
डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी, न्यू ऐज इस्लाम
13 फ़रवरी 2026
धर्म समाज की एक बुनियादी और पहली ज़रूरत है। सच यह है कि धर्म के बिना जीवन न सिर्फ अधूरा रह जाता है, बल्कि उसकी सुंदरता भी पूरी तरह महसूस नहीं की जा सकती। धर्म इंसान और समाज को न्याय, नैतिकता, सब्र, शुक्र और इबादत (उपासना) जैसी महत्वपूर्ण तालीमात से जोड़ता है। यह सही और ग़लत में फर्क करना भी सिखाता है। वास्तव में जो लोग ईश्वर से नहीं डरते या धर्म से दूर होते हैं, वे अक्सर जीवन में संतुलन खो देते हैं और इफ़रात व तफ़रीत के शिकार हो जाते हैं। एक बार मक़सद जीवन के लिए संतुलन ज़रूरी है, और यह गुण मुख्य रूप से धर्म से पैदा होता है।
धर्म सामाजिक अनुशासन और कल्याण में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समाज को व्यवस्थित करने के लिए धर्म जो विचार देता है वह बहुत अहम है। जैसे पड़ोसियों का ख्याल रखना, अत्याचार झेलने वालों की मदद करना और अन्याय व सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज़ उठाना — ये सब धर्म सिखाता है। माता-पिता, बच्चों और पति-पत्नी के अधिकारों का सम्मान समाज को बेहतर बनाता है। इसलिए धर्म द्वारा पेश किए गए सामाजी सिस्टम की अहमियत को नकारा नहीं जा सकता। धर्म ने इंसान को एक और महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान दिलाया है — सामाजिक कल्याण।
जब हम दुनिया के धर्मों की तालीमात को देखते हैं तो हमें कल्याण के बारे में स्पष्ट रहनुमाई मिलती है। इस्लाम में सामाजिक कल्याण का रूप ज़कात (अनिवार्य दान), सदक़ा (नफ़ली दान), वक़्फ़ और सूद (ब्याज) की मनाही के रूप में मौजूद है।
इस्लामी निज़ामे ह़यात में इबादत इंसान को ईश्वर से जोड़ती है, जबकि ज़कात एक महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक स्तंभ है, जो धन को पवित्र बनाता है, कल्याण को बढ़ाता है और ग़रीबी कम करता है। ज़कात केवल एक आर्थिक इबादत नहीं बल्कि एक पूरी सामाजिक व्यवस्था है, जो व्यक्ति और समाज दोनों को सुधारती है। इसका उद्देश्य धन को कुछ हाथों में जमा होने से रोकना और समाज के कमज़ोर लोगों की मदद करना है।
ज़कात इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है। क़ुरआन में नमाज़ और ज़कात का अक्सर साथ-साथ ज़िक्र आता है:
“नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो।” (अल-बक़रा: 43)
इससे पता चलता है कि जैसे नमाज़ रूह़ानी शान्ती का ज़रीआ है, वैसे ही ज़कात आर्थिक और सामाजिक सुधार का माध्यम है। पैग़ंबर मुहम्मद ने भी कहा:
“इस्लाम पाँच चीज़ों पर कायम है… ज़कात देना…”
ज़कात की अनिवार्यता बताती है कि इस्लाम धन को इंसान की निजी मिल्कियत नहीं बल्कि एक अमानत मानता है।
ज़कात सिर्फ दान या टैक्स नहीं है, बल्कि यह नैतिक और सामाजिक विचार पर आधारित है। यह लालच और स्वार्थ को दूर करता है। देने वाले में सख़ावत और हमदर्दी की भावना पैदा होती है। यह धन के ग़लत बँटवारे को रोकता है और ग़रीबी के ख़िलाफ़ स्थायी समाधान देता है। इससे धन समाज में चलता रहता है और आर्थिक ठहराव नहीं आता।
समझना चाहिए कि इस्लाम में सामाजिक कल्याण कोई वैकल्पिक काम नहीं बल्कि धार्मिक कर्तव्य है। क़ुरआन और पैग़ंबर की शिक्षाएँ बार-बार अनाथों, गरीबों, मुसाफ़िरों, विधवाओं और समाज के कमज़ोर लोगों की देखभाल पर ज़ोर देती हैं। राज्य और समाज दोनों की ज़िम्मेदारी हैं कि कोई भी व्यक्ति बुनियादी ज़रूरतों से वंचित न रहे। इस्लामी कल्याण केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं बल्कि सम्मान, आत्मनिर्भरता, बराबरी के अवसर और सामाजिक न्याय को भी शामिल करता है। इसलिए इस्लामी आर्थिक व्यवस्था अस्थायी दान नहीं बल्कि एक स्थायी और संगठित कल्याण सिस्टम पेश करती है। इसके अलावा वक़्फ़ संस्थाएँ और सूद की मनाही भी सामाजिक कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
अगर हम दूसरे धर्मों का अध्ययन करें तो उनमें भी इसी तरह की शिक्षाएँ मिलती हैं। हिंदू धर्म में दान और लोक-कल्याण की अवधारणा मौजूद है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने कल्याण की व्यवस्था के कुछ सिद्धांत बताए: ईश्वर सबका मालिक है; सच्चा ज्ञान ईश्वर से मिलता है; सत्य को अपनाओ और असत्य को छोड़ो; हमेशा दूसरों का भला करो; न्याय, प्रेम और दया अपनाओ; अज्ञान दूर करने के लिए ज्ञान फैलाओ; और अपनी ख़ुशह़ाली दूसरों के साथ बाँटो।
इसी तरह सिख धर्म संतोष, भाईचारा, आत्मशुद्धि, जीवों पर दया, स्त्री-पुरुष समानता, सेवा और ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करने पर ज़ोर देता है।
ईसाई धर्म भी सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देता है। यह सिखाता है कि किसी से नफ़रत न करो, अपमान न करो, ग़लती को माफ़ करो, बदला लेने से बचो और ज़रूरतमंद की मदद करो। बुराई का जवाब बुराई से नहीं बल्कि धैर्य और अच्छाई से देना चाहिए।
इन सभी शिक्षाओं को देखने के बाद स्पष्ट हो जाता है कि धर्मों में सामाजिक कल्याण की मज़बूत व्यवस्था मौजूद है। इसलिए धर्म का सम्मान करना और उसकी शिक्षाओं के अनुसार जीवन जीना आवश्यक है। वास्तविक जीवन में भी हम धर्म के कल्याणकारी उसूलों का सकारात्मक प्रभाव देख सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति अपना धन समाज के भले के लिए खर्च करता है, तो उसे ऐसा करने की प्रेरणा कहाँ से मिलती है? साफ़ है कि ऐसी सोच सच्चे विश्वास और धर्म के प्रति निष्ठा से ही पैदा होती है।
--------------
URL: https://newageislam.com/hindi-section/role-religion-social-welfare/d/138833
New Age Islam, Islam Online, Islamic Website, African Muslim News, Arab World News, South Asia News, Indian Muslim News, World Muslim News, Women in Islam, Islamic Feminism, Arab Women, Women In Arab, Islamophobia in America, Muslim Women in West, Islam Women and Feminism