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Hindi Section ( 22 March 2014, NewAgeIslam.Com)

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The International Community Must Actively Address the Menace of Jihadism अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को सक्रिय रूप से जिहादवाद के खतरे और इस्लाम की इनकी काल्पनिक व्याख्या पर ध्यान देना चाहिए- सुल्तान शाहीन


सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम

18 मार्च, 2014

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद

पच्चीसवाँ नियमित सत्र (3 - 28 मार्च, 2014)

एजेंडा आइटम 4: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के लिए विशेष चिंता का विषय

सुल्तान शाहीनएडिटरन्यु एज इस्लाम द्वारा दिये गये भाषण का पूरा टेक्स्ट 

अध्यक्ष महोदय,

अफगानिस्तान से नाटो सेना की वापसी और सीरिया के जिहाद से इस्लामी कट्टरपंथियों की उत्तरी अमेरिका, यूरोप और दुनिया के बाकी हिस्सों में वापसी के बाद पैदा होने वाले हालात को लेकर दक्षिण और मध्य एशियाई देश बहुत चिंतित हैं। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में तालिबानी जिहादवाद की लहर का मतलब भारत और बांग्लादेश में अधिक आतंक हो सकता है।

अध्यक्ष महोदय! जैसा कि अनुभव बताते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सैन्य साधनों से नहीं लड़ी जा सकती। इस युद्ध का सैन्य जितना ही वैचारिक आयाम है। इस्लाम की अलगाववादी, राजनीतिक, अधिनायकवादी और जिहादी विवरणों का मुक़ाबला किया जाना चाहिए और समावेशी व मोक्ष के लिए आध्यात्मिक मार्ग के रूप में मुख्य धारा के इस्लाम के विवरणों को भरपूर बढ़ावा दिया जाना चाहिए। पश्चिमी सरकारों के बीच सिर्फ ब्रिटेन ने इस युद्ध की वैचारिक प्रकृति के सम्बंध में जागरूकता का परिचय दिया है और मुसलमानों को वैचारिक रूप से इसका मुक़ाबला करने में मदद करने का संकल्प दिखाया है। लेकिन इस सम्बंध में ब्रिटिश मुसलमानों की प्रतिक्रिया निराशाजनक रही है।

दुनिया भर के मुसलमान इन तथ्यों से इंकार करना जारी रखे हुए हैं। इनमें आत्मावलोकन का थोड़ा सा भी संकेत नज़र नहीं आता।

ब्रिटिश मुसलमानों को प्रधानमंत्री की टास्क फोर्स आन टैक्लिंग रेडिकलाइज़ेशन एण्ड इक्सट्रीमिज़्म (Task Force on Tackling Radicalisation and Extremism) की रिपोर्ट संदिग्ध लगती है। इसके बाद उठाये कदम भी उनके अंदर घबराहट का कारण बनें हैं। लेकिन इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि मुसलमानों की खुद इस बुराई से लड़ने की कोई योजना है। हम मुसलमानों को ये समझना और स्वीकार करना चाहिए कि ये मुख्य रूप से इस्लाम के अंदर ही एक जंग है और हमें ही इस लड़ाई को लड़ना होगा।

तालिबान ने पहले ही अपनी ताक़त का प्रदर्शन शुरू कर दिया है। पिछले महीने पाकिस्तान में उन्होंने सरकार को बातचीत शुरू करने के लिए मजबूर किया। शरीयत लागू करने की मांग करते हुए उन्होंने पाकिस्तानी सेना के कैदी बनाये 23 सैनिकों के गले काट दिए। जैसा कि पाकिस्तान के सूचना मंत्री ने बताया है कि 1971 में हिंदुस्तान के खिलाफ युद्ध में 90,000 पाकिस्तानी सैनिक बंदी बनाए गए थे लेकिन इनमें से किसी का भी सिर कलम नहीं किया गया था। उन्हें इस बात पर भी आश्चर्य है कि पाकिस्तानी तालिबान किस तरह के शरई कानून को लागू करना चाहते हैं जो अपने ही देश के सैनिकों के गले काटने की इजाज़त देता है।

स्पष्ट रूप से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को सक्रियता के साथ जिहादवाद के खतरे और इसकी इस्लाम की स्वयंभू व्याख्या पर ध्यान देना चाहिए।

अध्यक्ष महोदय!

अब हम उपरोक्त मुद्दों में से कुछ पर थोड़ा विस्तार से चर्चा करते हैं। सबसे पहले, ये संतोषजनक है कि पश्चिमी देशों में कम से कम एक सरकार ने इस बात को स्वीकार किया है कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध को केवल सैन्य साधनों से नहीं लड़ा जा सकता। ब्रिटिश प्रधानमंत्री की टास्क फोर्स आन टैक्लिंग रेडिकलाइज़ेशन एण्ड इक्सट्रीमिज़्म (Task Force on Tackling Radicalisation and Extremism) की रिपोर्ट में ये बताया गया है कि "इस्लामी उग्रवाद की विचारधारा को परिभाषित करना भी आवश्यक है" और पैराग्राफ 1.4 में ये भी लिखा है:

