
डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी, न्यू ऐज इस्लाम
20 फ़रवरी 2026
इस्लाम लोगों को ज़ुल्म और बुराई के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की इजाज़त देता है। लेकिन यह भी सच है कि इस्लाम बिना वजह किसी को बुरा कहने को पसंद नहीं करता। वहीं अगर कोई व्यक्ति मज़लूम हो, तो उसे अपने ऊपर हुए अन्याय की शिकायत करने और ज़ालिम के ख़िलाफ़ बोलने की अनुमति है। यह राय की आज़ादी का संतुलित और स्वस्थ तरीक़ा है।
पवित्र क़ुरआन इस बात को बहुत साफ़ तौर पर बताता है:
“अल्लाह को बुराई की बात ख़ुलकर कहना पसंद नहीं, सिवाय उसके जिसके साथ ज़ुल्म हुआ हो। और अल्लाह सब कुछ सुनने और जानने वाला है।” (सूरह अन-निसा 4:148)
इस आयत से पता चलता है कि इस्लाम बुराई के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की मज़बूत हिमायत करता है। जब समाज से बुराई ख़त्म होती है तो लोग अमन और भलाई के साथ जी सकते हैं। नेक समाज के असर लंबे समय तक और सकारात्मक होते हैं।
आज हम समाज में हिंसा, अशांति और भ्रष्टाचार देखते हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि लोग ग़लत कामों और बुरी आदतों के ख़िलाफ़ चुप रहते हैं। इसलिए अगर हमें स्थायी शांति और ख़ुशहाली चाहिए, तो ज़ुल्म रोकने और बुराई मिटाने के लिए क़दम उठाने होंगे।
क़ुरआन मुसलमानों को बेहतरीन उम्मत इसलिए कहता है क्योंकि वे भलाई का हह़ुक्म देते हैं और बुराई से रोकते हैं:
“तुम सबसे बेहतर उम्मत हो, जो लोगों के लिए पैदा की गई — तुम भलाई का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो।” (सूरह आले-इमरान 3:110)
नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने भी फरमाया:
“तुम में से जो कोई बुराई देखे, उसे हाथ से रोके; अगर यह न कर सके तो ज़ुबान से रोके; और अगर यह भी न कर सके तो दिल में बुरा समझे — और यह ईमान का सबसे कमज़ोर दर्जा है।” (सहीह मुस्लिम)
इस हदीस में बुराई रोकने के तीन दर्जे बताए गए हैं:
अगर संभव हो तो ताकत या काम से रोकना।
अगर यह न हो सके तो ज़ुबान से रोकना।
कम से कम दिल में बुरा समझना — मगर यह ईमान का सबसे कमज़ोर दर्जा है।
अगर बुराई को बुराई न समझा जाए और उसे रोकने की कोशिश न की जाए, तो वह धीरे-धीरे बढ़कर पूरे समाज को नुक़सान पहुँचाती है।
इस्लाम ताक़तवर लोगों के लिए कोई छूट नहीं देता। अगर शासक भी ज़ुल्म करे तो उसके सामने सच कहना चाहिए। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया:
“सबसे बड़ा जिहाद ज़ालिम हाकिम के सामने सच बात कहना है।” (सुनन तिर्मिज़ी)
इससे पता चलता है कि इस्लाम साफ़ और नैतिक समाज बनाने पर कितना ज़ोर देता है। अफ़सोस, आज दुनिया में कई ग़लत काम खुलेआम होते हैं और लोग उन्हें बुरा भी नहीं समझते।
एक मौके पर नबी ने यह भी बताया कि इंसान को सच कहने में ख़ुद को कमज़ोर नहीं समझना चाहिए। क़यामत के दिन अल्लाह उससे पूछेगा कि जब मौका था तो उसने सच क्यों नहीं कहा, और लोगों का डर कोई बहाना नहीं माना जाएगा। (सुनन इब्न माजह)
सहाबा-ए-किराम ने भी यह वादा किया था कि वे हर जगह सच कहेंगे और अल्लाह के लिए किसी की निंदा से नहीं डरेंगे।
इन सारी शिक्षाओं से साफ़ होता है कि सच कहना और बुराई रोकना केवल नैतिक ज़िम्मेदारी ही नहीं बल्कि धार्मिक कर्तव्य भी है।
जब हम आज के समाज को देखते हैं, तो अक्सर लोग ताक़तवर का साथ देते हैं और कमज़ोर को दबाते हैं। यह आम सामाजी रुझान बन गया है। जबकि इस्लाम की शिक्षा ज़ुल्म और बुराई ख़त्म करने के बारे में बिल्कुल स्पष्ट है।
अगर हम सचमुच समाज में अमन और सुकून चाहते हैं, तो हमें क़ुरआन और नबी की शिक्षाओं पर अमल करना होगा।
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Urdu Article: Qur'anic Discourse on Eradication of Evil برائی کے خاتمہ میں قرآن و حدیث کا بیانیہ اور عصری منظر نامہ
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