया से वायुमंडल का तापमान हज़ारों डिग्री सेल्सियस तक पहुँच सकता है। यही प्रक्रिया वह है जिसे क़ुरआन ने "साअिका" के शब्द से अभिव्यक्त किया है —अर्थात एक ऐसी घटना जिसमें आग, अत्यधिक गर्मी, चिंगाड़ और विनाशकारी दबाव एक साथ सम्मिलित होते हैं। इस एक ही "साअिका" (विनाशकारी कड़क या अग्नि-आवाज़) में:

             चीख़ (सैह़ा)

             दबाव

             उष्णता (गर्मी)

             और पूर्ण विनाश —

एक ही समय पर एकत्र हो जाते हैं।

3. शरीर के अंगों का फटना और "हशीम" बन जाना

क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

فَكَانُوا كَهَشِيمِ الْمُحْتَظِرِ

अनुवाद: "तो वे जली हुई सूखी झाड़ियों और तिनकों की तरह हो गए।"(सूरह अल-क़मर, आयत 31)

आधुनिक वैज्ञानिक शोध के अनुसार, जब किसी मानव शरीर को 200 डेसिबल से अधिक तीव्रता वाली आवाज़ लगती है, तो सबसे पहले त्वचा (स्किन) फट जाती है, फिर कान और फेफड़े विस्फोटित हो जाते हैं, और यदि आवाज़ की तीव्रता और बढ़ जाए, तो वह आवाज़ शरीर के मांसपेशियों और ऊतकों (टिशूज़) को चीर डालती है और उन्हें जले हुए तिनकों की तरह बिखरे हुए छोटे-छोटे कणों में बदल देती है। क़ुरआन ने इसी भयानक और विनाशकारी अवस्था को "हशीम" शब्द से व्यक्त किया है —जिसका शाब्दिक अर्थ है:

जंगल की आग के बाद बची हुई जली और राख में तब्दील सूखी झाड़ियाँ और तिनके।

यानी यह अज़ाब इतना प्रचंड था कि इंसानी शरीर धुएँ में उड़ते हुए राख जैसे टुकड़ों में बदल गया।

इसी संदर्भ में क़ुरआन का एक और बयान है:

فَجَعَلْنَاهُمْ غُثَاءً

अनुवाद: "तो हमने उन्हें बहाव में बहने वाली झाग की तरह बना दिया।"(सूरह अल-मुमिनून, आयत 41)

यह आयत भी ध्वनि (आवाज़) की विनाशकारी तीव्रता को दर्शाती है —कि शारीरिक संरचना पूरी तरह समाप्त होकर ऐसी अवस्था में पहुँच जाती है, जहाँ शरीर बस पानी में बहती झाग या राख की तरह रह जाता है।

निष्कर्ष: क़ुरआन मजीद में अज़ाब-ए-समूद के लिए जो विभिन्न अभिव्यक्तियाँ (ताबीरें) इस्तेमाल हुई हैं —वह किसी विरोधाभास की नहीं, बल्कि एक ही सच्चाई के अलग-अलग चरणों और प्रभावों की व्याख्या हैं। हर एक शब्द उस अज़ाब की कोई नई परत और नया दृश्य हमारे सामने खोलता है।

अब हम पूर्ण दृष्टिकोण और सूझ-बूझ के साथ यह कह सकते हैं कि क़ुरआन मजीद में क़ौम-ए-समूद पर आए अज़ाब के लिए जिन विभिन्न शब्दों का प्रयोग हुआ है,

उनमें किसी प्रकार का विरोधाभास (तज़ाद) नहीं है, बल्कि ये सभी एक ही भयावह अज़ाब के विभिन्न वैज्ञानिक, क्रमिक (तदरीजी) और प्रक्रियागत चरणों के प्रतीक हैं।इन सभी शब्दों का संबंध उस घटनाक्रम से है जो उनकी हलाकत (विनाश) से पहले क्रमशः घटित हुआ:

             चीख़ (الصَّيحَة / सैह़ा): विनाश की शुरुआत करने वाली भयंकर आवाज़

             भूकंप (الرَّجفَة / रजफ़ा): उस आवाज़ की ज़मीनी प्रतिक्रिया

             गरमी व विस्फोट (الصَّاعِقَة / साअिका): तीव्र ताप और कंपन से उत्पन्न विस्फोट

             शारीरिक विघटन व जलना (هَشِيم / غُثَاء / हशीम / ग़ुस़ा): शरीरों का टूटकर बिखर जाना और राख की तरह उड़ जाना

वैज्ञानिक क्षेत्र में “सैह़ा” (चीख़) की शक्ति का व्यावहारिक उपयोग

यहाँ हम इस बिंदु को एक आश्चर्यजनक वैज्ञानिक तथ्य से और स्पष्ट करते हैं: शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के क्षेत्र में एक यंत्र प्रयोग किया जाता है जिसे "ध्वनि-चाकू" (Ultrasonic Scalpel) कहा जाता है। यह वास्तव में कोई धातु का चाकू नहीं होता, बल्कि एक कलम के आकार का उपकरण होता है, जो अतिध्वनिक तरंगें (Ultrasonic Waves) उत्पन्न करता है। इन तरंगों का प्रयोग मानव शरीर के कोमल अंगों, जैसे कि जिगर के प्रत्यारोपण के दौरान ऊतकों को काटने के लिए किया जाता है। यह तकनीक प्लास्टिक सर्जरी में भी प्रयुक्त होती है, जहाँ इन्हीं ध्वनि तरंगों की सहायता से वसा (फैट) को तोड़ा और विघटित किया जाता है।

इसी प्रकार, आधुनिक सेनाओं में एक विशेष प्रकार की ध्वनि तोप (Sonic Cannon) का प्रयोग किया जाता है, जो इमारतों, हथियार भंडारों, और बंकरों को नष्ट करने की क्षमता रखती है। यहाँ तक कि एक विशेष अतिध्वनिक तोप (Ultrasonic Cannon) भी विकसित की जा चुकी है जो पानी को भाप में बदल देने की शक्ति रखती है।

समापन बिंदु: क़ुरआन मजीद ने जो कुछ बताया, आज आधुनिक विज्ञान भी उसकी पुष्टि कर रहा है। क़ौम-ए-समूद पर जो अज़ाब उतरा था, वह कोई काल्पनिक या अलौकिक शक्ति नहीं थी, बल्कि वह एक वास्तविक तरंगीय शक्ति (Wave-based Force) का प्रकटीकरण था —जिसकी विनाशक क्षमता आज के आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों में भी देखी जा सकती है। और यही कुरआन की हिकमत (प्रज्ञा), इ‘जाज़ (चमत्कारी शैली) और सच्चाई की एक और उज्ज्वल दलील है। (समाप्त — और अल्लाह ही सबसे बेहतर मार्गदर्शन देने वाला और सहायक है)

ग़ुलाम ग़ौस सिद्दीकी एक इस्लामी विद्वान (Islamic Scholar) और न्यू एज इस्लाम के स्थायी अंग्रेज़ी एवं उर्दू कॉलम लेखक हैं।

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Urdu Article: Qur’anic Descriptions of the Punishment of the People of Thamūd: Perceived Contradiction or Mastery of Divine Wisdom? قومِ ثمود پر عذاب کی قرآنی تعبیرات: تضاد کا وہم یا حکمت کا کمال؟

URL: https://newageislam.com/hindi-section/quranic-contradiction-punishment-divine-wisdom/d/136095

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