"ये एक अलग विचारधारा है और इसको लेकर पारम्परिक धार्मिक व्यवहार से भ्रमित नहीं होना चाहिए। ये एक ऐसी विचारधारा है जो इस्लाम की विकृत व्याख्याओं पर आधारित है, जो इस्लाम के शांतिपूर्ण सिद्धांतों को धोखा देती है और सैयद कुतुब के जैसे लोगों की शिक्षाओं पर आधारित है। इस्लामी उग्रवादी मुस्लिम बहुल देशों में पश्चिमी हस्तक्षेप को 'इस्लाम के खिलाफ युद्ध' मानते हैं और उनका' और 'हमारा' का कथानक पैदा करते हैं। वो लोगों पर वैश्विक इस्लामी राज्य थोपना चाहते हैं जिसमें राज्य के कानून के रूप में उनकी व्याख्याओं पर आधारित शरीयत को लागू किया जाए और वो लोकतंत्र, कानून का राज और समानता के सिद्धांत जैसे उदार मूल्यों को खारिज करते हैं। उनकी विचारधारा में समझौता न करने वाला ये विश्वास भी शामिल है कि लोग एक ही समय में मुस्लिम और ब्रिटिश नहीं हो सकते और इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जो लोग उनसे सहमत नहीं वो सच्चे मुसलमान नहीं हैं।"

मुझे उम्मीद है कि उन्हें इस बात का भी एहसास होगा कि आधुनिक उग्रवाद के संस्थापक मिस्र के सैयद कुतुब और भारतीय उपमहाद्वीप के मौलाना अबुल आला मोदूदी एक ऐसी विचारधारा की पैदावार और उस विचाराधारा से प्रभावित हैं जिसे मुस्लिम समुदाय पर थोपने में ब्रिटिश साम्राज्य ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। ब्रिटिश साम्राज्य ने अपने शुरुआती दिनों में कट्टरपंथी वहाबी विचारधारा का समर्थन किया और विचाराधारा में निहित विनाश के लिए साधन उपलब्ध कराये और इस प्रक्रिया में सूफीवाद की तरफ झुकाव रखने वाले और शांतिपूर्ण मक्का के हाकिम- हाशमी खिलाफत के साथ अपने औपचारिक गठबंधन को भी धोखा दिया। इस बार अमेरिका के नेतृत्व में फिर पश्चिमी देशों ने इस विचारधारा का समर्थन और इसे बढ़ावा दिया और वास्तव में शीत युद्ध के अंतिम वर्षों के दौरान इसे बढ़ावा देने के लिए बहुत सारा पैसा भी खर्च किया।

लोगों ने सोचा होगा कि 9/11 की घटना के बाद जिहादियों का जीवित रहना बहुत मुश्किल होगा। इसके बजाय 9/11 की घटना के बाद ऐसा लगता है कि जेहादी तत्वों के कहर और दुनिया के विभिन्न भागों में तबाही की योजना और साज़िश के लिए और अधिक जमीनें मिल गई हैं। अतीत की गलतियों को नज़र में रखते हुए पश्चिमी देश ये एहसास बेहतर तरीके से कर सकते हैं कि अगर इस जिहादी विचारधारा से निपटना है तो सऊदी अरब में कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा के स्रोत का समर्थन और संरक्षण करना तुरंत बंद करना होगा और दुनिया भर के दूर दराज़ इलाकों में बड़े पैमाने पर सऊदी संस्करण के कट्टरपंथी इस्लाम के निर्यात को रोकना होगा। आखिरकार 9/11 के हमले में शामिल 19 आतंकवादियों में से 16 सऊदी नागरिक थे जिनका पालन पोषण सऊदी स्कूल के पाठ्यक्रम के तहत किया गया था और बाकी की भी सऊदी संस्करण वाले इस्लाम को मानने वाले स्कूलों में शिक्षा दीक्षा हुई थी।

ब्रिटेन की रिपोर्ट उग्रवाद को चुनौती देने और इससे निपटने को संयुक्त प्रयास मानती है। इसके पैराग्रफ 1.5 में लिखा हैः

"हम वूलविच हमले के बाद मुस्लिम समुदाय के संगठनों और दूसरे धार्मिक समूहों की सहज और स्पष्ट निंदा का स्वागत करते हैं। ब्रिटेन में सरकार के जितनी ही ज़िम्मेदारी वहाँ के संगठनों और समुदायों को जिम्मेदारी लेनी चाहिए। हम अतीत में अतिवादी इस्लामी विचाराधाराओं के बारे में चुप्पी साधे रहे हैं। और इस गलत चिंता के हिस्से के रूप में कि इस्लामी उग्रवादियों पर हमला इस्लाम पर हमले के बराबर है। हमारी खामोशी और अतिवादियों से मुकाबले करने में हमारी नाकामी ने कुछ मस्जिदों, इस्लामी केन्द्रों, युनिवर्सिटियों और जेलों में कट्टरता के लिए अनुकूल वातावरण बनाने के लिए प्रेरित किया। कई संस्थान ऐसे हैं कि अगर वो चाहें तो भी उनमें अतिवादियों का मुकाबला करने में अपना पूरा योगदान करने की क्षमता नहीं है। सरकार की इस चुनौती में अग्रणी भूमिका है वो ऐसे समाज जहां उग्रवादी सक्रिय हैं और जो संगठन इन चरमपंथियों के खिलाफ काम कर रहे हैं उनके अंदर खुद इनका मुकबला करने की क्षमता हो, सरकार इसको सुनिश्चित कर सकती है।"

उग्रवादी संवाद और विचारधारा से मुकाबले के बारे में बात करते हुए रिपोर्ट कहती हैः

"अतिवादी दुष्प्रचार, विशेष रूप से ऑनलाइन बहुत व्यापक रूप से उपलब्ध है और लोगों को कट्टरपंथी बनाने पर उनका सीधा प्रभाव है। चरमपंथियों का ज़हरीला संदेश, उदारवादी बहुमत की आवाज़ को दबा दे हमें इसकी इजाज़त नहीं देनी चाहिए।"

बिना अपवाद के इस सामन्यीकरण के बाद रिपोर्ट निश्चित बातों का वर्णन करती है और पैराग्राफ 1.3 में कहती है:

टास्क फोर्स इस बात पर सहमत है:

1. समुदायों और सिविल सोसायटी संगठनों की क्षमताओं का निर्माण किया जाए ताकि वो ऑनलाइन समेत बड़ी मात्रा में सभी प्रकार के अतिवादी सामग्री के खिलाफ अभियान छेड़ सकें,

2. ऑनलाइन अतिवादी सामग्री जिनकी होस्टिंग विदेशों में होती है और जो ब्रिटिश कानून के तहत अवैध हैं, उनकी जनता तक पहुँच को बंद करने के लिए इंटरनेट कंपनियों के साथ काम किया जाए।

3. ऑनलाइन अतिवादी सामग्री की सार्वजनिक रिपोर्टिंग की प्रक्रिया में सुधार के लिए इंटरनेट उद्योग के लगातार प्रयासों में मदद के लिए इनके साथ काम किया जाए।

लोगों ने सोचा होगा कि ब्रिटिश मुसलमान इस्लाम को बदनाम करने वालों से मुक़ाबला करने में मदद के लिए सरकार के दृढ़ संकल्प का स्वागत करेंगे जो इस्लाम को असहिष्णु और दूसरों से नफरत करने वाले धर्म के रूप में पेश करते हैं। वो इस मौक़े को जिहादी विचारधारा का खंडन करने और परम्परागत इस्लाम के उदार मुख्यधारा के संवाद को पेश करने के लिए प्रयोग करेंगे, क्योंकि परम्परागत इस्लाम सदियों से दूसरे समुदायों के साथ सहअस्तित्व में रहा है। हालांकि अतिवाद और इस्लाम की अतिवादी व्याख्या मुसलमानों के इतिहास का हमेशा हिस्सी रहा है लेकिन मुसलमानों के बहुमत ने उदारवादी रास्ता अपनाया है और उसने उग्रवाद के रूप और इसके नामकरण की परवाह किये बिना इसे हर दौर में हराया है।  

लेकिन आज इस मामले पर काफी हद तक चुप्पी साधे रहने की मुसलमानों की प्रवृत्ति, उग्रवाद का मुकाबला करने के लिए कोई विशेष प्रयास न करना, और उग्रवाद और जिहादवाद के लिए पश्चिमी देशों की विदेश नीति की नाकामी को ज़िम्मेदार ठहरा कर संतोष करना सिर्फ हमारी उत्पीड़ित मानसिकता को दर्शाता है और ये इस्लामी इतिहास और ज़मीनी वास्तविकताओं से इरादतन अज्ञानता को धोखा देना है। हमें ये तथ्य स्वीकार करना चाहिए कि इस्लामी इतिहास में हमेशा हिंसक तत्व मौजूद रहे हैं और इससे निपटना हमारा काम है। क्या हम आज भी ये समझ पाये हैं कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के दामाद और चौथे ख़लीफ़ा हज़रत अली इब्ने अबी तालिब और नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की आदरणीय बीवी हज़रत आयशा के बीच 7 नवम्बर, 656 ई. को जमल (ऊँट) की जंग क्यों हुई, जिसमें कम से कम पांच हज़ार मुसलमानों की मौत हुई। इस जंग के बाद हज़रत अली और मुआविया इब्ने अबी सुफियान के बीच 657 ई. में सिफिन की लड़ाई हुई जिसके नतीजे में बनु उम्मैद ने खानदानी खिलाफत के नाम पर एक क्रूर तानाशाही शासन स्थापित किया। लेकिन सिफिन के युद्ध के बाद बगदाद से बारह मील की दूरी पर नहरावान नाम के स्थान पर हज़रत अली और उनके पूर्व अनुयायियों (जो खारिजी हो गये थे) के बीच 658 ई. में नहरावान का युद्ध लड़ा गया। इन युद्धों में एक ऐसे समय और स्थान पर लाखों मुसलमान मारे गए थे जहां जनसंख्या बहुत कम थी। इन सभी घटनाओं से ऐसा लगता है कि इस्लाम के भीतर हमेशा से लड़ाई चल रही है। लेकिन साथ ही इन तथ्यों से इंकार करने की हमारी प्रवृत्ति अभूतपूर्व है।

अध्यक्ष महोदय!

हम मुसलमान, पश्चिमी देशों की नीतियों को आलोचना कर सकते हैं और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से अनुरोध कर सकते हैं कि वो इस तरह राजनीति को न अपनाएं जिससे मुस्लिम उग्रवादियों और आतंकवादियों के लिए और ज़मीनें पैदा हो और जहाँ वो शरण लें और विश्व शांति के लिए और मुसीबतें पैदा करें। लेकिन हमारा इन नीतियों पर कोई नियंत्रण नहीं है।  इसलिए हमें उन बातों पर ध्यान देना चाहिए जिन्हें हम खुद कर सकते हैं। आज मुस्लिम दुनिया की हालत ऐसी है कि जहाँ कहीं भी किसी उग्रवाद से प्रभावित समूह को आतंकवादियों और यहाँ तक कि आत्मघाती हमलावरों की ज़रूरत होती है, वहाँ उन्हें सेना उपलब्ध हो जाती है। इस सेना के सैनिकों को ये विश्वास होता है कि इस प्रक्रिया में अगर उन्हें आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध भी करना पड़े तब भी दूसरे निर्दोष मुसलमानों (ज़्यादातर) की हत्या कर वो स्वर्ग में जायेंगे।

मस्जिद में अपने साथी नमाज़ियों की हत्या या किसी सूफी बुज़ुर्ग की दरगाह पर अपने धार्मिक भाईयों को मौत की नींद सुलाने और सार्वजनिक स्थानों पर अपने साथी नागरिकों को मौत के घाट उतारने के लिए किसी को आत्महत्या करने के लिए राज़ी करना शायद दुनिया का सबसे मुश्किल काम होना चाहिए। लेकिन जब हम मुसलमानों की बात आती है तो ये सबसे आसान क्यों हो जाता है? और एक समुदाय के रूप में हम चिंतित भी क्यों नहीं हैं? ज़्यादातर हम क्यों मूकदर्शक बने हुए हैं?

अध्यक्ष महोदय!

आपके माध्यम से यहाँ उपस्थित विश्व मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों से ये निवेदन करना चाहूंगा कि हमें तुरंत अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। दुनिया के विभिन्न भागों में इस्लाम के भीतर एक आभासी गृह युद्ध के लिए दूसरों को ज़िम्मेदार ठहरा कर संतुष्ट होने के बजाय हम खुद अपना आत्मावलोकन करें और देखें कि हमसे कहां चूक हो रही है और उसे सही करने के लिए हम क्या कर सकते हैं।

अध्यक्ष महोदय, मेरे विचार में तत्काल हमारा ध्यान सबसे पहले इस बात पर होना चाहिए कि हम अपने बच्चों को स्कूलों और दीनी मदरसों में कौन सी शिक्षा दे रहे हैं। क्योंकि ये मदरसों की ही पैदावार हैं जो विभिन्न मुद्दों पर फतवा देने वाले बनते हैं और हमारी मस्जिदों में नमाज़ की इमामत करने वाले बनते हैं इत्यादि, और इस तरह वो मुसलमानों में विशेष रूप से कम पढ़े लिखे लोगों के बीच काफी प्रभाव हासिल कर लेते हैं।

कई मुसलमान इस बात से भी अवगत नहीं हैं कि हमारे स्कूलों और मदरसों में क्या पढ़ाया जा रहा है। और मुझे आशा है कि इस दिशा में जागरूकता से उनकी आंखें खुल जायेंगी और ये बात भी स्पष्ट हो जाएगी कि आज हम यहाँ क्यों हैं। और उम्मीद है कि इससे आत्मावलोकन की प्रेरणा मिलेगी। हमें ये मालूम होना चाहिए कि हमारे बच्चों को इस्लाम के नाम पर दूसरों से नफ़रत करने वाला साहित्य पढ़ने को मिल रहा है, जो सभी आसमानी किताब वाले धर्मों को मानने वाले गैर मुस्लिमों समेत ऐसे मुसलमानों जो इब्ने तैमिया और अब्दुल वहाब की इस्लामी व्याख्या पर विश्वास न रखते हों उनसे शाब्दिक व व्यवहारिक रूप से दुश्मन की तरह नफरत और व्यहार करने को अनिवार्य मानता है। क्या जिन लोगों का उनके बचपन में ही "दूसरे" लोगों के साथ नफरत और दुश्मनी करने के लिए ब्रेनवाश किया गया हो वो ऐसे लोगों का आसान शिकार नहीं बनेंगे जो एक आतंकवादी सेना तैयार करना चाहते ​​हैं? तो क्या इसमें कोई आश्चर्य की बात है, जितना मैं यहाँ पेश कर सकता हूँ उसकी तुलना में इन किताबों को और विस्तार से पढ़ने पर आप हैरान हुए बिना नहीं रहेंगें कि जब भी और जहाँ भी आत्मघाती हमलावरों की फौज की आवश्यकता होती है वो मुस्लिम समुदाय से उपलब्ध हो जाते हैं।

क्योंकि सऊदी अरब द्वारा प्रदान की गयी किताबें पूरी मुस्लिम दुनिया में व्यापक रूप से उपलब्ध हैं। मैं सऊदी स्कूल में पढ़ाई जाने वाली किताबों पर की गई एक शोध के कुछ पैरा ग्राफ पेश करना चाहूँगा जिसे प्रोफेसर अब्दुल्ला दोमेतो ने अपनी किताब ''Teaching Islam'' में पेश किया है। मैं हर उस व्यक्ति के लिए इस किताब का पढ़ना ज़रूरी समझता हूं जो जिहाद के प्रसार के रूझान को समझने में रुचि रखते हैं।

प्रोफेसर अब्दुल्ला दोमेतो लिखती हैं: "हर कक्षा की किताब में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि इस्लाम एक है, सभी मुसलमान एक उम्मत (मुस्लिम समुदाय) के रूप में एकजुट हैं और सभी मुस्लिम देशों में सऊदी अरब विशेष और पवित्र स्थान रखता है और इसका शाही परिवार वैध मुस्लिम शासकों की ज़रूरी आवश्यकताओं को पूरा करता है। स्कूली किताबों में छात्रों को इस बात के लिए तैयार करता है कि वो प्राधिकार (अथारिटी) का सम्मान करें, तथ्यों के साथ विचारों को भ्रमित करें, नैतिक सवालों को लिखित रूप में समझें, चूँकि इस्लाम सिर्फ एक ही है इसलिए ज्ञान की स्थिर संस्था के मुताबिक जीवन के सभी सवालों के स्पष्ट और अपरिवर्तनीय जबाव होंगे। और साथ ही साथ बाकी की मुस्लिम दुनिया की तरह सऊदी अरब भी नस्लीय आधार पर विविधता वाला और सांप्रदायिक आधार पर विभाजित है। एक अनुमान के अनुसार सऊदी अरब की 10 प्रतिशत आबादी शिया है, सऊदी अरब उन सुन्नी मुसलमानों का भी घर है जिनके धार्मिक अनुष्ठान जैसे सूफी रहस्यवाद, मज़ार पर हाज़िरी, सूफी संतों का आदर और सम्मान है, इनकी सऊदी अरब की स्कूली किताबों में बहुदेववादियों के रूप में निंदा की जाती है ........ हालांकि इन किताबों में प्रचीन स्रोतों के प्रमाणिक होने का दावा किया गया है। वो एक ऐसे इस्लाम का समर्थन करते हैं जो देसी वहाबियत, मुस्लिम ब्रदरहुड की सल्फ़ियत और अखिल इस्लामी एजेंडे का आधुनिक सम्मिश्रण है जिसमें ग्रंथों के साथ साथ सऊदी अरब के अपने राज़्य बनाने का एजेंडा शामिल है।"

प्रोफेसर अब्दुल्ला दोमेतो ने कक्षा 9 से 12 के लिए साल 2001- 2002 और 2003- 2004 के पाठ्यक्रम में शामिल 'फिक़्ह (न्यायशास्त्र), हदीस (पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम (स.अ.व.) के जीवन से आधिकारिक उपाख्यान), और तौहीद (इस्लामी एकेश्वरवाद) और प्राथमिक कक्षाओं 3, 5, और 6 व माध्यमिक कक्षाओं 7, 8, और 9 के लिए साल 2003/ 2004 के पाठ्यक्रम में शामिल तौहीद की किताबों की समीक्षा करके इस निष्कर्ष पर पहुँची। इसके अलावा उन किताबों की भी समीक्षा की गयी जो साल 2003- 2004 के पाठ्यक्रम में शामिल थी और जिनमें धर्म को विशेष विषय के रूप में शामिल किया गया थाः कक्षा 4 से लेकर 6 तक और कक्षा 8 से लेकर 12 तक के नागरिक शास्त्र और दसवीं कक्षा के लिए पैग़म्बर (स.अ.व.) की जीवनी और इस्लामी राज्य के इतिहास की पाठ्यपुस्तक। हाई स्कूल की धर्म की पाठ्यपुस्तक में शिक्षा मंत्रालय और जनरल प्रेसिडेंसी फॉर गर्ल्स दोनों के द्वारा तैयार किये गये संस्करण को शामिल किया गया है।'

इस्लाम केवल एक है और इसकी किसी और व्याख्या की कोई गुंजाइश नहीं है, ये ऐलान करने के बाद स्कूली किताबों में ये संदेश दिया गया है कि दर्शन और तर्क आपस में फूट पैदा करता है और इसलिए विशेष रूप से इनसे बचना चाहिए। प्रोफेसर अब्दुल्ला दोमेतो (10b: 14) की पाठ्य पुस्तक के निम्नलिखित पैराग्राफ का हवाला पेश करती हैं?

जब कुछ लोग अपने पंथ का निर्माण .... अध्यात्मिक अनुमान [इल्मुल किलाम] और व्यवस्थित तर्क [क़वायद अलमंतिक़] के आधार पर करते हैं जो ग्रीक और रोमन दर्शन से विरासत में मिला है तो उनके विश्वास में विचलन और पंथ में मतभेद पैदा हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप समाज में विभाजन और मतभेद पैदा होता है और इस्लामी समाज के निर्माण में बाधा पैदा होती है।

"निस्संदेह सही विश्वास से विचलन "आपदा और विनाश का कारण है।'' (10b: 15).5

प्रोफेसर अब्दुल्ला दोमेतो लिखती हैं:

"संदेश ये है कि बौद्धिक चर्चा और व्यक्तिगत तर्क का सांप्रदायिक सद्भाव और राजनीतिक एकता की वेदी पर बलिदान होना चाहिए। खालिद अबुल फ़ज़ल ने इसे समकालीन सऊदी "सर्वश्रेष्ठतावादी, विशुद्धतावादी दृष्टिकोण' वाले इस्लाम का बौद्धिकता विरोधी रवैया करार दिया है जो 'ग्रंथों के सुरक्षित आश्रय' की शरण लेता है और जहां ये खुद को आलोचनात्मक ऐतिहासिक जाँच से अलग कर सकते हैं (अलफज़ल 2003)। वो इस सर्वश्रेष्ठतावादी, विशुद्धतावादी दृष्टिकोण वाले इस्लाम को सल्फ़ाबिज़्म नाम देती हैं, जो "सल्फ़ी" और "वहाबिज़्म" शब्द का संयोजन है और वहाबिज़्म सऊदी इस्लाम का देसी नज्दी संस्करण है जिसे स्कूली किताबों में सऊदी अरब का एकमात्र इस्लाम करार देने और इसके वर्तमान शासकों की वैधता साबित करने की कोशिश की गई है।

दसवीं कक्षा की तौहीद की पाठ्य पुस्तक (असंशोधित संस्करण) में 'मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब की दावत' शीर्षक वाले एक अध्याय में नज्दी इस्लाम के जनक मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब को अरब प्रायद्वीप में धार्मिक विचलनों को शुद्ध करने वाला एतिहासिक व्यक्ति करार दिया है और सऊदी अरब में अलशेख के नाम से जाने जाने वाले मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब की   नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से तुलना की कोशिश की गयी है। इस पाठ में बताया गया है कि मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब इस उम्मत के धर्म का नवीनीकरण करने के लिए खुदा की तरफ से रहमत बनकर भेजे गए, नवीकरण के लिए उनकी दावत एक स्थापित पैटर्न के मुताबिक थी: पैग़म्बर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को मानव जाति के धर्म को नवीनीकृत करने के लिए अल्लाह ने भेजा था, क्योंकि मानव जाति समय के साथ विचलनों और नवाचारों से बदल गयी थी। हालांकि मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अंतिम नबी हैं लेकिन हर युग में नवाचारों के खिलाफ संघर्ष को नवीनीकृत करने, पंथ में सुधार और शरीयत को परिवर्तन से बचाने के लिए और अज्ञान के अँधेरे में डूबे हुए लोगों को दिव्य प्रकाश प्रदान करने के लिए खुदा उलमा में से कुछ लोगों को पैदा करता है (10b: 19)। ऐसे ही एक व्यक्ति का जन्म बारहवीं शताब्दी हिजरी (ईस्वी सन् की 18वीं शताब्दी) में हुआ जिसका नाम अल-शेख-अल-इस्लाम, अलमोजद्दिद मोहम्मद इब्न अब्दुल वहाब था। और वो अरब में उस समय पैदा हुए जब पूरा अरब अज्ञानता के अंधेरे और बहुदेववादी प्रथाओं (शिर्क) के पालन में डूबा हुआ था।

लेकिन मोहम्मद इब्न अब्दुल वहाब ने जो शिक्षाएं दी, आज वही इस्लामी देशों और यहाँ तक की पश्चिमी देशों में भी  हमारे बच्चों को पढ़ायी जा रही हैं? इन किताबों में सबसे महत्वपूर्ण सबक को अल-वला वअल-बरा की अवधारणा के द्वारा समझाया गया है (जिसका अर्थ अनिवार्य रूप से वहाबी मुसलमानों के प्रति वफादारी दिखाना और बाकी सभी लोगों के प्रति दुश्मनी रखना है)।

मुझे Teaching Islam के उस अध्याय का हवाला फिर से पेश करने दें। अल-वला वअल-बरा के द्वारा दूसरों के प्रति दुश्मनी दिखाने का इतिहास है और वहाबी दुश्मनी का निशाना बनने वाले समय के साथ बदल जाते हैं। मिसाल के तौर पर डेविड कमिन्स (2002) का कहना है कि 1880 के दशक में दुश्मनी रखने की अनिवार्यता को खिलाफते उस्मानिया के तुर्कों के खिलाफ नफ़रत को भड़काने के लिए इस्तेमाल किया गया था। समकालीन सऊदी अरब की तौहीद की स्कूली किताबों में दुश्मनी के दायरे में यहूदी, गैरवहाबी मुसलमानों से लेकर आम तौर पर पश्चिमी सभ्यता तक शामिल है। मिसाल के तौर पर आठवीं कक्षा की तौहीद की किताब में इस अवधारणा को सही सोच वाले मुसलमानों के साथ प्यार और दोस्ती रखी जाए और जो लोग सही विश्वास से सहमत न हों उनसे दुश्मनी (या सम्बंध खत्म कर लिया जाए) रखी जाए, के रूप में बताया गया है। दसवीं कक्षा में पढ़ाई जाने वाली तौहीद की पाठ्यपुस्तक में ''वफादारी दिखाने और दुश्मनी रखने, के अध्याय को बाहरी लोगों और विचारों व कार्यों के द्वारा दुश्मनों को ईमान वालों से अलग करने की रूपरेखा पेश करने के लिए इस्तेमाल करता है ....

"2002 में इस्तेमाल की गयी पाठ्य पुस्तक में स्पष्ट किया गया है कि मुसलमानों के बीच तयशुदा परम्पराओं को न मानने का विचार या वैसा ही अमल करने वाले को न सिर्फ सुधारना चाहिए बल्कि उसे तिरस्कृत भी करना चाहिए। गैर मुस्लिम दोस्ती के लायक नहीं हैं और न ही उनको बर्दाश्त करना है और न ही उन्हें आसानी से नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। वो सिर्फ नफरत के लायक हैं। किताब में लिखा है कि "ये तौहीद का क़ानून है कि एकेश्वरवादी (वहाबियों) मुस्लिमों के साथ वफादारी दिखाएं और बहुदेववादियों (सूफी, गैर-मुस्लिमों) से दुश्मनी रखें।''

''तुम्हारे मित्र तो केवल अल्लाह और उसका रसूल और वो ईमानवाले हैं; जो विनम्रता के साथ नमाज़ क़ायम करते हैं और ज़कात देते हैं। अब जो कोई अल्लाह और उसके रसूल और ईमानवालों को अपना मित्र बनाए, तो निश्चय ही अल्लाह का गिरोह प्रभावी होकर रहेगा।'' (कुरान 5: 55- 56)

तुम उन लोगों को ऐसा कभी नहीं पाओगे जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते है कि वो उन लोगों से प्रेम करते हो जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया, यद्यपि वे उनके अपने बाप हों या उनके अपने बेटे हो या उनके अपने भाई या उनके अपने परिवार वाले ही हों। (कुरान 58: 22)

"इसके अलावा पाठ्य पुस्तक (क़ुरानी आयतों और हदीसों से सबूत लेकर किसी बात को साबित करना) मक्का की लड़ाई के समय की विशिष्ट घटनाओं को बिना एतिहासिक संदर्भ के ये साबित करने के लिए पेश किया गया है कि मुसलमानों और गैर मुस्लिमों के बीच सम्बंध का न होना एक सार्वभौमिक और शाश्वत शर्त है जिसे अल्लाह ने बनाया है (10b: 109- 110).10। इस अध्याय में बताया गया है कि अल-वला वअल-बरा का इस्लाम में बहुत महत्व है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया है कि, "ईमान (विश्वास) का सबसे मज़बूत बंधन उससे प्यार है जिसे खुदा प्यार करे और उससे नफरत है जिससे खुदा नफरत करे और इन दो बातों के साथ ही मुसलमान अल्लाह की स्वामीभक्ति हासिल कर लेता है।" (10b: 110) इस अध्याय में खुदा की खातिर दुश्मनी को इस्लाम के बुनियादी स्तम्भों से भी ऊपर उठा दिया गया है: "पैग़म्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो कोई खुदा के लिए प्यार करता है और खुदा के लिए नफ़रत करता है, खुदा के लिए किसी से वफादारी करता है और खुदा के लिए किसी से बैर रखता है, वो इसके द्वारा खुदा की स्वामीभक्ति हासिल कर लेगा। तब तक कोई ईमानवाला ईमान का मज़ा नहीं ले सकता है जब तक कि वो ऐसा न करता हो, चाहे वो नमाज और रोज़ा ज़रूरत से ज़्यादा करता हो। (10b: 110)

"वो बहुदेववादी (मुशरिक) दुश्मन कौन हैं जिनसे एकेश्वरवादी मुसलमानों को दुश्मनी रखनी चाहिए? मोहम्मद इब्न अब्दुल वहाब के मुताबिक बहुदेववादी दुश्मनों में वो मुसलमान शामिल थे जो विशेष रूप से खिलाफते उस्मानिया के तुर्क, शिया, सूफी और हर वो व्यक्ति जो तावीज़ पहनता और जादू करता हो। स्कूली किताब में दुश्मन बनने के तरीके बताये गये हैं, ये भी स्पष्ट किया गया है कि धर्म का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ दुश्मनी रखने के लिए क्यों मुसलमानों को सतर्क रहना चाहिए। जब छात्र पाखण्ड को देखें तो उन्हें इसकी पहचान करनी चाहिए। अगर कोई व्यक्ति नैतिक रूप से पथभ्रष्ट व्यक्ति के साथ घुलता मिलता है लेकिन वो इन बुराइयों से खुद को मुक्त समझता है तो वो पाखंडी है और ऐसे लोगों से सम्बंध न तोड़ कर और नफरत न करके वो खुदा से बग़ावत कर रहा है। (10b: 111) इस किताब में इब्राहीम अलैहिस्सलाम की वो कहानी दी गई है जिसमें उन्होंने उन लोगों से सम्बंध विच्छेद कर लिया था जो खुदा पर विश्वास नहीं रखते थे इसके बजाए वो मूर्ति पूजा करते थे।"11

"फिक़्ह और हदीस की किताबों में काफिरों की नकल को नैतिक रूप से भ्रष्ट व्यवहार करार दिया गया है। मिसाल के तौर पर जो औरतें विदेशियों की तरह कपड़े पहनती हैं वो बुराई को आमंत्रित करती हैं, इसलिए मुसलमान औरतों के लिबास का कपड़ा इतना मोटा होना चाहिए जिससे उसका शरीर दिखाई न दे इतना ढीला ढाला होना चाहिए कि शरीर की आकृति छिप जाए और उसके व्यक्तित्व की सुरक्षा के लिए उसका चेहरा ढका होना चाहिए। काफिरों की नकल करना खुदा का अपमान है क्योंकि मुसलमानों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो उससे प्यार करें जिससे खुदा प्यार करे और उससे नफरत करें जिससे खुदा नफरत करे। अगर कोई मुसलमान काफिरों के समारोहों में शामिल होता है या अपनी खुशी या ग़म को उनसे साझा कर है तो वो उनके साथ वफादारी का प्रदर्शन कर रहा है। (10b: 118) काफिरों को ईद मुबारक कहना उतना ही बुरा जितनी की सलीब की पूजा करना, ये जाम टकराने से भी ज़्यादा बुरा पाप है। ये आत्महत्या से भी बदतर है और ये वर्जित संसर्ग से भी बदतर है, और बहुत से लोग ऐसा करते हैं और उन्हें ये एहसास भी नहीं होता कि उन्होंने कितना बड़ा पाप किया है। (10b: 118)

हिजरी के बजाय "ईस्वी" सन् का उपयोग कर काफिरों की नकल करना भी एक समस्या है, क्योंकि "ईस्वी" सन् से यीशु मसीह की जन्म तिथि का संकेत मिलता है और जो काफिरों के साथ लगाव को दिखाता है। क्रिसमस के दिन मुसलमानों को काफिरों की तरह कपड़े नहीं पहनने चाहिए, उन्हें तोहफों का लेन देन नहीं करना चाहिए और न ही उनकी दावत में जाना चाहिए और न ही उस दिन बनना सँवरना चाहिए। काफिरों के त्योहार मुसलमान के लिए आम दिनों की तरह ही होने चाहिए। जैसा कि इब्ने तैमिया ने कहा है: "आसमानी किताब वाले धर्म के लोगों के साथ उन बातों पर सहमत होना जो हमारे धर्म में नहीं हैं और जो हमारे पूर्वजों की परम्परा में नहीं रही है, वो धर्म से विचलन है। इन बातों से परहेज़ कर आप उनको समर्थन देने पर रोक लगाते हैं।" किताब के इस अध्याय में चेतावनी दी गयी है कि अगर आप उनके त्योहारों के मौके पर क़ुर्बानी करते हैं ये ऐसा ही है जैसे आपने सुअर की बलि दी हो।

"पाठ्य पुस्तकों में अतीत के हवाले को वर्तमान के लिए चेतावनी के रूप में पेश किया गया है। "नौकरी, लड़ाई और इस जैसे ही मामलों में काफिरों के इस्तेमाल के बारे में निर्णय" के शीर्षक से इस अध्याय के एक हिस्से में इब्ने तैमिया का ये बयान दर्ज है कि, विद्वान लोग ये बात जानते हैं कि यहूदी और ईसाई मुसलमानों के बारे में खुफिया जानकारी अपने सहधर्मी लोगों को देते रहे हैं। (10b: 119) नियम ये है कि काफिरों के साथ न तो सहयोग किया जाए और न ही उन पर विश्वास किया जाए:

"ऐ ईमान लाने वालो! अपनों को छोड़कर दूसरों को अपना अंतरंग मित्र न बनाओ, वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने में कोई कमी नहीं करते। जितनी भी तुम कठिनाई में पड़ो, वही उनको प्रिय है। उनका द्वेष तो उनके मुँह से व्यक्त हो चुका है और जो कुछ उनके सीने छिपाए हुए है, वह तो इससे भी बढ़कर है।" (कुरान 3: 118)

"अगर कोई ऐसा मुसलमान मौजूद हो जो वो काम कर सकता हो तो उसी काम के लिए किसी काफिर को नौकरी पर नहीं रखना चाहिए, और अगर उनकी कोई ज़रूरत न हो, तो उन्हें कभी भी नौकरी पर नहीं रखना चाहिए क्योंकि काफिरों पर कभी भी भरोसा नहीं किया जा सकता (10b: 121) और न ही किसी मुसलमान को किसी काफिर की नौकरी स्वीकार करनी चाहिए क्योंकि किसी मुसलमान को कभी भी किसी काफिर की अधीनता में नहीं रहना चाहिए, जो निश्चित रूप से उसका अपमान करेगा। और न ही उसे खुद को ऐसी स्थिति में डालना चाहिए जिसमें धर्म से इंकार करने की आवश्यकता हो।

किसी भी मुसलमान को स्थायी रूप से काफिरों के बीच नहीं रहना चाहिए क्योंकि इससे विश्वास के साथ समझौते की संभावना हो सकती है यही कारण है कि अल्लाह ने मुसलमानों को काफिरों की धरती से इस्लाम मानने वालों की धरती के लिए प्रवास करने के लिए कहा है। जहां तक उन लोगों का सम्बंध है जो काफिरों के लिए काम करते हैं और उनके बीच ही रहते हैं तो ये उनके साथ वफादारी और उनके साथ सहमत होने के जैसा है। और ये इस्लाम से मुर्तद (स्वधर्म त्याग) होना है। यद्यपि कोई अपने फायदे या आराम के लिए उन लोगों के बीच रह रहा हो और वो उनके धर्म से नफरत और अपने धर्म की रक्षा करता हो तब भी इसकी इजाज़त नहीं है। सबसे भयानक सज़ा से सावधान रहें। (10b: 121)

"इस अध्याय में संगीत, हास्य और गीत की मनाही के बारे में चेतावनी दी गयी है जिसे 19वीं शताब्दी में अलसऊद के नेतृत्व में टिप्पणीकारों ने वहाबियों से सख्त उपमा दी है। अध्याय के अनुसार प्रसन्नचित व्यवहार पर मनाही का मतलब ये है ताकि मुसलमान अपना पूरी ऊर्जा फालतू गतिविधियों के बजाए खुदा के ध्यान में लगाने के लिए प्रेरित हो। हालांकि , इस तरह की मनाही की महत्ता नये दुश्मनों और पश्चिमी संस्कृति के हमले की समकालीन चिंताओं में स्थानांतरित हो जाती है। और "काफिरों की बुरी तरह से नकल को लेकर फालतू बातों में इस तरह तल्लीनता बढ़ रही है और जिसे खुद कुफ्फार ने अपने समाजों में बढ़ावा दिया है कि जिससे मुसलमान भी खुदा की याद और नेक कामों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। जैसा कि अल्लाह का फरमान है, ''ऐ ईमान लाने वालो! तुम्हारे माल तुम्हें अल्लाह की याद से ग़ाफ़िल न कर दें और न तुम्हारी सन्तान ही। जो कोई ऐसा करे तो ऐसे ही लोग घाटे में रहने वाले हैं।'' (कुरान 63: 9; 10b: 124) इस अध्याय में स्पष्ट किया गया है कि काफिर अनावश्यक बातों को महत्व देते हैं, क्योंकि बिना किसी धार्मिक विश्वास के उनका जीवन खाली है।

"ये महत्वहीन बातें क्या हैं? पहला, कला का प्रदर्शन जैसे गाना और वाद्य यंत्र बजाना, नृत्य, थिएटर और सिनेमा आदि इन्हें वो ही लोग देखने आते हैं जो सत्य से दूर हो चुके हैं। इसके बाद ललित कला जैसे पेंटिंग, ड्राइंग और मूर्तिकला आदि हैं। (कला पर पाबंदी के बावजूद सऊदी अरब में कुछ स्कूलों कला की शिक्षा देते हैं) फिर इसके बाद खेल है जो नौजवानों के लिए कभी कभी खुदा को याद करने और उसका हुक्म बजा लाने से से भी अधिक महत्वपूर्ण है। खेल के कारण नौजवान  नमाज़ छोड़ देते हैं और स्कूल और घर की ज़िम्मेदारियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। क्या इस तरह के व्यवहार की इस्लाम में इजाज़त है या आज मुस्लिम क़ौम को अपने दुश्मनों की चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी ऊर्जा को बचाना चाहिए: "महत्वहीन गतिविधियों में बर्बाद करने के लिए मुसलमानों के पास समय नहीं है।" (10b: 124- 125)

"(डॉ. खालिद अबुल फज़ल (2003) का कहना है कि, ''जन्मदिन समारोह विशेष रूप से पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के जन्मदिन मनाने और आधुनिक जीवन का हिस्सा कला के प्रदर्शन से रोकना, ये सभी सभी वहाबी संस्कृति की ऐतिहासिक विरासत हैं।"किसी भी मानव गितिविधि जिससे कल्पना को उत्तेजना या रचनात्मकता को बढ़ावा  मिले उसके खिलाफ वहाबियों की दुश्मनी शायद वहाबियत की बहुत हास्यास्पद और घातक प्रकृति है। डॉ. खालिद अबुल फज़ल का कहना है, "हर वो गतिविधि जो रचनात्मकता की दिशा में एक कदम बढ़ाती हो वो वहाबियों के मुताबिक कुफ्र (अधर्म) की तरफ एक कदम है।"

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